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होम भारत

नाकाम किए मिशनरी

भारत के इतिहास में पहली बार बंजारा समाज का महाकुंभ महाराष्ट्र के जलगांव जिले के गोद्री ग्राम में संपन्न हुआ। इससे पहली बार भारत और विश्व को बंजारा समाज, संस्कृति एवं इतिहास के दर्शन हुए। एक हजार से भी ज्यादा संतों और 15 लाख श्रद्धालुओं ने इसमें भाग लिया। इससे बंजारा समाज को हिन्दुओं से अलग करने और कन्वर्ट करने की मिशनरियों की साजिश नाकाम हो गई

Written byPanchjanyaPanchjanya
Mar 8, 2023, 09:00 pm IST
in भारत, महाराष्ट्र
महाकुंभ में बनी यज्ञशाला

महाकुंभ में बनी यज्ञशाला

देशभर के एक हजार संतों और समाज के विभिन्न तबकों के 15 लाख श्रद्धालुओं ने गोद्री गांव में एकत्र होकर बंजारा समाज के साथ एकजुटता दिखाई तो गोर बंजारा, लबाना और नायकड़ा समाज के लाखों प्रतिनिधियों ने कुंभ में पहुंच कर हिंदुत्व के प्रति अपने दृढ़ संकल्प को जाहिर किया। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से कुंभ में गोर बंजारा, लबाना और नायकड़ा समाज की परंपराओं का दर्शन हुआ।

लंबे समय से हिंदू विरोधी षड्यंत्रों के शिकार रहे बंजारा समाज के इतिहास, पराक्रम, शौर्य, संस्कृति से परिचित होने का अवसर था महाराष्ट्र के जलगांव जिले के जामनेर-गोद्री गांव में संपन्न हुआ छह दिवसीय बंजारा कुंभ। बंजारा कौन, पहचान क्या जैसे प्रश्न उठाकर हिंदू समाज को बांटने का षड्यंत्र करने वालों को इस कुंभ ने धता बता दिया। देशभर के एक हजार संतों और समाज के विभिन्न तबकों के 15 लाख श्रद्धालुओं ने गोद्री गांव में एकत्र होकर बंजारा समाज के साथ एकजुटता दिखाई तो गोर बंजारा, लबाना और नायकड़ा समाज के लाखों प्रतिनिधियों ने कुंभ में पहुंच कर हिंदुत्व के प्रति अपने दृढ़ संकल्प को जाहिर किया। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से कुंभ में गोर बंजारा, लबाना और नायकड़ा समाज की परंपराओं का दर्शन हुआ।

पिछले 15 से 20 वर्ष में गोर बंजारा समाज में दो बड़ी चुनौतियां सामने आईं। एक है ईसाईकरण और दूसरा अहिंदूकरण। तेलंगाना, विदर्भ, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश में ईसाईकरण का संकट इतना बढ़ गया है कि 3500 टांडे ईसाईग्रस्त हो चुके हैं। महाराष्ट्र में दुष्प्रचार प्रांरभ है कि बंजारे हिंदू नहीं, बल्कि उनका अलग गोर धर्म है। इस दुष्प्रचार के माध्यम से राष्ट्रविरोधी शक्तियों द्वारा बंजारा समाज का अहिंदूकरण करने की चेष्टा की जा रही है। साथ ही बंजारा समाज अलग-अलग जातियों में बंटा होने के कारण एक-दूसरे से दूर होता जा रहा है। अपनी सनातन संस्कृति, परंपरा, त्योहार और सांस्कृतिक विरासत से आत्मविस्मृत होता जा रहा है।

पूज्य बाबूसिंग महाराज
कुंभ में शामिल मातृशक्ति

कुंभ में धर्मसभा, संत वचन, गुरुवाणी, कृष्णलीला, संत रामराव बापू अमृतवाणी, संस्कृति दर्शन आदि कार्यक्रम प्रतिदिन हुए। इस कुंभ में सात नगर बसाए गए थे। हर नगर में दिनभर महाप्रसाद के रसोड़े चलते थे। अमृतसर और नांदेड़ से आए सिख बंधुओं ने दो बड़े लंगर और बचतगटों के 200 स्टाल भी सजाए थे। कुंभ में मेला और प्रदर्शनी भी श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बने थे। उगते सूरज की आकृति में बहुत बड़ी प्रदर्शनी सजाई गई थी, जिसमें बंजारा समाज का इतिहास, संस्कृति, महापुरुषों का चरित्र, कन्वर्जन की वास्तविकता, सामाजिक समरसता आदि विषयों की प्रदर्शनी रखी गई थी। बंजारा संस्कृति के आभूषण, खेती औजार, परंपरागत वस्त्रों का भी समावेश था।

बंजारा समाज ने पीढ़ी दर पीढ़ी राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया है। इस समाज ने हड़प्पा-मोहनजोदड़ो सभ्यता से चलती आ रही सांस्कृतिक विरासत आजतक कुशलता से संभाली है। वीर लखी शाह बंजारा और मलुकी बंजारा के शौर्य-पराक्रम, संत सेवाभाया के समाजरक्षण, पूज्य लक्ष्मण चैतन्य बापू के धार्मिक चिंतन और पूज्य रामराव बापू के आध्यात्मिक मार्गदर्शन ने पूरे समाज को जीने की राह दिखाई है। अंग्रेजों और मुगलों ने बंजारा समाज को सनातन संस्कृति से तोड़ने के बहुत प्रयास किए, उनकी राष्ट्रभक्ति को मिटाने के षड्यंत्र किए लेकिन वे सफल नहीं हो सके।

समय बीता, भारत स्वतंत्र हुआ लेकिन देश विरोधी शक्तियों के षड्यंत्र अलग-अलग तरीकों से जारी हैं। आमने-सामने की लड़ाई में परास्त होने वाली इन देश विरोधी शक्तियों ने भोले-भाले बंजारा समाज को ईसाई मिशनरियों द्वारा छल-कपट से सनातन संस्कृति से अलग करना प्रारंभ कर दिया। बंजारा समाज को उकसाया जा रहा है कि ‘बंजारा हिंदू नहीं हैं’,… ‘जनगणना में हमारा धर्म हिंदू नहीं लिखना’।

बंजारा समाज की यह सामाजिक और सांस्कृतिक क्षति धर्मजागरण समन्वय के माध्यम से पूज्य संतों के संज्ञान में लाई गई। बंजारा समाज इन षड्यंत्रों को समझे और अपने परिवार एवं टांडो को बचाए, इस दृष्टि से संतों ने कुंभ में परम शक्तिशाली ईश्वर को साक्षी रखते हुए बंजारा, लबाना समाज का मार्गदर्शन किया। पूज्य शंकराचार्य सदानंद सरस्वती जी ने कहा, ‘यदि भारत में हिंदू धर्म जीवित रहेगा, तभी राष्ट्र जीवित रहेगा। हिंदू धर्म और हिंदुत्व अलग नहीं हैं। बंजारा समाज के पूर्वजों ने हिंदू धर्म के लिए बलिदान दिया है।’

गोरक्षनाथ पीठाधीश्वर श्री योगी आदित्यनाथ ने कहा, ‘बंजारा समाज के पास भारत माता की रक्षा के लिए व्यापक कार्य है। हिंदू धर्म ही मानव धर्म है।’

पूज्य बाबूसिंग जी महाराज ने कहा, ‘साढ़े तीन हजार टांडो पर कन्वर्जन हुआ, सबको वापस सनातन धर्म में लाएंगे।’
पूज्य जितेंद्र महाराज ने कहा, ‘गोर बंजारा हिंदू धर्म का अभिन्न हिस्सा हैं। हम सब हिंदू हैं।’

योगगुरु बाबा रामदेव ने कहा, ‘बंजारा समाज का आत्मबल हिमालय से भी ऊंचा है, भला कोई कैसे हमें हमारे स्वधर्म से अलग कर सकता है। बंजारा समाज के पुरखों ने हिंदू धर्म के लिए खून बहाया है।’ संतों की इस विवेक वाणी से उपस्थित श्रद्धालु और पूरा समाज जाग्रत हुआ। संतों की इस पवित्र वाणी को मन में बसाकर लाखों श्रद्धालु देशभर में अपने-अपने गांवों और तांडो पर एक जागरूक देशवासी बन कर अपना कर्तव्य निभाएंगे, राष्ट्र और धर्म की रक्षा करेंगे, यही है इस कुंभ का संदेश।

धर्मरक्षा के लिए प्रस्ताव

पूज्य धोंडीराम बाबा

इस कुंभ में धर्मरक्षा के लिए संतों द्वारा दो महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए। पहले प्रस्ताव में आह्वान किया गया कि बालाजी भगवान, जगदंबा माता और भगवान श्रीकृष्ण के मंदिर हर टांडे पर रहेंगे। पूजा अरदास के साथ सेवालाल नित्य पाठ का नियमित पाठन करेंगे और गोरमाटी भाषा का रक्षण एवं संवर्धन करेंगे। दूसरे प्रस्ताव में कन्वर्जन पर रोक लगाने के लिए महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में धर्म स्वातंत्र्य विधेयक को शीघ्रताशीघ्र लागू किए जाने की मांग हुई।

कुंभ के दूसरे दिन संत धोंडीराम महाराज और संत चंद्रबाबा जी की मूर्तियों की मंदिर में स्थापना हुई। संत चंद्रबाबा सिख पंथ के संस्थापक गुरुनानक जी के पुत्र थे और संत धोंडीराम बाबा उनके शिष्य थे। अपनी लंबी प्रवास यात्रा में पूज्य धोंडीराम बाबा गोद्री
में स्थाइक हुए। आज उनके वंशज इसी स्थान पर बसे हुए हैं। पूरे बंजारा, लबाना समाज में पूज्य धोंडीराम बाबा के प्रति बहुत आस्था है।

कुंभ में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करतीं महिलाएं

11 हजार टाडों से संपर्क

बंजारा महाकुंभ की तैयारी वृहद स्तर पर की गई थी। कुभ से पूर्व छह महीनों तक महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में बंजारा समाज के टाडों और नगरों में लगभग 400 संतों ने प्रवास कर निमंत्रण दिया। संतों के साथ टाडों के नायक, कार्यभारी और अन्य समाजगण भी सहभागी हुए। पांच राज्यों में 50 सदस्यों (40 पुरुष, 10 महिला) की टीम बनाई गई। इस भौगोलिक क्षेत्र के 450 जिलों में से 350 जिलों में स्वतंत्र टीमें बनीं जिनकी कुल संख्या सात हजार थी। इस कालखंड में छोटी-बड़ी 2 हजार बैठकें हुईं जिनमें 10 हजार से अधिक कार्यकर्ता शामिल हुए। संपर्क किए गए सभी 11 हजार टाडों पर धर्मरक्षा समितियां बनाई गईं जिसमें पांच राज्यों में 65 हजार कार्यकर्ता जुड़ गए। गांव-गांव और टाडा जाकर बंजारा समाज तक कुंभ का निमंत्रण और प्रचार साहित्य पहुंचाया गया। इस दौरान बंजारा समाज के करीब 800 संतों से संपर्क हुआ जिनकी कुंभ में सौ प्रतिशत उपस्थिति रही।

यह दिव्य महाकुंभ 25 जनवरी से 30 जनवरी, 2023 तक छह दिन चला जिसकी अध्यक्षता पोहरागढ़ के पूज्य बाबूसिंग जी महाराज ने और संचालन समिति का नेतृत्व पालधाम के पूज्य श्याम चैतन्य बापू जी ने किया। पूज्य बाबूसिंग जी महाराज ने प्रतिपादित किया कि बंजारा महाकुंभ के आयोजन का उद्देश्य केवल धार्मिक न होकर, हिंदू धर्म और देश की रक्षा है। कुंभ में संत श्री गोपाल चैतन्य जी बाबा, संत सुरेश बाबा, संत रामसिंग जी महाराज, संत यशवंत जी महाराज, संत श्री रायसिंग जी महाराज, महामंडलेश्वर जनार्दन हरि जी महाराज, परम पूज्य हिम्मत जी महाराज, संत साहेबराव जी शास्त्री, परम पूज्य विशुद्धानंद जी महाराज, संत सर्वचैतन्य जी महाराज, परम पूज्य दिव्य चैतन्य जी महाराज, परम पूज्य शांति चैतन्य जी महाराज, अखिल भारतीय धर्मजागरण प्रमुख शरदराव ढोले, क्रीड़ा एवं वैद्यकी शिक्षण मंत्री गिरीश जी महाजन आदि लोग उपस्थित रहे।

कुंभ में धर्मसभा, संत वचन, गुरुवाणी, कृष्णलीला, संत रामराव बापू अमृतवाणी, संस्कृति दर्शन आदि कार्यक्रम प्रतिदिन हुए। इस कुंभ में सात नगर बसाए गए थे। हर नगर में दिनभर महाप्रसाद के रसोड़े चलते थे। अमृतसर और नांदेड़ से आए सिख बंधुओं ने दो बड़े लंगर और बचतगटों के 200 स्टाल भी सजाए थे। कुंभ में मेला और प्रदर्शनी भी श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बने थे। उगते सूरज की आकृति में बहुत बड़ी प्रदर्शनी सजाई गई थी, जिसमें बंजारा समाज का इतिहास, संस्कृति, महापुरुषों का चरित्र, कन्वर्जन की वास्तविकता, सामाजिक समरसता आदि विषयों की प्रदर्शनी रखी गई थी। बंजारा संस्कृति के आभूषण, खेती औजार, परंपरागत वस्त्रों का भी समावेश था।

 

 

Topics: शंकराचार्य सदानंद सरस्वतीMahakumbh MaharashtraChristianizationकन्वर्जनNon-HinduizationConversionHarappa-Mohanjodaro CivilizationईसाईकरणShankaracharya Sadanand Saraswatiबंजारा समाजBanjara societyमहाकुंभ महाराष्ट्रअहिंदूकरणहड़प्पा-मोहनजोदड़ो सभ्यता
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