शिंदे बने बाला साहेब के वारिस
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शिंदे बने बाला साहेब के वारिस

चुनाव आयोग ने शिवसेना की बागडोर के साथ पार्टी चुनाव चिह्न भी एकनाथ शिंदे गुट के सुपुर्द किया। अर्थात् आयोग ने उन्हें बाला साहेब ठाकरे का वारिस माना। इससे उद्धव के सामने पैदा हुआ अस्तित्व का संकट

Written byसुमित मेहतासुमित मेहता
Mar 2, 2023, 07:59 am IST
inभारत, विश्लेषण, महाराष्ट्र
अब क्या होगा: चुनाव आयोग के फैसले के बाद उद्धव ठाकर एवं संजय राउत

अब क्या होगा: चुनाव आयोग के फैसले के बाद उद्धव ठाकर एवं संजय राउत

शिवसेना पार्टी के सदस्यों और समर्थकों का जो वर्ग केवल बाल ठाकरे की वजह से उद्धव के साथ खड़ा था, अब वह भी शिंदे शिविर में शामिल होने के लिए पाला बदलने पर विचार कर सकता है। इसका अर्थ यह होगा कि उद्धव के पास मुट्ठी भर हिंदू वोट और सम्मानजनक तादाद में मुस्लिम वोट रह जाएगा।

चुनाव आयोग ने शिवसेना के मूल चुनाव चिह्न और पार्टी पर नियंत्रण को एकनाथ शिंदे गुट को सौंप दिया है। महाराष्ट्र की राजनीति में आया यह सबसे बड़ा भूचाल है। न केवल उद्धव ठाकरे यह लड़ाई हार गए हैं और शिंदे ने पार्टी और उसके चुनाव चिह्न पर नियंत्रण हासिल कर लिया है, बल्कि चुनाव आयोग के इस फैसले ने प्रकारांतर से शिंदे को बाल ठाकरे का वारिस मान लिया है। यह बहुत बड़ा घटनाक्रम है, जो भारतीय राजनीति के इतिहास में इसके पहले सिर्फ एक बार हुआ है। कई लोगों को यह सातवें दशक की उस घटना की पुनरावृत्ति लगता है, जब इंदिरा गांधी ने न केवल उस पार्टी का नियंत्रण हासिल करने के लिए लड़ाई लड़ी, जिसने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका निभाई थी, बल्कि गांधी और नेहरू की विरासत पर भी दावा ठोका था।

वर्तमान राजनीतिक संदर्भ में इस फैसले का महाराष्ट्र में ही नहीं, बल्कि कई राज्यों में बड़ा प्रभाव पड़ने जा रहा है। यह घटनाक्रम सबसे पहले महाराष्ट्र की राजनीति पर गहरा प्रभाव डालेगा। शिवसेना पर पड़े प्रभाव को उद्धव ठाकरे गुट के दृष्टिकोण से देखें, तो वे जो कुछ भी शिंदे के हाथों छिनने से बचाने में अब तक सफल रहे थे, अब चुनाव चिह्न छिनने से उन्हें वहां भी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

वास्तव में शिंदे के तख्तापलट किए जाने के बावजूद उद्धव ठाकरे शिवसैनिकों और समर्थकों का एक अच्छा-खासा भाग अपने साथ बनाए रखने में सफल रहे थे। उन्होंने इस वर्ग को अपने साथ बनाए रखने के लिए बाल ठाकरे के प्रति वफादारी और उनकी विरासत का दावा करने की रणनीति का इस्तेमाल किया था। शिंदे के पक्ष में चुनाव आयोग का फैसला आने के बाद, उद्धव ठाकरे की विरासत का दावा करने का नैतिक बल और अधिकार खो बैठे हैं। इसका सीधा प्रभाव आगामी नगरपालिका चुनाव और 2024 के विधानसभा और आम चुनाव में उद्धव की चुनावी संभावनाओं पर पड़ेगा।

चुनाव चिह्न और मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा शिंदे को मिलने के बाद, उद्धव के चिंतित होने का यह एक और बड़ा कारण है। उनके लिए तीसरी चिंता शिवसेना के पारंपरिक मतदाताओं का वह गरीब वर्ग है, जो अब उनसे सीधे प्रश्न करने लगा है कि उन्होंने मराठी माणूस के लिए आखिर किया क्या है। यह एक खुला रहस्य है कि गैर-महाराष्ट्रियनों के साथ-साथ मराठियों को भी उद्धव ठाकरे सरकार के दौरान चले जबरन वसूली कारोबार का खामियाजा भुगतना पड़ा है। 

सेकुलर चेहरा बनाए रखना मजबूरी
शिवसेना पार्टी के सदस्यों और समर्थकों का जो वर्ग केवल बाल ठाकरे की वजह से उद्धव के साथ खड़ा था, अब वह भी शिंदे शिविर में शामिल होने के लिए पाला बदलने पर विचार कर सकता है। इसका अर्थ यह होगा कि उद्धव के पास मुट्ठी भर हिंदू वोट और सम्मानजनक तादाद में मुस्लिम वोट रह जाएगा। महाराष्ट्र में मुस्लिम वोटों का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस से होते हुए अब शिवसेना के उद्धव गुट के पाले में आ चुका है।

स्वाभाविक है कि उद्धव को अब अपनी राजनीतिक जमीन की रक्षा के लिए अगली चाल पर काफी गहराई से विचार करना होगा। उनके पास एक सरल विकल्प यह है कि वे विक्टिम कार्ड चलें और मतदाताओं के साथ एक भावनात्मक जुड़ाव बनाने की कोशिश करें। उद्धव का इस प्रकार का बयान देना कि शिंदे बाल ठाकरे की पार्टी और चुनाव चिह्न की ‘चोरी’ कर सकते हैं, लेकिन बाल ठाकरे के आदर्शों की चोरी नहीं कर सकते, सहानुभूति हासिल करने की कोशिश की इसी रणनीति का संकेत देता है। लेकिन इसके साथ ही, मुस्लिम वोट बरकरार रखने के लिए सेकुलर चेहरा बनाए रखना उद्धव की मजबूरी है। उद्धव अच्छी तरह जानते हैं कि मुस्लिम वोटों के दम पर ही कांग्रेस मुंबई में बची है।

कोरे नारे रास नहीं
उद्धव ठाकरे को बीएमसी की सीमा में घटते मराठी वोटों और बीएमसी चुनाव में इसके प्रभाव का स्पष्ट अनुमान है। बीएमसी में 1990 के दशक में मराठी वोट 40 प्रतिशत से अधिक थे, जो अब घटकर 28 प्रतिशत रह गए हैं। इन्हीं 28 प्रतिशत मतदाताओं के लिए कांग्रेस, राकांपा, रिपब्लिकन पार्टी, राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना, शिंदे की शिवसेना, भाजपा और उद्धव ठाकरे की शिवसेना सहित सभी राजनीतिक दलों में होड़ है। ऐसे में उद्धव ठाकरे को बीएमसी चुनाव में अच्छी संख्या में सीटें हासिल करने के लिए मुस्लिम वोटों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।

यही कारण है कि उद्धव एक धर्मनिरपेक्ष विचारधारा बनाए रखने को मजबूर हैं। उन्हें इस बात का भी पूरा अहसास है कि मुस्लिम उनका समर्थन तभी तक करेंगे, जब तक वे अच्छा खासा हिंदू समर्थन अपने साथ प्रदर्शित करने में सक्षम होंगे। उद्धव यह संतुलन कैसे स्थापित कर सकेंगे, यह आगामी बीएमसी चुनावों में देखने लायक महत्वपूर्ण बिन्दु होगा। उद्धव ठाकरे के लिए परेशानी वाली अन्य बड़ी बात यह है कि मुंबई के मराठी मतदाताओं के एक वर्ग में धीमे ही सही, लेकिन निश्चित तौर पर यह अहसास घर करता जा रहा है कि कि मराठी माणूस के खाली उग्र नारों से उनका भला नहीं होना। शिवसेना का पारंपरिक मराठी माणूस मतदाता आधार मिल श्रमिकों और अल्पशिक्षित श्रमिक वर्ग में था। लेकिन अब उनकी तीसरी पीढ़ी सामने है, जो उच्च शिक्षित भी है और कॉर्पोरेट नौकरियों में है। बाल ठाकरे द्वारा उछाली गई मराठी माणूस विचारधारा उसको रास नहीं आती।

मराठी माणुस भी नाराज
इस पहलू से न केवल उद्धव ठाकरे, बल्कि एकनाथ शिंदे के वोट बैंक में भी कमी आ चुकी है। यह चीज 2017 के बीएमसी चुनाव परिणामों में दिखाई दी थी, जिसमें भाजपा 82 सीटों पर जीत हासिल कर शिवसेना के बराबर आ गई थी, जबकि शिवसेना ने 84 सीटों पर जीत हासिल की थी। शिवसेना के उन मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा भाजपा में स्थानांतरित हो गया है या होता जा रहा है। चुनाव चिह्न और मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा शिंदे को मिलने के बाद, उद्धव के चिंतित होने का यह एक और बड़ा कारण है। उनके लिए तीसरी चिंता शिवसेना के पारंपरिक मतदाताओं का वह गरीब वर्ग है, जो अब उनसे सीधे प्रश्न करने लगा है कि उन्होंने मराठी माणूस के लिए आखिर किया क्या है। यह एक खुला रहस्य है कि गैर-महाराष्ट्रियनों के साथ-साथ मराठियों को भी उद्धव ठाकरे सरकार के दौरान चले जबरन वसूली कारोबार का खामियाजा भुगतना पड़ा है। सड़क किनारे के वड़ा पाव विक्रेताओं से लेकर सब्जी विक्रेताओं तक को शिवसेना की जबरन वसूली का सामना करना पड़ा है।

यह बात भी सबकी स्मृति में है कि 2020-22 में लॉकडाउन के दौरान गरीब मराठी लोगों को तो उनके हाल पर छोड़ दिया गया था, जबकि उद्धव के नेतृत्व वाली कांग्रेस-राकांपा-शिवसेना सरकार ने मुसलमानों को खुश करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी। वास्तव में एकनाथ के विद्रोह करने के प्रमुख कारणों में से एक कारण यही है। अगर यह विशुद्ध वैचारिक नहीं था, तो भी कम से कम अपने मतदाता आधार को सुरक्षित रखने के लिए उठाया गया एक सक्रिय कदम था।

जाहिर है, यह एकनाथ शिंदे का सबसे मजबूत हथियार भी हिंदुत्व ही रहेगा। उद्धव ठाकरे ने अपने जहाज को डूबने से बचाने में मदद करने के लिए ही सर्वोच्च न्यायालय में अपील की है। सर्वोच्च न्यायालय में जो भी परिणाम हो, शिवसेना के लिए जमीन पर संभावनाएं चुनौतीपूर्ण और विकट बन गई।

Topics: Supreme Courtsecular ideologyशिवसेना पार्टीShinde campउद्धव ठाकरे गुटBal Thackerayमराठी माणूस मतदाताधर्मनिरपेक्ष विचारधाराशिंदे शिविरबाल ठाकरेShinde becomes Balasaheb's heirShiv Sena PartyUddhav Thackeray factionसर्वोच्च न्यायालयMarathi manoos voters
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