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समाज: यह रीत है जीवन की

राजस्थान में जालौर के एक गांव में वाल्मीकि समाज की बेटी का विवाह

Written byसंदीप जोशीसंदीप जोशी
Dec 30, 2022, 12:36 pm IST
in भारत, धर्म-संस्कृति, सोशल मीडिया, राजस्थान
वाल्मीकि समाज की बेटी को आशीर्वाद देते ग्रामीण

वाल्मीकि समाज की बेटी को आशीर्वाद देते ग्रामीण

कुछ समय पहले राजस्थान में जालौर के एक गांव में वाल्मीकि समाज की बेटी का विवाह बड़े धूमधाम से संपन्न हुआ। खास बात यह रही कि विवाह की तैयारियों से लेकर कन्यादान और विदाई की रस्म ‘अगड़ी जाति’ के लोगों ने पूरी की। 7 तोले सोना, आधा किलो चांदी और इतना सामान दिया कि ट्रैक्टर ट्रॉली भर गई। समाज को जोड़ने वाली यह एक घटना मिसाल है

वाल्मीकि समाज की बेटी का ब्याह रचाते ग्रामवासी। सज-धज कर दूल्हे का स्वागत करतीं कथित उच्च जाति वर्ग की माता-बहनें।
यह दृश्य है, मेरे जालौर का। जालौर का नाम तो आपने सुना ही होगा। अभी हाल में एकाएक बहुत चर्चा में आ गया था। आज आपको जालौर के वास्तविक स्वरूप के दर्शन करवाते हैं।

जिला मुख्यालय से मात्र 10 किलोमीटर दूर एक गांव है-सांकरणा। जातिगत विद्वेष के कथित माहौल में वहीं से यह सुखद खबर आई है जहां गांव के सभी लोगों ने मिलकर वाल्मीकि समाज की एक बालिका को गांव की बेटी मानते हुए धूमधाम से उसका विवाह किया और सामाजिक समरसता की अद्भुत मिसाल प्रस्तुत की। गांव के वाल्मीकि समाज की महिला, जिसके पति जगदीश कुमार वाल्मीकि का देहांत हो चुका है, की पुत्री का विवाह धूमधाम से गांव के ही सुरेश सिंह पुत्र भैरुसिंह राजपुरोहित के नेतृत्व में समस्त ग्रामवासियों ने किया। सुरेश सिंह राजपुरोहित ने अपने घर में विवाह कराया और कन्यादान किया। यही नहीं, विवाह के दौरान उस (कथित दलित) परिवार को परिवारी भाव के साथ अपने घर में रखा।

ऐसे बहुत सारे सात्विक कार्य, अच्छे काम, हमारे चारों ओर होते रहते हैं। देखने की दृष्टि होनी चाहिए। यह घटना, यह दृश्य अपने आप में इकलौता उदाहरण नहीं है। ऐसे बहुत सारे उदाहरण हमारे आसपास हैं। पर सामान्यत: परिवारी भाव, अपनत्व, कर्तव्य भाव के साथ संपन्न इन प्रसंगों का लोग प्रचार-प्रसार नहीं करते, क्योंकि मन के संस्कार हैं।

बैंड और ढोल-थाली से सभी ग्रामवासियों द्वारा बारात का स्वागत किया गया। तथाकथित उच्च वर्ग की महिलाओं ने सज-धज कर मंगल गीतों के साथ वाल्मीकि समाज के दूल्हे का स्वागत किया एवं उसी प्रकार गांव के सभी लोगों ने अपनी बेटी को विदाई भी दी। विशेष बात यह है कि स्वच्छता कार्य करने वाली इस महिला का गांव भर में व्यवहार इतना अच्छा है और उसमें इतनी विनम्रता है कि गांव के साथ अनेक प्रवासी भी इस विवाह समारोह के लिए मुंबई से गांव तक आए।

बारात का स्वागत करने के साथ उन्होंने सुन्दर टेंट व्यवस्था में सुरुचिपूर्ण भोजन के साथ ही कन्या दान में 7 तोले सोना, आधा किलो चांदी, घर-गृहस्थी के सभी भौतिक संसाधन, बर्तन, कपड़े, नकद रुपये भेंट किए। बताते हैं कि गांव भर के लोगों ने अपने गांव की बेटी के लिए इतने उपहार दिए कि ट्रैक्टर ट्रॉली भर गई। सर्व समाज के लोगों ने कन्या दान में राशि दी। सुरेश सिंह राजपुरोहित, गोपाल सिंह राजपुरोहित, बाबूसिंह राजपुरोहित हंसाराम जी खवास, राजपुरी गोस्वामी, देवीसिंह राजपुरोहित सहित ग्रामवासियों ने समस्त मेहमानों का सम्मान किया।

अब कोई यह न कहे कि इतने दिन कहां थे? यहीं थे। ऐसे बहुत सारे सात्विक कार्य, अच्छे काम, हमारे चारों ओर होते रहते हैं। देखने की दृष्टि होनी चाहिए। यह घटना, यह दृश्य अपने आप में इकलौता उदाहरण नहीं है। ऐसे बहुत सारे उदाहरण हमारे आसपास हैं। पर सामान्यत: परिवारी भाव, अपनत्व, कर्तव्य भाव के साथ संपन्न इन प्रसंगों का लोग प्रचार-प्रसार नहीं करते, क्योंकि मन के संस्कार हैं। 6 वर्ष पूर्व ऐसे ही एक अति पिछड़े सामाजिक वर्ग के पहले सामूहिक विवाह कार्यक्रम में गोदन विद्यालय के कर्मचारियों ने मिलकर 40 सेट पलंग (बिस्तर, तकिया, चादर सहित कई सामान) की व्यवस्था की थी।

जालौर नगर में लगभग 3-4 वर्ष पूर्व एक अति पिछड़े वर्ग के भव्य सामाजिक सम्मेलन की सारी व्यवस्थाएं अन्य समाज के बंधुओं ने की थीं। इसे उन्होंने अपना कर्तव्य मान कर किया था। तथाकथित अगड़ों द्वारा पिछड़े समाज के बंधुओं के शादी-ब्याह में सहयोग करने की अनेक घटनाएं हैं। गांव-गांव में उदाहरण हैं। धर्म बहन बनाकर जीवनपर्यंत रिश्ता निभाने के उदाहरण हैं। मायरा भरने की सैकड़ों घटनाएं हैं। बहुत सारे अच्छे उदाहरण हैं, जो और बढ़ने चाहिए। अच्छे काम करना, लगातार करना और अच्छे कार्यों को विशाल करना ही पुराने घावों का इलाज है।

Topics: वाल्मीकि समाजसामाजिक समरसता
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