षड्यंत्र और समाधान : दासता का बोझ और नहीं
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षड्यंत्र और समाधान : दासता का बोझ और नहीं

भारत की उन्नत शिक्षा व्यवस्था को अंग्रेजों ने षड्यंत्रपूर्वक नष्ट किया। अंग्रेजों की शिक्षा प्रणाली ने मानसिक दास बनाए जिन्हें हम स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद तक ढोते रहे। परंतु अब नई शिक्षा नीति ने इन दोषों को दूर करने के सूत्र दे दिए

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Nov 2, 2022, 06:30 am IST
in विश्लेषण, गुजरात, शिक्षा, पाञ्चजन्य इवेंट
कर्णावती में पाञ्चजन्य द्वारा आयोजित साबरमती संवाद में मुकुल कानितकर से बातचीत करते पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर

कर्णावती में पाञ्चजन्य द्वारा आयोजित साबरमती संवाद में मुकुल कानितकर से बातचीत करते पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर

भारत की उन्नत शिक्षा व्यवस्था को अंग्रेजों ने षड्यंत्रपूर्वक नष्ट किया। अंग्रेजों की शिक्षा प्रणाली ने मानसिक दास बनाए जिन्हें हम स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद तक ढोते रहे। परंतु अब नई शिक्षा नीति ने इन दोषों को दूर करने के सूत्र दे दिए हैं। भारतीय शिक्षण मंडल के राष्ट्रीय महामंत्री मुकुल कानितकर से पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर की बातचीत पर आधारित रिपोर्ट

भारतीय शिक्षण मंडल के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्री मुकुल कानितकर ने कहा कि स्वतंत्रता के 75 वर्ष बीत जाने के बाद भी यदि हम पर औपनिवेशिक बोझ बना हुआ है तो इसके लिए हमारी अब तक की शिक्षा व्यवस्था जिम्मेदार रही है। उन्होंने कहा कि शिक्षा मानसिक दासता से भरे व्यक्तियों का निर्माण करेगी तो सारे ही तंत्र मानसिक दासता से भरे रहेंगे। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति ने 19 बीज सूत्र दिए हैं जिन्हें यदि समाज ने पुष्पित-पल्लवित कर लिया तो अद्भुत बदलाव होंगे। श्री कानितकर पाञ्चजन्य द्वारा कर्णावती में आयोजित साबरमती संवाद में ‘शिक्षा, षड्यंत्र और समाधान’ सत्र को संबोधित कर रहे थे।

सत्र संचालक पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर के यह पूछने पर कि इस देश की वास्तविक शिक्षा व्यवस्था कैसी थी और क्या इसके साथ षड्यंत्र हुए, श्री कानितकर ने कहा कि 1835 में हमारे देश में शिक्षा व्यवस्था का शीर्षासन हुआ था। उससे पहले इस देश के अंदर सर्वव्यापी, समावेशक, सर्वोपरि शिक्षा व्यवस्था थी। शिक्षा संस्थान थे, एक व्यवस्थित पद्धति थी, तंत्र था जिसमें इस देश में जन्म लेने वाले सभी वर्ण, सभी जाति, सभी आर्थिक वर्ग के प्रत्येक बालक-बालिका को शिक्षा की व्यवस्था थी। अंग्रेजों ने पूरे भारत की शिक्षा व्यवस्था का 1823 में सर्वेक्षण कराया।

थॉमस मुनरो ने मद्रास प्रेसिडेंसी, जिसमें अभी के दक्षिण भारत के पांचों राज्य शामिल थे, में सर्वेक्षण किया। सर्वे से पता चला कि यहां 100 प्रतिशत साक्षर और 76 प्रतिशत शिक्षित लोग यानी मैट्रिक पास थे। विलियम बेल द्वारा बंगाल प्रेसिडेंसी में किए गए सर्वेक्षण से पता चला कि वहां 98 प्रतिशत साक्षरता थी। विलियम लिटनर द्वारा पंजाब प्रेसिडेंसी में किए गए सर्वे से पता चला कि वहां 93 प्रतिशत साक्षरता थी जबकि विलियम एडम द्वारा बॉम्बे प्रेसिडेंसी में किए गए सर्वेक्षण के अनुसार वहां 98 प्रतिशत साक्षरता थी।

विलियम एडम ने सबसे बड़ी बात यह बताई कि एक तिहाई भारत में 1 लाख 13 हजार से अधिक विश्वविद्यालय और महाविद्यालय थे जहां उच्च शिक्षा दी जाती थी। मेटलर्जी, प्लास्टिक सर्जरी, मेडिसिन, हर प्रकार की इंजीनियरिंग सिखाई जाती थी। थॉमस मुनरो, बेल, लिटनर, एडम के सर्वेक्षण का नाम मैंने इसलिए लिया क्योंकि हमारे यहां का दुर्भाग्य है कि हमारे यहां की मानसिकता है कि भारतीय परंपरा के लोगों के हेय और अंग्रेजी परंपरा के लोगों को सही माना जाता है। यह मानसिकता बदलने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति में काम करना है।

पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर के यह पूछने पर कि इस देश की वास्तविक शिक्षा व्यवस्था कैसी थी और क्या इसके साथ षड्यंत्र हुए, श्री कानितकर ने कहा कि 1835 में हमारे देश में शिक्षा व्यवस्था का शीर्षासन हुआ था। उससे पहले इस देश के अंदर सर्वव्यापी, समावेशक, सर्वोपरि शिक्षा व्यवस्था थी। शिक्षा संस्थान थे, एक व्यवस्थित पद्धति थी, तंत्र था जिसमें इस देश में जन्म लेने वाले सभी वर्ण, सभी जाति, सभी आर्थिक वर्ग के प्रत्येक बालक-बालिका को शिक्षा की व्यवस्था थी।

उपनिवेशवाद में शिक्षा हथियार
पूरे यूरोप में 16वीं शताब्दी के बाद से जो उपनिवेशवाद की प्रक्रिया चली, उसमें भारत के प्रयोग के बाद शिक्षा एक बहुत बड़ा हथियार बना। गांधी जी ने भी 1931 में चैथम हाउस की बैठक में अंग्रेजों पर भारतीय शिक्षा व्यवस्था को नष्ट-भ्रष्ट करने का आरोप लगाया जिसमें बैठक के अंग्रेज अध्यक्ष ने इस आरोप को साबित करने की चुनौती दी। गांधी जी ने सिद्ध किया कि जब अंग्रेज भारत आए थे, उस समय यूरोप की कुल 1 प्रतिशत आबादी साक्षर थी जो भारत की कुल साक्षर आबादी की एक प्रतिशत थी।

श्री कानितकर ने कहा कि 2020 में स्वीकृत शिक्षा नीति 1835 के शैक्षिक शीर्षासन के 185 साल बाद आई है। इस राष्ट्रीय शिक्षा नीति में उस शीर्षासन को ठीक करने के लिए बीज बिन्दु हैं। इन बीजों को अंकुरित, पल्लवित करना, न करना समाज के हाथ में है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के 66 पृष्ठों के अभिलेख में बहुत सारे प्रावधान दिए गए हैं लेकिन लागू तो शिक्षकों को करना है। शिक्षक वही हैं जो 1835 की शिक्षा नीति से तैयार हुए हैं। इसीलिए मैं कहता हूं कि शिक्षा को मैकाले मुक्त करने से पहले स्वयं को मैकाले मुक्त करना पड़ेगा।

 

शिक्षा के साथ षड्यंत्र की शुरुआत
श्री शंकर के यह पूछने पर कि बार-बार ये पढ़ाया गया कि आर्य बाहर से आए, भारत का रास्ता पूछ कर आने वाले वास्को डी गामा को भारत का खोजकर्ता बता दिया गया, क्या अंग्रेजों का षड्यंत्र ऐसा था कि भारत के शिक्षित लोग प्रश्न पूछना भूल जाएं, श्री कानितकर ने कहा कि ये सारा षड्यंत्र विलियम जोन्स से शुरू हुआ। मैक्समूलर भी इसके शिकार हुए। भारतीय ज्ञान का गलत अनुवाद कर एक तरह से बौद्धिक षड्यंत्र किया गया। ये केवल राजनीतिक षड्यंत्र नहीं है। अंग्रेजों के उस समय के षड्यंत्र का खामियाजा हम आज तक भुगत रहे हैं।

भारत की शिक्षा व्यवस्था के साथ षड्यंत्र की शुरुआत नालंदा विश्वविद्यालय को बख्तियार खिलजी के जलाने से शुरू हुई। 1823 में भारत के गांव-गांव में समाज पोषित 7 लाख से अधिक गुरुकुल थे, लेकिन भारत के 12-13वीं के शैक्षिक वैभव के सामने ये 0.1 प्रतिशत भी नहीं था। नालंदा के बाद तक्षशिला को तोड़ा गया और उसके आसपास के 18-20 विश्वविद्यालयों को अपने-आप को समेटना पड़ा और यहां से हमारे यहां शिक्षा का सांस्थानिक स्वरूप खत्म होता गया।

अंग्रेजों ने इस षड्यंत्र को वैधानिक स्वरूप दिया। ईस्ट इंडिया कंपनी के विधिक सलाहकार मैकाले ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था का अध्ययन करने के बाद इसे नष्ट करने की सलाह दी। इस आधार पर बना 1835 का शिक्षा अधिनियम केवल इतना कहता है कि सरकार की अनुमति के बिना आप अपने घर में भी शिक्षा नहीं दे सकते और इस एक पंक्ति ने 7 लाख से अधिक गुरुकुलों को सिरे से अवैधानिक बना दिया। वह कानून अभी भी जीवित है। 1947 तक जो मैकाले नहीं कर पाया, 75 वर्ष में हमने वो करके दिखाया है। 1947 से पहले जितनी दासता नहीं थी, उससे ज्यादा अब है। यह षड्यंत्र आज भी कायम है। 1968 के बाद कांग्रेस से शिक्षा को कम्युनिस्टों को आउटसोर्स कर दिया। उसके बाद जो हुआ, उसकी कल्पना विलियम जोन्स और मैकाले ने भी नहीं की होगी।

ज्ञान परंपरा का नुकसान वैश्विक क्षति
श्री शंकर ने पूछा कि देश की सर्वांगीण उन्नति ज्ञान के आधार पर ही हो सकती है। पूरी सहस्राब्दी के दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक इतिहासकार एंगिस मेडिसन ने 2001 में 1500 ईस्वी तक के जो आंकड़े पेश किए उसके अनुसार विश्व अर्थव्यवस्था में भारत का योगदान 46 प्रतिशत था। भारत विभिन्न धातुओं को बनाने में निपुण था। इस पर श्री कानितकर ने कहा कि यदि अंग्रेज भारत नहीं आते तो केवल भारत का ही नहीं, सारे विश्व का विज्ञान आज से अधिक उन्नत होता। उन्होंने केवल भारत की ज्ञान परंपरा का नुकसान नहीं किया है बल्कि उनकी मूर्खता के कारण विश्व का बहुत बड़ा नुकसान हुआ। जस्ता, पीतल और अन्य कई धातुएं आज भी विश्व उतना शुद्ध नहीं बना पाता है जितना भारत तब बनाता था।

भारत में 13 जगह लोहे के स्तंभ खुले में हैं और उसमें जंग नहीं लगती। सबसे बड़ी बात यह थी कि वह पर्यावरण उन्मुख प्रणाली थी। उस समय की तकनीक 600-700 डिग्री तापमान पर शुद्ध लोहा निकाल लेती थी। आज उसी को शुद्ध करने के लिए 1300-1400 डिग्री तक जाना पड़ता है। इस तरह की इकोफ्रेंडली टेक्नोलॉजी विश्व से छीनने का काम अंग्रेजों ने किया। अंग्रेजों ने अपना स्टील बेचने के लिए यहां के गड़िया, रामगड़िया लोहारों को जंगलों में खदेड़ दिया। उन्हें भटकी विमुक्त जनजातियों में डाल दिया गया। 17वीं शताब्दी में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को टीकाकरण भारत ने सिखाया।

एलोपैथ में टीकाकरण का ज्ञान न होने से ही अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन की 63 दिन उपचार के बाद मृत्यु हो गई। उसी साल पुणे में एक सिपाही की नाक कट गई और वह नाक सिलवा कर गांव आ गया और वहीं पर उसकी नाक राइनो प्लास्टिक सर्जरी के माध्यम से ठीक की गई। टीपू सुल्तान के समय तो जनरल कार्नेल की ही नाक कटी थी तो सहजतम जी ने उनकी इलाज किया था। आज राइनोप्लास्टी पढ़ाई जाती है। और अमेरिका के, आस्ट्रेलिया के प्लास्टिक सर्जन ईमानदारी से बताते हैं कि इसका प्रारंभ भारत में हुआ, भारत वाले नहीं बताते हैं क्योंकि उन्हें पता ही नहीं है।

जब रिलांयस के अस्पताल के उद्घाटन के समय माननीय प्रधानमंत्री जी ने गणेशजी का उदाहरण दिया था, तब एक बहुत बड़ा नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश की गयी कि क्या पुराणों की बातों को विज्ञान के साथ जोड़ रहे हैं। तब बहुत शोध करके भारतीय शिक्षण मंडल ने दुनिया की दूसरे नंबर की प्लास्टिक सर्जन, टाटा मेमोरियल कैंसर इंस्टीट्यूट की प्रो. प्रभा यादव के सिर प्रत्यारोपण पर लिखे शोधपत्र के जरिए अमेरिकी सर्जन रॉबर्ट किंग की पुस्तक गणेशा का संदर्भ लेते हुए दो शोध पत्र प्रकाशित कराए जिसके बाद नैरेटिव पर अंकुश लगा।

भारत कृषि प्रधान देश, अर्थतंत्र नहीं
भारतीय ज्ञान परंपरा के व्याप, औद्योगिक जातियों के ज्ञान को खत्म करने और उनके औद्योगिक स्वरूप को नष्ट करने का षड्यंत्र राजनीतिक कितना था, आर्थिक कितना था और इससे शिक्षा व्यवस्था को क्या नुकसान हुआ, इस पर श्री कानितकर ने कहा कि कुछ षड्यंत्र था, कुछ मूर्खता थी। और हमने उसी मूर्खता को आज भी चला रखा है। आर्य आक्रमण के सिद्धांत को तो हमने बहुत शोध करके खारिज किया और आज सारा विश्व मानता है। लेकिन छोटी-छोटी बातों पर हम आज भी काम नहीं कर रहे। जैसे भारत में हम सब लोग बोलते हैं कि कृषि प्रधान देश है। क्योंकि आज भी भारत की 66 प्रतिशत जनता कृषि पर आधारित जीवन जीती है। ठीक है, लेकिन अगली बात कि भारत की अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान थी, यह सत्य नहीं है।

हमारी अर्थव्यवस्था सहस्राब्दियों से विनिर्माण (मैनुफैक्चरिंग) अर्थव्यवस्था रही है। हमने विश्व में ऐसे उत्पादों का निर्यात किया है जो हमारे कारीगरों ने बनाए थे। टेक्सटाइल का निर्यात हमारे यहां सबसे ज्यादा होता था। हमारे यहां कृषि व्यापार ही नहीं था। हमारे वेदों में तीन चीजों को बेचना मना है जिसमें अन्नं, वैद्यं एवं गृहम् शामिल है। वहीं अनर्थशास्त्रियों ने 12वें प्लानिंग कमीशन की रिपोर्ट में दुख व्यक्त किया है कि भारत में उत्पादित केवल 40 प्रतिशत अनाज ही बाजार में पहुंचता है।

इसी कारण 60 प्रतिशत अनाज जीडीपी का हिस्सा नहीं बनता। इसे नाम भी दिया गया है – सस्टेनेंस एग्रीकल्चर। भारत का तो 100 प्रतिशत अनाज पहले बाजार में नहीं जाता था, तब भी हम विश्व को 46 प्रतिशत जीडीपी देते थे। कृषि में से केवल कपास, मसाले, नकदी फसलों का ही निर्यात होता था। आज भी भारत में 66 प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर है। परंतु जीडीपी में 14 प्रतिशत का योगदान है। इसलिए भारत कृषि प्रधान देश है, अर्थव्यवस्था नहीं। भारत कृषि प्रधान संस्कृति है, कृषि प्रधान अर्थतंत्र नहीं। भारत सदियों से विनिर्माण अर्थव्यवस्था है। ये बहुत बड़ा षड्यंत्र है जिसने भारत की समृद्धि को कम किया।

धर्म समस्या नहीं, समाधान
देश के अर्थतंत्र की दुर्गति को हिंदू ग्रोथ रेट का नाम दिए जाने के प्रश्न पर श्री कानितकर ने कहा कि 18वीं शताब्दी से यह मानस बनाया गया कि धर्म हर समस्या की जड़ है। कार्ल मार्क्स धर्म को नहीं मानता था। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध में नाजियों से लड़ने के लिए कम्युनिस्ट स्टालिन को आर्थोडॉक्स ईसाइयत का पुनर्वास करना पड़ा। स्वामी विवेकानंद का एक वाक्य है कि धर्म इस देश की समस्याओं की जड़ नहीं है, बल्कि समाधान है। इस देश का पतन धर्म छोड़ देने के कारण हुआ। स्वतंत्रता के बाद भी हम वही कर रहे हैं। भारत के संविधान में सेकुलरिज्म शब्द बहुत चलता है लेकिन 1950 के संविधान की प्रस्तावना में सेकुलरिज्म शब्द नहीं था।

42वें संविधान संशोधन, जिससे भारत में आपातकाल लागू हुआ, के द्वितीय खंड में हमारी प्रस्तावना को असंवैधानिक तौर से संशोधित किया गया। संशोधन के लिए दो तिहाई बहुमत चाहिए, आपात काल के कार्यकारी आदेश से संशोधन नहीं हो सकता। बाद में जनता पार्टी सरकार ने 44वें संशोधन में 42वें संशोधन की तमाम बातों को वापस ले लिया लेकिन समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता को प्रस्तावना में बनाए रखा। हमारे लिए संतोष की बात है कि लक्ष्मीमल सिंघवी जैसा धर्मप्रेमी व्यक्ति उस समय विधि मंत्री था। इसलिए संविधान में सेकुलर शब्द डाला गया लेकिन हिन्दी अनुवाद पंथनिरपेक्ष किया गया। इसलिए हिन्दुस्थान में जितने भी राजनेता धर्मनिरपेक्ष शब्द का इस्तेमाल करते हैं, वह संवैधानिक रूप से गलत करते हैं। सही शब्द पंथनिरपेक्ष है।

तो सुप्त प्रतिभा आएगी बाहर
नई शिक्षा नीति के विभिन्न आयामों को दृष्टिगत रखते हुए समाज को इसके जमीनी फल कब देखने को मिलेंगे और इससे क्या बड़े बदलाव होंगे, इस प्रश्न के उत्तर में श्री कानितकर ने कहा कि एक बहुत बड़ी अद्भुत क्रांति का प्रारंभ तो हो गया है। सबसे बड़ी क्रांति होने वाली है भारतीय भाषाओं में शिक्षा से। जब भारतीय भाषा में डॉक्टर, इंजीनियर बनेंगे तो भारत की सुप्त प्रतिभा खुलकर बाहर आएगी। फिर हम पेटेंट में पीछे नहीं रहेंगे। इसके अलावा भारतीय ज्ञान परंपरा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बना दिया गया है। पहली कक्षा से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन तक भारतीय ज्ञान परंपरा का पेपर रहेगा।

नेशनल रिसर्च फाउंडेशन की जो बात हो रही है, उसको बनाने में थोड़ा समय लग रहा है क्योंकि उसको बहुत बड़ा महत्वाकांक्षी बना दिया। इन सबके बन जाने के बाद शिक्षा के क्षेत्र में बहुत बड़ा चमत्कार होगा। भारतीय शिक्षण मंडल ने ऐसे 19 बीज बिन्दु निकाले हैँ जो उस राष्ट्रीय शिक्षा नीति में हैं। इसी को यदि हमने ठीक ढंग से खाद-पानी दिया तो चमत्कार हो जाएगा। सही मायने में शिक्षा तभी ठीक मिलेगी जब इस देश में आईएएस अधिकारी शिक्षा सचिव नहीं होगा। शिक्षा शिक्षकों के हाथ में देनी पड़ेगी। डीएसटी, डीबीटी, परमाणु ऊर्जा जैसे तीन-चार मंत्रालय ऐसे हैं कि जिसमें प्रशासनिक अधिकारी नहीं बल्कि विषय के विशेषज्ञ हैं। वहां के संस्थान चमत्कार कर रहे हैं। शिक्षा शिक्षकों के हाथ में दे दी जाएगी तो सबसे बड़ी मुक्ति होगी। इसका भी बीज कस्तूरी रंजन जी ने नई शिक्षा नीति में थोड़े छिपे शब्दों में डाल दिया है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति सर्वसमावेशिता की बात करती है। आज तक भारत में ऐसी सामाजिक समरसता की बात किसी सरकारी दस्तावेज में नहीं थी। पूरे भारत के इतिहास में पहली बार सरकारी अभिलेख में विश्व गुरु बनाने का जिक्र आया है। इसमें कहा गया है कि विश्व के सौ विश्वविद्यालयों को भारत में कैंपस खोलने की अनुमति दी जाएगी। इस वाक्य का पूर्वाद्ध है – भारत के सर्वोत्तम विश्वविद्यालयों को विश्व में कैंपस खोलने की अनुमति देने के साथ…। ये बराबरी वाली ताकत नयी शिक्षा नीति ने दिखाई है। अभी तक पश्चिमी दूतावासों के सामने वीजा के लिए भारतीयों की कतार लगती है। लेकिन विदेशी नागरिक भारत आने के लिए वीजा दफ्तरों के सामने कतार लगाएं, यह कैसे होगा। ये काम राष्ट्रीय शिक्षा नीति कर सकती है।

विषयों में नहीं बंटेंगे बच्चे
बच्चों को उनके द्वारा पढ़े जाने वाले विषयों के आधार पर अच्छे-बुरे खांचे में बांट दिया जाता है। नई शिक्षा नीति आने से ये सामाजिक दबाव कितना कम होगा? इस पर श्री कानितकर ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने इसको समाप्त कर दिया है। बच्चों की प्रतिभा खत्म हो रही थी। जिसको लेखक बनना था उसे जबरदस्ती आईआईटी में दाखिला लेना पड़ता था। प्रौद्योगिकी को महत्व देने से विज्ञान का नुकसान हुआ। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में नौवीं के बाद कोई स्ट्रीम नहीं होगी। आप भौतिकी के साथ संगीत, खेल के साथ गणित सीख सकते हैं। नई शिक्षा नीति के परिणाम आने शुरू हो गए हैं। यूजीसी ने मल्टीपल इंट्री, मल्टीपल एक्जिट के दिशानिर्देश बना दिए हैं। एकेडमिक बैंक आॅफ क्रेडिट शुरू हो गया है।

बच्चों के दाखिले के समय अंग्रेजी विद्यालयों की ओर दौड़ पर श्री कानितकर ने कहा कि यदि अमीर बनाना है तो भारतीय भाषा में शिक्षा लो और यदि भिखारी बनना है तो अंग्रेजी में दाखिला दो। उन्होंने बताया कि विश्व के शीर्ष 10 जीडीपी देशों में कोई अंग्रेजी में शिक्षा नहीं देता जबकि सबसे कम जीडीपी के 20 देशों में अंग्रेजी में शिक्षा दी जाती है। भारतीय शिक्षा मंडल ने आईआईटी मद्रास, कानपुर वगैरह में 2011, 12, 13 14 में सर्वेक्षण किया जिसमें पता चला कि 84 प्रतिशत छात्र गैर-अंग्रेजी, गैर-सीबीएसी पृष्ठभूमि के होते हैं। अमेरिका में शिक्षा की एक मासिक रिपोर्ट के अनुसार वहां के चौथी कक्षा के 46 प्रतिशत छात्र दहाई संख्या का जोड़-घटाव नहीं कर सकते। और आठवीं कक्षा के 78 प्रतिशत छात्र बिना त्रुटि के अंग्रेजी के चार वाक्य सही नहीं लिख सकते। आप बच्चे को अंग्रेजी पढ़ाने के लिए अमेरिका भेज रहे हैं तो उससे बड़ी मूर्खता कुछ नहीं है। -पाञ्चजन्य ब्यूरो

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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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