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भारत की चिति का दिव्य दर्शन

भारतीय संस्कृति एकात्मवादी है। सृष्टि की विभिन्न सत्ताओं तथा जीवन के विभिन्न अंगों के दृश्य-भेद स्वीकार करते हुए वह उनके अंतर में एकता की खोज कर उनमें समन्वय की स्थापना करती है। उसका दृष्टिकोण सांप्रदायिक अथवा वर्गवादी न होकर सर्वात्मक एवं सर्वोत्कर्षवादी है। एकात्मकता उसकी धुरी है। ऐसा विशद् चिंतन दिया था दीनदयाल जी ने

Written byमहेश चंद्र शर्मामहेश चंद्र शर्मा
Sep 24, 2022, 09:52 pm IST
in भारत, विश्व, विश्लेषण, संघ @100, धर्म-संस्कृति
पं. दीनदयाल उपाध्याय

पं. दीनदयाल उपाध्याय

राज्य राष्ट्र के लिए होता है। राष्ट्रीयता राजनीति के लिए नहीं हुआ करती, राजनीति को ही राष्त का पोषण करने वाली होना होता है। राष्ट्र को क्षीण करने वाली राजनीति को त्याज्य ही मानना चाहिए।   — पं. दीनदयाल उपाध्याय

अजातशत्रु पंडित दीनदयाल उपाध्याय का शताब्दी वर्ष 2016 में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में मनाया गया। वे 20वीं शताब्दी के वैचारिक युग-पुरुष थे। उन्होंने भारत के जन-गण-मन का मर्म जाना था। वे एकात्म मानव दर्शन के प्रणेता थे। इस दर्शन में आज भारत की संस्कृति और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के साथ-साथ मानव को केंद्र-बिंदु में रखकर ही समाज व्यवस्थापन की प्रेरणा मिलती है। दीनदयाल जी कल भी प्रासंगिक थे, आज भी प्रासंगिक हैं, और आगे भी रहेंगे। एकात्म मानव तत्कालीन जनसंघ और भाजपा के लिए नहीं, वरन् विश्व की मानव सभ्यता और संस्कृति के लिए एक पाथेय है। उनके उद्गार से उत्पन्न विचार के कुछ बिंदु हम यहां रख रहे हैं।

जनसंघ: एक ऐतिहासिक आवश्यकता
विश्व का ज्ञान हमारी थाती है। मानव-जाति का अनुभव हमारी संपत्ति है। विज्ञान किसी देश विशेष की बपौती नहीं। वह हमारे भी अभ्युदय का साधन बनेगा। किंतु भारत हमारी रंगभूमि है। भारत की कोटि-कोटि जनता पात्र ही नहीं, प्रेक्षक भी है, जिसके रंजन एवं आत्मसुख के लिए हमें सभी भूमिकाओं का निर्धारण करना है। विश्व-प्रगति के हम केवल द्रष्टा ही नहीं, साधक भी हैं। अत: जहां एक ओर हमारी दृष्टि विश्व की उपलब्धियों पर हो, वहीं दूसरी ओर हम अपने राष्ट्र की मूल प्रकृति, प्रतिभा एवं प्रवृत्ति को पहचानकर अपनी परंपरा और परिस्थिति के अनुरूप भविष्य के विकास-क्रम का निर्धारण करने की अनिवार्यता को भी न भूलें।

स्व के साक्षात्कार के बिना न तो स्वतंत्रता सार्थक हो सकती है और न वह कर्म चेतना ही जाग्रत हो सकती है, जिसमें परावलंबन और पराभूति का भाव न होकर स्वाधीनता, स्वेच्छा और स्वानुभवजनित सुख हो। अज्ञान, अभाव तथा अन्याय की समाप्ति और सदृढ़, समृद्ध, सुसंस्कृत एवं सुखी राष्ट्र-जीवन का शुभारंभ सबके द्वारा स्वेच्छा से किए जाने वाले कठोर श्रम तथा सहयोग पर निर्भर है। यह महान कार्य राष्ट्र-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में एक नए नेतृत्व की अपेक्षा रखता है। भारतीय जनसंघ का जन्म इसी अपेक्षा को पूर्ण करने के लिए हुआ है।

भारतीय सांस्कृतिक अधिष्ठान की अपरिहार्यता
लोकतंत्र, समानता, राष्ट्रीय स्वतंत्रता तथा विश्व शांति परस्पर संबद्ध कल्पनाएं हैं। किंतु पाश्चात्य राजनीति में इनमें कई बार टकराव हुआ है। समाजवाद और विश्व-शासन के विचार भी इन समस्याओं के समाधान के प्रयत्न से उत्पन्न हुए हैं पर वे कुछ नहीं कर पाए। उलटे मूल को धक्का लगाया है और नई समस्याएं पैदा की हैं। भारत का सांस्कृतिक चिंतन ही तात्विक अधिष्ठान प्रस्तुत करता है, जिससे उपर्युक्त भावनाएं समन्वित हो वांछनीय लक्ष्यों की सिद्धि कर सकें। इस अधिष्ठान के अभाव में मानव-चिंतन और विकास अवरुद्ध हो गया है। भारतीय तात्विक सत्यों का ज्ञान, देश और काल से स्वतंत्र है। यह ज्ञान केवल हमारी ही नहीं वरन् पूर्ण संसार की प्रगति की दिशा निश्चित करेगा।

एकात्म दर्शन
भारतीय संस्कृति एकात्मवादी है। सृष्टि की विभिन्न सत्ताओं तथा जीवन के विभिन्न अंगों के दृश्य-भेद स्वीकार करते हुए वह उनके अंतर में एकता की खोज कर उनमें समन्वय की स्थापना करती है। परस्पर विरोध और संघर्ष के स्थान पर व परस्परावलंबन, पूरकता, अनुकूलता और सहयोग के आधार पर सृष्टि की क्रियाओं का विचार करती है। वह एकांगी न होकर सर्वांगीण है। उसका दृष्टिकोण सांप्रदायिक अथवा वर्गवादी न होकर सर्वात्मक एवं सर्वोत्कर्षवादी है। एकात्मकता उसकी धुरी है।

व्यष्टि और समष्टि
व्यष्टि और समष्टि के बीच संघर्ष की कल्पना कर, दोनों में से किसी एक को प्रमुख एवं संपूर्ण क्रियाओं का अंतिम लक्ष्य मानकर पश्चिम में अनेक विचारधाराओं का जन्म हुआ है। किंतु दृश्य व्यक्ति अदृश्य समष्टि का भी प्रतिनिधित्व करता है। ‘अहम्’ के साथ ‘वयं’ की सत्ता भी प्रत्येक अहम् के द्वारा जीती है। प्रत्येक इकाई में समुदाय की प्रवृत्ति परिलक्षित होती है। व्यक्ति ही समष्टि के उपकरण हैं, उसके ज्ञान-तंतु हैं। व्यक्ति के विनाश या अविकास से समष्टि पंगु हो जाएगी। व्यक्ति की साधना समष्टि की आराधना से भिन्न नहीं हो सकती। शरीर को क्षति पहुंचाकर कोई अंग कैसे सुखी हो सकता है। फूल का अस्तित्व पंखुड़ियों की शोभा तथा जीवन की सार्थकता पुष्प के साथ रहकर उसके स्वरूप बनाने और निखारने में है। व्यक्ति-स्वातंत्र्य और समाज-हित के बीच कोई विरोध नहीं है।

पुरुषार्थ चतुष्ट्य
व्यक्ति के विकास और समाज के हित का संपादन करने के उद्देश्य से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन चार पुरुषार्थ की कल्पना की गई है। धर्म, अर्थ और काम एक-दूसरे के पूरक और पोषक हैं। मनुष्य की प्रेरणा का स्रोत तथा उसके कार्योें का मापक किसी एक को ही मानकर चलना अधूरा होगा। फिर भी अर्थ और काम की सिद्धि का साधन है धर्म, अत: वह आधारभूत है।

धर्म का स्वरूप
कई बार धर्म को मत या मजहब मानकर उसके गलत अर्थ लगाए जाते हैं। यह भूल अंग्रेजी के रिलीजन शब्द का अनुवाद धर्म करने के कारण हुई है। धर्म का वास्तविक अर्थ है-वे सनातन नियम, जिनके आधार पर किसी सत्ता की धारणा हो और जिनका पालन कर व्यक्ति अभ्युदय और नि:श्रेयस की प्राप्ति कर सके। धर्म के मूल तत्व सनातन हैं, किंतु उनका विवरण देश, काल, परिस्थिति के अनुसार बदलता है। इस संक्रमणशील जगत में धर्म ही वह तत्व है, जो स्थायित्व लाता है। इसलिए धर्म को ही नियंता माना गया है। प्रभुता उसी में निहित है।

दीनदयाल जी भारत की जड़ों से जुड़ी राजनीति के पक्षधर थे

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

आज 25 सितम्बर है, पंडित दीनदयाल उपध्याय जी की जन्म जयंती का आज अवसर है और आज से उनके जन्म के शताब्दी वर्ष का प्रारंभ हो रहा है। मेरे जैसे लाखों कार्यकर्ता जिस राजनीतिक विचारधारा को लेकर काम कर रहे हैं, उस राजनीतिक विचारधारा को व्याख्यायित करने का काम, भारत की जड़ों से जुड़ी राजनीति के पक्षकार, भारत की सांस्कृतिक विरासत को पुरस्कृत करने के प्रयास वाली विचारधारा के साथ, जिन्होंने अपना एक राजनीतिक दर्शन दिया, एकात्म-मानव दर्शन दिया, वैसे पंडित दीनदयाल जी की शताब्दी का वर्ष आज प्रारंभ हो रहा है। ‘सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय’ का अन्त्योदय का सिद्धांत-ये उनकी देन रही है। महात्मा गांधी भी आखिरी छोर के व्यक्ति के कल्याण की बात करते थे। विकास का फल गरीब से गरीब व्यक्ति को कैसे मिले? ‘हर हाथ को काम, हर खेत को पानी’, दो ही शब्दों में पूरा आर्थिक एजेंडा उन्होंने प्रस्तुत किया था। देश उनके जन्म-शताब्दी वर्ष को ‘गरीब कल्याण वर्ष’ के रूप में मनाए। समाज का, सरकारों का, हर किसी का ध्यान, विकास के लाभ गरीब को कैसे मिले, उस पर केन्द्रित हो। तभी जाकर देश को हम गरीबी से मुक्ति दिला सकते हैं। जहां प्रधानमंत्री का निवास स्थान है, जो अब तक अंग्रेजों के जमाने से ‘रेस-कोर्स रोड’ के रूप में जाना जाता था, पंडित दीनदयाल उपाध्याय जन्म शताब्दी वर्ष के निमित्त उस मार्ग का नाम ‘लोक कल्याण मार्ग’ कर दिया गया है। यह उसी शताब्दी वर्ष के ‘गरीब कल्याण वर्ष’ का ही एक प्रतीकात्मक स्वरूप है। मैं हम सब के प्रेरणा पुरुष, हमारी वैचारिक धरोहर के धनी श्रद्धेय पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी को मैं आदरपूर्वक नमन करता हूं।
-प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी
(25 सितम्बर, 2016 को ‘मन की बात’ में)

राजनीतिक शक्ति का प्रजा में विकेन्द्रीकरण करके जिस प्रकार शासन की संस्था का निर्माण किया जाता है, उसी प्रकार आर्थिक शक्ति का भी प्रजा में विकेन्द्रीकरण करके अर्र्थव्यवस्था का निर्माण एवं संचालन होना चाहिए।
—पं. दीनदयाल उपाध्याय  

राष्ट्र की आत्मा-चिति
समाज केवल व्यक्तियों का समूह अथवा समुच्चय नहीं, अपितु एक जीवंत सावयव सत्ता है। भूमि विशेष के प्रति मातृ-भाव रखकर चलने वाले समाज से राष्ट्र बनता है। प्रत्येक राष्ट्र की अपनी एक विशेष प्रकृति होती है, जो ऐतिहासिक अथवा भौगोलिक कारणों का परिणाम नहीं, अपितु जन्मजात है। इसे चिति कहते हैं। राष्ट्रों का उत्थान-पतन चिति के अनुकूल अथवा प्रतिकूल व्यवहार पर निर्भर करता है। विभिन्न विशिष्टताओं वाले राष्ट्र परस्पर पूरक होकर मानव एकता का निर्माण कर सकते हैं। राष्ट्रों की प्रकृति मानव एकता की विरोधी नहीं, यदि कहीं उसके विरुद्ध आचरण दिखता है तो वह विकृति का द्योतक है। राष्ट्रों का विनाश कर मानव एकता उसी प्रकार असंभव तथा अवांछनीय है, जिस प्रकार व्यक्तियों को नष्ट कर समष्टि का अस्तित्व या विकास।

चिति की अभिव्यक्ति के उपकरण
समाज की चिति स्वयं को अभिव्यक्त करने तथा व्यक्तियों को विभिन्न पुरुषार्थोंे का संपादन की सुविधा प्राप्त कराने के लिए अनेक संस्थाओं को जन्म देती है। समाज में इनकी वही स्थिति है, जो शरीर में विभिन्न अंगों की। जाति, वर्ण, पंचायत, संप्रदाय, संघ, विवाह, संपत्ति, राज्य आदि इसी प्रकार की संस्थाएं हैं। राज्य महत्वपूर्ण है, किंतु सर्वोपरि नहीं।

हमारी संस्कृति
जब हम संगठन का कार्य करने चले हैं तो हमें अपने समाज से जोड़ने वाली चीज हमारी संस्कृति है। उसका विचार करना पड़ता है। आजकल कई लोग पूछते है कि आप किस ‘वाद’ में विश्वास करते हंै? हम किसी वाद को नहीं मानते। हम तो हिंदू संस्कृति अथवा भारतीय विचार में विश्वास करते हैं। फिर वे कहते हैं कि हम आधुनिक वादों समाजवाद, पूंजीवाद, अराजकता, अधिनायकवाद आदि में से किस पर विश्वास करते हैं? तो इनमें से किसी में भी नहीं, ये सब बाहर की उपज है। विदेशों में लोगों ने मुझसे पूछा, आप बीयर पीयेंगे या शैंपेन? ये दोनों भिन्न प्रकार की शराब हंै। लेकिन मैंने दोनों का निषेध किया। इसी प्रकार अपने देश में कुछ लोग कहते हैं कि आप पूंजीवाद में विश्वास करते हंै। हम कहते हैं- नहीं, तो कहते हैं-साम्यवाद में करते होंगे? यह माना जाता है कि इन दोनों में सब कुछ है। यह सत्य नहीं है। संसार में इनके अलावा दूसरे विचार भी हैं। ये सब ‘वाद’ बाहर के हैं। हम तो अपनी चीज को मानते हैं।
वैसे हम सत्य को सब जगह से ग्रहण कर लेते हैं। जैसे हमने रेलगाड़ी को स्वीकार किया। परंतु पश्चिम के जितने भी दर्शन हैं, वे अधूरे हैं, वे संपूर्ण जीवन का विचार नहीं करते, किसी एक अंग का विचार करते हैं। इसलिए हम उनको स्वीकार नहीं करते। हमारी संस्कृति की यही सबसे बड़ी विशेषता है कि इसमें जीवन का संपूर्ण विचार किया गया है। वर्तमान भाजपा नेताओं में अधिकतर लोग, जो आजादी के बाद की पीढ़ी में पैदा हुए ,वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में काम कर रहे हैं। अच्छी बात यह है कि नरेंद्र्र मोदी अपनी आंखों के सामने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन एवं अंत्योदय के सपने साकार कर रहे हैं।
(लेखक राज्यसभा सांसद तथा भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे हैं)

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