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हल्द्वानी लिटरेचर फेस्ट-2022  :  लोक कला में ज्ञान के सूत्र

हल्द्वानी में आयोजित दूसरे दो दिवसीय लिटरेचर फेस्टिवल में कई विषयों पर सार्थक चर्चा हुई।

दिनेश मानसेराअजय कन्यालWritten byदिनेश मानसेराandअजय कन्याल
Jul 11, 2022, 03:27 pm IST
inउत्तराखंड
हलद्वानी लिटरेचर फेस्टिवल के लोक कला एवं साहित्य सत्र में मालिनी अवस्थी और हितेश शंकर

हलद्वानी लिटरेचर फेस्टिवल के लोक कला एवं साहित्य सत्र में मालिनी अवस्थी और हितेश शंकर

हल्द्वानी में आयोजित दूसरे दो दिवसीय लिटरेचर फेस्टिवल में कई विषयों पर सार्थक चर्चा हुई। पुरातत्वविद् पद्मश्री डॉ. यशोधर मठपाल ने जहां भारतीय लोक संस्कृति के विविध आयामों पर सारगर्भित वक्तव्य दिया, वहीं पार्श्व लोक गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने लोककला संस्कृति को सहेजने पर जोर दिया

उत्तराखंड में कुमाऊं के प्रवेश द्वार हल्द्वानी शहर में ‘हल्द्वानी लिटरेचर फेस्टिवल’ के द्वितीय संस्करण का आयोजन किया गया। 2-3 जुलाई को रामपुर रोड स्थित डीपीएस हल्द्वानी के सभागार में आयोजित इस समारोह में पाञ्चजन्य की सहभागिता रही। समारोह के विभिन्न सत्रों में देशभर के जाने-माने साहित्यकार, लेखक, लोक कलाकार और टीवी मीडिया से जुड़ी हस्तियों ने अपनी बात रखी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने वीडियो संदेश में कार्यक्रम के आयोजकों और पाञ्चजन्य के प्रखर पत्रकारिता के 75वें वर्ष के लिए शुभकामनाएं दीं।

भारत की जीवंत परंपरा
इस दो दिवसीय लिटरेचर फेस्टिवल का शुभारंभ मुख्य अतिथि पद्मश्री डॉ. यशोधर मठपाल ने किया। अपने संबोधन में उन्होंने पुरातन भारतीय लोक संस्कृति के विविध आयामों को प्रस्तुत किया। उन्होंने रंगों से मनुष्य के संबंध का जिक्र करते हुए बताया कि मनुष्य का रंगों से संबंध तब से है, जब इसने विकास भी नहीं किया था। मनुष्य ने भवन निर्माण से पहले ही भवनों की सजावट करना सीख लिया था। गुफाओं में मिले भित्तिचित्रों से पता चलता है कि अपने क्रमिक विकास के दौर में मनुष्य पाषाण युग से पहले से ही गेरू रंग का प्रयोग कर रहा था। रंगों से मनुष्य के संबंधों को पुरातत्वविदों ने भी प्रमाणित किया है। रंगों और चित्रों का संबंध लोक संस्कृति में भारत के विभिन्न लोकों चाहे दक्षिण भारत हो, उत्तर भारत में मिथिला या कुमाऊं, सब में व्याप्त है। आज भी इन लोक संस्कृतियों में हाथों की छाप लगाने की परंपरा है।

डॉ. मठपाल ने कहा कि मनुष्य में सौंदर्यबोध गुफाकालीन है। भारत ही एक मात्र देश है, जहां पुरातन परंपराएं और भाषाएं जीवित हैं। वैदिक काल में ही रंगों पर शोध हुए। गेरू के दीर्घ समय तक चलने के तथ्य को तब ही समझ लिया गया था। इसी तरह, सिंधुघाटी सभ्यता की परंपराएं जैसे- मूर्ति पूजा, वृक्ष पूजा और यज्ञ अनुष्ठान के प्रमाण मिले हैं। हमारी पुरातन परंपराओं को लोक संस्कृति ने ही बचा कर रखा है। उन्होंने साहित्यकारों से अपने साहित्य में इस लोक संस्कृति को बनाए रखने का अनुरोध किया। वैदिक साहित्य में व्याप्त विज्ञान और शोध इतना व्यापक है कि आज के शोध परिणामों में भी यह स्थापित होता है। मतलब यह कि आज जो शोध परिणाम आ रहे हैं, उस पर सैकड़ों साल पहले ही शोध किए जा चुके थे।

इसी संदर्भ में श्रीमद्गवद्गीता का उल्लेख करते हुए डॉ. मठपाल ने कहा कि गीता में जीवन के हर पक्ष का समाधान मौजूद है। चाहे राजनीति हो, व्यापार हो या भवनशास्त्र, सबके लिए गीता समाधान प्रस्तुत करती है। उपनिषदों के उच्च स्तर की मीमांसा पूरे विश्व मे कहीं मौजूद नहीं है। अपने जीवन के प्रसंगों का जिक्र करते हुए उन्होंने कई उदाहरण देकर यह सिद्ध किया कि लोक परंपराओं में ज्ञान का सूत्र मौजूद है। बता दें कि पुरातत्वविद् पद्मश्री डॉ. मठपाल ने भारत तथा दुनिया की 400 से अधिक गुफाओं और उनके भित्ति चित्रों का अध्ययन किया है।

हलद्वानी लिटरेचर फेस्टिवल में शामिल प्रतिभागी

इतिहास में विवाद
तीसरे सत्र में ‘इतिहास में विवाद’ विषय पर पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने जाने-माने लेखक शांतनु गुप्ता और पी.ए. सबरीश से भारत के गौरवपूर्ण इतिहास पर चर्चा की। हितेश शंकर ने बेबाकी से भारत के इतिहास के उन हिस्सों को छुआ, जिन्हें लेकर अनेक मनगढ़ंत किस्से प्रचलन में हैं। उन्होंने सबरीश से पूछा कि भारत की मजबूत और व्यवस्थित शिक्षा व्यवस्था को किस प्रकार व्यवस्थित तरीके से पहले मुगलों, फिर बाद में अंग्रेजों द्वारा नष्ट करने का प्रयास किया गया। इस पर सबरीश ने कहा कि भारत का इतिहास चाहे राजनीतिक इतिहास हो, सामाजिक इतिहास या आर्थिक इतिहास हो, हर जगह शिक्षा का महत्व दिखता है। शिक्षा की व्यवस्था गुरुकुलों, आश्रमों, विश्वविद्यालयों और घरों तक में थी।

भारत में शिक्षा की परंपरा प्राचीन काल से है। इसमें वैदिक ज्ञान के साथ विज्ञान, योग से लेकर युद्ध कला तक सिखाई जाती थी। इन शिक्षण केंद्रों को स्थानीय स्तर पर सहायता मिलती थी। भारत में स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर करने की परंपरा रही है। इस कारण से भारतीय समाज शिक्षा ही नहीं, अपितु आर्थिक और अन्य मोर्चों पर भी सशक्त हुआ। ज्ञान परंपरा को नष्ट होने में काफी साल लग जाते हैं। इसलिए जब आक्रांताओं के बर्बर हमलों के बावजूद आज भी हमारी ज्ञान परंपरा जीवित है। बाद में जब अंग्रेज आए तो उन्होंने भारतीय शिक्षा व्यवस्था को गहराई से समझा और इस पर अध्ययन किया। हर कदम पर स्कूल थे, जिसके दरवाजे हर वर्ग और जाति के लिए खुले थे।

फेस्टिवल को संबोधित करते पद्मश्री डॉ. यशोधर मठपाल

अंग्रेजों ने महसूस किया कि यही भारत की मजबूती का कारण है। इसके बाद उन्होंने सबसे पहले शिक्षण संस्थानों को स्थानीय आर्थिक मदद के स्रोत पर चोट पहुंचाई और समाज को जाति और धर्म के आधार पर बांटा। अपनी किताब में ताजमहल को मंदिर बताने के सवाल पर अबरीश ने कहा कि मैं एक शोधार्थी हूं और बिना किसी प्रमाण के कुछ नहीं लिखता। ताजमहल एक मंदिर का प्रारूप था, जिसकी देख-रेख एक हिंदू राजा किया करते थे। इसका उल्लेख पुरानी किताबों में है। मेरे पास इसके प्रमाण हैं। ‘अ ब्रीफ हिस्ट्री आॅफ साइंस इन इंडिया’ के लेखक ने कहा कि भारत विज्ञान, कृषि, ज्योतिष और खगोल विज्ञान में भी अग्रणी था। पुराने ग्रंथों में जिस आग्नेयात्र का जिक्र किया गया है, वह रॉकेट ही तो था।

‘भाजपा: पास्ट, प्रेजेंट एंड फ्यूचर’ के लेखक शांतनु गुप्ता ने भाजपा के ‘सबका साथ, सबका विकास’ नारे को अतीत के भेदभाव रहित इतिहास के साथ रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि मेरी किताब 400 पन्नों की है, लेकिन इसमें से 150 पन्ने ही भाजपा पर हैं। वास्तव में भाजपा कोई राजनीतिक पार्टी नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप में भारत के कई सौ सालों के राष्ट्रवादी आंदोलन का इतिहास है। मैंने केवल 150 से 200 साल के इतिहास में ही झांकने की कोशिश की है। किताब के पहले अध्याय में मैंने लिखा है कि मैं क्या लिख रहा हूं और क्या दांव पर लगा रहा हूं। इतिहास में हम किसे पूजेंगे? जिन्होंने इस देश की संस्कृति और परंपरा को बढ़ाया या उसे जिसने इसका इस्तेमाल यहां की जमीन का दोहन करने के लिए किया। भारत की सभ्यता हजारों साल पुरानी है। इसका संरक्षण करना केवल हमारी ही नहीं, विश्व की भी जिम्मेदारी है।

इतिहास में विवाद सत्र में लेखक शांतनु गुप्ता और पी.ए. सबरीश

‘इतिहास में विवाद’ विषय पर पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने जाने-माने लेखक शांतनु गुप्ता और पी.ए. सबरीश से भारत के गौरवपूर्ण इतिहास पर चर्चा की। हितेश शंकर ने बेबाकी से भारत के इतिहास के उन हिस्सों को छुआ, जिन्हें लेकर अनेक मनगढ़ंत किस्से प्रचलन में हैं। उन्होंने सबरीश से पूछा कि भारत की मजबूत और व्यवस्थित शिक्षा व्यवस्था को किस प्रकार व्यवस्थित तरीके से पहले मुगलों, फिर बाद में अंग्रेजों द्वारा नष्ट करने का प्रयास किया गया।

लोक कला और साहित्य
इस सत्र में पार्श्व लोक गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी के साथ हितेश शंकर की वार्ता बेहद दिलचस्प रही। लोक से लेकर नए दौर के सिनेमा में अपनी जादुई आवाज देने वाली मालिनी अवस्थी ने कहा कि उन्होंने वास्तव में लोक कला को ही जिया है। उन्होंने सांस्कृतिक स्वरूपों और मान्यताओं को कमजोर करती विचारधाराओं का तार्किक ढंग से खंडन करते हुए लोक की महत्ता और समाज की संस्कृति को प्रोत्साहित करते आचरणों की वकालत की। साथ ही, स्त्री विमर्श के नाम पर सांस्कृतिक ह्रास को बढ़ावा देने वाली शक्तियों के खिलाफ आवाज बुलंद करने की हिमायत भी की। वार्ता के दौरान बीच-बीच में उन्होंने लोक गीत सुनाए और उनका विश्लेषण भी किया। सत्र के समापन पर उन्होंने ‘वन्दे मातरम्’ गीत गाकर श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया।

सांस्कृतिक कार्यक्रम के बाद उद्घाटन सत्र सोशल मीडिया का युवाओं पर प्रभाव को लेकर था, जिसमें अंशुल सक्सेना के साथ वैभव पांडे ने बातचीत की। लिटरेचर फेस्टिवल के पहले दिन आठ सत्र हुए, जिसमें उपन्यास और महिलाओं का दर्द, आज के दौर में मीडिया, कुमाऊं साहित्य और लेखक, डिजिटल साहित्य तथा युवा और साहित्य पर अलग-अलग सत्र थे। दूसरे दिन का कार्यक्रम भी आठ सत्रों में बंटा हुआ था। दूसरे दिन के सत्र की शुरुआत ‘बॉलीवुड और साहित्य’ विषय से हुई, जिसमें चर्चाकार प्रख्यात गीतकार विजय अकेला और कवयित्री गौरी मिश्रा रहीं। ‘चर्चा नई किताबों की’ सत्र में लेखक कौस्तुभ आनंद चंदोला, अमृता पांडे, दीपक उपाध्याय और रंजना शाही ने चर्चा में भाग लिया। इसके अलावा, ‘महिलाओं का रुचिकर साहित्य’, ‘बात किताबों की, बुक्स विद ऋचा और खाकी में इनसान जैसे सत्र भी शामिल थे।

‘बात किताबों की’ सत्र में डीडी न्यूज के प्रस्तोता अशोक श्रीवास्तव और वरिष्ठ टीवी पत्रकार विजय त्रिवेदी के साथ टीवी पत्रकार अनुराग पुनेठा की चर्चा बेहद रोचक रही। इस सत्र में अशोक श्रीवास्तव और विजय त्रिवेदी ने वर्षों से गढ़े जा रहे नैरेटिव की कलई खोली। अशोक श्रीवास्तव ने पूर्ववर्ती सरकारों, उनके पक्षकारों और प्रभावशाली लोगों द्वारा समाचार एजेंसियों में अपने पक्ष की रिपोर्टिंग पर हस्तक्षेप की कई रोचक घटनाओं के बारे में बताया। इसमें गुजरात दंगों से लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के साक्षात्कार पर रोक और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के जन्मदिन पर डीडी न्यूज के कार्यालय में मिठाई बांटने का भी जिक्र किया। वहीं, विजय त्रिवेदी ने उन गुटों पर सवाल उठाए जो सरकार की मेहनत पर आसानी से पानी फेर देते हैं।

‘महिलाओं का रुचिकर साहित्य’ सत्र में लेखिका प्रीतपाल कौर, सोनाली मिश्रा और सर्जना शर्मा के बीच सार्थक चर्चा हुई। शेष सत्रों में ऋचा अनिरुद्ध, आईएएस रणवीर सिंह चौहान, साहित्यकार लक्ष्मण सिंह बटरोही, उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक हेम पंत, कंचन पंत, मंजू पांडेय उदिता, मंजरी बलूटिया, पत्रकार गणेश जोशी, नेधीर अरोड़ा, शैलेंद्र प्रताप सिंह, ललित मोहन रयाल, डॉ. चंद्रशेखर जोशी के साथ प्रमोद शाह तथा युवा और साहित्य विषय पर महेश दत्त व मनमोहन जोशी के बीच संवाद हुआ। मंच का संचालन प्रीति बिष्ट और स्वाति कपूर ने किया।

Topics: ज्ञान के सूत्रलोक कला और साहित्यभारत में शिक्षा की परंपराप्राचीन काल सेलोक कला
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