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ग्लोबल वार्मिंग बढ़ा रही क्रिप्टोकरेंसी

2016 से 2018 के बीच बिटकॉइन निर्माण की प्रक्रिया में तीस लाख से 1.3 करोड़ टन

Written byबालेन्दु शर्मा दाधीचबालेन्दु शर्मा दाधीच
Jul 1, 2022, 05:04 pm IST
in भारत, विज्ञान और तकनीक

सन् 2016 से 2018 के बीच बिटकॉइन निर्माण की प्रक्रिया में तीस लाख से 1.3 करोड़ टन तक कार्बन डाई आक्साइड का उत्सर्जन हुआ

यह ऐसी करेंसी है जो कभी छलांगें मारने के लिए चर्चा में आती है तो कभी गोते लगाने के कारण। लेकिन पिछले कई वर्षों से वह इसलिए भी चर्चा में है कि यह दुनिया की जलवायु को नुकसान पहुंचा रही है। धरती के तापमान को बढ़ाने में इसका गहन योगदान है। जी हां, बात बिटकॉइन और उसके जैसी ही दूसरी क्रिप्टोकरेंसी की हो रही है। कैंब्रिज विश्वविद्यालय की 2021 की रिपोर्ट कहती है कि अकेले बिटकॉइन के इस्तेमाल पर दुनिया में 121.36 टेरावाट घंटे बिजली खर्च हो रही है जो पूरे अर्जेंटीना में होने वाली बिजली की खपत के बराबर है।

इसे यूं भी कह सकते हैं कि आईटी की दिग्गज कंपनियां- माइक्रोसॉफ़्ट, एपल, गूगल और फेसबुक मिलकर एक साल में जितनी बिजली खर्च करती हैं, यह उससे भी ज्यादा है। और बिटकॉइन कोई अकेली क्रिप्टोकरेंसी नहीं है। ईथरियम, बिनांस, रिप्पल, डॉगकॉइन, लाइटकॉइन, कोडार्नो जैसी कितनी ही क्रिप्टोकरेंसीज इन दिनों बाजार में खरीदी-बेची और इस्तेमाल की जा रही हैँ।

बिटकॉइन ऐसी करेंसी है जिसे आप भी बना सकते हैं लेकिन छू नहीं सकते। यह कंप्यूटरों और ऐसे ही दूसरे डिजिटल माध्यमों के जरिए ली और दी जाने वाली डिजिटल करेंसी है जिसे वर्चुअल करेंसी या क्रिप्टोकरेन्सी भी कहा जाता है। समझ लीजिए कि यह किसी खास किस्म की कंप्यूटर फाइल की तरह है। सबसे मशहूर क्रिप्टोकरेन्सी का नाम है बिटकॉइन जिसे 2009 में पहली बार सातोशी नाकामोतो नाम के एक (वर्चुअल) निर्माता ने बनाया था। दुनिया में कुल 2.1 करोड़ बिटकॉइन ही हो सकते हैं और उनमें से करीब 17 लाख अब तक बनाए जा चुके हैं। जितने बचे हैं उनकी संख्या बहुत थोड़ी रह गई है लेकिन फिर भी अगर आप चाहें तो बिटकॉइन बनाने की कोशिश कर सकते हैं क्योंकि एक बिटकॉइन की कीमत लाखों रुपये में है।

सौदा बड़े फायदे का है लेकिन वह बनेगी कैसे- आप पूछेंगे। बिटकॉइन के निर्माण की प्रक्रिया को माइनिंग कहा जाता है। यह माइनिंग सोने और चांदी की माइनिंग से अलग है क्योंकि यहां पर आपको एक बिटकॉइन बनाने के लिए एक बेहद जटिल डिजिटल पहेली को हल करना पड़ता है।

समझ लीजिए कि सातोशी नाकामोतो ने एक बहुत ही मुश्किल डिजिटल चुनौती दे दी है जिसे हल करने के लिए आपको अपने खुद के एल्गोरिद्म (प्रोग्रामिंग कोड) और साथ ही साथ बहुत ज्यादा कंप्यूटिंग पावर की जरूरत पड़ेगी। उलझन वाली बात यह है कि जितने कम बिटकॉइन बनाने बच जाएंगे, आपके सामने आने वाली डिजिटल पहेली उतनी ही जटिल होती चली जाएगी।

शुरू के दिनों में यह इतना मुश्किल काम नहीं था, जितना कि अब हो गया है। हाल यह है कि कई प्रोग्रामर मिलकर बिटकॉइन बनाने की कोशिश करते हैं और उसके लिए बहुत सारे माइक्रोप्रॉसेसरों, ग्राफिक्स कार्ड सिस्टमों और दूसरी चीजों का इस्तेमाल करते हैं। सिर्फ अपने कंप्यूटरों में ही नहीं बल्कि इंटरनेट का इस्तेमाल करते हुए वे आपके और हमारे जैसे दूसरे लोगों के कंप्यूटरों की ताकत का भी इस्तेमाल इसी काम के लिए कर लेते हैं। ज्यादातर मौकों पर हमें पता ही नहीं चलता कि कोई हमारे कंप्यूटर की ताकत का इस्तेमाल क्रिप्टोकरेन्सी की माइनिंग के लिए कर रहा है।

2016 से 2018 के बीच जितनी बिटकॉइन बनाई गई, उनके निर्माण की प्रक्रिया में तीस लाख से 1.3 करोड़ टन तक कार्बन डाईआक्साइड का उत्सर्जन हुआ। समझ लीजिए कि इसी अवधि में दस लाख कारों के धुएं से जितना प्रदूषण हुआ होगा, यह उसके बराबर है।

कंप्यूटरीय गणना जितनी ज्यादा जटिल और लंबी होती है माइक्रोप्रॉसेसरों को उतनी ही शक्ति लगानी पड़ती है और उसी लिहाज से कंप्यूटिंग पावर तथा बिजली की जरूरत पड़ती है। फिर भी इस काम में कई हफ्ते या कई महीने भी लग सकते हैं। कहा जाता है कि सोने की माइनिंग में जितनी बिजली खर्च होती है, उससे कई गुना ज्यादा बिजली क्रिप्टोकरेन्सी की माइनिंग में लग जाती है। कुछ स्वतंत्र शोधकर्ताओं का अनुमान है कि एक डॉलर की कीमत के बराबर बिटकॉइन बनाने में 17 मेगा जूल पावर की जरूरत पड़ेगी जबकि इतनी ही रकम के बराबर सोने की माइनिंग करने में 5 मेगा जूल और प्लेटिनम में 7 मेगा जूल बिजली खर्च होगी। इससे होने वाला प्रदूषण तो और भी चिंताजनक है। ॉ

कहा जाता है कि सन् 2016 से 2018 के बीच जितनी बिटकॉइन बनाई गई, उनके निर्माण की प्रक्रिया में तीस लाख से 1.3 करोड़ टन तक कार्बन डाईआक्साइड का उत्सर्जन हुआ। समझ लीजिए कि इसी अवधि में दस लाख कारों के धुएं से जितना प्रदूषण हुआ होगा, यह उसके बराबर है।

रुझान और भी खतरनाक है। 2015 और 2021 के बीच दुनिया में बिटकॉइन के लिए होने वाली ऊर्जा की खपत करीब 62 गुना बढ़ी है। आने वाले दिनों में क्या स्थिति होगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। सवाल उठता है कि क्या इसका कोई समाधान निकल सकेगा जब बहुत सारी सरकारें और केंद्रीय बैंक खुद भी अपनी क्रिप्टोकरेंसी तैयार करने में जुटे हैं।
(लेखक माइक्रोसॉफ्ट में ‘निदेशक- भारतीय भाषाएं और सुगम्यता’ के पद पर कार्यरत हैं)

Topics: लाइटकॉइनकोडार्नोक्रिप्टोकरेंसीग्लोबल वार्मिंगबिटकॉइनईथरियमबिनांसरिप्पलडॉगकॉइन
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