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चीन के लिए चिंता का सबब बनता भारत

लुम्बिनी यात्रा के दौरान नेपाली प्रधानमंत्री शेरबहादुर देउबा का अभिवादन स्‍वीकार करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

Written byपंकज दासपंकज दास
May 30, 2022, 11:39 am IST
inविश्व
लुम्बिनी यात्रा के दौरान नेपाली प्रधानमंत्री शेरबहादुर देउबा का अभिवादन स्‍वीकार करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

लुम्बिनी यात्रा के दौरान नेपाली प्रधानमंत्री शेरबहादुर देउबा का अभिवादन स्‍वीकार करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

नेपाल लगातार कम्‍युनिस्‍ट चीन को झटके दे रहा है। पहले उसने बीआरआई के लिए चीन से कर्ज लेने से साफ मना कर दिया। फिर चीन के विरोध के बावजूद संसद में मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन (एमसीसी) परियोजना पर प्रस्‍ताव पारित किया और अब लुम्बिनी पर आंखें गड़ाए चीन को झटका दिया है

नेपाल पूरी तरह से चीन के फंदे से निकलने को आतुर है। बदली विदेश नीति के तहत नेपाल न केवल अब भारत और अमेरिका से नजदीकी बढ़ा रहा है, बल्कि देश में पैठ बना चुके चीन को भी दरकिनार कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया नेपाल दौरे को केवल धार्मिक और सांस्कृतिक यात्रा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसका रणनीतिक और सामरिक महत्‍व भी है। लंबे समय से लुम्बिनी पर निगाहें जमाए चीन के लिए प्रधानमंत्री मोदी का दौरा एक बड़ा झटका है। नेपाल में माओवादी सहित अन्य वामपंथी दलों के उदय के साथ ही चीन ने एक बड़ा मास्टर प्लान बनाया और लुम्बिनी को बौद्ध धर्मावलम्बियों का आस्‍था का केंद्र बनाने की कवायद शुरू कर दी। वह लुम्बिनी के बहाने दुनिया के तमाम बौद्धमार्गी देशों को अपने साथ जोड़ने की फिराक में था। इसलिए दुनिया भर में बीआरआई का जाल बिछाने के लिए चीन ने योजनाबद्ध तरीके से अधिकांश बौद्ध देशों को अपनी महत्वाकांक्षी योजना बेल्ट एंड रोड (बीआरआई) में भी शामिल किया।

 

यह थी ड्रैगन की चाल

चीन ने पहली बार वर्ष 2,000 लुम्बिनी में अपना प्रभाव दिखाना शुरू किया और भगवान गौतम बुद्ध की जन्मस्थली में एक बड़ा मंदिर बनाया। चीन की बुद्धिस्ट एसोसिएशन ऑफ चाइना द्वारा चीन के बाहर विदेश में निर्मित यह पहला मंदिर था। उसी समय तत्‍कालीन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने भी बोधगया में बौद्ध धर्म को लेकर अंतरराष्‍ट्रीय सम्‍मेलन कराया था, जिसमें दुनियाभर से बौद्ध धर्म से जुड़े लोग शामिल हुए थे। इसमें गौतम बुद्ध से जुड़े स्थानों के महत्‍व से दुनिया को अवगत कराया गया था। अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में ही बुद्ध से जुड़े पर्यटन और धार्मिक स्थलों के विकास का काम शुरू हुआ था।

 

उधर, लुम्बिनी में मंदिर बनाने के साथ चीन ने वहां बौद्ध विहार, बौद्ध भिक्षुओं के रूप में बहाने से अपने जासूसों को तैनात करना शुरू किया। भारत की सीमा से महज 19 किलोमीटर दूर स्थित लुम्बिनी में चीन के बढ़ते प्रभाव व उपस्थिति भारत की सुरक्षा के लिए खतरा बन गई थी। वर्ष 2011 में चीन सरकार के मातहत रहे एशिया पैसिफिक एक्सचेंज एंड कॉपरेशन (एपेक) ने लुम्बिनी को व्यवस्थित बनाने के नाम पर संयुक्त राष्ट्र के औद्योगिक विकास संगठन (यूनिडो) के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किया, जिसमें लुम्बिनी के विकास और विस्तार के लिए करीब 300 करोड़ अमेरिकी डॉलर खर्च करने की बात कही गई थी। एपेक का मुख्‍यालय बीजिंग में था, जिसके जरिये लुम्बिनी में चीन अपना प्रभाव बढ़ा रहा था।

लुम्बिनी में चीन के तीन स्‍वार्थ हैं। भारत से जुड़े होने के कारण वहां अपनी रणनीतिक उपस्थिति बढ़ाना, उसे सबसे बड़ा बौद्ध स्‍थल बताते हुए दुनियाभर के बौद्धमार्गी देशों को जोड़ कर व्यापारिक स्वार्थ सिद्ध करना और लुम्बिनी को लेकर जो भावनात्मक लगाव है, उसे अपने पक्ष में सॉफ्ट पावर के रूप में प्रयोग करना। लेकिन नेपाल के बुद्धिजीवियों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी ने लुम्बिनी का दौरा कर उसके मंसूबों पर पानी फेर दिया है।

इस पर भारत ने कूटनीतिक माध्यम से आपत्ति जताई थी। अमेरिका, जापान सहित कई यूरोपीय देशों ने भी चीन के साथ नेपाल की बढ़ती नजदीकी पर भी चिंता जताई थी। वहीं, नेपाल में इस समझौते और एपेक के जरिये अपना प्रभुत्व बढ़ाने में कोई राजनीतिक अड़चन नहीं आए, इसके लिए चीन ने नेपाल के माओवादी नेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री पुष्‍पकमल दाहाल प्रचण्ड को एपेक का सहअध्यक्ष और नेपाल के निर्वासित राजपरिवार के पूर्व युवराज पारस शाह को गवर्निंग काउंसिल का सदस्य बनाया। लेकिन नेपाल के अन्‍य राजनीतिक दलों को उसकी खराब नियत को भांपने में देर नहीं लगी। ऊपर से भारत की नाराजगी और अमेरिका, जापान जैसे मददगार देशों की चिंता के मद्देनजर तत्कालीन विदेश मंत्री उपेंद्र यादव ने पत्र लिख कर एपेक और यूनिडो के बीच हुए समझौते से पल्‍ला झाड़ लिया। कहा गया कि इस समझौते से सरकार का कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन यह जानकारी केवल संयुक्त राष्ट्र संघ और चीन सरकार को ही दी गई।

फिर भी रुचि बनी रही

बहरहाल, लुम्बिनी में चीन की योजना खटाई में पड़ गई, फिर भी उसकी दिलचस्‍पी कम नहीं हुई। वर्ष 2016 में जब प्रचंड फिर प्रधानमंत्री बने तो चीन ने एक बड़े बुद्ध अंतरराष्‍ट्रीय सम्मलेन का आयोजन किया और अपने प्रभाव वाले देशों से प्रतिनिधियों को बुलाया। कहने के लिए यह आयोजन नेपाल सरकार द्वारा किया गया था, लेकिन इसका पूरा खर्च चीन सरकार ने उठाया था। बीआरआई के तहत ट्रांस हिमालयन रेल लाइन बिछाने और उसे लुम्बिनी से जोड़ने की बात चीन द्वारा ही फैलाई गई। कहा गया कि चीन की अधिकांश आबादी बौद्ध धर्म को मानती है। यदि चीन के केरुंग से काठमांडू होते हुए लुम्बिनी तक रेल लाइन बिछने के बाद हर साल लाखों चीनी पर्यटक लुम्बिनी आएंगे, जिससे नेपाल को फायदा होगा।

इससे पूर्व अप्रैल 2015 में चीन सरकार के स्टेट एडमिनिस्ट्रेशन फॉर रिलीजियस अफेयर्स के निर्देशक वांग चु वें ने नेपाल का दौरा किया था और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. रामवरण यादव और तत्कालीन संस्कृति मंत्री से मुलाकात कर एपेक से हुए समझौते को आगे बढ़ाने का प्रस्ताव रखा था। इसके बाद वर्ष 2018 में चीन ने एक बार फिर नेपाल पर ट्रांस हिमालयन बुद्धिस्ट सर्किट की अवधारणा को मिलकर आगे बढ़ाने का दबाव डाला, लेकिन सफल नहीं हो सका। चीन ने भले ही नेपाल को बीआरआई का साझीदार बना लिया है, लेकिन इसके लिए कर्ज लेने से नेपाल के मना करने के बावजूद चीन ने लुम्बिनी को लक्षित करते हुए उसे दूसरा अंतरराष्‍ट्रीय हवाईअड्डा बनाने के लिए कर्ज दिया है।

चीन के तीन स्‍वार्थ

लुम्बिनी में चीन के तीन स्‍वार्थ हैं। भारत से जुड़े होने के कारण वहां अपनी रणनीतिक उपस्थिति बढ़ाना, उसे सबसे बड़ा बौद्ध स्‍थल बताते हुए दुनियाभर के बौद्धमार्गी देशों को जोड़ कर व्यापारिक स्वार्थ सिद्ध करना और लुम्बिनी को लेकर जो भावनात्मक लगाव है, उसे अपने पक्ष में सॉफ्ट पावर के रूप में प्रयोग करना। लेकिन नेपाल के बुद्धिजीवियों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी ने लुम्बिनी का दौरा कर उसके मंसूबों पर पानी फेर दिया है।

Topics: कम्‍युनिस्‍ट चीनचीन के तीन स्‍वार्थलुम्बिनी मंदिरड्रैगन की चालनेपाल
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