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बड़े बेआबरू होकर हर कूचे से ये निकले

पंजाब में जीत से मदहोश आआपा नेताओं ने खुद को कांग्रेस और यहां तक कि राष्ट्रीय विकल्प होने का दावा करना शुरू कर दिया है। परंतु चुनाव परिणामों की हकीकत बताती है कि देश की जनता ने इनके सपनों पर झाड़ू बुहार दी है

Written byप्रदीप सरदानाप्रदीप सरदाना
Apr 5, 2022, 02:30 pm IST
in भारत, विश्लेषण, दिल्ली

आम आदमी पार्टी (आआपा) को 117 सदस्यीय पंजाब विधानसभा के चुनाव में 92 सीटें मिली हैं। आआपा इस सफलता को कुछ इस तरह दर्शाने का प्रयास कर रही है जैसे उसे देश भर के लोगों ने समर्थन दिया हो। ‘आआपा’ के कुछ नेता यह दावा कर रहे हैं कि पूरे देश ने ‘केजरीवाल मॉडल’ को स्वीकार किया है। यह भ्रम भी फैलाया जा रहा है कि ‘आआपा’ देश की तीसरी सबसे बड़ी ‘राष्ट्रीय पार्टी’ बन गई है। कुछ लोग आआपा को कांग्रेस का, वहीं कुछ भाजपा तक का विकल्प बताने लगे हैं।

सवाल यह है कि इन दावों का आधार क्या है? चूंकि ये दावे हालिया विधानसभा चुनावों के बाद किए गए हैं, तो इनके परिणामों की छान-फटक करना समीचीन होगा। पंजाब के अलावा शेष अन्य चुनावी राज्यों में केजरीवाल और उनकी ‘आआपा’ को बेहद शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है। यह ऐसी हार है जो साफ बताती है कि उन राज्यों के मतदाताओं ने अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी को बुरी तरह नकारना तो दूर, गिना तक नहीं है।

यूपी में एआईएमआईएम से भी नीचे
पहले उत्तर प्रदेश की ही बात करें। उत्तर प्रदेश की 403 सदस्यीय विधानसभा के लिए आआपा ने 350 सीटों पर प्रत्याशी उतारे। हालांकि चुनाव के दौरान आआपा नेताओं ने बड़े-बड़े दावे किए परंतु परिणाम आने पर उत्तर प्रदेश में आआपा का खाता तक नहीं खुला और वह महज 0.38 प्रतिशत वोट हासिल कर पाई। अधिकांश सीटों पर उसके प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई। कई सीटों पर तो आआपा प्रत्याशियों को नोटा से भी कम वोट मिले और अधिकतर सीटों पर तो ‘आप’ प्रत्याशी को कुल एक हजार मत भी नहीं मिले। इसके मुकाबले कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में 2.33 प्रतिशत वोट और दो सीटें मिलीं। यहां भाजपा, सपा, बसपा को मिले मत प्रतिशत का जिक्र करने के बजाय आआपा के दावों की हकीकत बताने के लिए इतना बताना काफी होगा कि हैदराबाद के असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम तक को 0.49 प्रतिशत वोट मिले। एआईएमआईएम ने उत्तर प्रदेश में पहली बार चुनाव लड़ा था जबकि आआपा 2014 के आम चुनावों से ही उत्तर प्रदेश में राजनीतिक कदमताल में जुटी है।

उत्तराखंड और गोवा में भी मिट्टी पलीद
उत्तराखंड और गोवा में केजरीवाल ने सरकार बनाने के सपने देखे थे। उत्तराखंड में ‘आआपा’ के सभी 70 सीटों पर उतरे प्रत्याशियों में 55 की जमानत तक जब्त हो गई और पार्टी का खाता तक नहीं खुला। यहां आआपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार कर्नल अजय कोठियाल भी गंगोत्री सीट से जमानत तक नहीं बचा पाए। प्रदेश में कांग्रेस के 37.91 प्रतिशत वोट के मुकाबले आआपा प्रत्याशियों को कुल 3.31 प्रतिशत वोट मिले। इससे बेहतर स्थिति बसपा की रही जिसे 4.82 प्रतिशत वोट और दो सीटें मिलीं।

गोवा में तो ‘आआपा’ ऐसी हवा बनाने में जुटी थी कि इस बार वहां उसकी सरकार बन रही है। ‘आआपा’ ने यहां सभी 40 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे लेकिन उसे सिर्फ दो सीट वेलिम और बेनोलिम पर ही जीत मिली और दो सीटों वह पर दूसरे स्थान पर रही। वेलिम में भी ‘आप’ प्रत्याशी को मात्र 169 वोट से जीत मिली। सेंट क्रूज विधानसभा क्षेत्र से खड़े एवं आआपा की ओर से मुख्यमंत्री पद के दावेदार अमित पालेकर तीसरे स्थान पर रहे जहां कांग्रेस ने भाजपा को हराकर जीत हासिल की। पूरे प्रदेश में आआपा को 6.77 प्रतिशत वोट मिले जबकि कांग्रेस को 23.46 प्रतिशत वोट हासिल हुए।

दिल्ली में ‘सात साल बेमिसाल’ का नारा लगाने वाली आआपा को पिछले 7 साल में दिल्ली और पंजाब विधानसभा को छोड़कर अन्य सभी राज्यों हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, छत्तीसगढ़, राजस्थान, मेघालय, तेलंगाना, नागालैंड और ओड़िसा विधानसभा में जबर्दस्त हार मिली। दिल्ली में भी पिछले दोनों लोकसभा चुनावों में ‘आआपा’ एक भी सीट नहीं जीत सकी। दिल्ली नगर निगम में भी ‘आआपा’ की सरकार नहीं बनी। ऐसे में आआपा नेतृत्व और मीडिया का एक विशेष वर्ग यदि केजरीवाल को 2024 के आम चुनाव में राष्ट्रीय विकल्प या कम से कम कांग्रेस के विकल्प के रूप में देखता है तो उसे मुंगेरीलाल के समकक्ष रखना गलत न होगा।

Topics: ‘केजरीवाल मॉडल’
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