दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध समाज को जगाने और सबमें प्रेम और सहयोग के भाव को जगाने वालों में अग्रणी रहे बिशप टूटू के निधन पर दुनिया भर के शीर्ष नेताओं ने शोक व्यक्त किया है।
नोबल शांति पुरस्कार से सम्मनित दक्षिण अफ्रीका के आर्चबिशप रहे डेसमंड टूटू 90 साल के थे। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खात्मे में उनका बड़ा योगदान माना जाता है।बिशप टूटू को दक्षिण अफ्रीका ही नहीं, दुनियाभर के देशों में बड़े सम्मान से देखा जाता था। टूटू के अवसान की जानकारी देते हुए दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने कहा है कि आर्चबिशप डेसमंड टूटू का जाना दक्षिण अफ्रीका की उस बहादुर पीढ़ी का खत्म होना है जिसने रंगभेद के विरुद्ध लड़कर हमें एक नया दक्षिण अफ्रीकी दिया है। उल्लेनीय है कि बिशप टूटू को भारत के गांधी शांति पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।

2007 में भारत के गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित बिशप टूटू के अवसान पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी गहन दुख व्यक्त किया। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा कि टूटू वैश्विक स्तर पर असंख्य लोगों के लिए एक पथप्रदर्शक की तरह थे।
टूटू को 1984 में नोबल शांति पुरस्कार दिया गया था। 1986 में वे दक्षिण अफ्रीका की राजधानी केप टाउन के प्रथम आर्चबिशप बनाए गए थे। उनकी पहल पर अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस की सरकार से बातचीत चली जिसके बाद ही 1990 में दक्षिण अफ्रीका के सर्वप्रिय रंगभेद विरोध के प्रतीक नेता नेल्सन मंडेला को जेल से रिहा किया गयाथा। इसके साथ ही वहां रंगभेद कानून का खात्मा हुआ था। मंडेला 1994 में चुनाव जीतने के बाद राष्ट्रपति बने। तब उन्होंने बिशप टूटू को रंगभेद के दौरान हुए मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों की जांच करने वाले आयोग का अध्यक्ष बनाया था।
2007 में भारत के गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित बिशप टूटू के अवसान पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी गहन दुख व्यक्त किया। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा कि टूटू वैश्विक स्तर पर असंख्य लोगों के लिए एक पथप्रदर्शक की तरह थे। उन्होंने सदा मानवीय गरिमा और समानता पर जोर दिया था जिसे हमेशा याद रखा जाएगा।











