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होम भारत

ऐसी दीवाली! कैसी दीवाली!!

Written byPanchjanyaPanchjanya
Oct 24, 2021, 05:54 pm IST
in भारत, दिल्ली
दीवाली महात्योहार की रौनक

दीवाली महात्योहार की रौनक

उल्लास, उमंगों और उम्मीदों का त्योहार है दीवाली। पर पटाखों पर प्रतिबंध से इस महात्योहार की रौनक ही खत्म हो गई है। न्यायालय का निर्णय सिर-माथे, पर यह भी देखना होगा कि प्रशासन की ओर से इसकी आड़ में अतिशय कठोरता न बरती जाय जो सामाजिक आक्रोश को जन्म दे और न ही भारत की सांस्कृतिक पहचान को कुंद करे

उल्लास, उमंग और उम्मीदों का त्योहार है दीवाली। लंका विजय के पश्चात प्रभु श्रीराम का माता सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ 14 वर्षों बाद अयोध्या आगमन। बुराई पर अच्छाई की विजय। पराक्रमी, न्यायप्रिय, मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के अयोध्या आगमन से पूरे राज्य में हर्षोल्लास छाया है। पूरी अयोध्या रोशनी से जगमगा रही है। हिंदू समाज इसी दिन को याद करके प्रत्येक वर्ष दीवाली मनाकर उल्लास से सराबोर हो जाता है। निश्चित रूप से समय के साथ इस परंपरा में कई रंग जुड़ते गए जो क्रमिक और सामयिक विकास है, कुछ थोपा हुआ नहीं है।

परंतु पिछले कुछ वर्षों से हिंदू त्योहारों से उनका रंग, चमक, उत्साह छीनने का एक क्रम सा दिखाई पड़ता है। उल्लास, उमंग और उम्मीदों के इस त्योहार की रौनक पटाखों पर प्रतिबंध से छिन सी गई है। थोड़ा पीछे जाएं तो दशहरे पर रावण का पुतलादहन खामोशी से होने लगा है, पुतले के भीतर लगे पटाखे छीन लिये गए हैं। यह पहले पर्यावरण के नाम पर हुआ, फिर दूसरों की सुविधा के नाम पर पटाखे फोड़ने पर प्रतिबंध लागू कर दिया गया।

रौनक छीनने की कड़ियां
त्योहारों की रौनक छीनने की एक कड़ी एनजीओ हैं, एक चरण जनहित याचिका है और मीडिया का एक तबका है। इसके साथ कन्वर्जन तंत्र आ जुड़ता है। ये सब मिलकर एक माहौल बनाते हैं जिसमें हिंदू परंपराएं खलनायक के तौर पर दिखें, न्यायपालिका की बौद्धिक घेराबंदी की जाती है, और न्यायालयों से कुछ खास तरह के निर्णय लेने के प्रयास किए जाते हैं। इसमें हम याद कर सकते हैं रक्षाबंधन के त्योहार को जिसमें पशु अधिकारों से जुड़ा वैश्विक एनजीओ पेटा लोगों से अपील करता है कि इस रक्षाबंधन में चमड़े की राखी का उपयोग न करें। हिंदू मान्यताओं को थोड़ा सा भी परिचित लोग जानते हैं कि हिंदू विधानों में चमड़े का प्रयोग वर्जित है। कभी किसी ने चमड़े से बनी राखी के बारे में सुना तक नहीं होगा। परंतु पेटा को चमड़े की राखी का सपना आता है और वह अपील जारी कर हिंदू समाज और इस त्योहार को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करता है। ऐसा हिंदुओं के विभिन्न त्योहारों में हो रहा है।

 


जल्लीकट्टू

हिंदू त्योहारों पर प्रतिबंध का संगठित प्रयास तमिलनाडु के लोकप्रिय जल्लीकट्टू उत्सव से आरंभ हुआ था। पोंगल पर होने वाला यह एक लोकोत्सव है जो 2,500 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है। इसमें सांडों की प्रतिस्पर्धा और उन्हें काबू करने का खेल होता है जिसके लिए किसान साल भर तैयारी करते हैं। सबसे पहले मीडिया के माध्यम से इस उत्सव को लेकर दुष्प्रचार अभियान शुरू हुआ। बताया गया कि इससे पशुओं के साथ क्रूरता हो रही है। वर्ष 2014 में पेटा और केंद्र सरकार की संस्था पशु कल्याण परिषद ने सर्वोच्च न्यायालय में जल्लीकट्टू  पर प्रतिबंध की याचिका दायर की, जिस पर न्यायालय ने तत्काल प्रतिबंध भी लगा दिया। वास्तव में ग्रामीण भारत का यह उत्सव उत्तम गोधन को संरक्षित करने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। इसके कारण गांवों में तगड़े गोवंश तैयार होते थे, जिनका उपयोग कृषि और नस्ल संवर्धन में होता था।
स्थानीय लोग मानते हैं कि प्रतिबंध का परिणाम यह हुआ कि नंदी के संरक्षण की यह परंपरा भंग हो गई और उन्हें कसाईखाने भेजने के मामले बढ़ गए। यह विषय अभी भी सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ के समक्ष विचाराधीन है।


दही-हांडी

एक समय था जब महाराष्ट्र में कृष्ण जन्माष्टमी पर दही-हांडी की परंपरा को देखने और सम्मिलित होने विश्वभर से पर्यटक आया करते थे। बहुत से लोग मानते हैं कि चूंकि इसके माध्यम से सनातन संस्कृति का विश्व में प्रचार हो रहा था, इसलिए दही-हांडी महोत्सव अब्राहमिक संगठनों और कन्वर्जन गिरोहों के निशाने पर आ गया। 2012 में एक मेडिकल जर्नल में खेल से जुड़े जोखिम को लेकर एक कथित अध्ययन प्रकाशित कराया गया। वैसे किसी भी खेल में खिलाड़ियों के घायल होने की संभावनाएं रहती हैं। दही-हांडी में भी कुछ लोग चोटिल हो जाया करते थे। यही बात पकड़कर उसे खूब प्रचारित किया जाने लगा। 2014 में महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार ने अपना कार्यकाल समाप्त होने से ठीक पहले दही-हांडी में गोविंदाओं पर उम्र सीमा की शर्त लगा दी। इसके बाद मुंबई उच्च न्यायालय ने उम्र सीमा को और बढ़ा दिया। साथ ही दही-हांडी की अधिकतम ऊंचाई केवल 20 फीट तय कर दी। यह एक ऐसा निर्णय था, जिसने दही-हांडी के रोमांच और इस पर्व की लोकप्रियता को हमेशा के लिए नष्ट कर दिया। न तो संविधान में दी गई धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी की चिंता की गई और न ही इससे देश को होने वाली आर्थिक क्षति की।


होली

होली का पर्व भी लंबे समय से नियम-कानूनों के कड़े परीक्षणों से गुजर रहा है। हर वर्ष होली से पहले जलसंकट का एक कृत्रिम शोर मचता है और होली पर प्रतिबंध की मांग उठती है। उत्तर प्रदेश में वर्ष 2012 से 2017 तक जल संकट के नाम पर होली के दिन ही जलापूर्ति में कटौती की घोषणाएं की जाती रहीं। सरकारों की ओर से हर वर्ष सूखी होली की अपील की जाती हैं। आश्चर्य है कि पानी बचाने की यह जागरूकता वर्ष में एक दिन के लिए ही क्यों होती है। एक बार होली के पर्व को बदनाम करने के लिए एक निहायत निम्न स्तरीय दुष्चक्र रचा गया। दक्षिण दिल्ली के अमर कॉलोनी में मार्च, 2018 में दिल्ली विश्वविद्यालय की एक छात्रा ने आरोप लगाया कि उस पर कुछ लड़कों ने वीर्य भरा गुब्बारा फेंका। ऐसी ही एक घटना एक दिन पहले भी होने की खबर आई थी, हालांकि पहली घटना में पीड़ित छात्रा ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई। इस खबर पर बहुत हंगामा हुआ। छात्राओं ने मार्च निकाला, सोशल मीडिया पर कथित प्रगतिशीलों ने उस लड़की का खूब महिमामंडन किया और होली के पर्व की खूब लानत-मलानत की गई और इस त्योहार को यौन हिंसा के रूप में दशार्या गया। परंतु बाद में फोरेंसिक जांच में यह आरोप झूठा पाया गया।


सबरीमाला मंदिर विवाद

इसे हिंदू परंपराओं और धार्मिक स्वतंत्रता के साथ खिलवाड़ का यह सबसे घिनौना प्रयास कहा जा सकता है। साथ ही हिंदू परंपराओं और संवेदनाओं पर संगठित आक्रमण कहें तो अनुचित नहीं होगा। यह सब किया गया स्त्रियों की समानता की आड़ में। सबरीमाला मंदिर में आयु के आधार पर महिलाओं के प्रवेश की मनाही देखते ही देखते राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समस्या बन गई। इसका आरंभ 2006 में हुआ।  संयोग ही है कि हिंदू परंपराओं और त्योहारों पर हमले के ऐसे अधिकांश प्रयासों का आरंभ यूपीए-1 के कार्यकाल में हुआ। इस बहाने हिंदू धर्म को स्त्री विरोधी और पुरातनपंथी साबित करने का पूरा प्रयास हुआ। जबकि यह परंपरा मात्र एक मंदिर तक सीमित थी। सितंबर 2018 में सर्वोच्च न्यायालय की 5 जजों की पीठ ने सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दे दी। जिस एकमात्र जज ने इस निर्णय पर तार्किक असहमति व्यक्त की वे जस्टिस इंदु मल्होत्रा थीं। इस निर्णय के बाद तो मंदिर में घुसने की मानो होड़ सी लग गई। कोई सैनिटरी पैड लेकर मंदिर में जाने लगी तो कोई कुछ और। ऐसा करने वाली महिलाओं में अधिकांशत: ईसाई या मुसलमान थीं। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने इस प्राचीन हिंदू मंदिर पर विधर्मी आक्रमण की मानो छूट दे दी। बाद में पुनर्विचार याचिकाओं के आधार पर यह विषय सात जजों वाली बड़ी पीठ को सौंपा गया। इसे पूरे विवाद का ईसाई मिशनरियों द्वारा पैदा किया गया माना जाता है। केरल के इस क्षेत्र में ढेरों ईसाई मिशनरियां सक्रिय हैं। सबरीमाला मंदिर के लिए स्थानीय लोगों की आस्था उनके अभियान में सबसे बड़ी रुकावट थी। सबरीमाला मंदिर से पहले महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के नाम पर ऐसा ही तमाशा खड़ा किया गया था। वास्तव में वह एक प्रयोग था, जिसका दूसरा चरण सबरीमाला मंदिर था। वास्तव में ये महिलाओं के लिए न्याय या समानता की लड़ाई थी ही नहीं। जिन लोगों ने यह आंदोलन चलाया था वो तब भाग खड़े हुए जब दरगाहों और मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश का विषय उठने लगा।


कुंभ और चारधाम यात्रा

हरिद्वार में कुंभ का कार्यक्रम कोरोना की दूसरी लहर के पहले से तय था। जब संक्रमण बढ़ने लगा तो साधु-संतों ने स्वयं ही पहल करते हुए कुंभ का समापन समय से पहले कर दिया। लेकिन इसे लेकर टिप्पणियां दुर्भाग्यपूर्ण ही कही जा सकती हैं। ऐसा कोई अध्ययन नहीं है जिससे सिद्ध होता हो कि कुंभ के कारण कोरोना फैला। महाराष्ट्र, दिल्ली और केरल जैसे राज्यों में अधिकांश संक्रमण हुए, जिनका कुंभ से कोई लेना-देना नहीं था। उत्तराखंड के दूर-दराज के क्षेत्रों में जहां कोरोना पहुंचा, उनमें से अधिकांश लोग वे थे जो दिल्ली, मुंबई या अन्य राज्यों में काम करते थे और लॉकडाउन के कारण गांव लौट आए थे। मीडिया ने भी इस विषय पर अत्यंत गैर-जिम्मेदार रिपोर्टिंग की। कुंभ और चारधाम यात्रा को लेकर लगातार ऐसी टिप्पणियां की गईं, जिनकी तथ्यात्मकता पूरी तरह संदिग्ध है।


छठ

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने वर्ष 2018 में कोलकाता की झीलों में छठ पूजा करने पर यह कहते हुए रोक लगा दी कि इससे प्रदूषण फैलता है। इस निर्णय पर उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक की मुहर भी लग चुकी है। लेकिन कहीं भी यहां स्पष्ट नहीं है कि छठ पूजा में ऐसा क्या होता है जिससे प्रदूषण फैलता हो। छठ में जो पूजन सामग्री प्रयूक्त होती है वह पूरी तरह प्राकृतिक होता है। जो सरकारें साल भर नदियों में बहने वाले मलमूत्र और औद्योगिक कचरे को नहीं रोक पातीं, प्रदूषण के नाम पर छठ पर प्रतिबंध लगाकर यही संदेश देती हैं कि उनका असली लक्ष्य कुछ और ही है। आरंभ में ऐसे प्रयासों को लोगों ने अपवाद के रूप में लिया था, लेकिन अब इनके पीछे की निरंतरता को स्पष्ट देखा जा सकता है।


किस राज्य में, कैसे प्रतिबंध

राजस्थान की गहलोत सरकार ने प्रदेश में पटाखों पर प्रतिबंध के मामले में यूटर्न ले लिया है। यहां एनसीआर क्षेत्र को छोड़कर अन्य जिलों में दीपावली पर दो घंटे रात 8 से 10 बजे तक के लिए ग्रीन पटाखों को चलाने की अनुमति दी गई है। गृह विभाग की ओर से जारी आदेशों में क्रिसमस और नववर्ष पर रात्रि 11:55 से रात्रि 12:30 बजे, गुरु पर्व पर रात्रि 8 से रात्रि 10 बजे तक तथा छठ पर्व पर सुबह 6 से सुबह 8 बजे तक ग्रीन पटाखे चलाने की अनुमति होगी। कुछ दिन पहले प्रदूषण और कोरोना मरीजों को होने वाली परेशानियों को देखते हुए सरकार ने राज्य में 1 अक्तूबर, 2021 से 31 जनवरी, 2022 तक इनके विक्रय व उपयोग पर रोक लगा दी थी।


इन राज्यों में पटाखों पर पूरी तरह से रोक

राजधानी दिल्ली में प्रदूषण को देखते हुए दीवाली पर पटाखे जलाने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा हुआ है। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति ने दिल्ली में पटाखा बेचने और जलाने पर प्रतिबंध लगा दिया है। ये रोक जनवरी 2022 तक है। हरियाणा और ओडिशा सरकार ने भी इस पर रोक लगा दी है। चंडीगढ़ यूटी प्रशासन लगातार दूसरे साल आतिशबाजी पर रोक लगा चुका है। इसके अलावा कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, सिक्किम में भी पिछले साल पटाखों पर प्रतिबंध की घोषणा की गई थी। दूसरी ओर महाराष्ट्र सरकार ने भी एसओपी जारी करते हुए पटाखे न जलाने की अपील की है।


सर्वोच्च न्यायालय
पटाखों पर प्रतिबंध के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि 'उत्सव दूसरों की जान की कीमत पर नहीं हो सकता। हम जश्न मनाने के खिलाफ नहीं हैं। आप त्योहार मनाना चाहते हैं। हम भी मनाना चाहते हैं। लेकिन किस कीमत पर, यह भी हमें सोचना होगा।' न्यायालय ने आगे कहा, 'पटाखों की वजह से अस्थमा और दूसरे रोगों से पीड़ित लोगों को परेशानी होती है। हर त्योहार, समारोह में पटाखे चलाए जाते हैं और लोग परेशान होते हैं। किसी को इससे कोई लेना-देना नहीं है।' शीर्ष अदालत ने कहा कि वह पटाखों पर प्रतिबंध लगाने पर विचार करते समय कुछ लोगों के रोजगार की आड़ में अन्य नागरिकों के जीवन का अधिकार नहीं छीन सकती। पीठ ने कहा कि हमारा मुख्य फोकस निर्दोष नागरिकों का जीवन जीने का अधिकार कायम रखने पर है। यदि हम पाएंगे कि ग्रीन पटाखे मौजूद हैं और विशेषज्ञों की समिति उन्हें मंजूरी देती है तो हम उचित आदेश पारित कर सकते हैं।

इससे पहले अक्टूबर, 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया था कि कम प्रदूषण फैलाने वाले ग्रीन पटाखों को ही बनाने और बेचने की अनुमति दी जाएगी। दीपावली पर रात 8 बजे से 10 बजे के बीच ही पटाखे फोड़े जा सकेंगे। फ्लिपकार्ट और अमेजन जैसी ई-कॉमर्स वेबसाइट्स पर पटाखों की बिक्री नहीं होगी। केवल लाइसेंसी बाजारों या दुकानों पर ही कम प्रदूषण वाले पटाखों की बिक्री हो सकेगी। अगर किसी इलाके में प्रतिबंधित पटाखों की बिक्री होती है तो इसका जिम्मेदार संबंधित पुलिस थाने का एसएचओ होगा। केंद्र और राज्य सामुदायिक आतिशबाजी को बढ़ावा देने के तरीके तलाशें ताकि ज्यादा प्रदूषण ना हो। इसके लिए विशेष स्थान पहले से तय किए जाएं।

कानून के जानकार बताते हैं कि देखना यह भी होगा कि निर्णय के आधार क्या अन्य मामलों में समान रूप से देखे जाते हैं। अब जैसे अन्य नागरिकों के जीवन जीने के अधिकार को कायम रखने का आधार अन्य मामलों में भी काम करता है। क्या सुबह-सुबह लाउडस्पीकर पर अजान की आवाज से अन्य निर्दोष नागरिकों के जीने के अधिकार का हनन नहीं होता? कोई चीज गलत है तो उस पर रोक लगनी चाहिए, मगर समाज को साथ लेकर होनी चाहिए और सबके लिए होनी चाहिए। ऐसा न होने पर समाज में आक्रोश उत्पन्न होता है। न्यायपालिका और प्रशासन को यह ध्यान रखना चाहिए कि भारतीय नागरिकों से समान व्यवहार हो, उन्हें न्याय मिले ही नहीं बल्कि मिलता हुए दिखे भी ताकि न्यायपालिका की साख बनी रहे और समाज की व्यवस्था भी चलती रहे।

वायु प्रदूषण में पटाखों की हिस्सेदारी का सच यह सही है कि हमें अपने और आने वाली पीढ़ियों को शुद्ध सांसें प्रदान करने के लिए वायु प्रदूषण से बचना होगा। परंतु यह भी देखना होगा कि वायु प्रदूषण में दीवाली पर जलाए जाने वाले पटाखों की हिस्सेदारी क्या है। दिल्ली के प्रदूषण पर आईआईटी, कानपुर द्वारा दिल्ली सरकार को सौंपी गई रपट से वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो जाती है। इसमें विभिन्न स्रोतों से हो रहे प्रदूषण का पूरा ब्योरा देते हुए दशमलव शून्य प्रतिशत तक के सूक्ष्म आंकड़ों (0.0%) को भी शामिल किया गया है। आईआईटी की रपट में कहीं इस बात का उल्लेख नहीं है कि पटाखों से प्रदूषण होता है। कम से कम दशमलव के एक अंक बाद तक तो नहीं ही, जिसके बाद की गणना को नगण्य मानकर छोड़ दिया जाता है। आईआईटी ने इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए दिल्ली में सर्दी और गर्मी, दोनों मौसमों के आंकड़े इकट्ठे किए और जिस तरह से दशमलव के एक अंक बाद तक के आंकड़े जुटाए गए,  लिहाजा माना जा सकता है कि यह विशुद्ध वैज्ञानिक मानदंडों के आधार पर तैयार की गई एक विश्वसनीय रपट थी।  

 
सीपीसीबी ने दीपावली के दौरान दिल्ली की हवा की गुणवत्ता से संबंधित दाखिल किए हलफनामे में मुख्यत: तीन बातों पर जोर दिया। पहली, सल्फर और नाईट्रोजन के आक्साइड .. सीमा के अंदर रहे। दूसरी, पीएम-10 और पीएम-2.5 के स्तर में दीपावली के दौरान वृद्धि हुई और तीसरी कि दो-तीन दिन के भीतर ही इन दोनों का स्तर फिर पहले जैसा हो गया। इसका सीधा मतलब है कि न तो एनजीटी के पास इस बात का कोई आधार है कि पटाखों के कारण प्रदूषण होता है, न आईआईटी कानपुर को दिल्ली के प्रदूषण में इसकी कोई भूमिका मिली। दिल्ली के कुल प्रदूषण में नगण्य भागीदारी रखने वाले पटाखों के कारण अगर दीपावली के दौरान प्रदूषण हुआ भी तो वह केवल दो दिन का मामला था जिसका पर्यावरण पर कोई दीर्घकालिक प्रभाव नहीं था।

अदालत में हो गया ‘खेल’
सर्वोच्च न्यायालय ने जब पहली बार पटाखों पर रोक लगाई, तब वह एक तात्कालिक कदम था और बाद में जब उसने मामले से जुड़े तथ्यों पर विचार किया तो प्रतिबंध हटा लिया, क्योंकि पटाखों से प्रदूषण का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं था। लेकिन तब याचिकाकर्ताओं ने पीठ ही बदलवा ली।

 अदालतों के सामने अमूमन दो तरह की स्थितियां आती हैं- एक, मामले के हर कोण पर विचार करते हुए अंतत: न्याय करना और जब तक न्याय की यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, वैसे तात्कालिक उपाय करना जिससे यथास्थिति में कोई बदलाव न हो जाए। इसी संदर्भ में पटाखों पर सर्वोच्च न्यायालय के दिए फैसलों को देखा जा सकता है। साथ ही, यह देखना भी दिलचस्प है कि कद्दावर याचिकाकर्ता जब अदालत से अपने पक्ष में फैसला पाने में विफल रहते हैं तो किस-किस तरह के हथकंडे अपनाते हैं।

शिवकाशी के पटाखा उद्योग की पीड़ा
पटाखों पर प्रतिबंध ने तमिलनाडु के शिवकाशी के पटाखा उद्योग को लगभग नष्ट कर दिया है। यहां 8 लाख से अधिक लोग प्रत्यक्ष रूप से पटाखे बनाने के काम से जुड़े हैं। इन सभी के सामने रोजी-रोटी का संकट है। ऐसे समय में जब कोरोना वायरस के कारण  उद्योगों की सहायता की जानी चाहिए, शिवकाशी के पटाखा उद्योग को प्रतिबंध की मार झेलनी पड़ रही है। प्रदूषण की आड़ में दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और ओडिशा की सरकारों ने दीवाली पर पटाखे छुड़ाने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा रखा है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने भी इन राज्यों से प्रतिबंध हटाने की अपील की है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी एक निश्चित समयावधि में ग्रीन पटाखों की अनुमति दे रखी है।

क्या हैं ग्रीन पटाखे
ग्रीन पटाखे निम्न-उत्सर्जन वाले पटाखे हैं जिनकी अनुमति सर्वोच्च न्यायालय ने त्योहारों के दौरान जश्न के लिए दी है। ये ग्रीन पटाखे सरकार द्वारा वित्त पोषित पर्यावरण शोध संस्थान सीएसआईआर-नीरी द्वारा विकसित हैं। ये सामान्य पटाखों के मुकाबले छोटे होते हैं। ये सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी दिशानिर्देशों के अनुरूप कम हानिकारक तत्वों से बनाए जाते हैं और इस तरह से निर्मित होते हैं कि ये जलाए जाने पर धूल को दबाते हैं जिससे उत्सर्जन घटना है। इसमें लीथियम, आर्सेनिक, बेरियम और सीसा नहीं मिला होता है और इसके बजाय ये पानी छोड़ते हैं जो धूल को उड़ने नहीं देता। 
 

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