वनवासी समाज पर चर्च की नजर
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वनवासी समाज पर चर्च की नजर

Written byArchiveArchive
Aug 28, 2017, 12:00 am IST
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दिंनाक: 28 Aug 2017 13:21:01

 

‘भेड़ों’ की संख्या बढ़ाने को आतुर चर्च देश में कन्वर्जन के नए-नए तरीके खोजकर तेजी से अपने काम को अंजाम देने में लगा हुआ है। लेकिन झारखंड विधानसभा में पिछले दिनों पास हुए ‘रिलिजियस फ्रीडम बिल’ ने उसकी तिलमिलाहट को सतह पर ला दिया है

 आशीष कुमार 'अंशु'
चर्च ने दशकों से झारखंड को कन्वर्जन का चारागाह बना रखा है। राज्य सरकार ने ‘रिलिजियस फ्रीडम बिल’ को पास कराकर जो साहसिक काम किया है, उससे जबरन कन्वर्जन पर रोक लगेगी। कन्वर्जन वैसे तो सभी समुदायों से संबंधित है, लेकिन वनवासी समाज आरंभ से ही इसका सबसे बड़ा भुक्तभोगी रहा है। अब जनजातीय समुदाय भी जाग्रत हो रहा है। तभी तो जैसे ही यह मामला उठता है, बवाल-सा मच जाता है। चर्च कहीं न कहीं चंगाई सभा के माध्यम से लोगों को बरगला कर जो कन्वर्जन करा रहा है, इस काननू से उस षड्यंत्र पर रोक लगेगी। लेकिन झारखंड में पास हुए रिलिजियस फ्रीडम बिल को लेकर एक बार चर्चा होने लगी है।
झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में प्रलोभन देकर कन्वर्जन की घटनाएं आम हैं। समय-समय पर प्रलोभन देकर कन्वर्जन के विरोध में प्रदर्शन भी होते रहे हंै। इससे समाज में जागरूकता तो बढ़ी लेकिन कन्वर्जन नहीं रुका।
पिछले दिनों उत्तरी बंगाल के हाशिमआरा क्षेत्र से गुजरते हुए ईसाइयों की एक कॉलोनी पर नजर गई। वनवासी समाज के बीच बनी इस कॉलोनी में झारखंड और ओडिशा से वनवासी समाज के लोगों को कन्वर्जन करके यहां बसाया गया है। इन कन्वर्ट लोगों का काम यह है कि वे उत्तरी बंगाल के जनजातीय समाज के बीच अपनी पैठ बढ़ाएं और स्थानीय लोगों को ईसाइयों और ईसा मसीह के किस्से-कहानियां सुनाएं। पैठ बढ़ने पर उनकी छोटी-मोटी सहायता कर उन्हें अपनी ओर आकर्षित करें। जब उनका विश्वास बढ़ जाए तो फिर उन्हें चर्च तक लेकर आएं। वहां चर्च की देखरेख के लिए भी वनवासी समाज से कन्वर्ट हुए लोगों को ही रखा गया है। अपनी यात्रा के दौरान अलीपुर द्वार के पास से होकर गुजरना हुआ। भूटान की सीमा से लगे खोकला बारी में मिले उत्तम प्रधान ने बताया कि पहले गोरखा लोगों में कन्वर्जन बिल्कुल नहीं था। पिछले कुछ समय से मीठी-मीठी बातों में बरगलाकर, धन का प्रलोभन देकर, उनकी छोटी-छोटी जरूरतें पूरी करके गोरखा लोगों का भी तेजी से कन्वर्जन किया जा रहा है। उनके घर के पास भी देखते-देखते दो चर्च खड़े हो गए। उनके रिश्तेदार कन्वर्ट हो गए। उत्तम प्रधान कहते हैं,‘‘कन्वर्जन के बाद हमारे रिश्तेदारों की जीवन शैली में बदलाव नजर आया है। निश्चित तौर पर उन्हें पैसा मिला होगा।’’ यहां यह बताना जरूरी है कि कन्वर्जन का प्रयास पूरे देश में हर स्तर पर हो रहा है। यहां तक कि कई जाने-माने लोग जो नाम से हिन्दू मालूम पड़ते हैं लेकिन वे होते छद्म ईसाई हैं। जो अपनी पहचान छुपाकर देश में ईसाई मत का प्रचार कर रहे हैं। यह सच है कि चर्च का बड़ा शिकार वनवासी समाज है लेकिन इसके अलावा भी वह समाज के विभिन्न वर्गों को बरगलाने और उनका कन्वर्जन करके के लिए बड़ी द्रुत गति से काम में लगा हुआ है।
अब बात करते हैं छद्म ईसाई कांचा इलैया की। उनका एक ईमेल पिछले दिनों कई लोगों के पास आया जिसमें उन्होंने अपनी किताब 'हिंदुत्व मुक्त भारत' के विमोचन-कार्यक्रम में भाग लेने के लिए लोगों को जेएनयू बुलाया था। कार्यक्रम संपन्न हुआ। कथित प्रगतिशीलों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं हुई इस आयोजन से। सोचिए, क्या जेएनयू में इस्लाम मुक्त भारत या ईसाई मुक्त भारत का आयोजन किया जाए तो वामपंथियों की तरफ से क्या प्रतिक्रिया आएगी? उन्होंने इस ईमेल में अपना नाम कांचा शेफर्ड लिखा था।
बहरहाल, जब वे हिंदुत्व मुक्त भारत बनाने के लिए दिल्ली में रुके तो यह भी जानना जरूरी था कि वे कहां रुके थे? दिल्ली में उनका ठिकाना था ईसाई मिशनरी से जुड़े कन्वर्जन के ‘ठेकेदार’ सुनील सरदार का साउथ एक्सटेंशन स्थित आलीशान फ्लैट।
एक दलित स्कॉलर के तौर पर उन्होंने देश में अपनी छवि गढ़ी है लेकिन हकीकत में वे चर्च के काम को आगे बढ़ाते हैं। वे भारत में खुद को आंबेडकरवादी, वामपंथी और उदारवादी दिखाते हैं। उन्हें पता है कि भारत में चर्च उनका यही स्वरूप बेच सकता है। कांचा इलैया जैसे लोग दुनिया भर के मंचों पर जाकर यही बात कर रहे हैं कि हिन्दुत्व सारी समस्याओं की जड़ है, जिसका समाधान ईसाई बनने में है। सुनील सरदार का दिल्ली स्थित बंगला ऐसे कई संदिग्ध लोगों के आने-जाने का केन्द्र है, जो छद्म ईसाई हैं और भारत में जाति के नाम पर हिन्दू समाज में भेद पैदा करके सुनील सरदार जैसों के लिए कन्वर्जन की राह आसान करते हैं। सुनील सरदार जैसों के पास अथाह पैसा कहां से आ रहा है, यह वास्तव में देश की सुरक्षा में लगी एजेंसियों के लिए जांच का
विषय हो सकता है।
पिछले दिनों झारखंड के एक वामपंथी लेखक से भोपाल में मिलना हुआ। बातचीत के क्रम में उन्होंने बेहद चौंकाने वाली बात बताई। उन्होंने बताया कि वे भूमिहार समाज से हैं और वनवासी समाज की महिला से शादी की है जिसके चलते चर्च के लगातार संपर्क में रहते हैं। वे बताते हैं कि इस वक्त पूरा झारखंड एक ज्वालामुखी बना हुआ है। वह कभी भी फट सकता है। क्योंकि चर्च इस समय ऐसी मुसीबत में फंस गया है, जिसे न वह मीडिया में आकर बता सकता है और न ही इस मामले में चुप रह सकता है। उनकी इस पहेली से मेरी रुचि जगी सो मैने उनसे पूरी बात साफ-साफ बताने को कहा। कॉमरेड लेखक के अनुसार—चर्च ने बड़ी मुश्किल से लंबे समय से झारखंड में काम करते हुए वनवासी समाज को बरगलाकर
ईसाई बनाया।
अब झारखंड के मुस्लिम लड़के इन कन्वर्ट हुई वनवासी समाज की लड़कियों को प्रेमपाश में ले रहे हैं और शादी कर रहे हैं। अब चर्च इसका विरोध भी नहीं कर सकता क्योंकि चर्च और मौलवियों में टकराव होगा तो उन दोनों की पोल खुल जाएगी। लेकिन चर्च इन घटनाओं पर चुप भी नहीं रह सकता क्योकि मुसलमान लड़के ऐसे काम करते रहे तो चर्च की दशकों की मेहनत पर पानी फिर जाएगा।
रांची के युवा पत्रकार दिव्यांशु के अनुसार—  छत्तीसगढ़ में कन्वर्जन को लकर कानून है और देश में कन्वर्जन को लेकर भी एक मजबूत कानून है। झारखंड में रिलिजियस फ्रीडम बिल में सिर्फ तीन साल की जेल या पचास हजार रुपए जुर्माना या फिर दोनों का प्रावधान है। साथ ही अगर यह अपराध नाबालिग, महिला, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी व्यक्ति के साथ किया गया तो, सजा तीन की जगह चार साल होगी और जुर्माना भी बढ़ाकर एक लाख रुपये तक देना होगा। दिलचस्प बात यह है कि इस विधेयक के पास होने पर विपक्ष ने भी हंगामा नहीं किया। ऐसा लग रहा था कि यह विधेयक सब मिलकर ही पास कराना चाहते थे। यदि वास्तव में झारखंड में सरकार कन्वर्जन रोकने के प्रति गंभीर है तो उसे कन्वर्ट हुए लोगों के लिए आरक्षण प्रतिबंधित करना होगा। आज भी झारखंड में छद्म ईसाई आरक्षण का लाभ ले रहे हैं। राज्य में यह भी चिन्ता की बात है कि कन्वर्जन का जहर जनजातीय समाज के साथ—साथ यादव, कुर्मी, हलवाई व अन्य वर्गों तक फैल रहा है।
झारखंड यात्रा के दौरान जामा —दुमका में वनवासी नेता सुरेश मुर्मू से मिलना हुआ। सुरेश बताते हैं कि ‘‘वे अपनी मां के साथ चर्च जाया करते थे। चर्च में पादरी उन्हें कहता था कि रा.स्व.संघ के लोगों से बचकर रहा करो। ये हिन्दूवादी लोग ईसाइयों के दुश्मन हैं। जब मैंने यह बात सुनी तो मेरी संघ के बारे में जानने की जिज्ञासा बढ़ी और मैं संघ के संपर्क में आया। मुझे यहां आने पर आभास हुआ कि कोई तो है जो हिन्दू समाज के लिए कार्य कर रहा है। लेकिन एक बात समझ में नहीं आई कि चर्च में पादरी ने संघ के बारे में ऐसा क्यों बोला? जबकि संघ में आज तक चर्च या ईसाइयों के बारे में एक भी शब्द बुरा नहीं सुनने को मिला।’’ रांची विवि में प्राध्यापक दिवाकर मिंज के अनुसार— ‘‘जनजातीय समाज के लोगों को चर्च से ठेंगा हासिल हुआ है। यह बात यहां के भोेले-भाले जनजातीय लोग समझ नहीं पा रहे।’’ अकेले झारखंड या छत्तीसगढ़ चर्च की गिरफ्त में नहीं है अपितु अधिकतर वनवासी क्षेत्रों में ईसाइयों ने भेड़ों की संख्या बढ़ाने के कई नायाब तरीकों को ढूंढ निकाला है जिसके जरिए वे लोगों को कन्वर्ट करते हैं। ऐसे ही ओडिशा में ईसाई मिशनरियों ने जो नायाब तरीका निकाला वह यह कि चर्च द्वारा अलग-अलग जिलों के नाम पर ‘क्रिश्चियन डेटिंग साइट’ तैयार की गई हैं। जैसे-बालासोर क्रिश्चियन डेटिंग साइट।
इन साइट पर हजारों की संख्या में ईसाई लड़के-लड़कियां मौजूद हैं। उसके बाद यहां आकर कोई भी अपने मन मुताबिक पुरुष या महिला मित्र पाई जा सकती है। भेड़ों की संख्या बढ़ाने पर आमादा चर्च किसी भी तरीके से भारत के वनवासी प्रदेशों में नए-नए हथकंडे अपनाकर अपने काम को अंजाम देने पर तुला है। इसके लिए वह हर तरकीब अपना रहा है जिससे हिन्दुओं को कन्वर्ट करके ईसाई बनाया जा सके। लेकिन केन्द्र में सरकार बदलने के बाद उसके काम में थोड़ी समस्या जरूर आई है। जिसके चलते भारत के चर्चों में तिलमिलाहट है।
बहरहाल, झारखंड में कन्वर्जन पर लगाम लगाने के लिए राज्य सरकार ने जो कदम उठाया है, उससे ईसाई मिशनरी बेचैन हैं। लेकिन देखने वाली बात यह होगी कि कानून बनने के बाद कन्वर्जन पर लगाम लग पाएगी या नहीं?     ल्ल

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