‘जाति पर सवार’ लालू का भ्रष्टाचार
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‘जाति पर सवार’ लालू का भ्रष्टाचार

Written byArchiveArchive
Aug 7, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 07 Aug 2017 10:56:11

‘सच्ची निष्ठा और समाज सेवा’ की आड़ में लालू परिवार ने बिहार में भ्रष्टाचार के ऐसे कीर्तिमान स्थापित किए जिन्होंने व्यवस्था को खोखला करने का काम किया

एन. के. सिंह

राजनेताओं पर भ्रष्टाचार के मामले प्रजातंत्र के घाव से रिसती उस मवाद का संकेत देते हैं जिसकी सडांध चीख-चीख कर समाज के कैंसर के खतरे की ओर इंगित करती है। लालू यादव का भ्रष्टाचार, प्रजातंत्र की वह बीमारी है जो सभ्य समाज में इस शासन पद्धति को एक दीमक की तरह चाट चुकी है और पूरे शरीर को खोखला कर चुकी है। इसके लक्षण कई दशकों पहले से राजनीति में सिद्धांतों के अभाव, व्यक्तिगत स्वार्थ, परिवारवाद आदि के रूप में दिखने लगे थे। लेकिन तब हम नहीं चेते।
लालू-ब्रांड के भ्रष्टाचार का एक छोटा उदाहरण देखें। जिस दिन रेलवे के शीर्ष सगंठन व त्रि-सदस्यीय समिति से आईआरसीटीसी को आदेश जाता है और यह विभाग एकल टेंडर के जरिये (बाकी कंपनियों को बचकाने बहाने से बाहर कर दिया जाता है)  तत्कालीन रेल मंत्री लालू यादव की चहेती कंपनी सुजाता होटल्स को औनी-पौनी दर पर रेलवे के पुरी और रांची के दो होटल चलाने का ठेका देता है, ठीक उसी दिन सुजाता कंपनी पटना की एक महंगी जमीन लालू यादव के मंत्री प्रेम गुप्ता की पत्नी की कंपनी को औनी-पौनी दर पर बेच देती है। यानी इतना भी परदा (कानून का भय) नहीं कि महीना दो महीना रुक जाएं ताकि आदान-प्रदान का अपराध न दिखे। फिर कुछ हीं दिन में प्रेम गुप्ता की पत्नी की कंपनी यही जमीन लालू यादव के परिवार की कंपनी (जिसमें पत्नी-बेटी और बेटा शामिल थे) को बेच देती है। यह देश का दुर्भाग्य ही है कि सत्ता में आने के बाद हर मंत्री की पत्नी और बच्चों में व्यवसाय करने की अद्भुत क्षमता पैदा हो जाती है। जो बीवी ठीक से नाम भी नहीं लिख पाती, उसमें 1 लाख 60 हजार करोड़ रुपये के बजट व 11 करोड़ आबादी वाले राज्य को चलाने की क्षमता आ जाती है और जो बेटा हाई स्कूल भी मुश्किल से पास करता है, वह उसी राज्य का कर्णधार करार दिया जाता है।
भारत के संविधान की तीसरी अनुसूची  में मंत्रियों और जन प्रतिनिधियों (जिसमें प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री भी शामिल हैं) को पद ग्रहण करने के पहले इस बात की शपथ लेनी होती है कि वे संविधान में ‘सच्ची श्रद्धा और निष्ठा’ रखते हैं। संविधान निमार्ताओं ने सोचा होगा कि सार्वजानिक रूप से शपथ लेने से मानव बांध जाता है क्योंकि उसे ईश्वर से डर लगे या न लगे, प्रजातंत्र में जनता की नजरों से गिरने का भय रहेगा। लेकिन भारत में ठीक उलटा हुआ और नेता की समझ विकसित हुई कि शपथ लेने के बाद सरकारी सुविधा में ईश्वर को तो उसके दर पर ‘वीआईपी’ दर्शन कर खुश किया जा सकता है लेकिन जनता की नाराजगी की काट एक ही है और वह है उसे जाति या सम्प्रदाय में बांट देना और खुद को उसका संरक्षक बताना। अभिजात्य वर्ग के लिए या दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में सेमिनार के लिए इसका नाम ‘सोशल जस्टिस फोर्सेज’(सामाजिक न्याय की ताकतें)       दिया गया।
नतीजा यह हुआ कि कई वर्ष पहले जब लालू यादव पर चारा घोटाले का आरोप लगा तो एक संपादक ने बिहार के एक यादव -बहुल क्षेत्र राघोपुर में, जहां से लालू और उनके परिवार के लोगों ने समय-समय पर चुनाव लड़ा, अपने संवाददाता भेजे। संवाददाता का सवाल था,‘‘लालू यादव चारा घोटाले में फंसे हैं। आपकी क्या प्रतिक्रिया है?’’ इस पर लगभग सभी यादवों का जवाब था कि बाबू साहेब, आपका नाम क्या है? जब उस संवाददाता ने नाम बताने की जरूरत नहीं होने की बात कही और प्रश्न दोहराया तो उनका जवाब था,‘‘जगन्नाथ मिश्रा भ्रष्टाचार करें तो आप लोगों को दिखाई नहीं देता लेकिन हमारा नेता छाती ठोक कर भ्रष्टाचार कर रहा है तो बड़ा बुरा लग रहा है।’’
किसी समाज में किसी जाति विशेष के नेता का अगर भ्रष्टाचार करना भी उस जाति की सामूहिक गरिमा का परिचायक होने लगे तो वहां प्रजातंत्र, प्रजातांत्रिक मूल्य, नियम और कानून-व्यवस्था सामुद्रिक आंधी में छोटी नौका की तरह डोलने लगती है और अंत में वह डूब जाती है। घोटाले में फंसने के कारण लालू के बाद राबड़ी का शासन में आना और फिर बाद में उनके बच्चों का भी संविधान में उसी ‘सच्ची निष्ठा’ की शपथ लेना इसी आंधी में नाव की मानिंद रहा। इस आंधी में कोई अपराधी शहाबुद्दीन भी पांच बार चुनाव जीतता है क्योंकि उसे मुसलमान अपना ‘रॉबिनहुड’ मानते हंै और हिन्दू वोटर डर के मारे वोट देता है। शहाबुद्दीन जेल से भी वही करता है जो छुट्टा घूमते हुए करता था। संविधान में सच्ची निष्ठा थी तभी तो अपने खिलाफ किसी भी गवाह को जिंदा नहीं रहने देता। फिर वोटर का अपने ‘रॉबिनहुड’ से मोह भंग हो जाएगा अगर गवाह इतनी हिमाकत कर जाए कि अदालत तक पहुंच कर ‘साहेब’ के खिलाफ बोल दे।
तो लालू यादब अदालत में भ्रष्टाचार के तमाम मामलों के बावजूद चुनाव-दर-चुनाव मंत्री के रूप में केंद्र में संविधान में सच्ची निष्ठा की शपथ लेते रहे। राबड़ी देवी राज्य में और अब उनके होनहार बेटा-बेटी भी इसी राह पर हैं। क्योंकि लालू यादव की वर्षों की इसी सच्ची निष्ठा और अदालत के फैसले में टकराव होता है। इस बार कानून की व्यवस्था जीत जाती है लालू चुनाव राजनीति से बाहर कर दिए जाते हैं। यहीं पर प्रजातन्त्र की जनता की समझ और संविधान की प्रजातांत्रिक व्यवस्था में विरोधाभास दिखता है जो समस्या की जड़ में है। अगर लालू भ्रष्टाचार के दोषी हैं और अदालत सजा दे चुकी है तो फिर लालू की पार्टी, लालू का परिवार कैसे वोट पाता है?
इसी बीच देश में शासन बदला और भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राजग की सरकार आई। लालू पर नाजायज धन और जायदाद कमाने के तमाम मामलों की जांच शुरू हुई। अब यहां भी लालू ब्रांड प्रजातंत्र का नमूना देखिये। जब लालू यादव ने रेल मंत्री के रूप में संविधान में सच्ची निष्ठा की शपथ ली थी और उसके अनुरूप काम शुरू किया तो बिहार के एक परिचित व्यक्ति के होटल को सरकारी होटल चलाने का ठेका दे दिया गया। ठेका काफी कम में उठाया गया। लालू की पार्टी के एक अन्य मंत्री की कंपनी को इस होटल चलाने के लिए कम दर पर एक जमीन का कीमती टुकड़ा दिया गया। फिर यही जमीन का टुकड़ा सरला गुप्ता की कंपनी ने लालू यादव के परिवार की कंपनी को औने-पौने में बेच दिया है। इसकी कीमत वैसे तो 32 करोड़ रुपए आंकी गई है लेकिन कागजों में मात्र कुछ लाख ही दिखाई गई। क्या कहीं भी संविधान के प्रति सच्ची निष्ठा में कोई कमी लालू या उनके मंत्रियों में नजर आई?
लालू का गरजना स्वाभाविक है। हालांकि उनको जवाब यह देना था कि क्या होटल को सस्ते में टेंडर दिया गया? क्या होटल मालिक ने प्रेम गुप्ता की पत्नी की कंपनी को जमीन दी? क्या यह जमीन लारा कंपनी को हस्तांतरित हुई? और क्या इसकी कीमत उस समय बाजार दर से (जिस पर अन्य क्रेताओं ने जमीन वेची या खरीदी थी) कम पर दी गई थी? लेकिन लालू के प्रजातंत्र की मान्यताएं अलग हैं। उन्होंने पहले तो कहा कि ‘मेरी होने वाली रैली से मोदी डर गए हैं।, और जब सीबीआई का छापा पड़ा और पूछताछ चली तो लालू ने मीडिया को बताया,‘‘ये मोदी और अमित शाह मुझे जेल में बंद करके भी मुझे समर्पण करने को मजबूर नहीं कर सकते। मैं इनकी सरकार को उखाड़ फेंकूंगा।’’ लालू को यह बोलने की शक्ति शायद इस बात से मिल रही है कि जनता को जाति और सम्प्रदाय में बांट कर फिर एक बार ‘सच्ची निष्ठा’ की धज्जियां उड़ाई जा सकती हैं। पर शायद अबकी बार जनता की तर्क-शक्ति और सामूहिक सोच बदलेगी और प्रजातंत्र संकीर्ण सोच के भंवर से
निकल सकेगा। बिहार की ताजा राजनीतिक घटनाओं के बाद अब देश में एक बड़े राजनीतिक वर्ग से जनता का विश्वास हमेशा-हमेशा के लिए उठ गया है। यह विश्वास पहले से ही काफी कम हो गया था और राजनीति में सिद्धांत एक मजाक हो चुका था लेकिन फिर भी एक झीना परदा था और कई बार लगता था कि कभी यह परदा पूरी तरह नीचे नहीं गिरेगा। जिस देश में आजादी के लिए गांधी ने लाखों लोगों के साथ अहिंसक आन्दोलन किया (जिसके लिये जबरदस्त नैतिक साहस की दरकार होती थी) उस देश में आज कोई लालू यादव 20 साल तक चारा घोटाले में कानूनी प्रक्रिया को धता बताते हुए सत्ता में रह सकता है और यही नहीं, लगातार अद्भुत हिमाकत दिखाते हुए भ्रष्टाचार पर भ्रष्टाचार कर सकता है। लेकिन शायद अब बदलती सामूहिक चेतना इस ब्रांड की राजनीति को खारिज करने को आुतर है।     (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)   

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