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आवरण कथा- एक विलक्षण व्यक्तित्व

Written byArchiveArchive
Dec 19, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 19 Dec 2016 15:51:28

यूं तो महापुरुष सर्वकला संपूर्ण होते हैं तथा देश काल की आवश्यकताओं के अनुसार उनके व्यक्तित्व का पक्ष विशेष हमारे सामने आता है। महापुरुषों के व्यक्तित्व को किन्हीं विशेष रूपों तक सीमित रखना उचित नहीं होता लेकिन इस दुनियावी लोगों के मार्गदर्शन के लिए उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों की चर्चा समाज के विकास के लिए प्रासंगिक व समीचीन प्रतीत होती है।
योद्धा स्वरूप
गुरु गोबिंद सिंह जी एक कुशल घुड़सवार, धनुर्विद्या, खड्ग संचालन आदि युद्ध की सभी विधाओं में प्रवीण थे। इसका दर्शन उनके पहले युद्ध भंगाणी में ही हो गया था। भंगाणी के युद्ध में 22 धार के राजाओं ने आक्रमण किया लेकिन वे सफल नहीं हो पा रहे थे। तब उनके सबसे कुशल योद्धा राजा हरिचंद को मैदान में उतारा गया। हरिचंद ने क्रोध में आते ही अनेक शूरवीरों का हनन किया। इसका वर्णन श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने विचित्र नाटक के आठवें अध्याय के छंद 12 और उससे आगे के छंदों में किया है। तब गुरुजी ने हरिचंद को ललकार कर कहा कि पहले तुम वार करो, मैं तुम्हारे सामने हूं। तो हरिचंद ने क्रोध में आकर पहला तीर चलाया जो गुरुजी के घोड़े को लगा। दूसरा तीर चलाया तो वह कान के पास से निकल गया तथा तीसरा तीर वृक्ष में बंधी पेटी व उसके नीचे के कवच को बेधता हुआ शरीर में आ लगा। श्री गुरुजी ने विचित्र नाटक के आठवें अध्याय के 31वें छंद में कहा कि हरिचंद के प्रहार के कारण मुझे जो तीर लगे, उसने मुझे भी उचित उत्तर देने के लिए बाध्य किया। गुरुजी ने खींचकर तीर मारा जो हरिचंद को लगा और उसके प्राण पखेरू उड़ गए। (श्लोक 31 व 33)। विचित्र नाटक में गुरुजी ने अपनी कलम से राजा हरिचंद के युद्ध कौशल की प्रशंसा की है। दूसरे उन्होंने पहला अवसर दुश्मन को दिया। ऐसा विलक्षण व्यक्तित्व योद्धाओं के इतिहास में विरले ही मिलता है। दूसरा अवसर तब आया जब सैदखान औरंगजेब के दरबार में कसम खाकर आया था कि मैं श्री गुरु गोबिंद सिंह जी को जिंदा या मुर्दा इस दरबार में पेश करूंगा। युद्ध प्रारंभ होने से पहले ही गुरुजी उसके कैंप में घोड़े पर सवार होकर पहुंच गए और कहा कि निर्दोष लोगों को क्यों मरवाते हो। तुम कसम खाकर आए हो तो मुझ पर वार करो। सैदखान ने तीर उठाया, लेकिन गुरुजी के मुख को देखकर तीर नीचे कर दिया। इतिहास में ऐसा दुस्साहस भी विरले ही मिलता है। श्री गुरुजी केवल युद्ध कौशल में प्रवीण ही नहीं थे, बल्कि रणनीति में भी अद्वितीय थे। जिस तरह श्री आनंदपुर साहिब किले की रचना गुरुजी ने करवाई और अपने सैनिकों को इस तरह तैनात किया कि लाहौर, सरहिंद के सूबों तथा 22 धार के सभी राजाओं की फौज आठ महीने में भी श्री आनंदपुर साहिब को जीत नहीं सकी और उन्होंने धोखा देकर गुरुजी से आनंदपुर साहिब छोड़ने का आग्रह किया। श्री गुरुजी उन कसमों पर विश्वास नहीं कर रहे थे पर माता गुजरी जी के कहने पर उन्होंने श्री आनंदपुर साहिब को छोड़ा, जिसकी दुखद परिणिति सिरसा दरिया की घटना, छोटे साहिबजादों और बड़े साहिबजादों के रूप में हुई। चमकौर की गढ़ी में केवल 40 सिखों और दो साहिबजादों के साथ उन्होंने 10 लाख फौज के साथ मुकाबला किया और मुगल सेना चमकौर की गढ़ी पर कब्जा नहीं कर सकी और गुरुजी पंज प्यारों के हुक्म से सुरक्षित चमकौर की गढ़ी से बाहर चले गए। यह भी उनकी विलक्षण युद्ध रणनीति का अद्वितीय उदाहरण है।
ब्रह्मवेत्ता
गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज एक दृढ़ साधक थे। वे सदैव सवा पहर रात्रि जागकर स्नान,  नितनेम और साधना करते थे। उन्होंने श्री जाप साहिब में परमात्मा के अनेक रूपों का वर्णन किया है तथा परमात्मा के स्वरूप के बारे में अनेक भ्रमों को दूर किया है। उन्होंने चौपाई साहब में यह वर्णन किया है-
उन्होंने परमात्मा के बारे में श्री जपुजी साहिब के प्रारंभ में कहा है कि परमात्मा का ना कोई चक्र है, न कोई चिह्न, ना कोई वर्ण, जाति अथवा भाईचारा है। उसका कोई रंग-रूप भी नहीं है, कोई भेष भी नहीं है, वह परमात्मा अचल मूरत है तथा वह अनुभव से ही जाना जाता है और वह महान है।
चक्र चह्न अरु बरन जाति
अरु पातिन नहिन जीह।
रूप रंग अरु रेख भेख कोउ
कहि न सकति कहि।।
अचल मूरति अनुभव
प्रकाश अमितोजि कहिजै।।
उन्होंने जीवन और आत्मा के संबंध को व्याख्यायित करते हुए कहा है कि जैसे एक जलधारा से अनेक धाराएं हो जाती हैं। वे पुन: मिलकर जल के साथ एकमेव हो जाती हैं। उन्होंने अनेक उदाहरण देकर कहा, उसी प्रकार जीवन परमात्मा से अलग होकर पुन: परमात्मा में विलीन हो जाता है।
जैसे एक नद ते तरंग कोटि उपजतुहैं।
पान के तरंग पिरु पान ही कहाएंगे।।
परमात्मा को लोगों ने देवी देवता, सूर्य, चंद्र, पवन आदि शक्तियों तक सीमित कर रखा था, लेकिन श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने परमात्मा के विशुद्ध रूप को जैसे प्रगट किया है वह वेदांत का सार है तथा ब्रह्म ज्ञान की दृष्टि से सर्वोच्च दर्शन है।
कुशल संगठनकर्ता
श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने यह विचार किया कि भारत की धरती को पाप से मुक्त करना है तथा आक्रांताओं का मुकाबला करना है तो ऐसा केवल कुछ क्षत्रियों के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए पूरे समाज को जगाना तथा जोड़ना जरूरी है। उन्होंने समाज के अंदर यह भाव पैदा किया कि देश, धर्म की रक्षा की जिम्मेदारी हम सभी की है। इसी कारण पंज प्यारों में से उन जातियों में से भी लोग आए जिनके जिम्मे चाकरी, व्यापार और मजदूरी थी। उन पंज प्यारों को तथा उसके बाद अमृत छकने वाले हजारों गुरसिखों के अंदर उन्होंने आत्म सम्मान पैदा किया। उन्होंने पंज प्यारों को समाज का प्रतिनिधित्व दिया और इस प्रकार लोकतांत्रिक संगठनात्मक पद्धति को दृढ़ किया। उनके कुशल नेतृत्व और गुरसिखों से आत्मीतयापूर्ण व्यवहार के कारण हजारों लोग जान हथेली पर लेकर मरने-मारने को तैयार हो गए। उन्होंने समाज की कायरता को दूर करने के लिए नामों के साथ सिंह लगवाना प्रारंभ करवाया जोकि उस समय तक राजपूतों के अलावा सभी को मुमानियत था। उन्होंने अपने पुत्रों के नाम भी अजीत सिंह, जोरावर सिंह, जुझार सिंह व फतेह सिंह रखे क्योंकि ये समाज के लिए आत्मबल और आत्मविश्वास की प्रेरणा देने वाले थे। गुरुजी ने समाज को जागृत व सुदृढ़ करने के लिए प्राचीन व पौराणिक चरित्रों व कथाओं को नए रूप में रखा। कृष्णवतार ग्रंथ में उनहोंने खड्ग सिंह नाम का एक पात्र गढ़ा जो शक्ति का प्रतीक था। इसी में उन्होंने अनेक मुसलमान पात्र भी खड़े किए। क्योंकि उन्हें पता था कि सिखों का मुकाबला उनसे होने वाला है। उन्होंने अपनी वाणी में खड्ग को, जो शक्ति की प्रतीक थी, सर्वाधिक सम्मान दिया। यह सब समाज में आत्मबल भरने के लिए था और इसका स्वत: प्रमाण यह है कि उनके बनाए हुए गुरसिख हजारों से अकेले लड़ गए। गुरुजी का मानना था कि शान से जिंदा रहने के लिए मरना आना जरूरी है। उन्होंने भारत को मरना सिखाया और इस प्रकार वे इतिहास में एक विलक्षण संगठक के रूप में सामने आते हैं।  उन्होंने दलित व दमित कहे जाने वाले लोगों को साथ लेकर ऐसे खालसे की रचना की, जिसने विदेशी आक्रांताओं का रास्ता सदा-सदा के लिए बंद कर दिया। उनके संगठन की दूसरी विलक्षणता यह थी कि उन्होंने गुरसिखों के अंदर चरित्र की दृढ़ता उत्पन्न  की जिसका उल्लेख बाद के इतिहास में भी आता है। अहमदशाह अब्दाली के हमले के समय काजी नूर मोहम्मद शायर के रूप में आया था ताकि उसकी फौजों का उतसाहवर्धन कर सके। जब सिख जीवन-मरण की लड़ाई लड़ते हुए जंगलों में रह रहे थे और अब्दाली के काफिले पर हमला करते थे तो उसके सैनिक कहते संग आ गए। उसने अपनी एक पुस्तक 'जंगनामा' में एक कविता सिखों को समर्पित की है। उसमें लिखा है कि ऐ मेरे बहादुर सिपाहियो, इन्हें सग यानी कुत्ता मत कहो, ये सिंह यानि शेर हैं। मैदान-ए-जंग में ये शेर की तरह लड़ते हैं। उसने आगे लिखा कि मैंने अपने दौरे के दौरान किसी भी सिख को निहत्थे, बूढ़े, गरीब व्यक्ति पर शस्त्र उठाते नहीं देखा। यहीं बस नहीं, चाहे रानी हो या गोली उसका धन व इज्जत लूटने के लिए शस्त्र का प्रयोग नहीं किया। यह चरित्र श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज का ही दिया हुआ था। उनके संगठन का एक विलक्षण पक्ष यह भी था कि उन्होंने अपनी जीत का श्रेय गुरसिखों को दिया।
महान संत
श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज ने बेशक युद्ध लड़े और युद्ध में अपने चारों बेटों और माता को खोया। लेकिन एक संत की तरह वे इस पीड़ा से ऊपर थे। जब श्री गुरु गोबिंद सिंह महाराज ने औरंगजेब को पत्र लिखा, जिसे जफरनामा के नाम से जाना जाता है, तब भी उनके शब्दों में क्रोध व घृणा नहीं थी,  बल्कि एक संत की तरह महान उच्चता थी और उन्होंने एक उपदेशक की तरह औरंगजेब को संबोधित किया। गुरुजी ने जफरनामा के पहले 12 छंदों में परमात्मा की स्तुति की है। उन्होंने यह भी लिखा कि खुदा को तो तू भी मानता है और मैं भी, लेकिन तेरे और मेरे मानने में फर्क है। तू यह कहता है कि परमात्मा संसार की गुप्त व प्रकट बात को जानता है लेकिन तू दुनिया के साथ धोखा, फरेब व ठगी करता है, तू अपनी बातें सही साबित करने के लिए बेईमानी, ठगी, झूठ व बुराई से बाज नहीं आ रहा है। उन्होंने आगे कहा कि इस पत्र के जरिए मैं वो सब तुम्हारे पास लिखकर भेज रहा हूं जो चलाकियां व झूठी कसमें तुमने खाई हैं, इनको पढ़कर देख, तू कितना सच्चा है। जिस औरंगजेब ने गुरुजी का सारा वंश समाप्त कर दिया हो, उन्हें अनेक कष्ट सहने पड़े हों और उनके लाडले हजारों सिख मारे गए हों, फिर भी सहज रूप से एक उपदेशक की तरह उसे उसके पापों का अहसास कराना, किसी उच्चता प्राप्त संत के द्वारा ही संभव हो सकता है।  

-सरदार गुरचरन सिंह गिल 

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