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शक्ति का मंत्र

Written byArchiveArchive
Oct 17, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 17 Oct 2016 11:34:29

 

1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बीज रोपा था। नागपुर में प्रतिवर्ष सरसंघचालक शस्त्र पूजन के बाद स्वयंसेवकों और आम नागरिकों को संबोधित करते हैं। गत 11 अक्तूबर को नागपुर के रेशमबाग में संपन्न उत्सव को संबोधित करते हुए सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने जहां शक्तिशाली भारत का अभिनंदन किया तो वहीं राष्ट्र के समक्ष उपस्थित चुनौतियों की चर्चा करते हुए समाधान भी सुझाए    

दुनिया के सबसे बड़े संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गठन के 9 दशक पूरे होने और बदले हुए गणवेश के वातावरण में इस बार का विजयादशमी उत्सव और सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत का उद्बोधन, ये दोनों सामान आकर्षण के केंद्र बने हुए थे। नियंत्रण रेखा के पार भारत के बहादुर जवानों द्वारा अप्रतिम शौर्य दिखाकर आतंकियों के शिविरों को ध्वस्त करने की घटना से देश का मनोबल ऊंचा है। इस घटना की पृष्ठभूमि में सरसंघचालक के विचार सुनने के लिए देश-विदेश के लोग, पत्रकार और गणमान्य नागरिक नागपुर के ऐतिहासिक रेशमबाग मैदान पर गत 11 अक्तूबर को विजयादशमी समारोह में एकत्र हुए थे। इस ऐतिहासिक कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे थे पूर्व प्रशासनिक अधिकारी और अखिल भारतीय सफाई कामगार संघ के अध्यक्ष श्री सत्य प्रकाश राय। पश्चिम क्षेत्र के संघचालक डॉ. जयंतीभाई भाड़ेसिया, नागपुर महानगर संघचालक राजेश लोया, सह संघचालक श्रीधर गाडगे और विदर्भ प्रान्त के सह संघचालक श्री राम हरकरे भी मंच पर विराजमान थे। इस अवसर पर केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस, नागपुर के महापौर प्रवीण दटके, महाराष्ट्र के ऊर्जा मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले, राष्ट्रीय स्वयंसेविका समिति की प्रमुख संचालिका शांताक्का, समिति की कार्यवाहिका सीताक्का, संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख डॉ. मनमोहन वैद्य, सह प्रचार प्रमुख जे़ नंदकुमार, संघ के वरिष्ठ विचारक व वरिष्ठ पत्रकार मा़ गो़ वैद्य, सुप्रसिद्ध गायिका अनुराधा पौडवाल, भाजपा सांसद व गायक मनोज तिवारी मुख्य रूप से उपस्थित थे।  
सरसंघचालक श्री भागवत का यह भाषण कई अथोंर् में अलग था। अपने भाषण में जो मुद्दे उन्होंने उठाये और जिस प्रकार से उन्हें स्पष्ट किया, वह अपने आपमें एक अलग शैली का परिचायक था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने जो विभिन्न सुधार कार्यक्रम शुरू किए हैं, जैसे स्वच्छ भारत, मेक इन इंडिया, इत्यादि, उन्होंने उनका पूर्ण समर्थन किया। श्री भागवत ने कहा कि इस सरकार ने समाज में एक नयी आशा जगाई है, नया विश्वास जगाया है, इसी आशा और विश्वास भरे माहौल में देश आगे बढ़            रहा है।
जैसा कि अपेक्षित था, सरसंघचालक ने समाज और देश के सामने प्रस्तुत अनेक समस्याओं का उल्लेख किया और उनके समाधान का मार्ग भी दिखाया। उन्होंने भारत के चार महान सपूतों—कश्मीर के आचार्य अभिनवगुप्त, दक्षिण के रामानुजाचार्य, सिख पंथ के दशम् गुरु गुरु गोविन्द सिंह और विदर्भ के प्रज्ञाचक्षु 'ज्ञानेश्वर कन्या' संत श्री गुलाबराव महाराज- का आदरपूर्वक उल्लेख करते हुए उनके दिखाए मार्ग का अनुसरण करने का आह्वाहन किया। इन महानुभावों के संदेशों का अनुसरण कर हम देश के सामने  दिख रही समस्याओं पर विजय पा सकते हैं।
अपने एक घंटे के उद्बोधन में सरसंघचालक श्री भागवत ने जहां अनेक विषयों को स्पर्श किया, वहीं भारत की जांबाज सेना और प्रधानमंत्री मोदी की सरकार का खुलेदिल से अभिनन्दन किया। उन्होंने कहा कि सेना की सफल सर्जिकल स्ट्राइक के कारण देश का मनोबल ऊंचा हो गया हैं, आत्मविश्वास बढ़ गया है।
विविधताओं में एकता
प्रजातंत्र में जो दल सत्ता से वंचित रहते हैं। वे विरोधी दल बनकर शासन-प्रशासन की कमियां अधोरेखित करते हैं और अपने दल का प्रभाव बढ़ाने का प्रयास करते हैं, जो उचित भी है। सरसंघचालक ने कहा कि देश की व्यवस्था के नाते हमने अपने संविधान में संघ राज्यीय कार्यप्रणाली को स्वीकार किया है। राज्यों की शासन व्यवस्थाओं का भी इसमें पूर्ण सहयोग आवश्यक रहता है। विभिन्न दलों का राजनीतिक नेतृत्व करने वालों को यह निरन्तर स्मरण रखना पडे़गा कि व्यवस्था कोई व कैसी भी हो, सम्पूर्ण भारत युगों-युगों से अपने जन की सभी विविधताओं सहित एक जन, एक देश, एक राष्ट्र रहा है तथा आगे उसको वैसे ही रहना है, रखना है। उन्होंने कहा कि मन, वचन, कर्म से हमारा व्यवहार उस एकता को पुष्ट करने वाला होना चाहिए, न कि दुर्बल करने वाला। समाज जीवन के विभिन्न अंगों में नेतृत्व करने वाले सभी जन को इस दायित्वबोध का परिचय देते चलने का अनुशासन दिखाना ही पड़ेगा। साथ-साथ समाज को भी ऐसे ही दायित्वपूर्ण व्यवहार को सिखाने वाली व्यवस्थाएं बनानी पडे़ंगी।

संपूर्ण जम्मू-कश्मीर भारत का 

श्री भागवत ने भारतीय सशस्त्र सेना की प्रशंसा करते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर की स्थिति चिंताजनक है। जम्मू, लद्दाख सहित कश्मीर घाटी का बड़ा क्षेत्र अभी कम उपद्रवग्रस्त व अधिक नियंत्रण में है। लेकिन वहां राष्ट्रीय प्रवृत्तियां व शक्तियों का बल स्थापित हो, इसके लिए शीघ्रता करनी चाहिए। सरसंघचालक ने कहा कि कश्मीर घाटी में उपद्रवों को उकसाने का काम सीमापार से होता है, यह सारी दुनिया जानती है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि मीरपुर, मुजफ्फराबाद, गिलगित, बाल्टिस्तान सहित संपूर्ण कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है, यह दृढ़ भूमिका प्रत्येक भारतीय के मन में बनी रहनी चाहिए।
केंद्र और राज्य सरकार में ठीक तालमेल और सहकारिता के आधार पर काम होना चाहिए, इस बात पर जोर देते हुए श्री भागवत ने जम्मू-कश्मीर की महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व वाली राज्य सरकार को मर्यादा पालन की हिदायत दी। शासन चलाना केवल केंद्र की जिम्मेदारी नहीं होती उसमंे राज्य सरकार का भी योगदान होता है। केंद्र सरकार अगर दृढ़ता से निर्णय लेकर काम करना चाहती है तो राज्य सरकार को भी दृढ़ता दिखानी होगी। केंद्र और राज्य सरकार की दिशा समान होनी चाहिए।
सरसंघचालक ने जम्मू-कश्मीर की वर्तमान स्थिति को सुधारने तथा विस्थापित हिन्दू समाज के पुनर्वास को लेकर केन्द्र सरकार व जम्मू-कश्मीर की राज्य सरकार से समन्वय साधकर कार्य करने की अपील की। उन्होंने कहा कि कश्मीर के उपद्रवग्रस्त क्षेत्रों में उपद्रव उत्पन्न करने वाले स्थानीय व परकीय तत्वों पर कड़ाई से शीघ्र नियंत्रण हो, इसके लिए राज्य शासन व केन्द्र शासन को अपने-अपने प्रशासन सहित एकमत व एकनीति बनाकर समन्वय से कार्य करना होगा। सरसंघचालक ने कहा कि शासन व संसद ने दृढ़तापूर्वक यह संकल्प दोहराया है कि कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है । जम्मू-कश्मीर के लिए सही नीति का तत्पर व दृढ़तापूर्वक क्रियान्वयन होना आवश्यक है।
सरसंघचालक ने पाकिस्तानी कब्जे वालेकश्मीर व कश्मीर घाटी से विस्थापित हिन्दुओं की सुरक्षा, योगक्षेम और उनके पुनर्वास के कार्य को शीघ्रता से पूर्ण करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि विभाजन के समय जम्मू-कश्मीर राज्य में तत्कालीन राज्य शासन ने विस्थापित हिंदुओं को आश्वस्त करते हुए राज्य में ही बसने को कहा था। उन विस्थापितों को राज्य में भी अभी तक नागरिकता के अधिकार से वंचित रखा गया है, उन्हें उनके सभी अधिकार प्राप्त कर देने होंगे। सरसंघचालक ने कहा कि अब तक राज्य प्रशासन के द्वारा जम्मू व लद्दाख के साथ किया जाता रहा भेदभाव तुरंत समाप्त होना चाहिए। जम्मू व कश्मीर में राज्य का प्रशासन राष्ट्रभाव से स्वच्छ, तत्पर, समदृष्टि व पारदर्शी होकर चले। ऐसा होगा तभी राज्य की जनता को विजय तथा विश्वास की एक साथ अनुभूति मिलेगी और घाटी की जनता के एकरस होने की प्रक्रिया आगे बढे़गी।
सीमाओं पर सेना और सूचना का समन्वय
श्री भागवत ने कहा कि सीमान्त प्रदेशों में अलगाव, हिंसा, आतंक व नशीली दवाओं की तस्करी जैसी समाज के स्वास्थ्य व बल को नष्ट करने वाली गतिविधियां चलती हैं। ऐसी अवस्था में हमारे सामरिक बल के सदैव तत्पर सेना दल, रक्षक बल तथा सूचना तंत्रों में समन्वय बहुत जरूरी है। सरसंघचालक ने कहा कि आपसी समन्वय, सहयोग का प्रमाण व नित्य सजगता में क्षणभर की ढिलाई महंगी पड़ सकती है, इस उरी के सैनिक शिविर पर हुए हमले की घटना ने फिर एक बार अधोरेखित किया है।
उन्होंने कहा कि शासन के नेतृत्व ने उरी हमले का जवाब बड़ी दृढ़ता व कुशलतापूर्वक दिया, इसलिए शासन व सभी सेना दलों का हार्दिक अभिनंदन! हमारी यह दृढ़ता तथा राजनयिक व सामरिक कुशलता हमारी नीति में स्थायी हो, यह आवश्यक है। समूचे सागरी व भू-सीमा प्रदेशों में इस दृष्टि से कड़ी निगरानी रखते हुए शासन, प्रशासन व समाज के परस्पर सहयोग से अवांछित गतिविधियों तथा उनके पीछे काम करने वाली कुप्रवृत्तियों को जड़-मूल से समाप्त करना आवश्यक हो गया है।
अनावश्यक विवाद व विभाजनकारी मुद्दों को उछालकर विपक्ष के रवैये व अलगाववादी शक्तियों की ओर संकेत करते हुए सरसंघचालक ने कहा कि देश की वर्तमान स्थिति व विश्व परिदृश्य की थोड़ी-बहुत जानकारी रखने वाले, सभी को यह पता है कि भारत के समर्थ, एकात्म, आत्मनिर्भर व नेतृत्वक्षम होकर उभरने को फूटी आंखों न पसंद करने वाली कुछ कट्टरपंथी, अतिवादी, विभेदकारी व स्वार्थी ताकतें दुनिया में हैं। और ये ताकतें भारत में भी अपना जाल बिछाने का काम कर रही हैं। उन्होंने कहा कि भारत के समाज-जीवन से विषमता, भेद व संकुचित स्वार्थी प्रवृत्तियां अभी तक समाप्त नहीं हुई हैं। इसी कारण यदा-कदा घटने वाली घटनाओं का लाभ उठाकर अथवा घटना घटे, इसके लिए कतिपय लोगों को उकसाते हुए समाज में वैमनस्य का भाव पैदा करने की कोशिश स्वार्थी लोग करते हैं। श्री भागवत ने कहा कि कई बार तो अघटित घटनाओं के घटने का असत्य प्रचार करते हुए विश्व भर में बसे भारतवासियों, भारत के शासन-प्रशासन तथा भारत में ऐसी दुष्प्रवृत्तियों को रोक सकने वाले संघ सहित सज्जन शक्तियों को विवादों में खींचकर बदनाम करने व लोकमानस को उनके बारे में भ्रम फैलाने का प्रयास किया जाता है। ऐसी विभाजक ताकतें अलग-अलग अथवा समान स्वार्थ के लिए गोलबंद होकर काम करेंगी ही। उनके भ्रमजाल तथा छल-कपट के चंगुल में फंसकर समाज में विभेद व वैमनस्य का वातावरण न बने, इसके लिए प्रयास करने पड़ेंगे।
सरसंघचालक ने आगे कहा कि देशी गाय अपने देश के पशुधन का बड़ा हिस्सा है। गो-रक्षण, संवर्धन व विकास, यह संविधान के मार्गदर्शक तत्वों में निर्दिष्ट, भारतीय समाज की आस्था व परंपरा के अनुसार पवित्र कार्य है। उन्होंने कहा कि केवल संघ के स्वयंसेवक ही नहीं, देशभर में अनेक संत, सज्जन, संविधान-कानून की मर्यादा का पूर्ण पालन करते हुए जीवन तपस्या के रूप में इस कार्य को आगे बढ़ा रहे हैं। आधुनिक विज्ञान के प्रमाण देशी गाय की उपयुक्तता व श्रेष्ठता को सिद्ध कर चुके हैं। अनेक राज्यों में गोहत्या प्रतिबंध कानून तथा पशुओं के प्रति क्रूरता प्रतिबंध कानून बने हैं। उनका ठीक से अमल हो इसके लिए भी कभी-कभी व कहीं-कहीं गोसेवकों को अभियान चलाना पड़ता है।
गाय की हो चिंता

गाय की हो चिंता
सरसंघचालक ने कहा कि गोहत्या की घटनाओं का आधार लेकर अथवा कपोल-कल्पित घटनाओं की अफवाह को उछालते हुए अपना व्यक्तिगत अथवा राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध करना, समाज में बिना कारण कलह खड़ी करना, अथवा केवल गोसेवा के पवित्र कार्य को ही लांछित व उपहासित करने के लिए भ्रामक प्रचार रचने वाले अवांछित तत्वों से उनकी तुलना नहीं हो सकती। गोसेवकों की तपस्या तो चलती रहेगी, बढ़ती रहेगी। अपना हर कार्य कानून-सुव्यवस्था की मर्यादा में ही हो, यह स्वतंत्र देश के प्रजातंत्र का अनुशासन है। उन्होंने कहा कि गोहत्या प्रतिबंधन कानूनों पर कड़ाई से अमल हो व कानून-सुव्यवस्था का पालन भी कड़ाई से हो, यह देखते समय प्रशासन सज्जन व दुर्जनों को एक ही तराजू में न तोले, यह आवश्यक है। यह ध्यान में रखना चाहिए कि समाज में स्वतंत्रता व समता का अवतरण व दृढ़ीकरण, समाज में बंधुभाव की व्याप्ति व दृढ़ता पर निर्भर रहता है।
अंत में विजयादशमी की शुभकामनाएं देते हुए सरसंघचालक ने गुरु गोविन्द सिंह द्वारा रचित सूत्र का उल्लेख किया-
देह शिवा वर मोहे इहै,
सुभ करमन ते कबहूं न टरों।
न डरों अरि सों जब जाय लरों,
निसचै कर अपनी जीत करों॥
अरु सिख हों आपने ही मन कौ,
इह लालच हउ गुन तउ उचरों।
जब आव की अउध निदान बनै,
अति ही रन मै तब जूझ मरों॥
इसके पूर्व कार्यक्रम के प्रारंभ में ध्वजारोहण के पश्चात विशिष्ट अतिथियों द्वारा शस्त्रपूजन किया गया। स्वयंसेवकों ने पथ संचलन तथा दंड-व्यायाम योग का प्रदर्शन किया। नागपुर महानगर संघचालक श्री राजेश लोया ने कार्यक्रम की प्रस्तावना तथा आभार व्यक्त किया। तत्पश्चात कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री सत्यप्रकाश राय ने समारोह को
संबोधित किया।  प्रहार समाज जागृति संस्था के अध्यक्ष सेवानिवृत्त कर्नल सुनील देशपांडे का अभिप्राय था कि सरसंघचालक जी का विजयादशमी उद्बोधन अप्रतिम और संतुलित था। उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक के लिए सेना और सरकार की उचित प्रशंसा भी की और समाज की एकता पर बल दिया। जाति आधारित सभी भेदों को भुलाकर एकात्म, समरस समाज का निर्माण करने पर उन्होंने जो बल दिया वह उचित ही था। दैनिक तरुण भारत के पूर्व संपादक श्री ल़ र्त्य. जोशी ने सरसंघचालक जी के उद्बोधन को समयोचित बताया। मोदी सरकार के अच्छे कामों की सराहना को भी उन्होंने उचित ठहराया। गो-रक्षा के विषय में प्रामाणिक गोसेवक और उपद्रवकारियों के बीच शासन-प्रशासन को अंतर करना चाहिए, ऐसा कह कर उन्होंने सरकार को सावधानी बरतने का संकेत भी दिया है, जो सर्वथा सही है।
संघ के वरिष्ठ स्वयंसेवक तथा महाराष्ट्र शासन के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के पूर्व अतिरिक्त संचालक श्री. ग़ सहस्रभोजनी का कहना था कि जिनको सरसंघचालक के उद्बोधन में केवल राजनीति देखने की आदत है उनकी नजरें भले उसे ही खोजें, पर उनका उद्बोधन देशहित को समर्पित और प्रभावी था। देशहित के लिए बाधा बनें, ऐसे विचार और आचार को दूर रखने का और देशहित साधने वाले विचार के पीछे पूर्ण शक्ति के साथ खड़े रहने का स्पष्ट संकेत उनके उद्बोधन से न केवल हिन्दू समाज को वरन् सभी भारतवासियों को प्राप्त हुआ है।    ल्ल
 

 

गोवध बंदी कानूनों पर अमल हो
देशी गाय अपने देश के पशुधन का बड़ा हिस्सा है। गो-रक्षण, संवर्धन व विकास, यह संविधान के मार्गदर्शक तत्वों में निर्दिष्ट, भारतीय समाज की आस्था व परंपरा के अनुसार पवित्र कार्य है। आधुनिक विज्ञान के प्रमाण देशी गाय की उपयुक्तता व श्रेष्ठता को सिद्ध कर चुके हैं। अनेक राज्यों में गोहत्या प्रतिबंध कानून तथा पशुओं के प्रति क्रूरता प्रतिबंध कानून बने हैं। उन पर ठीक से अमल हो इसके लिए भी कभी-कभी व कहीं-कहीं गोसेवकों को अभियान चलाना पड़ता है।'

जम्मू-कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग
जम्मू, लद्दाख सहित कश्मीर घाटी का बड़ा क्षेत्र अभी कम उपद्रवग्रस्त व अधिक नियंत्रण में है। लेकिन वहां राष्ट्रीय प्रवृत्तियां व शक्तियों का बल स्थापित हो, इसके लिए शीघ्रता करनी चाहिए। कश्मीर घाटी में उपद्रवों को उकसाने का काम सीमापार से होता है, यह सारी दुनिया जानती है।  मीरपुर, मुजफ्फराबाद, गिलगित, बाल्टिस्तान सहित संपूर्ण कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है, यह दृढ़ भूमिका प्रत्येक भारतीय के मन में बनी रहनी चाहिए।

विस्थापितों का हो पुनर्वसन,  मिलें अधिकार
कश्मीर के उपद्रवग्रस्त क्षेत्रों में उपद्रव उत्पन्न करने वाले स्थानीय व परकीय तत्वों पर कड़ाई से शीघ्र नियंत्रण हो, इसके लिए राज्य शासन व केन्द्र शासन को अपने-अपने प्रशासन सहित एकमत व एकनीति बनाकर समन्वय से कार्य करना होगा। जम्मू-कश्मीर के लिए सही नीति का तत्पर व दृढ़तापूर्वक क्रियान्वयन होना आवश्यक है। विभाजन के समय जम्मू-कश्मीर राज्य में तत्कालीन राज्य शासन ने विस्थापित हिंदुओं को आश्वस्त करते हुए राज्य में ही बसने को कहा था। विस्थापितों को राज्य में भी अभी तक नागरिकता के अधिकार से वंचित रखा गया है, उन्हें उनके सभी अधिकार प्राप्त कराने होंगे।

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