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बिहार विधानसभा चुनाव की डुगडुगी बज रही है। अलग-अलग नाम से तरह-तरह की पालेबंदियां मैदान में हैं। ताकत कहां से खिसकेगी, किस ओर जाएगी, देखना दिलचस्प होगा। देश की राजधानी से राज्य की राजधानी की ओर व्याख्याकार, टीकाकार, पत्रकार, सभी का पहुंचना और लौटना जारी है। राजनैतिक रुझानों की यह खिसकन इतनी साफ है कि आरंभिक चरण में ही दिखने लगी है। दशकों की सेकुलर-समाजवादी धारणाएं अपने अंतर्निहित कारणों से गुत्थमगुत्था और बुरी तरह डरी हुई हैं।
राजनीति से बाहर के लोगों का पटना में जमना-लौटना समझ आता है, लेकिन अखाड़ेबाजों के साथी-सरदारों का मुकाबला गरम होने से पहले ही लौटना? शायद कुछ है जो गरमाने से पहले ही ठंडा पड़ने लगा है।
27 अगस्त को पाटलिपुत्र में ‘सुशासन बाबू’ के साथ सुशासन के ही सेमिनार में समर्थन की गलबहियां करने के बाद ‘सर जी’ दिल्ली लौट चुके हैं। बिहार में ‘चारा’ चरने और दिल्ली में भ्रष्टाचार करने वालों से पूरा भाईचारा जताने के बावजूद वे पूरब का रुख करने को राजी नहीं। कुछ इसे बेगानी शादी में बदनामी के ठप्पे का डर बता रहे हैं तो कुछ के मुताबिक फिक्र घर की है। मीसा भारती पाले की चिंता तो तब करें जब सोमनाथ भारती का जंजाल हटे! कम से कम ‘आप’ के पास पटना में न होने का कारगर बहाना तो है!
धोती और सूट वाले बयान की सलवटें सत्रहवीं बार निकालकर युवराज भी लौट चुके हैं। बुजुर्ग पार्टी के जवान ‘मिस्टर इंडिया’ हमेशा की तरह इस बार भी ऐन वक्त अचानक बिना कोई सुराग छोड़े मौके से गायब हैं। चुटकियां लेने वाले इसे मैदान में मुकाबले से पहले उठती धूल से पैदा हुई ‘थकन’ बता रहे हैं तो सफाई देने वाले किसी अज्ञात अंतरराष्टय ‘मंथन’ का मुहूर्त। वजह जो हो, सिर्फ 41 सीटों पर दावेदारी के साथ देश की सबसे पुरानी पार्टी ऐतिहासिक शर्मिंदगी के साथ मझधार में भी नहीं, किनारे के किनारे पर ही है। खिवैया नाव छोड़ कहीं ओर निकल गया है। सदा की तरह बूढ़े कंधों पर ही कुनबा पार्टी की डोली ढोने की जिम्मेदारी है।
तीसरे क्रम में उल्लेख मगध, कौशाम्बी, पाटलिपुत्र से लौटे उन्हीं लोगों का जिनके पास इस पूरे माहौल को लेकर सबसे ज्यादा व्याख्याएं, टीकाएं और रिपोर्ट हैं।
इन सबके झोले, डायरियों, खर्रे से निकली बातों में एक साझापन है। ऐसा अनुभव जो इन्होंने पूरे सूबे में घूमते हुए, लोगों से मिलते हुए अनुभव किया।
चर्चा तो सारे में है!
मुकाबले में बढ़त तो दिखती है!
इस बार माहौल हर बार से अलग है!
पिछले आम चुनाव के दौरान उठी राजनैतिक परिवर्तन की देशव्यापी लहर का क्या यह दूसरा दौर है? संभवत: यह ऐसा ज्वार है जिसे उठाने वाली जनता के पास दिल्ली विधानसभा चुनाव की ‘चिंगारी’ और इसके बुझ जाने से पैदा हुए मोहभंग का कड़वा अनुभव भी है।
विधानसभा सीटों के लिए राज्य की सीमा है लेकिन, बिहार की बेचैनी इससे बाहर तक पसरी है। परिवर्तन के दौर में राजनीति के घूरे पर बुहार दिए गए दलों में परस्पर एका हो न हो, एक बात पर सब एकमत हैं-इस चुनाव में चोट करारी लगेगी। चोट की वजह सत्ता की शासकीय अक्षमताएं होंगी या कुनबा पार्टियों की कुख्याति! जातिवादी राजनीति से उकताहट इसका कारण होगी या ‘अल्पसंख्यक’ मतदाताओं को मुख्यधारा से काटे रखने की बेईमानी, इसकी तह में कोई सेकुलर पार्टी या सूरमा जाना नहीं चाहता। डर गहरा है। किसकी वजह से है? जिम्मेदारी कौन ले? इसलिए सबने अपने भय के प्रतीक, भविष्य के जख्मों की वजह को अग्रिम तौर पर खोज लिया है। वह मुखौटा भी खोज लिया गया है जो सभी चोटिल चेहरों को छिपा लेगा।
सेकुलरिज्म। राष्टÑीयता की उठान और इसमें हर वर्ग की आकांक्षाओं की भागीदारी से उपजा यह सेकुलर डर साझा है। इसलिए सब एकमत हैं। पिटे कोई भी, आहत सेकुलरिज्म ही होगा। ‘कम्युनल’ नेता कट्टर वोट नहीं, बल्कि उदार-सभ्य-सेकुलर वोट काटेगा, यह उलटबांसी अभी से जनता के गले उतारने की कोशिशें तेज हो गई हैं।
डर का ऐसा अद्भुत एका, पलटनें लेकर पटना गए और बौखलाकर पर्दे के पीछे जा छिपे सूरमाओं की सूरतें…यह सब बहुत कुछ कह रहा है। बिहार के राजनीतिक भविष्य में मौजूदा सियासत की सेकुलर थरथराहट को मिला कर पढ़िए। अनकहा कहे जाने की तैयारी में है।










