| दिंनाक: 21 Sep 2015 14:06:23 |
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अतुल जैन
देश का एक बड़ा भूभाग इन दिनों सूखे की मार झेल रहा है। मानसून की अनिश्चितता व उसके असामान्य बर्ताव ने लाखों हेक्टेयर फसल बर्बाद कर दी है। मानसून के प्रारंभिक दिनों में अच्छी बरसात हुई़ उसके कारण किसानों ने जमकर बुवाई भी की। मौसम विभाग की उस भविष्यवाणी को अनदेखा कर दिया कि इस बार मानसून असामान्य रह सकता है। परिणाम सामने है, सैंकड़ों किसानों ने आत्महत्या कर ली है। संकट भयावह है।
सरकार अपने तरीके से इससे निपटने का प्रयास कर रही है़, लेकिन प्रकृति के सामने वह भी लाचार है। भारत में कृषि की निर्भरता लंबे समय से प्रकृति पर रही है। पहले, देश के विभिन्न राज्यों में शासक सिंचाई के लिए ऐसी व्यवस्थाएं किया करते थे ताकि कम वर्षा की स्थिति में अकाल न पड़े़, लेकिन विदेशी आक्रांताओं के शासनकाल में इन व्यवस्थाओं को तहस-नहस कर दिया गया। इस स्थिति को अब से 50 वर्ष से भी अधिक पहले भांप लिया था, युगद्रष्टा पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने। उन्होंने सिर्फ मौसम की अनिश्चितता का ही नहीं, बल्कि खेतीबाड़ी से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण विषयों का भी इतनी गंभीरता व विस्तार से अध्ययन किया कि उस समय के विशेषज्ञ भी चौंक गए थे। कृषि के बारे में यदि उनके दर्शन को एक वाक्य में परिभाषित करना हो तो वह है, 'अदैव मात्रिका कृषि' यानी कृषि की ऐसी व्यवस्था जो पूर्णतया प्रकृति पर निर्भर न हो। आज हम उसकी आवश्यकता कितनी तीव्रता से अनुभव कर रहे हैं, यह कहने की नहीं, देखने की बात है।
आज देश में कृषि उत्पादकता में ठहराव आ गया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी देश लगभग ऐसी ही स्थिति से जूझ रहा था। तब की सरकार अपने देश की समस्याओं का हल विदेशी मॉडलों में ढूंढने का प्रयत्न कर रही थीं। जबकि दीनदयाल जी ने इसका हल ढूंढने का प्रयास अपने चिंतन में किया। उन्होंने कहा कि भारत की कृषि मुख्यतया इन्द्रदेव की कृपा पर निर्भर करती है। वर्षा का चार्ट ही भारत के किसान का 'कार्डियोग्राफ' है। यद्यपि यहां वर्षा के महीने निश्चित हैं फिर भी कहां, कब और कितनी वर्षा होगी इसके संबंध में निश्चित बताना कठिन है।
पंडित जी सिंचाई के साधन के रूप में छोटी योजनाओं को ही अधिक उपयोगी मानते थे। उनका कहना था कि बड़े बांधों की योजनाएं पूंजी-प्रधान हैं। उन्होंने बाकायदा एक तुलनात्मक अध्ययन के माध्यम से प्रमाणित किया कि खाद्य उत्पादन के मामले में भी बड़ी योजनाओं के मुकाबले छोटी योजनाएं अधिक लाभकारी रही हैं। बड़ी योजनाओं की सबसे बड़ी खराबी यह है कि वे थोड़े दिनों में भूमिगत जल की ऊंचाई बढ़ाकर खेतों और आबादी को नुकसान पहुंचा देती हैं। भूमि का क्षार भी तल पर आ जाता है, जिससे जमीन बंजर, अनुपजाऊ हो जाती है। यह बात इतने बरस बाद अब दुनियाभर के पर्यावरणविद् मानने लगे हैं। अब सरकारें छोटी परियोजनाओं की ओर ध्यान देने लगी हैं।
दीनदयाल जी का कहना था कि नए कुएं और तालाब बनाने के साथ-साथ हमें पुरानों को ठीक रखने तथा उनकी मरम्मत का भी विचार करना होगा। दीनदयाल जी का मानना था कि कृषि-विकास का कार्यक्रम दो प्रकार का हो सकता है (1) प्राविधिक यानी तकनीकी (2) संस्थागत पहले कार्यक्रम का संबंध खेती की पद्धति से है। किन साधनों को तथा किस मात्रा में उपयोग किया जाए इसका विचार करना होगा। उन्हें भारतीय किसानों के देशज ज्ञान पर बहुत भरोसा था। इसलिए उन्होंने लिखा कि जहां तक खेती की पद्धति का संबंध है, भारत के किसान ने परिस्थितियों के अनुरूप पद्धति का विकास किया है। युगों से चली आई पद्धतियों को आज की उन प्रक्रियाओं के पक्ष में एकाएक नहीं छोड़ देना चाहिए। भारत का किसान फसलों की अदल-बदल कर बुवाई, हरी खाद का प्रयोग मलमूत्र के खाद को पकाकर उपयोग करना, भूक्षरण रोकने के लिए मेंड़ बांधना तथा वृक्ष लगाना आदि अनेक विधियों को भलीभांति जानता है। उसने युगों से भूमि की उर्वरता को बनाए रखा है। हां, पिछले दिनों में विभिन्न कारणों से वह अपने ज्ञान का पूरा उपयोग नहीं कर पाया।
पशुपालन को वे कृषि का अभिन्न अंग ही मानते थे। कहते थे कि गाय और भैंसों का उपयोग दूध के लिए होगा किन्तु बैल यदि हमारे कृषि के उपयोग में नहीं आता तो भार बन जाएगा। पश्चिम के देश गोमांसभक्षी हैं। अत: वे बैलों को खा जाते हैं। किन्तु भारत के लिए यह कल्पना करना उसकी परंपरा एवं राष्ट्रभावना के प्रति अज्ञानमूलक एवं अव्यावहारिक होगा। बैल हमारी खेती की धुरी हैं। ट्रैक्टर लाकर हम अपना सब महल ढहा देंगे। आज के कृषि वैज्ञानिक इन सब चेतावनियों को दांतों तले उंगली दबाए महसूस कर रहे हैं। कृषि वैज्ञानिकों का एक बड़ा वर्ग अब खेतीबाड़ी की परंपरागत व्यवस्थाओं को ही भारत के अनुकूल मान रहा है।
आज पूरी दुनिया कीटनाशकों के जहर से त्रस्त है। रासायनिक उर्वरकों को लेकर भी संपूर्ण विश्व में बहस छिड़ी हुई है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने 50 वर्ष पूर्व ही देश के नीति निर्माताओं को चेताया था कि अन्न की उपज बढ़ाने के लिए तथा भूमि की उपजाऊ शक्ति को बनाए रखने के लिए खाद की आवश्यकता है किन्तु जमीनों का ठीक-ठाक सर्वेक्षण उत्पादन की पद्धति, फसल, सिंचाई के साधन आदि का विचार करके ही उसके उपयुक्त एवं योग्य मात्रा में खाद एवं उर्वरक का उपयोग होना चाहिए। उन्होंने अर्थनीति पर अपने दस्तावेज में कहा कि यह नि:सन्देह कहा जा सकता है कि लगातार रासायनिक उर्वरकों का यदि उपयोग किया जाए तो खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ने की बजाय कम हो जाती है। गाय का गोबर, मल-मूल आदि भारत के लिए अत्यन्त उत्तम खाद के साधन हैं। पांच दशक से भी पहले उन्होंने उन्नत बीजों के संबंध में हमारे शासकों को चेताया था।
आज भी लगभग वह स्थिति बनी हुई है। दीनदयाल जी विदेशी ज्ञान अथवा तकनीकी के विरोधी नहीं थे लेकिन उनका मानना था कि हम विदेशों के परीक्षणों का लाभ अवश्य उठा सकते हैं किन्तु अनुकरण नहीं कर सकते। हमें बाहर से प्राप्त ज्ञान के आधार पर अपने यहां अनुसंधान-केन्द्रों में पहले परीक्षण करके अपने गांव की परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में ही उसका उपयोग करना चाहिए। उन दिनों देश में सहकारी खेती पर बहुत जोर देने का प्रयास चल रहा था। चीन से प्रेरणा लेकर इसे भारत की कृषि-समस्या का एकमात्र हल बताया जा रहा था। पंडित जी ने कहा कि योजना आयोग तथा कांग्रेस सहकारी खेती पर बहुत बल दे रहे हैं। लेकिन उनका मानना था कि सहकारी खेती हमारी प्रकृति और प्रतिभा के प्रतिकूल है। भूमि के प्रति किसानों का भारी लगाव है। यह कार्यक्रम क्रियान्वित नहीं हो सकता।
लेखक:दीनदयाल शोध संस्थान के प्रधान सचिव