श्रम-संजीवन :सूखे पहाड़ों और बंजर जमीन पर फिर लहलहाई हरियाली
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डॉ़ भरत पाठक एवं डॉ़ वेद प्रकाश सिंह
छोटी रिसाव कुण्डियां
बारिश के जल को संचित करने के लिए सूखे पहाड़ पर समतल जगह देखकर छोटी-छोटी कुण्डियां बनाई जाती हैं जिनमें से पानी धीरे-धीरे जमीन में रिसता है।
गभग दो दशक पूर्व भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली की मदद से मा़ नानाजी देशमुख संस्थापक दीनदयाल शोध संस्थान द्वारा कृषि विज्ञान केन्द्र की स्थापना मध्य प्रदेश के सतना जिले के कृषिगत विकास की योजनानुसार मझगवां में की गई। वनवासी बाहुल्य क्षेत्र में स्थापित इस कृषि विज्ञान केन्द्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से जुड़ी हुई थी। पूरे वर्ष पीने का पानी नहीं, दो वक्त की रोटी नहीं, जीविकोपार्जन के लिए वनों पर निर्भरता बढ़ती रही, पेड़ कटते रहे, जंगल घटते रहे परिणामस्वरूप प्राकृतिक रूप से बिछी हरी चादर अस्त-व्यस्त होती चली गयी। पहाडि़यां नग्न दिखने लगीं। वर्षाकाल में मिट्टी का कटाव शुरू हुआ। पहाडि़यों पर ऊपरी क्षेत्र से छोटी-छोटी नालियां बनीं जो निचले हिस्से में आकर नाले का रूप लेती चली गयीं। ऐसा दुर्गम, कठिन एवं चुनौतियों से भरा क्षेत्र जहां रूखे-सूखे पहाड़ एवं बंजर भूमि अपनी दुर्दशा की कहानी स्वयं बयां कर रही थीं।
वृक्ष एवं वानस्पतिक आवरण वर्षा की बूंदों की गति को कम कर देते हैं जिससे भूमि का कटाव कम होता है, पानी ठहरता है और रिसता हुआ धीरे-धीरे जमीन में चला जाता है। वर्षाजल का मिलन भूमिगत जल से होता है परिणामस्वरूप सूखी नदियां एवं नाले जीवन्त हो जाते हैं। भूमिगत जलस्तर बढ़ने लगता है। सिंचाई क्षेत्र में विस्तार होता है। वृक्षों की पत्तियां गल सड़कर खाद का काम करती हैं। जिससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति में वृद्धि होती है, भौतिक गुणों में सुधार होता है तथा मिट्टी में जलधारण की क्षमता भी बढ़ जाती है।
इस क्षेत्र के लोग खुशहाली का जीवन अर्जित कर सकें इस आशय से प्रकृति प्रदत्त संसाधनों के संरक्षण एवं संवर्द्धन हेतु ग्रामीण जनों की सहभागिता के आधार पर बीस ग्रामों की एक ऐसी योजना तैयार की गयी। जिसमें वर्षा की एक-एक बूंद पानी के संरक्षण हेतु रिज लाइन से वैली तक (पहाड़ी की चोटी से तलहटी तक) प्राकृतिक बनावट के अनुसार अलग-अलग संरचनाएं बनाई गयीं। बंजर एवं नग्न पहाडि़यों पर वनस्पति व पेड़-पौधे पैदा करने हेतु ग्राम स्तर पर स्वयं सहायता समूह एवं उपयोगकर्ता दलों का गठन किया गया। समूह के सभी सदस्यों को नर्सरी (पौधशाला) स्थापना एवं प्रबन्धन विषय पर कृषि विज्ञान केन्द्र, मझगवां द्वारा प्रशिक्षित किया गया। तदुपरांत कृषि विज्ञान केन्द्र, मझगवां के सतत मार्गदर्शन में समूह द्वारा नर्सरी तैयार की गयी जहां से पौधे खरीद कर उपयोगकर्ता दलों द्वारा रोपित किए गए।
नग्न पहाडि़यों पर मिट्टी व पानी के संरक्षण दृष्टि से बनाई गयी कण्टूर ट्रेंच के निचले भाग में 33 फीट का गड्ढा खोदा गया। वर्षा से पूर्व गड्ढे के मध्य में घड़ा / मटका जमीन की ऊपरी सतह के स्तर पर लगाकर गड्ढे को गोबर की खाद एवं मिट्टी की बराबर-बराबर मात्रा से भर दिया गया। जैसे ही वर्षा प्रारम्भ हुई उपयोगकर्ता दल के सदस्यों ने 8 से 10 इंच की दूरी पर फलदार/बहुउद्देशीय पौधों का रोपण किया गया अधिकतर पौधे फरवरी से वर्षा के पूर्व तक पानी की कमी से सूख जाते हैं। मटका पद्धति द्वारा रोपित पौधों को वर्षा के पश्चात् सूखे के समय भी प्रत्येक 15 दिन पर मटके को भरा जाता रहा। जिससे पौधों को जीवन रक्षक नमी मिलती रही और पौधे सूखने से बच गए साथ ही सघन वानस्पतिक आवरण विकसित करने की दृष्टि से 'कंटूर ट्रेंच' की नई मिट्टी पर 'स्टाइलो हमाटा' चारे के बीज को छिटक दिया गया जैसे ही वर्षा हुई बीजों से अंकुर फूटे और देखते ही देखते बंजर पड़ी जमीन और सूखी पहाडि़यों पर हरी चादर सी बिछ गयी । इससे मिट्टी का कटाव रुका, पानी संरक्षित हुआ साथ ही पशुओं के लिए पौष्टिक हरा चारा सहजता से उपलब्ध हुआ। वर्षा जल सहजता से संरक्षित किया जाने लगा। भोजन पकाने के लिए ईंधन और फलदार पौधों से फल प्राप्त होने लगे। सिंचाई क्षेत्र में विस्तार हुआ है। जिससे फसलों के उत्पादन में आश्चर्यजनक वृद्घि हुई। इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति में बदलाव भी हुआ। निर्मित सभी संरचनाएं टिकाऊ एवं उपयोगी बनी रहें इस आशय से प्रत्येक संरचना के लिये उपयोगकर्ता दल का गठन किया गया है। जो इसकी देख-रेख के दायित्वों का निर्वहन करते हुए समुचित उपयोग कर लाभान्वित हो रहे हैं। जीवन-यापन के लिए जंगलों पर निर्भर रहने वाले परिवार आज खेती के काम पर लगकर अच्छा उत्पादन प्राप्त कर रहे हैं। कुओं एवं हैण्डपम्प के जलस्तर में वृद्धि हुई है। आज इस क्षेत्र में पूरे वर्ष पीने के पानी के साथ ही सिंचाईं का भी पानी उपलब्ध है।
प्राकृतिक संसाधनों के समन्वित प्रबन्धन के कारण सिंचाई के लिये पानी उपलब्ध हुआ है। कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा आयोजित प्रशिक्षण एवं फसल प्रदर्शन से किसानों के अंदर जागरूकता आई, आत्मविश्वास बढ़ा और अत्यधिक उत्पादन लेने की चेष्टा ने उर्वरकों के प्रयोग की तरफ ध्यान आकृष्ट किया। जहां पहले किसान नाम मात्र का उर्वरक प्रयोग करता था आज कृषि विज्ञान केन्द्र में मिट्टी परीक्षण के बाद उसने विशेषज्ञों की सलाह पर इसका प्रयोग जैविक खादों के साथ-साथ करना शुरू कर दिया है।
आजीविका का आधार हुआ सशक्त
मिली वाटरशेड कृषि विज्ञान केन्द्र मझगवां के अधीनस्थ 18 ग्रामों में जहां कभी पीने के पानी का संकट हुआ करता था, जानवरों को चारे व पानी की तलाश में मीलों भटकना पड़ता था, किसान वर्षा पर आधारित खेती के चलते मुश्किल से केवल एक ही फसल ले पाता था, दो जून की रोटी की व्यवस्था हेतु पलायन की नौबत तक आ जाती थी। आज वहां मिट्टी व पानी के संरक्षण तथा संवर्द्धन हेतु निर्मित संरचनाओं के प्रभाव के कारण सिंचित क्षेत्र में विस्तार हुआ है। किसान 3550 हेक्टेयर क्षेत्र पर सिंचाई कर वर्ष में दो-तीन सिंचित फसलें सफलतापूर्वक ले रहें हैं। सब्जी उत्पादन के क्षेत्र में भी विस्तार हुआ है। पशुओं के लिए चारा व पानी गांव-गांव में उपलब्ध हुआ है जिसके कारण पशुओं के स्वास्थ्य में सुधार होने के साथ ही दुग्ध उत्पादन में भी वृद्घि हुई है। वर्षा जल प्रबन्धन कार्यों के परिणामस्वरूप लोगों को अपने ही गांव में कार्य का अवसर प्राप्त हुआ है, वे अपने गांव तथा खेतों पर कार्य करते हुए स्वावलम्बन की ओर अग्रसर हो रहे हैं। जल प्रबंधन कायार्ें से पूर्व परिवारों की औसत आय 11760 रुपए प्रतिवर्ष हुआ करती थी। आज वे 30540 रुपए प्रतिवर्ष अर्जित कर रहे हैं। प्राकृतिक संसाधन हीे ग्रामीणों की समृद्धि व स्वावलम्बन का टिकाऊ आधार है। यह सदैव जीवन्त बना रहे इस आशय से किसान कृषि विज्ञान केन्द्र से सतत् तकनीकी मार्गदर्शन एवं समस्याओं के समाधान हेतु स्वयमेव सम्पर्क बनाये रखने में समर्थ हुए हैं।
भूमिगत जलस्तर मे वृद्घि
वर्षा वर्षा वर्षा जल उपलब्धता (मी़)
(मिमी़) दिन मई जल स्तर दिसम्बर जल स्तर
में वृद्धि में वृद्धि
1997 905 61 0.93 – 1.80 –
2003 1298 49 2.03 1.10 3.67 1.87
2006 748 34 3.90 2.97 4.92 3.12
2009 784 27 3.12 2.78 4.7 2.97
जल प्रबन्धन का उर्वरकों की खपत पर प्रभाव
फसल मात्रा (किग्रा. प्रति हेक्टेयर)
जल प्रबंधन के पूर्व जल प्रबंधन के पश्चात
यूरिया डी.ए.पी. यूरिया डी.ए.पी.
गेहूं 22 – 47 32
गेहूं 10 18 50 54
चना – – – 37
जल प्रबन्धन का उर्वरकों की खपत पर प्रभाव
फसल जल प्रबंधन जल प्रबंधन वृद्धि
के पूर्व 1987 के पश्चात प्रतिशत
धान 10.30 22.17 115.24
अरहर 7.40 11.70 58.11
चना 8.10 14.85 83.33
गेहूं 15.80 26.46 67.47
अलसी 2.88 6.63 130.21
सरसों 6.10 11.50 88.52
दीनदयाल शोध संस्थान, कृषि विज्ञान केन्द्र, सतना (म़ प्ऱ)










