विश्व हिन्दू परिषद् : स्वर्णजयन्ती - विश्व मंच पर हिन्दुत्व का जयनाद
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विश्व हिन्दू परिषद् : स्वर्णजयन्ती – विश्व मंच पर हिन्दुत्व का जयनाद

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Aug 16, 2014, 12:00 am IST
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दिंनाक: 16 Aug 2014 14:38:12

विश्व हिन्दू परिषद् जनसाधारण के स्तर पर स्व. दादा साहब आपटे द्वारा प्रारम्भ किया गया जनांदोलन है। मध्य प्रदेश मेंे ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों का अध्ययन करने के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित नियोगी आयोग की रपट वर्ष 1957 में प्रकाशित हुई थी। इस रपट ने देश में हलचल पैदा कर दी थी। इससे यह स्पष्ट हो गया था कि विदेशों से भारत में ईसाई मिशनरियों को मिलने वाले धन से बने विद्यालयों, अस्पलातों और अनाथालयों का दुरुपयोग धोखाधड़ी से गरीब लोगों का, विशेष रूप से वनवासियों का सामूहिक मतान्तरण करने में किया जाता है। इस मतान्तरण का एकमात्र उद्देश्य रहता है कि भारतीय समाज की समरसता भंग हो और देश को और अधिक टुकड़ों में बांटा जा सके। 1947 में हुआ भारत का विभाजन इसी मतान्तरण का परिणाम है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य श्रीगुरुजी की चिन्ता थी कि संसार के भिन्न-भिन्न देशों में रह रहे हिन्दू बन्धुओं का अपने धर्म और दर्शन से जीवन्त रिश्ता कैसे बना रह सकता है ?
दादा साहब आपटे पत्रकार होने के नाते विदेश भ्रमण करते थे। विदेशों में निवास करने वाला हिन्दू किस तरह अपनी परम्पराओं व धार्मिक, सांस्कृतिक जड़ों से कट रहा है, यह वे अनुभव करते थे। हिन्दुओं के मतान्तरण की गम्भीर चुनौती उनके सामने थी। देश को राजनीतिक आजादी तो मिल गई, परन्तु समाज छिन्न-भिन्न हो रहा है। देश में साम्यवाद का उत्थान भी परेशान करने वाली घटना थी, औद्योगिक प्रगति का परिणाम क्या होगा, इन सबसे हमारे समाज में जो अराजकता फैल रही है उससे कैसे बचें, यह चिन्तन चल रहा था। विश्व के अनेक देशों में साम्यवादी शासन आ गया था, दक्षिण पूर्वी एशिया में साम्यवाद का संकट उपस्थित हो गया था, चीन ने तिब्बत पर आक्रमण कर दिया था, हजारों मंदिर तोड़ दिए, साधु-सन्तों की हत्या कर दी गई, तिब्बत के धर्मगुरु दलाई लामा को भारत में शरण लेनी पड़ी थी, चीन नेपाल की सीमा तक आ गया था, चीन तो मजहब को अफीम ही मानता था। दादा साहब आपटे के मस्तिष्क में ये सारी परिस्थितियां सम्भवत: घूमती रहती थीं। ऐसे समय में वर्ष 1961 में लोकमान्य तिलक जी द्वारा प्रारम्भ की गई पत्रिका 'केसरी' में दादा साहब के तीन लेख छपे थे। इन लेखों के माध्यम से उन्होंने विदेशस्थ हिन्दुओं की समस्याओं की ओर भारतवासी हिन्दुओं का ध्यान आकृष्ट करके, उनकी समस्याओं का समाधान तथा उनकी सहायता करने के लिए विश्वभर में फैले हिन्दुओं के वैश्विक संगठन की आवश्यकता का प्रतिपादन किया था।
कैसा विचित्र संयोग था कि सांदीपनी साधनालय के संस्थापक पूज्य स्वामी चिन्मयानन्द जी, जो विश्वभर में ज्ञान यज्ञ के लिए भ्रमण करते थे, के मन में भी हिन्दुओं के लिए एक विश्वव्यापी संगठन का विचार पल रहा था। अपने ही आश्रम की पत्रिका 'तपोवन प्रसाद' के नवम्बर, 1963 के अंक में एक लेख द्वारा स्वामी जी ने भी एक वैश्विक हिन्दू सम्मेलन की आवश्यकता प्रतिपादित की थी।
त्रिनिदाद में सैकड़ों वषार्ें से बसे हुए हिन्दुओं का अपनी मातृभूमि भारत से सम्बन्ध टूट रहा है, हिन्दू संस्कार धीरे-धीरे लुप्त हो रहे हैं, क्योंकि संस्कार सम्पन्न कराने वाले ब्राह्मण त्रिनिदाद में उपलब्ध नहीं हैं, यदि संस्कार पूर्णत: नष्ट हो गए तो समाज निर्जीव ढ़ांचा मात्र रह जाएगा, यह सोच-सोच कर त्रिनिदाद के ही एक सांसद डॉ. शम्भूनाथ कपिलदेव अपने देश में दु:खी रहते थे। वे भारत आए, भारत सरकार से उन्हें निराश होना पड़ा। किसी के सुझाव पर वे श्रीगुरुजी से मिलने निकले। बेलगांव (कर्नाटक) में उनकी गुरुजी से भेंट हुई। इसी भेंट में विश्व हिन्दू परिषद् का बीज पड़ गया।
श्रीगुरुजी ने दादा साहब आपटे को बुलाकर उन्हें उनके लेखों का स्मरण कराया और कहा कि अपने लेखों में व्यक्त विचारों की पूर्ति के लिए कार्य में लग जाओ। दादा साहब ने हिन्दुस्थान समाचार संस्था का दायित्व एक अन्य कार्यकर्ता को सौप दिया और स्वयं देशभर में लगभग 10 महीनों तक भ्रमण कर विद्वानों, सन्तों और सामाजिक महानुभावों से भेंट करके अपने मस्तिष्क में चलने वाले विचारों पर वार्तालाप किया।
भ्रमण के दौरान वे तमिलनाडु व कर्नाटक में कांची कामकोटि पीठ एवं शारदा पीठ के पूज्य शंकराचायार्ें से मिले। मुम्बई में कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जी, विदर्भ में सन्त तुकड़ो जी महाराज, राजस्थान में श्री चन्द्रशेखर शास्त्री जी (जो कालान्तर में गोवर्धनपीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य बने), डॉ. सम्पूर्णानन्द जी, लद्दाख के पूज्य कुशक बकुला जी, भूतपूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी़ पी़ सिन्हा जी, राजनेता बाबू जगजीवनराम जी, जैन मुनि सुशील कुमार जी, पंजाब में ज्ञानी भूपेन्द्र सिंह जी, चंडीगढ़ में डॉ़ हजारीप्रसाद द्विवेदी जी, होशियारपुर में डॉ़ आचार्य विश्वबन्धु जी, नामधारी समाज के सद्गुरु जगजीत सिंह जी, वृन्दावन में प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी, सर सीताराम राय जी, श्री श्रीप्रकाश जी, हनुमान प्रसाद पोद्दार जी, उद्योगपति श्री जुगल किशोर बिरला जी, स्वामी नारायण सम्प्रदाय के आदरणीय गुरु योगीराज महाराज जी जैसी विभूतियों से दादा साहब की भेंटवार्ता हुई।
इस देशव्यापी अभियान में आपटे जी ने भारत में लगभग 600 व्यक्तियों से तथा विदेशों के लगभग 40 संस्थाओं/व्यक्तियों से पत्र-व्यवहार किया। भारत में लगभग 200 विद्वानों और चिन्तकों से भेंट की और 150 लोगों को बैठक के लिए आमंत्रित किया। इसी परिश्रम के परिणामस्वरूप श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन 29 अगस्त, 1964 को सांदीपनी साधनालय,मुम्बई में विश्व हिन्दू परिषद् की स्थापना हुई।
इस अवसर पर श्रीगुरुजी, डॉ. कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, सन्त तुकड़ो जी महाराज, स्वामी शंकरानन्द, ब्रह्मचारी दत्तमूर्ति, मास्टर तारा सिंह, ज्ञानी भूपेन्द्र सिंह जी, 151 वर्ष आयु के योग शिरोमणि रामटेक के श्री सीतारामदास जी महाराज, हिन्दू महासभा के महासचिव श्री वी.ज़ी़ देशपाण्डे आदि उपस्थित थे। सभा की अध्यक्षता स्वामी चिन्मयानन्द जी महाराज ने की थी।
उस अवसर पर पूज्य स्वामी चिन्मयानन्द जी महाराज ने कहा था कि हमारे सामने सबसे महत्वपूर्ण कार्य है कि हम सब अपने मतभेदों को त्यागकर हिन्दू समाज के उद्धार के लिए एकत्रित होकर सम्मिलित प्रयास करें। मास्टर तारा सिंह जी ने अपने भाषण में कहा था कि समाज के मतभेदों को दूर करके सभी को एकता के सूत्र में बांधने के लिए तत्काल कुछ उपाय किए जाएं। आज यह पंजाब और बंगाल में जितना आवश्यक है उतना कहीं नहीं है। यदि एक बार हिन्दू और सिख एक-दूसरे से गले लग जाएं तो सम्पूर्ण समाज में नवजीवन का संचार होने लगेगा। श्रीगुरुजी ने अपने उद्बोधन में कहा था कि भिन्न-भिन्न कारणों से अपने समाज के बहुत से लोग विश्व के अनेक देशों में जाकर बसे हैं। पूर्वकाल मंे हम धर्म के विजेता, संस्कृति के विजेता और लौकिक जीवन में भी विजेता के रूप में संसार में फैले, परन्तु विगत 100-150 वषार्ें में हम मजदूर के रूप में चाकरी करने के लिए उपार्जन वृत्ति के लिए विदेशों में गए। यह अन्त:करण को दु:खित करने वाला चित्र है। अत: हम फिर से एक बार अपने धर्म और संस्कृति की ध्वजा देश-विदेश में फहराने वाले सिद्ध हो सकें, ऐसे प्रयत्न पुन: कर सकें, सम्पूर्ण समाज का एकीकरण हो, देश-विदेश के हिन्दुओं में नवजागरण हो, सम्पूर्ण जगत् में रहने वाले बन्धुओं को एक करने की कोई स्थायी कार्ययोजना बने और इस कार्य के लिए कटिबद्ध समर्पित व्यक्तियों की परम्परा निर्माण करनी है। इसी दृष्टि से इस सम्मेलन का विचार सामने आया है, यह प्रयास संकीर्ण प्रयास नहीं, किसी पंथ विशेष तक यह सीमित नहीं, यह कोई नूतन धर्म की स्थापना करने का प्रयास भी नहीं है।' दादा साहब आपटे ने कहा था कि हमने सम्पूर्ण मानव जाति को एक परिवार माना है, एक विशेष तत्वज्ञान संसार को दिया, मनुष्य को व्यक्तिगत/सामाजिक जीवन में कैसा व्यवहार करना चाहिए यह हमने बताया, परन्तु ईसाई और इस्लाम अन्य मत-पंथों का अस्तित्व मानने के लिए ही तैयार नहीं हैं। अपने मत को न मानने वाले तथा अपने पवित्र ग्रंथ और पैगम्बर पर विश्वास न करने वालों को नष्ट करने के लिए जिहाद की घोषणा हुई। ईसाइयत ने तो स्पष्ट घोषणा की कि हम सम्पूर्ण विश्व को ईसाई मत की दीक्षा देकर ही दम लेंगे। साम्यवाद भी एक नए मत के रूप में अवतरित हो गया है। इन तीनों ने ही हिन्दुओं को अपना लक्ष्य बनाया है। इस संघर्ष के युग में अपनी रक्षा करने के लिए और संकटों से मुक्ति के लिए हिन्दुओं का संगठित होना नितांत आवश्यक है। विगत कई शताब्दियों में इन आक्रामक मत-पंथों ने बड़ी संख्या में हमारे बन्धुओं को अपने मत में मिला लिया। परिणामस्वरूप मातृभूमि का विभाजन हुआ। विभाजन की यह तलवार नित्य हमारे सर पर मंडरा रही है। विभाजन का संकट समाप्त नहीं हुआ है, मतान्तरण अभी भी चलता है। धर्म बदलने से राष्ट्रीयता बदल जाती है। इसी राष्ट्रीयता परिवर्तन के कारण ही पाकिस्तान का निर्माण हुआ। ईसाई प्रभावित राज्य भी भारत से अलग होने की मांग करते हैं। इन संकटों के बीच हिन्दू समाज की उदासीनता और इन संकटों के प्रति उपेक्षाभाव अत्यन्त घातक है। हम सामाजिक बुराइयों को दूर करने के निमित्त और समाज सुधारने के लिए सदैव से एकत्रित होते रहे हैं। जैन सम्मेलन और बौद्ध परिषदों का भी यही उद्देश्य रहा है। महान सिख गुरुओं ने पंथ सम्मेलनों की महत्ता बताई है। इतिहास में अनेक बार पुरानी व्यवस्था की समीक्षा और नवीन संहिता की रचना हेतु ऐसे सम्मेलन होते रहे हैं। अत: आप सब महानुभाव अपनी संतति को बुराइयों से बचाने के लिए एक नवीन जीवन संहिता प्रदान करें।
दो दिवसीय इस बैठक में निर्णय लिया गया था कि राजनीति में दायित्व निर्वाह करने वाले व्यक्ति परिषद् में पदाधिकारी नहीं होंगे। यह कार्य राजनीति से अलग है। परिषद् समस्त हिन्दू आस्थाओं का प्रतिनिधित्व करेगी। दूसरा निर्णय लिया गया था कि आगामी 21 जनवरी, 1966 को प्रयागराज में संगम तट पर माघ मास में मौनी अमावस्या पर होने वाले मेले में विश्वभर के हिन्दुओं का सम्मेलन आयोजित किया जाएगा।
दादा साहब ने कालान्तर में लिखा है कि प्रत्येक हिन्दू का कर्त्तव्य है कि वह भारत में उत्पन्न सभी मत, पंथ एवं सम्प्रदायों को एक जगह लाकर देश-विदेश में फैले उनके असंख्य अनुयायियों को एक सूत्र में गूंथने का प्रयास करे, उनके हृदय में अपने धर्म, परम्परा, संस्कृति और इतिहास के प्रति गौरव निर्माण हो, जन्म से मृत्यु तक के निर्धारित संस्कारों के प्रति आस्था का पुनर्जीवन हो, हमारी उदारचित्तता, सहिष्णुता, श्रेष्ठ संस्कृति और सभ्यता के होते हुए भी हमारा समाज दु:खपूर्ण स्थिति में पहुंच गया, इस अवस्था को बदलना है। हिन्दुस्थान तथा विदेशों में रहने वाले हिन्दुओं में एक सुदृढ़ जाति के रूप में उनके अंदर एकता और धर्म, संस्कृति के प्रति अभिमान, निष्ठा व भक्ति उत्पन्न करनी है, धर्म के आधार पर कर्त्तव्य भावना जगानी है, दूर देशों में रहने वाले भाइयों के साथ प्रेम की कड़ी को पुन: जोड़ना है, हिन्दू रीति-रिवाजों में विश्वास उत्पन्न करने के लिए उन्हें प्रभावशाली मार्गदर्शन की आवश्यकता है, इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए सभी दार्शनिक आचायार्ें, गुरुओं, विचारकों के आशीर्वाद और विख्यात सामाजिक चिंतकों के परामर्श से विश्व हिन्दू परिषद् की स्थापना की गई है।
पूज्य स्वामी चिन्मयानन्द जी महाराज अन्तरिम अध्यक्ष ही थे। स्वामी जी ने स्थाई अध्यक्ष चुनने का परामर्श दिया था। दादा साहब देश भ्रमण पर निकले, उन्होंने मैसूर के महाराज श्री जयचामराज वाडियार से भेंट की, विश्व हिन्दू परिषद् के उद्देश्यों से उन्हें अवगत कराया और परिषद् का नेतृत्व संभालने का निवेदन किया। महाराजा ने निवेदन स्वीकार कर लिया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति सर डॉ़ सी़ पी़ रामास्वामी अय्यर उपाध्यक्ष बने और अगली बैठक दिल्ली में 22 व 23 दिसम्बर को सम्पन्न हुई। बैठक दिल्ली में आचार्य डॉ़ लोकेश चन्द्र जी के निवास स्थान पर हुई। इसी बैठक में परिषद् के संविधान पर विचार हुआ। इसी बैठक के अवसर पर परम पावन दलाई लामा जी का संदेश तथा लद्दाख के श्री कशुक बकुला जी का आशीर्वाद प्राप्त हुआ। श्रीगुरुजी विशेष रूप से बैठक में पधारे। यहीं निर्णय लिया गया कि 1966 में होने वाले प्रथम विश्व हिन्दू सम्मेलन के लिए परम पावन दलाई लामा के अतिरिक्त मंगोलिया के सम्राट और जापान के बौद्ध विद्वानों का सहयोग प्राप्त किया जाएगा। 27-28 मई, 1965 की परिषद् की बैठक महाराजा मैसूर के निवास स्थान पर ही हुई और जिन देशों में हिन्दुओं की संख्या अच्छी है वहां विश्व हिन्दू परिषद् की स्वतंत्र इकाइयां स्थापित करने का विचार हुआ। महाराज मैसूर ने कहा था कि हिन्दू धर्म के आदशार्ें की सेवा करने का सुअवसर मुझे प्राप्त हुआ है मैं कृतज्ञ हूं। आज हम विध्वंसकारी परिस्थितियों से गुजर रहे हैं, यदि हम अपने धर्म को ठीक से आचरण में लाएं तो हम इस परिस्थिति का सामना कर सकते हैं।
1966 में प्रयागराज में माघ मेले के अवसर पर विश्व हिन्दू सम्मेलन का आयोजन एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक क्षेत्र के प्रश्नांे पर मंथन करने के लिए ऐसे सम्मेलनों की परम्परा रही है। इस प्रकार के सम्मेलन का श्रीगणेश कन्नौज के सम्राट हर्षवर्धन जी द्वारा संगम तट पर 680 ई. में किया गया था। इसी कालखण्ड में विदेशियों के आक्रमण प्रारम्भ हो गए और चिन्तन-मनन की प्रक्रिया में अवरोध आ गया। लगभग 1000 से भी अधिक वषार्ें तक संघर्ष करता हुआ भारत 1947 में विदेशी पंजे से मुक्त तो हुआ, परन्तु देश के नीति-निर्धारकों के घट-घट में जो कुछ भर चुका था वह अभारतीय था और राष्ट्र के लिए अहितकर भी। घट-घट में भर चुके इस अभारतीय तत्व को बाहर निकालकर समाज में पुनर्जागरण की प्रक्रिया को पुन: प्रारम्भ करना था। दादा साहब पूर्ण मनोयोग से इस कार्य में जुट गए। उन्होंने सम्पूर्ण देश का पुन: भ्रमण किया।
22 जनवरी, 1966 को 20 जगद्गुरु आचार्य, विभिन्न सम्प्रदायों के धर्मगुरु व्यासपीठ पर विराजमान थे, 'विश्वमखिलमुध्यर्तुममि ़.़.़.़.' द्वारा मंगलाचरण हुआ। तत्पश्चात् आसन पर विराजमान आचायार्ें ने बारी-बारी से अपनी-अपनी परम्परा की प्रार्थना उच्चारण कर आशीर्वाद प्रदान किया था। काशी के वैदिक शाखाओं के ज्ञाता वैदिकों ने वेदपाठ किया था। शारदापीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य जी ने अपना आशीर्वाद देते हुए कहा था कि 'आज की यह घड़ी हिन्दू धर्म के इतिहास में बहुत बड़ा संकटकाल है, जिसका सामना हमें करना है। हमें परम कृपालु परमात्मा का आभारी होना चाहिए, जिनकी अनुकम्पा से हममें तत्परता आई है और हम विश्व हिन्दू परिषद् के तत्वावधान में एकत्र हुए हैं। हमारे अस्तित्व में समन्वय था, परन्तु धर्म का अपूर्ण ज्ञान ग्रहण करने के कारण मतभेद बढ़ गए, भौतिक विकास के कारण सभी वस्तुओं में आर्थिक मूल्यांकन का प्रभाव हो गया। इसी भौतिकवादिता के कारण नैतिक जीवन ढीला पड़ गया है, यही संकट है। इसी परिस्थिति को सुधारना है, इसी कार्य के द्वारा हममें एकता आएगी और यही हमारा आगामी कार्यक्षेत्र होना चाहिए।'
अमरीका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, इंग्लैण्ड, जर्मनी, फ्रांस, पोलैण्ड, स्विटजरलैण्ड, फिनलैण्ड, जापान तथा दक्षिण पूर्वी एशिया के विद्वानों ने इस सम्मेलन पर हर्ष व्यक्त करते हुए शुभकामना संदेश दिए थे। परम पावन दलाई लामा जी ने इस अवसर पर अपने उद्गार प्रेषित करते हुए लिखा था कि 'हिन्दू धर्म पुरातन और शाश्वत है। इसका तत्वज्ञान समृद्धि है। अत: हिन्दू धर्म के अनुयायियों को चाहिए कि वे हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए सचेष्ट रहें और आधुनिक समाज को अपना आवश्यक योगदान प्रदान करें।'
तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ़ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने इस सम्मेलन की महत्ता को एक पत्र के द्वारा रेखांकित करते हुए कहा था कि 'सभी काल में आत्म नवीनीकरण की परम्परा पर विभिन्न प्रकार से बल दिया जाता रहा है आज वही परम्परा प्रस्तुत की जा रही है। हिन्दू धर्म में आन्तरिक संशोधन हो रहा है। इसका यह अर्थ नहीं कि हम अपने मूलभूत सिद्धान्तों का परित्याग कर दें। हमने सदा ही सत्य के अन्वेषण पर बल दिया है। हिन्दू धर्म कभी भी कोरी परम्परा से चिपक कर रहना पसंद नहीं करता। त्याग की भावना के लिए शरीर या जीवन या संस्कार का परित्याग करना आवश्यक नहीं है। हमें तो ईश्वरीय तत्व का अन्वेषण करना है।'
नेपाल नरेश ने अपने शुभकामना संदेश में लिखा था कि 'विश्व शांति की समस्या को हम सांस्कृतिक स्रोत के द्वारा सुलझा सकें तो यह एक बहुत बड़ी देन होगी। इस दृष्टि से हम सभी नेपाली इस सम्मेलन का स्वागत करते हैं।'
उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल श्री विश्वनाथ दास ने सम्मेलन का उद्घाटन किया था।
बिहार के तत्कालीन राज्यपाल श्री अनन्त शयनम अयंगार ने हिन्दू विश्व के विशेषांक का लोकार्पण किया था और कहा था कि विश्व अनेक संकटों से पीडि़त है। युद्ध के संकट का निवारण तभी संभव है जब हिन्दू धर्म के आदशार्ें पर अमल किया जाएगा।
दक्षिणी पूर्वी एशिया, श्रीलंका, मॉरीशस, त्रिनिदाद, फिजी, थाईलैण्ड व अन्य अनेक देशों के प्रतिनिधियों ने अपने विचार प्रकट किए थे।
स्वामी नारदानन्द जी, स्वामी आत्मानन्द जी, स्वामी अद्वैतानन्द जी, पुरी के जगद्गुरु शंकराचार्य जी, स्वामी विश्वेशतीर्थ जी महाराज, सद्गुरु जगजीत सिंह जी, श्री राघवाचार्य जी एवं श्री घुंड महाराज जी ने अपना मार्गदर्शन दिया था।
जगद्गुरु मध्वाचार्य पूज्य स्वामी विश्वेशतीर्थ जी महाराज ने 1966 के सम्मेलन में हिन्दी में उद्बोधन करते हुए कहा था कि आज का विश्व बलवानों का है, विश्व में सर्वत्र संघर्ष है, ऐसी स्थिति में हमें केवल जीना ही नहीं विजयी भी होना है। हमें हिन्दुओं की एक समान आचार संहिता निर्माण करने के लिए विद्वत परिषद् की आवश्यकता है। हमारा संदेश दीन-हीन, दु:खी, वंचित सर्वसाधारण हिन्दू तक पहुंचाने का प्रयत्न हो। सन्त तुकड़ो जी महाराज ने इस अवसर पर कहा था कि यह देखकर मुझे अपार हर्ष हो रहा है कि विश्व हिन्दू परिषद् उन्हीं विचारों को साकार रूप में कार्यान्वित कर रही है, जिसके लिए भारत साधु समाज स्थापित करने की प्रेरणा मिली थी।
दादा साहब आपटे ने स्थापना से लेकर सम्मेलन तक की परिषद् की कार्य प्रगति की रपट प्रस्तुत करते हुए कहा था कि चीन द्वारा 1959 में तिब्बत पर कब्जा तथा 1962 में भारत पर आक्रमण इस काल की महत्वपूर्ण घटनाएं हैं। साम्यवादी शक्तियों द्वारा हिन्दू और बौद्ध अस्मिता पर एक साथ आक्रमण हो रहा है। अत: वैश्विक स्तर पर बौद्ध जगत में भी हिन्दू संगठन को अपनी भूमिका निर्वाह करने की आवश्यकता है। दादा साहब परिषद् की स्थापना के तुरन्त बाद हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में परम पावन दलाई लामा जी से परिषद् के कार्य पर चर्चा करने के लिए गए थे।
इस प्रकार विश्व हिन्दू परिषद् वैदिक और श्रमण परम्परा का संगम स्थल है। सम्मेलन में कुल 11 प्रस्ताव स्वीकार किए गए थे।
उस समय परिषद् की मुख्य चिन्ता नए संदभार्ें में युगानुकूल आचार-संहिता का निर्माण करना था। इस सम्बन्ध में पारित किया गया प्रस्ताव आज भी प्रासंगिक है। देश और विदेश में संस्कृत के पठन-पाठन की सुविधाओं का विस्तार, हिन्दुओं के विभिन्न सम्प्रदायों में आपस में आत्मीयभाव के विकास के सम्बन्ध में प्रस्ताव पारित हुए थे। विदेशस्थ हिन्दुओं को संगठित करने की आवश्यकता प्रतिपादित करते हुए उनका भी अभिनंदन और शुभकामनाएं प्रस्ताव द्वारा प्रदान की गई थीं।
हिन्दू मठ-मंदिरों का वैभव
प्राचीन काल से मठ मंदिर हिन्दू समाज की रीढ़ रहे हैं। अंग्रेजों ने इसी रीढ़ को तोड़ा। इसी के बल पर भारतीय समाज आज तक अनेक झंझावातों के बावजूद बचा हुआ था और विदेशी ताकतों को टक्कर दे रहा था। भारतीय समाज को निरन्तर शक्ति, ऊर्जा व प्रेरणा सदैव यहीं से प्राप्त होती रही। अंग्रेज जान गए थे कि जब तक ये मठ-मंदिर स्वतंत्र हैं तब तक 'यूनियन जैक' भारत में असुरक्षित है। अंग्रेजों ने मठ-मंदिरों को राज्य के नियंत्रण में लेने का प्रयास किया। कानून बनाकर मंदिरों की जमीन को हड़पना प्रारम्भ हो गया। मंदिरों का सरकारीकरण विदेशी शक्तियों का भारतीय समाज पर आक्रमण का एक प्रकार है। स्वतंत्रता के बाद भी जिन शक्तियों के हाथों में शासन और सत्ता आई वे मानसिक रूप से विदेशी नीतियों के ही अनुगामी बने रहे, परन्तु मठ-मंदिर भी वर्तमान युग की आवश्यकताओं के अनुसार अपने कर्त्तव्य की पूर्ति करने में पिछड़ रहे हंै। इन संस्थाओं में निहित प्रेरणादायिनी शक्ति की अभिव्यक्ति आज नहीं हो पा रही है। इस सम्बन्ध में एक प्रस्ताव पारित कर महत्वपूर्ण विषय पर चिन्ता व्यक्त की गई थी।
गोरक्षा पर चर्चा के समय कहा गया कि दुनियाभर में रह रहे हिन्दुओं के लिए गऊ का प्रश्न उनकी भावनाओं और आस्थाओं से जुड़ा है। गऊ का प्रकृति से तारतम्य बैठता है। विदेशी राज्य सत्ताओं के काल में गोहत्या को बढ़ावा दिया जाने लगा। दुर्भाग्य से देश स्वातंत्र्य के उपरान्त भी गोहत्या जारी है। जबकि संविधान के नीति-निदेशक तत्वों में गोहत्या को रोकना भी सम्मिलित है। प्रस्ताव में सरकार से मांग की गई थी कि गोमाता के प्रति विश्व के हिन्दुओं की श्रद्घा भावना का समुचित आदर करते हुए समस्त भारतवर्ष में गोहत्या बंद करने का केन्द्रीय कानून अविलम्ब बने। 7 नवम्बर, 1966 को दिल्ली में संसद भवन के सामने गोरक्षा एवं गोहत्या बंदी कानून बनाने के लिए प्रदर्शन का निर्णय इसी अवसर पर लिया गया था।
स्वधर्म के लिए पुन: स्वागत
जो हिन्दू अनेकानेक कारणों से भूतकाल में अपना धर्म छोड़कर मुसलमान या ईसाई बन गए उनको पुन: हिन्दू समाज में कैसे स्वीकृत कराया जाए?, सामान्यतया हिन्दू समाज उनको वापस लेने के लिए तैयार नहीं होता। एक हजार वषार्ें तक विदेशियों से संघर्ष करते रहने के कारण अपनी पहचान और अस्मिता की रक्षा के लिए हिन्दू समाज ने शायद यह कठोर व्यवस्था बनाई हो, परन्तु युगानुकूल उसमें परिवर्तन की आवश्यकता सम्मेलन में अनुभव की गई और आह्वान हुआ कि यदि सन्त समाज, धर्माचार्य ऐसे हिन्दू बन्धुओं की घरवापसी के रास्ते का अवरोध समाप्त करें तो समाज का बहुत लाभ हो सकता है। तदनुरूप पूज्य स्वामी विश्वेशतीर्थ जी महाराज ने 'न हिन्दू पतितो भवेत्' का उद्घोष किया। सभा स्थल जयघोष से गंूज उठा। यह घोषणा ही एक नई स्मृति की रचना का प्रारम्भ था। इसी प्रक्रिया को परावर्तन कहा गया। इसी सम्मेलन में हिन्दू की परिभाषा को स्वीकृति प्राप्त हुई। (परिषद् के संविधान का पंजीकरण 13 अक्तूबर, 1966 को हुआ)
अस्पृश्यता निवारण
इसके लिए प्रस्ताव पारित हुआ था। विचार आया था कि हिन्दू समाज से अस्पृश्यता के विष को बाहर निकालकर अमृत का संवर्धन करना है। 1970 में महाराष्ट्र के पंढ़रपुर में हिन्दू सम्मेलन में दादा साहब ने कहा था कि द्वारिका, श्रृंगेरी के जगद्गुरु शंकराचार्य तथा मध्व व वल्लभ सम्प्रदायों के जगद्गुरु आचायार्ें ने भी असंदिग्ध रूप से छुआछूत का निषेध किया है। हमारे बीच जो निर्धनता व असमानता भरी पड़ी है उसे सुधारात्मक सामाजिक आचरण द्वारा दूर करना है।सम्मेलन के अध्यक्ष न्यायमूर्ति रमाप्रसाद मुखर्जी ने अन्त में यह आशा प्रकट की थी कि परिषद् के सम्मेलन की इतिश्री तो हो गई, लेकिन परिषद् के कार्यकलाप का श्रीगणेश ही हुआ है। यह वाक्य दादा साहब व कार्यकर्ताओं के लिए मंत्र बन गया। इसी आधार पर संगठन की रचना तैयार होने लगी। दादा साहब ने सम्पूर्ण भारत के भ्रमण का निश्चय कर लिया।
उन स्थानों पर तत्काल जाने की आवश्यकता अनुभव की गई थी, जहां इस्लाम और चर्च के आघात तीव्र गति से हो रहे थे। इस दृष्टि से भारत का पूवार्ेत्तर क्षेत्र सबसे ज्यादा संवेदनशील था और दादा साहब सर्वप्रथम असम के प्रवास पर ही निकले थे। उन्होंने अनुभव किया था कि चर्च केवल मतान्तरण ही नहीं करता, अपितु अलगाववाद का बीज भी बोता है। उन्हें समग्र भारतीय समाज से काटने का प्रयास करता है। तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (आज का बंगलादेश) से अवैध रूप से आए मुसलमान असम में बस रहे थे। दादा साहब ने इन सब समस्याओं को समझा और असम में सेवा कायार्ें का प्रारम्भ हुआ।
असम क्षेत्र में सम्मेलन
असम क्षेत्र में तीन सम्मेलन किए गए। 2 अक्तूबर, 1966 को गुवाहाटी में, फरवरी 1967 में त्रिदिवसीय सम्मेलन पुन: गुवाहाटी में तथा 27, 28 व 29 मार्च, 1970 को जोरहाट में सम्मेलन किया गया। तिब्बत और म्यांमार की सीमा पर अरुणाचल प्रदेश में स्थित प्रसिद्ध तीर्थ परशुराम कुण्ड का जीणार्ेद्धार करने के लिए 1967 में परशुराम कुण्ड विकास समिति गठित की गई थी। एक मंदिर का निर्माण कर भगवान परशुराम की मूर्ति की स्थापना भी की गई थी। 1966 के सम्मेलन में इस बात पर विशेष बल दिया गया था कि सभी के सभी हिन्दू प्रकृति पूजक हैं। हम सब हिन्दू हैं और यह देश हिन्दू राष्ट्र है। 1967 के सम्मेलन में 100 से अधिक क्षेत्राधिकारी तथा अरुणाचल, मेघालय, त्रिपुरा, नागालैण्ड से भी प्रतिनिधि आए थे। जोरहाट सम्मेलन में स्वयं नागारानी गाइदिन्ल्यू पधारी थीं। तत्पश्चात् उत्तर कछार जिले के हॉफलॉन जिले में छात्रावास प्रारम्भ किया गया था। जोरहाट सम्मेलन में गंगा, यमुना, नर्मदा, कृष्णा, गोदावरी सहित 45 नदियों का पवित्र जल लाया गया था। पूज्य विश्वेशतीर्थ जी महाराज इस सम्मेलन में उपस्थित थे। हिन्दू समाज की एकता का यहां अभूतपूर्व दृश्य बना था। श्रीगुरुजी तीनों दिन सम्मेलन में उपस्थित थे, 'हिन्दू-हिन्दू एक रहें' की घोषणा की गई थी।
दक्षिण भारत मंे सम्मेलन
दक्षिण भारत का प्रथम क्षेत्रीय हिन्दू सम्मेलन 13, 14 दिसम्बर, 1969 को 'उडुप्पी' कर्नाटक में हुआ था। राज्य के 12000 स्थानों से 15000 प्रतिनिधि और इतने ही स्थानीय दर्शनार्थी सम्मेलन में रहते थे। प्रमुख परम्पराओं के 40 धर्माचार्य मंच पर विराजमान थे। सम्मेलन की अध्यक्षता कर्नाटक राज्य लोकसेवा आयोग के सदस्य और सेवानिवृत्त आई़ ए़ एस़ अधिकारी श्री आऱ भरनैय्या ने की थी। उन्होंने स्वयं प्रस्ताव प्रस्तुत किया था कि 'हिन्दू समाज से अपील की जाती है कि वह ऊंच-नीच और अस्पृश्यता के भेद-भाव पूर्ण विचार को त्यागकर अपने सभी धार्मिक व सामाजिक कार्य जात-पांत व जन्म का विचार किए बिना एक हिन्दू भ्रातृत्व भाव के आधार पर सम्पन्न करें।' प्रस्ताव प्रस्तुत होते ही सभागार में तालियां बजने लगीं, प्रसन्नता दौड़ गई, धर्माचायार्ें ने हृदय से आशीर्वाद प्रदान किया। पूज्य पेजावर स्वामी ने 'हिन्दव: सोदरा: सर्वे' की घोषणा की। सम्मेलन के अन्त में श्रीगुरुजी ने आह्वान करते हुए कहा था कि धर्माचायार्ें ने अस्पृश्यता के त्याग का निर्देश किया है। अत: हममें से प्रत्येक कार्यकर्ता का दायित्व है कि वह अपने निजी जीवन में सन्तों के निर्देश का पालन करें। गुरुजी ने यह भी कहा था कि यदि हमारे मठाधिपति सर्वसाधारण समाज के मध्य भ्रमण करना प्रारम्भ कर दें तो महान कार्य हो सकता है।
पश्चिम भारत सम्मेलन
5, 6 दिसम्बर, 1970 को पंढ़रपुर (महाराष्ट्र) में सम्मेलन हुआ था। श्री दादा साहब ने अपने उद्बोधन में कहा था कि हम सब हिन्दू हैं, न कोई अस्पृश्य और न वनवासी, प्रत्येक हिन्दू को आदर्श हिन्दू बनना है। अक्तूबर, 1972 को गुजरात के सिद्धपुर में, 1974 में पुन: मुम्बई में सम्मेलन हुआ।
इसी प्रकार 1968, 1969, 1971 व 1973 में उड़ीसा में सम्मेलन हुए।
1971 के पूर्वी उत्तर प्रदेश के सम्मेलन में तत्कालीन उपराष्ट्रपति श्री गोपालस्वरूप पाठक एवं उत्तर प्रदेश के राज्यपाल श्री गोपाल रेड्डी पधारे थे। राष्ट्रपति श्री वी़ वी़ गिरि का शुभकामना संदेश प्राप्त हुआ था।
़इन सम्मेलनों ने समाज में स्वाभिमान पैदा किया, यह भाव पनपा कि 'हम सब हिन्दू हैं।' जहां-जहां सम्मेलन हुए वहां संगठन की इकाइयाँ गठित होने लगीं।
विदेशों में कार्य
परिषद् की स्थापना के पूर्व से ही आपटे जी ने विदेशों के प्रमुख हिन्दू बन्धुओं/संस्थाओं के पदाधिकारियों से पत्र व्यवहार प्रारम्भ कर दिया था। 1966 को प्रयागराज में हुए विश्व हिन्दू सम्मेलन में विदेशों से प्रतिनिधि आए थे। विदेशों में कहीं-कहीं परिषद् कार्य प्रारम्भ होने लगा था। अमरीका में विश्व हिन्दू परिषद् का कार्य 1970 में प्रारम्भ हो गया था। दादा साहब आपटे ने 1971 में परिषद् के कार्य की वृद्धि के लिए 9 महीनों तक विदेश भ्रमण किया, 30 देशों के 117 नगरों में 140 सभाओं को सम्बोधित किया। इस काल में आपटे जी त्रिनिदाद, सूरीनाम, गुयाना, इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैण्ड, हांगकांग आदि देशों में गए थे। इंग्लैण्ड में श्री आपटे जी लगभग एक मास रहे, 1975 में आपटे जी पुन: इंग्लैण्ड गए।
़विश्व में वेदों की स्थापना
पूज्य स्वामी गंगेश्वरानन्द जी महाराज उदासीन परम्परा के प्रमुख सन्त थे, प्रज्ञाचक्षु थे, उन्होंने चारों वेदों को एक ही खण्ड में प्रकाशित कराया था। वे चाहते थे यह गं्रथ सारे संसार में पहुंचे। परिषद् इस कार्य के लिए आगे आई। आपटे जी ने वर्ष 1974-75 में स्वामी गंगेश्वरानन्द जी के साथ जाकर विश्व के अनेक देशों में छोटे-छोटे 88 स्थानों पर वेद मंदिरों की स्थापना की थी। दादा साहब आपटे जी ने घोषणा की थी कि 'विश्व हिन्दू परिषद् नई आचार संहिता का निर्माण करेगी।' आपटे जी ने विदेशस्थ हिन्दू संस्थाओं की प्रशंसा करते हुए कहा था कि 'भारत से दूर रहकर भी जिन्होंने हिन्दू धर्म से अपनी अभिन्नता को कायम रखा है, परिषद् उनकी हर प्रकार से सहायता करती रहेगी तथा मार्गदर्शन प्रदान करती रहेगी।' इस प्रकार दादा साहब आपटे ने विश्व हिन्दू परिषद् को अन्तरराष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया और उनका प्रयत्नसिद्ध संकल्प फलीभूत दिखाई दे रहा है।
12 जून, 1977 को विश्व हिन्दू परिषद् की कार्यसमिति बैठक में दादा साहब आप्टे ने अपना कार्यभार संस्कृत विद्वान राजाभाऊ डिग्वेकर को सौप दिया और स्वयं पूना में रहने लगे।
़द्वितीय विश्व हिन्दू सम्मेलन
25, 26, 27 जनवरी, 1979 को प्रयागराज में संगम तट पर द्वितीय विश्व हिन्दू सम्मेलन हुआ। सम्मेलन की अध्यक्षता परिषद् के अध्यक्ष महाराणा श्री भगवत सिंह (मेवाड़) ने की थी तथा राजाभाऊ डिग्वेकर महामंत्री थे। सम्मेलन के स्वागताध्यक्ष का दायित्व दिल्ली निवासी उद्योगपति श्री विष्णुहरि डालमिया ने निभाया था। श्री डालमिया जी परिषद् कार्य से ऐसे जुड़े कि परिषद् के अध्यक्ष बने। परम पावन दलाई लामा जी सम्मेलन का उद्घाटन करने पधारे थे। काशी के पंडितों ने काशी पधारने पर दलाई लामा जी का स्वागत किया था। एक समय था जब काशी के ही पंडितों ने महात्मा बुद्ध को काशी में प्रवेश करने नहीं दिया था। इतिहास की इस भूल को सुधारने का कार्य 1979 में विश्व हिन्दू परिषद् के तत्वावधान में सम्पन्न हुआ। परम पावन दलाई लामा जी ने काशी के पंडितों का अभिवादन किया था। दलाई लामा जी ने अपने उद्बोधन में कहा था कि बौद्ध मत भगवान बुद्ध द्वारा प्रवर्तित भारतीय मत है जिसे तिब्बत में हमने सुरक्षित भी रखा है, विकसित भी किया है। इस सम्मेलन में सम्मिलित होने पर मुझे हार्दिक प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। मॉरीशस के तत्कालीन उद्योग मंत्री दयानन्द बसन्तराय जी सम्मेलन में पधारे थे। समवेत स्वर में संकल्प लिया गया कि 'देशकाल का ध्यान रखते हुए हिन्दुत्व के मूल आदशार्ें के आधार पर महर्षियों द्वारा दिखाए गए दृष्टिकोण व आदशार्ें के अनुसार विदेशों में बसे हुए हिन्दुओं का मार्गदर्शन करेंगे।' कुल 6 प्रस्ताव पारित किए गए थे। महाराणा ने अपने समापन भाषण में कहा था कि इस सम्मेलन में मुझे भगवान के दर्शन का आभास और ईश्वरीय शक्ति की प्रति हुई है। इस महानगर की व्यवस्था देखने के लिए पुलिस का एक भी आदमी मुझे दिखाई नहीं पड़ा। 26 जनवरी को हुए मातृ सम्मेलन में नागालैण्ड की रानी गाइदिन्ल्यूू, राजमाता विजयाराजे सिन्धिया व कवयित्री महादेवी वर्मा उपस्थित थीं। सन्त सम्मेलन में डॉ. कर्ण सिंह पधारे थे। 27 जनवरी को विदेशस्थ हिन्दुओं के सम्मेलन में विदेशस्थ हिन्दुओं की रक्षा, भारत में अध्ययन करने वाले प्रवासी हिन्दू छात्र तथा बंगलादेश में हिन्दुओं की रक्षा पर प्रस्ताव पारित किए गए थे। धर्म गंगा के नाम से एक प्रदर्शनी लगाई गई थी, हिन्दुओं के लिए न्यूनतम धर्माचरण की घोषणा की गई थी –
1. सूर्य शाश्वत देवता है प्रतिदिन प्रणाम करें।
2. ओम् परमात्मा का सर्वमान्य प्रतीक है। अत: सभी हिन्दू ओम् का चिन्ह अपने गले में धारण करें। प्रत्येक कार्य के प्रारम्भ में ओम् अंकित करें।
3. प्रत्येक हिन्दू परिवार में गीता अवश्य रखंे।
4. प्रत्येक हिन्दू परिवार अपने घर में इष्टदेव का चित्र रखें एवं यथासम्भव प्रतिदिन प्रार्थना करें।
5़ प्रत्येक परिवार में तुलसी का पौधा अवश्य हो।
6़ अपने-अपने श्रद्घा केन्द्र में प्रतिदिन दर्शन, प्रार्थना करने उपस्थित हों।
यद्यपि दादा साहब महामंत्री का दायित्व छोड़ चुके थे, तथापि सम्मेलन के अन्त में वे मंच पर आए और बोले कि परिषद् का कार्य विश्वव्यापी हो गया है। विश्व के 88 देशों में वेद मंदिर की स्थापना हो गई है। श्रीगुरुजी ने एक बनफूल उखाड़कर जनता की सेवा में लगा दिया। मुझे वह सौभाग्य मिला, हिन्दू धर्म को कोई खतरा नहीं, दूसरे अपने खतरों की चिन्ता करें।
25 अक्तूबर, 1979 को माता उमाबाई ने भी प्राण छोड़ दिए। आपटे जी अपनी जन्मदात्री मां और भारत मां दोनों के ऋण से उऋण हो चुके थे। 10 अक्तूबर, 1985 रात्रि 8़ 40 बजे आपटे जी का शरीर भी शान्त हो गया।
गुजरात के नवसारी स्थान पर दादा साहब के पूर्वज रहते थे। पिताजी शंकर राव के घर में गरीबी थी, परन्तु उनकी ईमानदारी के उदाहरण दिए जाते थे। माता का नाम उमा था। इन्हीं उमा-शंकर के घर 2 फरवरी, 1905 को बड़ौदा में अपने नाना के यहां दादा साहब का जन्म हुआ। बालक का नाम रखा गया शिवराम, जो कालान्तर में दादा साहब के नाम से प्रसिद्ध हुए।
़प्राथमिक शाला में पहुंचने से पहले ही माताजी समर्थ रामदास स्वामी के मराठी श्लोक तथा पिताजी संस्कृत के श्लोक बालक को कण्ठस्थ कराते थे। धर्म और वेदान्त विषय लेकर बड़ौदा में स्नातक कक्षा में दाखिला लिया। कानून की पढ़ाई करने के लिए मुम्बई आए। मुम्बई में ही उस समय के प्रख्यात वकील कन्हैयालाल माणिकलाल जी के सहयोगी के रूप में कुछ दिन वकालत भी की। अंग्रेजी, संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती आदि कई भाषाओं पर दादा साहब का समान अधिकार था। वे साहित्यकार थे, चित्रकार भी थे, उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं। उन्होंने कुछ समय संस्कृत शिक्षक के रूप में कार्य किया। अमर चित्रकथा का प्रारम्भ भी आपटे जी ने ही किया, समर्थ रामदास की ऐसी कथा उन्होंने स्वयं चित्रित की। सुभाषचन्द्र बोस द्वारा स्थापित फॉरवर्ड ब्लॉक संस्था का कार्य जब मुम्बई में प्रसिद्ध वकील नरीमन ने शुरू किया तो आपटे जी उसी संस्था में सक्रिय हो गए। उन्होंने एक अंग्रेजी पत्रिका में उपसंपादक का कार्य भी किया। यूनाइटेड प्रेस ऑफ इण्डिया संवाद समिति में भी कार्य किया। ऐसा प्रतीत होता है कि दादा साहब का मन शान्त नहीं था, वे अपने जीवन का मार्ग अन्दर ही अन्दर खोज रहे थे। मुम्बई में ही 1939 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से युवक शिवराम (दादा साहब आपटे) का सम्पर्क हुआ। परिणामस्वरूप आपटे जी के जीवन की दिशा बदल गई और एक दिन अपनी दैनिक डायरी में लिख दिया 'विवाह नहीं करूंगा और भारतमाता की सेवा के लिए समर्पित हो जाऊंगा।' 1940 में नागपुर में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग में श्रीगुरुजी से सम्पर्क हुआ, जो निरन्तर बढ़ता ही चला गया। वर्ष 1944 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के नाते तमिलनाडु के त्रिचिरापल्ली चले गए।
वीर सावरकर जी ने दादा साहब को मुम्बई स्थित अपने घर पर रहने के लिए आमंत्रित किया था। वे चार वर्ष उनके घर में रहे। सावरकर जी ने ही वर्ष 1942 में दादा साहब आपटे को एक ऐसी समाचार एजेन्सी चलाने की प्रेरणा दी थी जो केवल अंग्रेजों के पक्ष को ही नहीं, अपितु भारतीय पक्ष को भी प्रस्तुत करे। शायद इसी कारण, 1948-49 में जब संघ पर संकट आया तब दादा साहब को अनुभव हुआ कि तत्कालीन प्रसार माध्यम संघ के विरुद्ध अनर्गल और झूठा प्रचार कर रहे हैं। मीडिया की भूमिका नकारात्मक है। उस समय दादा साहब ने भारतीय भाषाओं में समाचार प्रेषण करने के लिए संवाद समिति बनाई, उसका नाम रखा गया हिन्दुस्थान समाचार, यह संस्था आज भी कार्यरत है। देवनागरी लिपि का टेलीप्रिंटर निर्माण करने में दादा साहब का महत्वपूर्ण सहयोग सरकार को रहा है।
जुलाई, 1982 में श्री अशोक सिंहल जी को संयुक्त महामंत्री के रूप में परिषद् कार्य का दायित्व मिला। उस समय महाराणा भगवत सिंह (मेवाड़), परिषद् के अध्यक्ष तथा आगरा निवासी हीरों के व्यापारी श्री हरिमोहन लाल मेहरा महामंत्री का दायित्व सम्भाल रहे थे। वर्ष 1983 में आचार्य गिरिराज किशोर परिषद् के कार्य में आए। 1985-1992 तक न्यायमूर्ति शिवनाथ काटजू, 1992-2005 तक उद्योगपति श्री विष्णुहरि डालमिया तथा 2005-2011 तक श्री अशोक सिंहल परिषद् के अध्यक्ष रहे। श्री हरिमोहन लाल जी के देहावसान के पश्चात् 1986 में श्री अशोक सिंहल, 1995-1998 तक आचार्य गिरिराज किशोर, 1998-2011 तक डॉ. प्रवीणभाई तोगिउ़या परिषद् के महामंत्री रहे। 1982 के पश्चात् का विश्व हिन्दू परिषद् का विकासक्रम आंखों से देखने वाले और जानने वाले असंख्य बन्धु अभी हैं, यह विकास सर्वज्ञात है। इसलिए इस संकलन को यहीं विराम देता हूं।
(लेखक विश्व हिन्दू परिषद् के अन्तरराष्ट्रीय महामंत्री हैं)

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