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-विवेक शुक्ला-
जब देश लोकतंत्र के पर्व को मनाने के लिए तैयारी कर रहा है, बस तब ही माओवादियों ने छत्तीसगढ़ के सुकमा में जो क्रूरता दिखाई उसकी दास्तान दिल दहला देने वाली है। लोकसभा चुनाव के ठीक पहले माओवादियों की दुस्साहसपूर्ण कार्रवाई पूरे देश के लिए चुनौती है। सवाल ये है कि बीते दशकों के दौरान इस देश ने पंजाब,असम, पूर्वोत्तर भारत में भी हिंसक पृथकतावादी आंदोलनों को देखा और कुचला भी। लेकिन, माओवादियों को लेकर देश कमजोर क्यों दिख रहा है। क्या देश के संकल्प में किसी स्तर पर कमी है?
बेशक, आगामी लोकसभा चुनावों में माओवादी प्रभावित क्षेत्रों में शांतिपूर्ण तरीके से मतदान कराना चुनाव आयोग के लिए निश्चित रूप से चुनौती होगा। इसलिए माओवादी प्रभावित इलाकों में एक दिन ही मतदान होगा। माओवादी हिंसा से अत्यधिक प्रभावित छह सूबों के 33 जिले चिन्हित किए गए हैं। ये सूबे हैं झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार, ओडिशा, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश। पिछले दो लोकसभा चुनाव 2004 और 2009 के अलावा 2008, 2009, 2010 और 2013 में इन राज्यों में अलग-अलग समय में हुए विधानसभा चुनावों में सबसे ज्यादा जानें गई थीं। इसके अलावा झारखंड में सिर्फ 2013 में हिंसा की 383 घटनाएं हुईं, जिसमें 150 नागरिक और जवान मारे गए। छत्तीसगढ़ में 353 ऐसी घटनाओं में 110 लोगों ने जान गंवाई। इसी तरह बिहार में 69 लोगों ने 176 घटनाओं में जान गंवाई।
ओडिशा में 101 घटनाओं में 35 लोगों की जान गई। सुरक्षा की दृष्टि से गृह मंत्रालय ने सबसे ज्यादा संवेदनशील जिले भी चिन्हित किए हैं। इनमें झारखंड के खूंटी, गुमला, लातेहार, सिमडेगा, पश्चिमी सिंहभूम, रांची, दुमका, गिरीडीह, पलामू, गढ़वा, चतरा, लोहरदग्गा और बोकारो जबकि छत्तीसगढ़ के बस्तर, बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा, कांकेर, नारायणपुर, कोंडागांव और राजनांद गांव जिले में शामिल हैं। बिहार में औरंगाबाद, गया, जमुई, मुजफ्फरपुर और लक्खीसराय तथा ओडिशा में मलकानगिरी, कोरापुट, नौपदा और बोलनगीर को संवेदनशील माना
गया है।
माओवादियों की ताजा कार्रवाई के बाद चुनाव आयोग को अपनी रणनीति पर फिर से विचार करना होगा। इस तरह की रणनीति बनानी होगी ज%











