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लेखन कर्म से अपनी जीवन यात्रा शुरू करने वाले अटल जी के जीवन के हर पड़ाव पर संघर्षशीलता एवं उतार-चढ़ाव दृष्टव्य होता है। अटल जी को कुशल वक्ता की कला एवं काव्य कला अपने पिताजी पं. कृष्णबिहारी वाजपेयी से विरासत में मिली है। उनके पिताजी तत्कालीन समय में ग्वालियर राज्य के विख्यात कवि तथा कुशल वक्ता थे। अटल जी के बाबा भी संस्कृति के मूर्धन्य विद्वान थे, परन्तु अटल जी की वाणी पर जिस प्रकार साक्षात् सरस्वती विराजती है वह उनकी ईश्वर प्रदत्त और स्वयं के अध्यवसाय से अर्जित उपलब्धि है।
संवाद कौशल एवं अपनी भाषण कला के लिए अटल जी विख्यात हैं एवं श्रोताओं में अति लोकप्रिय हैं। विषयों का गहन विवेचन या प्रतिपादन भी जैसी सर्वजन-सुलभ सरल शब्दावली में करके अर्थशास्त्र से अनभिज्ञ श्रोताओं को भी वे सारी बात जितनी अच्छी तरह से समझा देते हैं वह योग्यता अर्थशास्त्र के पंडितों के लिए भी कठिन है। सहज भाषा के बावजूद अपने कथ्य को कितने स्पष्ट रूप से अटल जी समझाते हैं, इसके लिए संसद में विदेश मंत्रालय की पूरक अनुदान मांगों के अवसर पर लोकसभा में 21 फरवरी, 1958 को दो कटौती प्रस्तावों पर बहस के दौरान अटल जी के भाषण से स्पष्ट होता है। प्रस्तुत उदाहरण में श्री वाजपेयी विदेशों से आने वाले मेहमानों के सत्कार पर व्यय होने वाली राशि और तौर-तरीके के संबंध में संसद में चर्चा में भाग ले रहे हैं। अटल जी कहते हैं- 'मैं यह जानना चाहता हूं कि क्या यह आवश्यक है कि दिल्ली की नगरपालिका प्रत्येक विदेशी मेहमान को मानपत्र भेंट करके ही स्वागत करे? जब भी कोई मेहमान आते हैं, हम उनका स्वागत करें यह स्वाभाविक है। अतिथि- सत्कार की हमारी पुरानी परम्परा है।' परिवहन तथा संचार राज्य मंत्री- 'स्वाभाविक ही नहीं बल्कि आवश्यक भी है।' श्री वाजपेयी- 'आवश्यकता से स्वभाव अधिक बलवान होता है। जो स्वाभाविक चीज होती है वह स्वभाववश अपने आप अन्दर से आ जाती है और प्रकट हो जाती है, जबकि आवश्यकता में एक बाहर से लाने की भावना प्रकट होती है। अपने मेहमानों का स्वागत करना यह हम भारतीयों के स्वभाव में है़।' श्री दी.चं. शर्मा- 'आप उसको अपोज कर रहे हैं।' श्री वाजपेयी- 'मैं उसको अपोज नहीं कर रहा हूं। जरा ध्यान से सुनिये। मैं यह निवेदन कर रहा हूं कि स्वागत का हमारा एक स्तर होना चाहिए। जो हमारी आज की स्थिति और पुरानी परम्पराओं के अनुकूल हो। दिल्ली नगरपालिका मानपत्र भेंट करें और उसी से स्वागत हो, या दिल्ली दरवाजे पर बिजलियां जगमगा कर और आसफअली पार्क के एक-एक पत्ते पर एक-एक लट्टू लगा कर अगर हम समझते हैं कि स्वागत-सत्कार का हमारा कर्तव्य पूरा हो गया तो यह ठीक नहीं है और मैं उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हूं। आज का हमारा स्वागत भी पंचवर्षीय योजना की सफलता के लिए हम देश में त्याग और बलिदान का जो वातावरण उत्पन्न करना चाहते हैं, उसके अनुकूल होना चाहिए। अगर उससे शान और शौकत टपकती है और अगर आम आदमी को ऐसा अनुभव होता है कि इन स्वागतों के बिना भी हम अपने अतिथि के प्रति प्रेम प्रकट कर सकते हैं तो मैं समझता हूं कि इन स्वागतों के ढांचे में और तौर-तरीकों में कुछ परिवर्तन होना चाहिए।'
भाषा, सहजता, शब्द-चुनाव एवं सांकेतिक भाषा में अपने प्रस्ताव की प्रासंगिकता एवं उसके गुण-दोष के आधार पर उसकी सापेक्षता को सिद्घ करने का उनका अनोखा ही अंदाज था। उपरोक्त उदाहरण में अपने विनम्र अंदाज में उन्होंने विदेशी मेहमानों के स्वागत को भारतीय परंपरानुसार कायम रखते हुए खूबसूरती से उस पर होने वाले खर्चें में कटौती का उदाहरण देकर उसे भारत की स्थिति एवं जनता की भावनाओं से जोड़ा है। इससे स्वागत की मूल भावना को कायम रखते हुए एवं जनता की भावनाओं से जोड़कर उस पर होने वाले व्यय में कटौती का संदेश भी उन्होंने बखूबी दिया है। यह तो एक उदाहरण भर है। ऐसे अनगिनत प्रसंग हैं, जब अटल जी ने अपने अनोखे अंदाज एवं चुटकियों से अपने अभूतपूर्व संवाद कौशल का परिचय दिया।
जिस समय अंग्रेजी बोलने वाले राजनेताओं का बड़ा रुतबा हुआ करता था और उन्हें हिन्दी भाषी राजनेताओं की तुलना में ज्यादा योग्य माना जाता था उस समय अटल जी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में विदेश मंत्री के नाते हिन्दी में भाषण करते हुए विश्व मंच पर सर्वप्रथम भारत की राष्ट्रभाषा को गौरव का स्थान दिलाकर उसके नए अध्याय का सूत्रपात किया। वहां से वापसी पर भारत की राजधानी में हिन्दी प्रेमी तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री बाबू जगजीवन राम की अध्यक्षता में अटल जी का सम्मान किया गया। इस समारोह में वक्ताओं ने अटल जी की भूरि-भूरि प्रशंसा की। तब अंत में अटल जी ने कहा हिंदी की बात मत करो, हिंदी में बात करो। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की ह्यनिज भाषा उन्नति अहै सब भाषा को मूलह्ण में पूरी तरह विश्वास करने वाले अटल जी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में अपने भाषण से भारतेन्दु जी की उक्ति को पूर्णत: चरितार्थ किया। उनके भाषण में निहित संदेश, उसकी सम्प्रेषणीयता एवं उसके स्तर ने भी सबको प्रभावित किया। भाषण के कुछ अंश यहां प्रस्तुत हैं -ह्यमेरे विचार राष्ट्रों की शक्ति और महिमा के संदर्भ में नहीं हैं। मेरे लिए आम आदमी की गरिमा और मांग ज्यादा महत्वपूर्ण है। हमारी सफलताओं और असफलाओं को मापने का एक ही मापदण्ड होना चाहिए। हम हर आदमी, औरत और बच्चों, सभी लोगों के लिए सामाजिक न्याय और गरिमा के लिए काम कर रहे हैं। इसकी सफलता के लिए यह आवश्यक है कि संयुक्त राष्ट्र संघ मानवता की प्रभावी आवाज बने और राष्ट्रों के बीच अन्तर्संबंधों एवं सहयोग तथा सामूहिक कार्रवाई पर आधारित एक गतिशील मंच इसे बनाया जाए।ह्ण उपरोक्त भाषण को पढ़कर यह आभास होता है कि यह किसी राजनेता का उबाऊ या उपदेशात्मक भाषण भर नहीं वरन् परिस्थितियों को देखते हुए बहुमुखी प्रतिभावान किसी कुशल नेता द्वारा एक अंतरराष्ट्रीय मंच से दिया गया प्रभावी एवं मर्मस्पर्शी संदेश है।
अटल जी का व्यक्तित्व इतना व्यापक है कि उन पर कई पुस्तकें बन सकती हैं। परन्तु उन पर लिखे गये लेख में यदि उनके अंदर विद्यमान कालजयी कवि की चर्चा न करना, उनके व्यक्तित्व के साथ अन्याय होगा। उनकी कविताओं को पढ़कर विश्वास नहीं होता कि कोई राजनेता इतना उत्कृष्ट कवि हो सकता है। उनकी कविताओं में राष्ट्रप्रेम, जीवन संघर्ष, विश्व शांति एवं राजनेता के रूप में उनके मन के अंदर की उथल-पुथल का बखूबी वर्णन है। जब वे लिखते हैं- ह्यखड़े देहली पर हो किसने पौरुष को ललकारा, किसने पापी हाथ बढ़ाकर मां का मुकुट उतारा?ह्ण तब मानो वे राष्ट्र के दुश्मनों को चुनौती देते हुए ललकार रहे हैं। एक दूसरी कविता में वे लम्बे संघर्ष के बाद मिली आजादी की सुरक्षा के लिए नसीहत देते हुए कहते हैं- ह्यउस स्वर्ण दिवस के लिए आज से कमर कसें बलिदान करें। जो पाया उसमें खो न जायें, जो खोया उसका ध्यान करें।ह्ण भारत के आत्मसम्मान की अक्षुण्णता के लिए लिखते हैं- ह्यदांव पर सब कुछ लगा है रुक नहीं सकते हैं, टूट सकते हैं, मगर हम झुक नहीं सकते हैं।ह्ण अटल जी की उक्त कविताओं को देखकर लगता है कि मानो वे कोई वीर रस के कवि हों। लेकिन जब हम उनकी एक अन्य कविता ह्यअपने ही मन से कुछ बोलेंह्ण पर नजर डालते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि मानो कोई दार्शनिक लिख रहा है एवं कविता के माध्यम से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का संदेश दे रहा है। यह कविता बहुत मर्मस्पर्शी है एवं मानव जीवन की यात्रा का वृतांत इसमें वर्णित है। अपनी अंतरचेतना में झांकने एवं उसका आत्मावलोकन करने का खूबसूरत संदेश भी इसमें निहित है। पूरे जीवन चक्र का निचोड़ इस कविता में किस तरह सम्मिलित है यह कविता की निम्न पंक्तियों से समझा जा सकता है:-
क्या खोया, क्या पाया जग में,
मिलते और बिछड़ते मग में,
मुझे किसी से नहीं शिकायत,
यद्यपि छला गया पग-पग में,
एक दृष्टि बीती पर डालें,
यादों की पोटली टटोलें।
पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी,
जीवन एक अनन्त कहानी,
पर तन की अपनी सीमाएं,
यद्यपि सौ शरदों की वाणी,
इतना काफी है अंतिम
दस्तक पर खुद दरवाजा खोलें।
जन्म-मरण का अविरत फेरा,
जीवन बंजारों का डेरा,
आज यहां, कल कहां कूच है,
कौन जानता, किधर सवेरा,
अंधियारा आकाश असीमित,
प्राणों के पंखों को तोलें।
अपने ही मन से कुछ बोलें।
कुल मिलाकर चाहे एक कुशल संगठक की भूमिका हो, चाहे मंजे हुए राजनेता की, सहृदय कालजयी कवि या फिर अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक की, अटल जी जैसा कोई दूसरा नहीं है। यह अटल जी की अभूतपूर्व मेधा का ही परिणाम है कि उन्हें विरोधी और दूसरी पार्टियों में वही सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त है जो अपनी पार्टी के शीर्ष नेता होने के कारण अपनी पार्टी में प्राप्त है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दूरदृष्टा, दृढ़ निश्चयी, अविचल और प्रखर प्रतिभा के धनी, अटल जी के व्यक्तित्व को हम परखते हैं तो उनका व्यक्तित्व सबसे ऊंचाई पर व्यक्तित्व की पराकाष्ठा को छूता नजर आता है। आजकल की चरित्रहनन, कीचड़ उछालने वाली राजनीति से दूर साफ-सुथरी छवि एवं व्यापक व्यक्तित्व तथा राष्ट्र के गौरव को शिखर पर पहुंचाने के लिए समर्पित रहने को हमेशा तत्पर रहने वाले बिरले राजनेताओं में उनको शीर्ष स्थान प्राप्त है। अटल जी सत्ता के लिए सिद्घान्तों से समझौता न करने एवं वैचारिक स्वतंत्रता की परम्परा के संवाहक हैं। उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व का मूल्यांकन करने से इस विश्वास की पुष्टि होती है कि संस्कारित व्यक्ति कितने ही ऊंचे पद पर क्यों न पहुंच जाय, अपने सद्गुणों को कभी नहीं छोड़ता।
प्रो. बृजकिशोर कुठियाला
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति हैं)











