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'देवदूतों' के लिए परीक्षा की घड़ी

Written byArchiveArchive
Dec 14, 2013, 12:00 am IST
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दिंनाक: 14 Dec 2013 16:03:47

कितना विचित्र है कि चार विधानसभाओं की 590 सीटों में 409 सीटें पानी वाली भाजपा के बजाए दिल्ली विधानसभा की 70 सीटों में 28 सीटें पाने वाली आम आदमी पार्टी और छोटी सी केजरीवाल मंडली ही पूरे मीडिया पर छायी हुई है। आप की इस सफलता को एक चमत्कार के रूप में देखा जा रहा है, उसमें भारतीय राजनीति के चरित्र परिवर्तन की संभावनाएं देखी जा रही हैं। 15 वर्ष तक दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की, जिन्हें सभी चुनावपूर्ण सर्वेक्षणों में सर्वाधिक लोकप्रिय आंका गया था, एक नौसिखिया केजरीवाल के हाथों पराजय कोई इंदिरा गांधी के विरुद्ध राजनारायण की विजय जैसा आश्चर्यजनक माना जा रहा है। अब सब टेलीविजन चैनलों, पूरे प्रिंट मीडिया और सोशल मीडिया में केवल इस चमत्कार की ही चर्चा हो रही है। बाकी सब विधानसभा परिणाम नेपथ्य में चले गये हैं। दो महीने पहले जब कोई ओपीनियन पोल ह्यआपह्ण को 9 से अधिक सीटें नहीं दे रहा था और भाजपा व कांग्रेस जैसे बड़े राजनीतिक दल उन्हें उपेक्षा भाव से देख रहे थे तभी हमने 10 अक्तूबर को ह्यअण्णा आंदोलन का राजनीतिक अपहरणह्ण(पाञ्चजन्य 30 अक्तूबर, 2013) शीर्षक से लिखा था- ह्यइस नई पार्टी का नेतृत्व जिस छोटे ग्रुप के हाथ में है, उसमें अरविंद केजरीवाल, योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण, मनीष सिसोदिया, कुमार विश्वास, गोपाल राय, और शाजिया इल्मी जैसे लोग हैं। ये सभी लोग राजनीतिक दृष्टि से बहुत जागरूक, जानकार, विचारवान, आदर्शवादी संगठनकुशल व संकल्पबद्ध व्यक्तियों की छवि रखते हैं। ये सभी चेहरे अप्रैल से अगस्त 2011 तक राजधानी दिल्ली में इंडिया अगेंस्ट करप्शनह्ण (भ्रष्टाचार विरुद्ध भारत) आंदोलन में से उभरकर देश के सामने आए। तभी देश ने उन्हें जाना और पहचाना था।ह्ण और कि, ह्यइस टीम की प्रामाणिकता, समाजनिष्ठा, और भ्रष्टाचार विरोधी संकल्प के प्रति अविश्वास का कारण अभी नहीं है। केजरीवाल मंडली अभी तक इस राजनीतिक प्रणाली का सीधा अंग नहीं बनी है। इसलिए वह स्वयं को बेदाग कहने का दावा कर सकती है।ह्ण
दिल्ली ही क्यों चुना?
तभी हमने प्रश्न उठाया था कि केजरीवाल मंडली ने पांच राज्यों में से केवल दिल्ली राज्य को ही क्यों चुना है? इसके पीछे उसकी रणनीति क्या है? क्योंकि उनका दावा है कि आम आदमी पार्टी का संगठनात्मक ढांचा पूरे देश में फैल गया है। 12 राज्यों और 350 जिलों में उनकी इकाइयां गठित हो चुकी हैं। उनकी 23 सदस्यों वाली राष्ट्रीय कार्यसमिति में पूरे देश का प्रतिनिधित्व है।ह्ण(पाञ्चजन्य, 30 अक्तूबर, 2013)। दिल्ली को ही प्रयोगशाला बनाने की उनकी रणनीति के पीछे निम्नलिखित कारण हमें उस समय सूझे थे-
पहला, दिल्ली ही कई महीनों तक अण्णा आंदोलन का एकमात्र मंच बना रहा। इसलिए दिल्ली की युवा पीढ़ी और शिक्षित मध्यम वर्ग पर उस आंदोलन का व्यापक प्रभाव हुआ। कई वर्षों से भ्रष्टाचार की चर्चा मीडिया और राजनीति में छाये रहने के कारण पूरे राजनीतिक वर्ग के प्रति इस विशाल युवा वर्ग की वितृष्णा और आक्रोश का राजनीतिक दोहन सरल था।
दूसरा, केजरीवाल मंडली अभी तक इस राजनीतिक प्रणाली का सीधा अंग न रहने के कारण स्वयं को बेदाग और कांग्रेस व भाजपा को एक ही थाली के चट्टे-बट्टे कह सकती है।
तीसरा, अण्णा आंदोलन का रंगमंच भले ही दिल्ली रहा हो पर उसका प्रभाव पूरे भारत में फैला। भ्रष्टाचार के विरुद्ध युवा पीढ़ी का आक्रोश पूरे देश में धरनों-प्रदर्शनों और सोशल मीडिया पर प्रचार के रूप में प्रगट हुआ इसलिए अण्णा आंदोलन का आम आदमी पार्टी के नाम से राजनीतिक अपहरण हुआ तब भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति का सपना पूरा करने के लिए पूरे देश यहां तक कि विदेशों में रह रहे प्रवासी भारतीयों का युवा वर्ग ह्यआपह्ण के साथ जुड़ गया। इसलिए वे पूरे देश से यहां तक कि विदेशों से भी उन युवाओं को दिल्ली में चुनाव प्रचार के लिए जुटाने में सफल रहे। अक्तूबर में ही अरविंद केजरीवाल ने टाइम्स नाऊ चैनल पर गर्वोक्ति की थी कि उनके 7000 कार्यकर्त्ता दिल्ली में काम कर रहे हैं। बाद में योगेन्द्र यादव आदि अन्य नेताओं ने चैनलों पर कहा कि ढाई हजार से अधिक कार्यकर्त्ता दिल्ली के बाहर से आये हैं। शिकागो के डा. मनीष रायजादा ने टेलीविजन पर आकर बताया कि मैं भ्रष्टाचार राजनीति के इस प्रयोग को सफल बनाने के लिए अपनी डाक्टरी बंद करके भारत आया हूं। ऐसे अनेक प्रवासी भारतीयों के चेहरे टेलीविजन चैनलों पर आते रहे।
दिल्ली को प्रयोगशाला के रूप में चुनने का चौथा बड़ा कारण यह रहा कि दिल्ली राष्ट्रीय और अन्तररष्ट्रीय प्रचार माध्यमों का केन्द्र है। यहां सुई भी खड़कती है तो मीडिया के माध्यम से उसकी आवाज विश्व के प्रत्येक कोने में पहुंच जाती है। इसके साथ ही केजरीवाल मंडली के सभी सदस्य अन्ना आंदोलन के समय और उसके पहले से ही मीडिया में काफी चर्चित नाम रहे हैं। योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण मीडिया के लिए जाने-पहचाने नाम हैं। इन सबके मीडिया में व्यापक संपर्क हैं। इन संपर्कों का परिणाम इस पूरे चुनाव अभियान में दिखायी दिया। टेलीविजन चैनलों और प्रिंट मीडिया में जितनी खबरें और बहस आम आदमी पार्टी के बारे में हुईं उतनी किसी और पार्टी की नहीं।
अण्णा आंदोलन के पहले से ही केजरीवाल मंडली ने सोशल मीडिया पर बहुत प्रभावी नेटवर्क खड़ा कर लिया था। उसी नेटवर्क ने जंतर-मंतर और रामलीला मैदान में भीड़ जुटाने में भारी भूमिका निभायी थी, वही नेटवर्क इन चुनावों के समय काम आया।
पांचवां, दिल्ली का चरित्र शेष भारत से थोड़ा भिन्न है। यहां एक विशाल शिक्षित मध्यम वर्ग और एक विशाल वर्ग भारत के विभिन्न भागों से जीविका की खोज में आया झोपड़पट्टी निर्धन वर्ग है।
केजरीवाल मण्डली
केजरीवाल मंडली को यह श्रेय देना पड़ेगा कि उसने दिल्ली के इस चरित्र के अनुरूप अपने प्रतीकों को चुना। चुनावी राजनीति में प्रतीकों का अपना महत्व होता है। इस महत्व को पहचानकर केजरीवाल मंडली ने अपनी पार्टी के लिए ह्यआम आदमी पार्टीह्ण जैसा नाम चुना। हर समय भाषा बोली कि चुनाव हम नहीं आम आदमी पार्टी लड़ रही है। भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति के सपने पर पल रहे विश्वविद्यालयी युवा वर्ग को झुग्गी झोपडि़यों में भेजा। मैंने देखा कि मेरी सोसायटी में जो लोग ह्यआपह्ण के कार्यकर्त्ता बने उनकी प्रामाणिकता, ईमानदारी और समाजनिष्ठा संदेह से परे हैं। उन्होंने घर में काम करने वाली महिलाओं के वोटर कार्ड बनवाने के लिए दौड़ धूप की। केजरीवाल  मंडली ने पार्टी के नाम के साथ ह्यझाड़ूह्ण जैसा चुनाव चिन्ह चुना, जिसने एकदम उन्हें समाज के कमजोर वर्गों से जोड़ दिया। दिल्ली का विशाल वाल्मीकि समाज उन्हें अपना समझने लगा। इसका परिणाम हुआ कि कांग्रेस और भाजपा के सभी वाल्मीकि प्रत्याशी हार गये। मेरा परिचित एक वाल्मीकि विधायक, जिसने पिछले पांच साल में बहुत अधिक काम किया था, आप के एक ऐसे प्रत्याशी से 18000 मतों से हार गया जो वोट मांगने के लिए घर से बाहर ही नहीं निकला। उस क्षेत्र के विशाल वाल्मीकि वर्ग ने प्रत्याशी को नहीं ह्यझाड़ूह्ण को वोट दिया।
केजरीवाल मंडली ने अद्भुत कल्पनाशक्ति का परिचय देते हुए सफेद टोपी को पार्टी चिन्ह के रूप मेंअपनाकर अपनी पार्टी को प्रतीकात्मक धरातल पर गांधी जी एवं अन्ना दोनों का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। अण्णा आंदोलन के समय टोपी पर लिखा होता था ह्यमैं अण्णा हूंह्ण ह्यमैं भी अण्णा, तू भी अण्णा, हम सब अण्णाह्ण। अब यह नारा हटाकर लिखा गया ह्यआम आदमी पार्टीह्ण। सौ लोगों की भीड़ में भी आप के एक कार्यकर्त्ता की सफेद टोपी दूर से दिखायी दे जाती थी। पोलिंग बूथ में भी मैंने कई कार्यकर्त्ताओं को सफेद टोपी पहने देखा। सावधानी के लिए उन टोपियों पर कुछ नहीं लिखा था इसलिए उनका प्रवेश रोका नहीं जा सकता था।

इसके साथ ही केजरीवाल ने 70 चुनाव क्षेत्रों के लिए अलग-अलग घोषणा पत्र तैयार करने की पद्धति अपनाकर चुनाव घोषणा-पत्र का स्थानीयकरण कर दिया, उसे नगर निगम पार्षद का कार्यक्रम बना दिया।
अण्णा आंदोलन के समय देश भर में जो युवा वर्ग जुड़ा था वह विश्वविद्यालयों और आईटी सेक्टर का कर्मचारी वर्ग था। उन दिनों बेंगलूरू में आईटी सेक्टर के युवा कर्मचारियों ने एक किलोमीटर लम्बी मानव दीवार बनाकर अपने समर्थन का प्रदर्शन किया था। इस वर्ग में गुस्सा अधिक है, आत्मालोचन का भाव कम। वह मान बैठा है कि भ्रष्टाचार की जड़ वर्तमान राजनीतिक दलों में है इसलिए उसका गुस्सा वर्तमान राजनीति पर है। वह समझता है कि राजनीतिक परिवर्तन से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। उसे यह कौन समझाये कि चुनाव राजनीति से सत्ता परिवर्तन तो हो सकता है, पर व्यवस्था परिवर्तन नहीं। भ्रष्टाचार तो हम सबके भीतर घुसा बैठा है, उसे निकालने के लिए हमें भ्रष्टाचार से सम्बंध विच्छेद का संकल्प लेना होगा। उन्हें यह जानना होगा कि संकट राजनीतिक दलों का नहीं, राजनीतिक प्रणाली का है। अन्ना आंदोलन के शुरू होते ही 14 अप्रैल, 2011 को हमने लिखा था, ह्यब्रिटिश संसदीय प्रणाली से उधार ली गई भारतीय चुनाव प्रणाली ने हमारे समूचे राजनीतिक नेतृत्व और समाजजीवन को भ्रष्टाचार की कीचड़ में धकेल दिया है। इस भ्रष्ट चुनाव प्रणाली से उभरे नेतृत्व का उसमें निहित स्वार्थ होना स्वाभाविक है। (पाञ्चजन्य 24 अप्रैल, 2011) चुनाव राजनीति से सत्ता परिवर्तन तो हो सकता है पर व्यवस्था परिवर्तन नहीं। यहीं अण्णा और केजरीवाल की विचारधारा अलग हो जाती है। अण्णा का आग्रह ग्राम पंचायत स्तर पर रचनात्मक कार्य पर है तो केजरीवाल का चुनावी राजनीति के माध्यम से सत्ता परिवर्तन पर। अण्णा-केजरीवाल के इस वैचारिक अंतर को स्पष्ट करते हुए हमने 13 अक्तूबर, 2011 को अन्ना आंदोलन दोराहे पर?ह्ण शीर्षक से लिखा था ह्यआज आवश्यकता है अण्णा के अनशनों से युवा पीढ़ी में जो स्पंदन व उद्वेलन पैदा हुआ है, उसे भ्रष्टाचार मुक्त नैतिक आचरण के संकल्प यज्ञ का रूप पूरे भारत में दिया जाए। युवा पीढ़ी, जिसमें आदर्शों की छलांग लगाने का जोश व साहस है, जिसकी आंखों में उज्ज्वल भविष्य के सपने हैं, जिसका भ्रष्टाचार में कोई निहित स्वार्थ नहीं है, वही युवा पीढ़ी भारतमाता के चित्र की छाया में स्वामी विवेकानंद और गांधी जी को साक्षी करके तिरंगे ध्वज के सामने वंदेमातरम् के उदघोष के साथ भ्रष्टाचार मुक्त नैतिक आचरण का संकल्प ले सकती है।ह्ण(पाञ्चजन्य 23 अक्तूबर, 2011)
भ्रम न पाले
उस समय अण्णा आंदोलन की नकेल केजरीवाल मंडली के हाथ में थी और उसकी प्रेरणा चुनाव राजनीति में प्रवेश करने की थी इसलिए अण्णा आंदोलन स्वयं इस संकल्प यज्ञ का पुरोधा नहीं बन सकता था। किंतु बाबा रामदेव, श्री श्री रविशंकर, गोविंदाचार्य और विशेषकर अ.भा.विद्यार्थी परिषद् सहित समूचा संघ परिवार पूरे देश भर में इस प्रकार के संकल्प यज्ञों का आयोजन करके युवा पीढ़ी को नैतिक आचरण की प्रतिज्ञा के बंधन में बांध सकते थे। इस दिशा में उनकी निष्क्रियता ने ही युवा पीढ़ी को केजरीवाल की सत्ता परिवर्तन राजनीति का हथियार बनने दिया। स्वामी विवेकानंद जिन्होंने ऐसे आदर्शवादी युवकों को बार-बार आह्वान किया था जिनकी ओजस्वी वाणी आज भी युवा पीढ़ी को स्पंदित करती है, उनकी सार्द्धसती पर भी संगोष्ठियों, पुस्तकों एवं लेखों के माध्यम से शब्द रूप हिमालय तो खड़ा हुआ किंतु उनके चित्र के सामने युवाओं को संकल्प दिलाने का विचार किसी के मन में नहीं आया। अभी तो केजरीवाल मंडली पर- निंदा करके आत्मश्लाघा कर सकती है पर इस चुनाव प्रणाली के माध्यम से सत्ता की सीढि़यों पर चढ़ते ही उसे अनुभव हो जाएगा कि उनके पहले भी राजनीति में अनेक लोग ऐसे ही आदर्शवाद एवं नि:स्वार्थ भाव को लेकर राजनीति में उतरे थे पर चुनाव प्रणाली की आवश्यकताओं एवं बाध्यताओं ने उन्हें कैसे बदल डाला।
मुझे स्मरण आता है कि 1949 में संघ पर से प्रतिबंध हटने के पश्चात जब भावी कार्यनीति के बारे में संघ में आंतरिक बहस चली थी तब उत्तर प्रदेश के एक प्रचारक शिविर में, जिसमें मैं भी मौजूद था, उस समय के सरसंघचालक श्रीगुरुजी गोलवलकर ने सत्ता राजनीति की सीमाओं को बताते हुए कहा था, ह्यकांग्रेस के लोग जब सत्ता में आये तब वे कम देशभक्त और त्यागी नहीं थी, सत्ता में आने के बाद अल्पकाल में ही उनका पतन हो गया, और हमारा नहीं होगा, यह सोचना मिथ्याभिमान हैह्ण (गुरुजी समग्र, खंड 2 ध्येय दर्शन)। जनसंघ में भेजे गये अनेक आदर्शवादी कार्यकर्त्ताओं के जीवन में उनकी इस भविष्यवाणी को घटित होते हमने देखा है। केजरीवाल मंडली अपने को देवदूत समझने का भ्रम न पाले। देवेन्द्र स्वरूप (12.12.2013)  

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