|
भोर के दरवाजे से निकलकर रोज सूर्य अपनी अनन्त तेजोमयी रश्मियों से जगत को प्रभा से सराबोर करता है; तमस को दूर कर उजाले से परिचित कराता है, जो दीप्त है, उजला है, तेज से परिपूर्ण है, प्रज्ञा से आप्लावित है, सहस्र किरणों के साझे प्रदीप्त के समान है उसे धरा पर यहां से वहां बिखेरता है और इस सबमें वह किसी को कम या ज्यादा नहीं आंकता, बड़ा या छोटा नहीं समझता, लायक या नालायक नहीं मानता, सुविज्ञ या अविज्ञ की संज्ञाओं में नहीं बांधता। वह तो सबके सामने अपनी पूंजी का पिटारा खोल देता है। पर क्या सब उससे उतना ही पाते हैं, उतना ही अपने में समा लेते हैं, बराबर आत्मसात करते हैं, उस ज्ञान धारा में वैसा ही अवगाहन करते हैं? नहीं। जिसकी जैसी क्षमता है, वह उस हिसाब से उस अनन्त भण्डार से जज्ब कर लेता है। इसलिए कोई बहुत भर-भर कर, दोनों हाथों से समेट लेता है तो कोई किनका भर पाता है। जैसी पात्रता वैसा प्रसाद। या कहें जैसी जिसकी मानसिक तैयारी वैसी उसकी ग्रहण करने की पिटारी। कहने का अर्थ है, सूर्य की आभा को अंक में भरने को जो तैयार होता है वही सत्य को, सनातन को, सही को, समस्त को, सार को जान पाता है। बाकी बचे लोग सिर्फ कमियां, दोष निकालने और शिकवे-शिकायतों में उलझे अपने जीवन को ढोते जाते हैं। इसमें दोष सूर्य का नहीं, उससे भर-भर हाथ लेने से चूक जाने वाले का है। उसका आमंत्रण तो सबके लिए है।
पुस्तक ह्यसूर्य का आमंत्रणह्ण सूर्य की इसी विशिष्टता से परिचित कराते हुए अपने 50 अध्यायों के अंक में समेटे उन मूल्यों और संस्कारों की झलक पेश करती है, आगे यह पढ़ने वाले के ऊपर है कि वह उसमें से कितना समेटता है। पुस्तक की प्रस्तावना में रा़ स्व़ संघ के अ़ भा़ प्रचार प्रमुख श्री मनमोहन वैद्य लिखते हैं, ह्यसूर्य का आमंत्रण अपने मन-मस्तिष्क का कोना-कोना आनंद से, उत्साह से, संवेदनाओं की ऊंचाइयों से आलोकित कर देता है।़.़.़ सूर्य का आमंत्रण मानों संन्यासी को, साधक को, गृहस्थ को, विद्यार्थी को, सामाजिक कार्यकर्ता को, यानी सभी को अपना-अपना पाथेय देने वाली द्रौपदी का अक्षयपात्र है।ह्ण सही बात है। ह्यप्रबुद्घ चेतना के द्वारह्ण अध्याय में लेखक ने लिखा है-ह्यमनुष्य को तमोगुण के गहन अंधकार और रजोगुण के रंग-बिरंगे सपनों से बाहर आना हो तो क्या करना चाहिए? प्रकृति के राज्य में से संस्कृति के प्रदेश में जन्म लेना चाहिए। प्रबुद्घ चेतना को पाने के लिए दूसरे किसी का भी द्वार खटखटाने की जरूरत नहीं है। यह तो अपने आप का ऊर्ध्वकरण है, जो मात्र बौद्घिक विकास से नहीं होता। उसके लिए मनुष्य को समग्र भाव से ऊपर उठना चाहिए। ़.़.हम अंतर्नाद जैसे शब्दों का उपयोग करते हैं पर यह नाद या आत्मा की आवाज सुनने के लिए कितने लोग तत्पर रहते हैं?ह्ण
ह्यमुझे खोजोह्ण अध्याय में लेखक लिखते हैं-ह्यआनंद बाहर ढूंढने से नहीं मिलता। वह तो हमारे अंतर में छिपा होता है, हमें पुकार रहा होता है।़..जिसके कानों में यह आवाज पड़ जाती है, उसकी दौड़ थम जाती है।़.़.अपने अंदर की प्रभु की प्रेमातुर वाणी सुनकर ही कबीर ने कहा होगा-
चिंतामणि मन में बसै,
सोई चित्त मैं। आणि।
बिन चिंता चिंता करे
इहे प्रभु की वाणी॥
गुजराती के सुप्रसिद्घ लेखक, कवि मकरन्द भाई दवे की गुजराती भाषा में लिखी पुस्तक ह्यसूर्यनी आमंत्रण पत्रिकाह्ण दरअसल जीवन के पग-पग पर मन में उठने वाले प्रश्नों का सहज-सरल शब्दों में समाधान करती है। श्री दवे की खूबी यह है कि उन्होंने दैनिक कार्य-व्यवहार के बीच बार-बार आंखों के सामने आने के बाद भी हमारे देखने से चूक जाने वाले ये समाधान हमारे शास्त्रों, वेदों, उपनिषदों और संतों-महंतों की वाणियों से ही दिए हैं। वह भी गूढ़ भाषा में नहीं, बल्कि आसानी से समझ आने वाले शब्दों में, कथा-कहानियों के जरिए। उनकी मूल गुजराती में छपी इस पुस्तक का हिन्दी में अनुवाद किया है सौ़ मंजरी सुनील बेलापुरकर ने। मकरन्द दवे की भावधारा को उन्होंने बड़ी सहजता के साथ जस का तस रखा है, तार कहीं टूटने नहीं दिया। भाषा की स्पष्टता और सरलता, दोनों देखते ही बनती हैं। मंजरी जी ने किसी पुस्तक का पहली बार अनुवाद किया है, यह जानकर और आश्चर्य हुआ क्योंकि शुरू से अंत तक पढ़ने के बीच कहीं यह आभास नहीं होता कि यह अनुवाद उनका पहला प्रयास है। यह पुस्तक उन सभी को पढ़नी चाहिए जो बात-बात पर कहते हैं, सब है पर कुछ नहीं है; सुख-सुविधाओं के अंबार हैं, पर ह्यसुखह्ण नहीं है; पाया तो बहुत, पर जैसे कुछ ह्यपायाह्ण नहीं है। आलोक गोस्वामी
पुस्तक का नाम – सूर्य का आमंत्रण
लेखक – मकरंद दवे
अनुवाद – – सौ़ मंजरी सुनील बेलापुरकर
मूल्य – 200 रु. पृष्ठ – 167
प्रकाशक – प्रभात प्रकाशन
4/19,आसफ अली रोड
नई दिल्ली – 110002











