| दिंनाक: 07 Dec 2013 17:27:58 |
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तरुण तेजपाल को वामपंथियों की इस मदद से मेरे सामने साहित्य में वामपंथियों की गिरोहबंदी, साहित्य में वर्चस्व की स्थापना तथा अपने प्रतिकूलों-विरोधियों को ध्वस्त करने का लम्बा इतिहास जीवंत हो चुका। रूस की क्रांति के बाद लेनिन-स्टालिन के नेतृत्व में जिन देशों में वपमांथियों का आधिपत्य हुआ, वहां-वहां कम्युनिस्ट पार्टी और उसके सहयोगियों का एक गिरोह बना और उन्होंने अपने विरोधी लेखकों, कलाकारों को भयंकर यातनाएं दीं और अनेकों को मौत के घाट उतार दिया। रूस में अनेक लेखक साइबेरिया भेज दिए गए और और यहां तक कि गोर्की को भी कम्युनिस्टों के क्रोध का शिकार होना पड़ा। भारत के साहित्य-संसार में, कम्युनिस्टों ने, प्रवेश के लिए प्रसिद्ध हिन्दी-उर्दू लेखक प्रेमचंद को सीढ़ी बनाया। रूस, पेरिस, इंग्लैण्ड में लेखकों की संगोष्ठी के बाद वामपंथी लेखकों ने भारत में ह्यप्रगतिशील लेखक संघह्ण की स्थापना की और इसके प्रथम अधिवेशन के उद्घाटन के लिए प्रेमचंद को बुलाया। यह वामपंथियों की अन्तरराष्ट्रीय साजिश थी जो बहुत सोच-समझ कर बनाई गई थी। वामपंथियों ने इस घटना के बाद प्रेमचंद को ह्यप्रगतिशील लेखक संघह्ण के संस्थापक और मार्क्सवादी लेखक बना दिया, जबकि सज्जाद जहीर, मुल्कराज आनंद आदि ने जो घोषणा-पत्र प्रेमचंद को भेजा था, उसमें मार्क्सवाद की कोई चर्चा नहीं थी, न मार्क्सवादी प्रगतिशीलता की, जबकि उसमें सांस्कृतिक और राष्ट्रीय उत्कर्ष और जीवन की आलोचना का लक्ष्य था। प्रेमचंद तो आरम्भ से ही इसी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर चल रहे थे। उन्होंने बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा था कि उनका उद्देश्य देश की स्वतंत्रता और भारतीय आत्मा की रक्षा है, लेकिन किसी वामपंथी लेखक ने इसे कोई महत्व नहीं दिया और आज छह-सात दशकों बाद भी ये वामपंथी प्रेमचंद को अपने घेरे में बंद किये हुए हैं। इन वामपंथियों का छल-कपट और सिाजश अब हिन्दी संसार के सम्मुख आ चुकी है। मेरी प्रेमचंद पर तीस पुस्तकें छप चुकी हैं, जिनसे प्रेमचंद की भारतीयता वाली वास्तविक मूर्ति और वामपंथियों का कपट-जाल उजागर हो चुका है।
हिन्दी साहित्य में वामपंथियों ने प्रेमचंद को केन्द्र में रखा और प्रगतिशील साहित्य-धारा को केन्द्रीय धारा के रूप में स्थापित किया, और चूंकि ह्यप्रगतिशील लेखक संघह्ण का देश में बड़ा नेटवर्क रहा, कांग्रेसी सरकारों से राजनीतिक मदद मिलती रही, रूसी सम्मान और यात्रा के रास्ते खुले और विश्वविद्यालयों में तथा पाठ्यक्रमों एवं पुरस्कारों पर कब्जे करते गये, तो इससे इनकी शक्ति का विस्तार होता गया और साहित्य में वामपंथियों का एक मजबूत गिरोह बन गया। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय वामपंथियों का गढ़ बन गया और साहित्य ही नहीं इतिहास, संस्कृति, समाज-शास्त्र, अर्थशास्त्र आदि विषयों में वामपंथी गिरोहों का अधिकार होता चला गया। हिन्दी में मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह आदि सर्वश्रेष्ठ कवि बना दिए गए और दिनकर, नरेश मेहता, मैथिलीशरण गुप्त, प्रसाद, पंत आदि रद्दी की टोकरी में डाल दिए गए। ये वामपंथी भक्ति-काल के साहित्य को- तुलसी, सूर आदि को पाठ्यक्रमों से निकालने का प्रयत्न अब भी कर रहे हैं। जिन लेखकों ने अपने राष्ट्र, अपनी संस्कृति, अपने इतिहास और अपने परम्परागत मूल्यों को साहित्य का आधार बनाया, वे तो इनकी दृष्टि में लेखक ही नहीं हैं। नरेन्द्र कोहली, दयाप्रकाश सिन्हा, विमल लाठ, देवेन्द्र दीपक, रामशरण गौड़, देवेन्द्र आर्य, कमल किशोर गोयनका आदि तो अलेखक हैं। राजेन्द्र यादव दिवंगत हो गये, ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दें, किन्तु उन्होंने हंस का उपयोग प्रेमचंद के विचारों के प्रतिकूल किया। उन्होंने विष्णुकांत शास्त्री, विद्यानिवास मिश्र आदि की हिन्दू चेतना की असंसदीय भाषा में आलोचना की और वामपंथी छतरी के नीचे स्त्री की देह को भोग का केन्द्र बना दिया। नामवर सिंह और उनके चेले-चपाटों ने तो एक वामपंथी गिरोह ही बना लिया। जिसको ये चाहें, वह प्रोफेसर, जिसको देना चाहें वही पुरस्कृत और वही हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ लेखक। इधर शंकर शरण और सुरेश गौतम की वामपंथियों की कलुष-गाथा पर पुस्तकें आईं हैं, उन्हें देखनी चाहिएं।
वामपंथियों का तिलस्म सारे विश्व में टूट चुका है। भारत में भी राजनीतिक परिवेश में टूट चुका है और साहित्य में टूटने की प्रक्रिया में है। कार्ल मार्क्स को भारत की परिस्थितियों का ज्ञान नहीं था और ये हमारे वामपंथी भी उसी मूढ़ता में फंसे हैं। ये कैसे नासमझ हैं, देश में वामपंथ सिकुड़ गया है, वह अदृश्य हो रहा है और साहित्य में ये अपनी सत्ता बचाये रखना चाहते हैं। वामपंथी भारत में लोकतंत्र की बात कहते हैं, यह इनकी विवशता है, किन्तु प्रेमचंद ने लिखा था कि कम्युनिस्ट रूप भी ह्यविचार का साम्राज्यह्ण चाहता है। इसीलिए उन्होंने यह भी लिखा था कि साम्यवाद तो पूंजीवाद से भी भयानक है और उससे उनका मोह-भंग हो रहा था। उन्होंने घोषणा की थी कि कम्युनिज्म जब जनता के प्रतिकूल हो जायेगा तो जनता उसे बदलकर नई व्यवस्था ले आएगी। प्रेमचंद ने ह्यकैदीह्ण कहानी में लेनिन के रूसी कामरेडों के चरित्र का उद्घाटन भी कर दिया था।
वामपंथी गुटबंदी का साहित्य में अब अंत का समय आ गया है। देश में अब राष्ट्र एवं संस्कृति तथा जीवन-मूल्यों को प्रेम करने वाले लेखकों को साहित्य में अपनी भागीदारी बढ़ानी होगी और देश के कल्याण और विकास के लिए आगे आना होगा। कमल किशोर गोयनका