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पिछले दिनों दिल्ली की एक अदालत ने अनुसूचित जाति से संबंधित एक व्यक्ति को आपत्तिजनक शब्द कहने का दोषी मानते हुए 4 लोगों को 6 महीने की कैद और 2 हजार रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई। लेकिन देश का दुर्भाग्य है कि जहां अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के सम्मान की रक्षा के लिए कानून बनाया जाता है, वहीं देश के भविष्य (छात्रों) को ऐसे शब्द सिखाए जाते हैं। बाकायदा पुस्तकों में 'चमार', 'भंगियों' एवं जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। यह शब्द वर्ग विशेष के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाले हैं इसलिए इन शब्दों को पुस्तकों से हटाया जाए, ऐसी मांग वाली याचिका बीते दिनों दिल्ली की एक जिला अदालत में दाखिल की गई।
दिल्ली की साकेत अदालत में दाखिल याचिका में याचिकाकर्ता ने कहा है कि कक्षा 9 और 11 की हिन्दी की पुस्तकों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों की मानहानि और अपमान करने वाले शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। इसलिए इन शब्दों को पुस्तकों से हटाया जाए। याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायाधीश ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सचिव के माध्यम से केन्द्र सरकार, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद एवं केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड को आदेश जारी कर इस संबंध में स्पष्टीकरण मांगा है।
याचिकाकर्ता ने याचिका में कहा है कि कक्षा 11 की हिन्दी की पुस्तक 'अंतरा' के 'खानाबदोश' अध्याय में 'अपने काम से काम रखो। क्यों इन चमारों के चक्कर में पड़ते हो', 'बामन तेरे हाथ की रोटी खावेगा क्या। अक्ल मारी गई क्या तेरी' आदि आपत्तिजनक बातें पढ़ाई जा रहा हैं। इसी तरह कक्षा 9 की हिन्दी की पुस्तक 'स्पर्श' में एक अध्याय के अंतर्गत 'कैसे यह अछूत भीतर आया' छात्रों को पढ़ाया जा रहा है। इन दोनों पुस्तकों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों की भावनाओं को आहत करने वाले शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है ऐसी बातों को छात्रों को पढ़ाकर छात्रों के बीच कटुता एवं विद्यालय का माहौल खराब हो सकता है। इसलिए इन शब्दों को पुस्तकों से हटाया जाना चाहिए। इन शब्दों को न केवल पुस्तकों से हटाया जाए, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में पुस्तकों में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।
हिन्दी की पुस्तकों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों के लिए अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल के अलावा अनेक आपत्तिजनक और बच्चों पर दुष्प्रभाव डालने वाले शब्दों का उपयोग किया गया है। शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'शिक्षा का चीर-हरण' में हिन्दी की पुस्तकों में प्रकाशित सारहीन और संस्कार विहिन शब्दों का संकलन किया गया है। पुस्तक में बताया गया है कि हिन्दी की पुस्तकों में छात्रों को 'उल्लू कहीं का', 'कमबख्त', 'लुच्चे-लफंगे', 'बदमाश', 'क्या में एक साले को भी नहीं पकड़ पाउंगा' आदि शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। पुस्तक में यह भी बताया गया है कि हिन्दी की पुस्तक में अंग्रेजी की कविता बच्चों को पढ़ाई जा रही है। साथ ही फारसी, उर्दू और अंग्रेजी के जो शब्द छात्र समझ भी नहीं सकते उन शब्दों का हिन्दी की पुस्तकों में खुलकर इस्तेमाल हुआ है।
हिन्दी की पुस्तकों में आपत्तिजनक एवं छात्रों पर बुरा प्रभाव डालने वाले शब्दों की भरमार के अलावा इतिहास की पुस्तकों में भी देश के इतिहास को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया है। हालांकि पुस्तकों में विकृत इतिहास के जो मामले न्यायालय के सामने रखे गए उनमें से बहुतों को न्यायालय ने हटाने के आदेश दे दिए। इतिहास की पुस्तकों में स्वतंत्रता सेनानियों- बाल गंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पाल तथा लाला लाजपत राय को उग्रवादी कहा गया। भगत सिंह को आतंकवादी बताया गया। देश पर आक्रमण करने वालों को धार्मिक नेता बताया गया। कुछ समय पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास विषय के अंतर्गत छात्रों को पढ़ाए जाने वाले ए.के. रामानुजन के लेख 'तीन सौ रामायण' 'पर खूब हंगामा हुआ। इस लेख में रामायण को गलत ढंग से परिभाषित किया गया था। इसमें बताया गया था कि रावण को राम ने नहीं लक्ष्मण ने मारा था। माता सीता के रावण और लक्ष्मण के साथ अवैध संबंध थे।
बदलो ऐसी शिक्षा
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में बदलाव के लिए अनेक सामाजिक संगठनों ने कई बार मांग उठाई है। गत 24 मार्च को दिल्ली में 'शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन' विषय पर व्याख्यान हुआ, जिसमें एक बार फिर शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन की पुरजोर मांग उठी। दीनदयाल शोध संस्थान के संस्थापक स्व. नानाजी देशमुख की स्मृति में आयोजित तृतीय नानाजी स्मृति व्याख्यान में मुख्य वक्ता के रूप में गुजरात विद्यापीठ के उपकुलपति डा. सुदर्शन आयंगार थे, जबकि अध्यक्षता लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष श्रीमती सुषमा स्वराज ने की। वक्ताओं ने अपने उद्बोधन में कहा कि जो शिक्षा स्वतंत्रता सेनानियों को आतंकवादी और उग्रवादी बताती हो और छात्रों को अपशब्द (गालियां) सिखाती हो उस शिक्षा को बदला जाना जरूरी है।
पिछड़े वर्ग के लोगों की भावनाएं आहत करने वाले शब्दों के अलावा हिन्दी की पुस्तकों में और भी अनेक आपत्तिजनक शब्दों की भरमार है जिनसे छात्रों पर बुरा असर पड़ेगा। ज्ञान छात्रों को शिष्ट बनाता है, लेकिन क्या ऐसे ज्ञान से छात्र संस्कारवान बन पाएंगे? ऐसी शिक्षा व्यवस्था में बदलाव करना ही होगा।
–दीनानाथ बत्रा, संयोजक, शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति
पुस्तकों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए अपमानजनक शब्दों का होना अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 का खुला उल्लंघन है। इसलिए इन शब्दों को पुस्तकों से हटाना ही चाहिए।
-मोनिका अरोडा, अधिवक्ता











