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इन्होंने जाना संघ क्या है

Written byArchiveArchive
Mar 9, 2013, 12:00 am IST
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इन्होंने जाना संघ क्या है

दिंनाक: 09 Mar 2013 12:35:34

तुष्टीकरण की नीति के चलते इस्लामी आतंकवाद के समानांतर भगवा आतंकवाद का जुमला सोनिया कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने उछाला और चिदम्बरम ने स्थापित करने की कोशिश की। गांधी की कांग्रेस से सोनिया की कांग्रेस तक की यात्रा में इतना अंतर आया कि गांधी जी ने संघ के शिविर को देखकर कहा कि ऐसा अच्छा दृश्य कहीं नहीं दिखा तो आज सोनिया कांग्रेस के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे को संघ के शिविरों में आतंकवाद का प्रशिक्षण मिलता दिख रहा है।

रा.स्व.संघ के संस्थापक डा. केशव बलिराम हेडगेवार एक क्रांतिकारी तथा कांग्रेस के संगठक रहे थे। उन्होंने गांधी जी के आह्वान पर असहयोग आंदोलन तथा 1931 में जंगल सत्याग्रह में भाग लिया तथा जेल भी गए। ब्रिटिश गुप्तचरों की सूची में उनका नाम मध्य भारत- 114 नम्बर पर दिया गया है। संघ के इतिहास में उसके स्वयंसेवकों का पहला प्रशिक्षिण शिविर 1927 में लगा था, जो दो महीने का था। 1937 से प्रांतों में प्रशिक्षिण शिविर प्रारंभ हुए तथा उस वर्ष लाहौर, पूना तथा नागपुर में शिविर लगे। 1940 में केवल असम, उड़ीसा तथा जम्मू-कश्मीर छोड़कर देश के सभी प्रांतों में प्रशिक्षण वर्ग लगे। 1943-1944 में देश के सभी 11 प्रांतों में शिविर लगे। प्रत्येक शिविर में संघ के स्वयंसेवकों की संख्या तेजी से बढ़ती गई। 1945 में यह संख्या 10,000 तक पहुंच गई। स्वाभाविक है ब्रिटिश सरकार संघ के बढ़ते प्रभाव से विचलित हुई। गुप्त सरकारी दस्तावेजों से 1943-44 में 11 प्रांतों में हुए संघ-शिविरों की पूरी जानकारी मिलती है। इन प्रशिक्षण शिविरों में श्री गुरुजी तथा अन्य प्रमुख विचारकों के भाषणों के सारांश भी दिये गए हैं। इनमें मुख्य रूप से छुआछूत दूर करने, हिन्दुओं में एकता स्थापित करने, भारतीय स्वतंत्रता के लिए प्राणोत्सर्ग करने के लिए तैयार रहने तथा अंग्रेजों के व्यवहार को असहनीय बताते हुए अपने देश की स्वतंत्रता के लिए कटिबद्ध रहने के लिए कहा गया था। अंग्रेज सरकार ने संघ को पहले साम्प्रदायिक कहा, पर गहरी छानबीन तथा गृह विभाग से जिला स्तर की रपटों तथा विश्वकोशों की परिभाषाओं का अध्ययन कर स्वयं ही इस आरोप को गलत माना। ब्रिटिश सरकार ने  पहले संघ की वेशभूषा तथा 'परेड़' पर ऐतराज जताया, परंतु बाद में उसे भी वापस लेना पड़ा।

जब ब्रिटिश सरकार के संघ को कुचलने के प्रयास असफल रहे तब तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गर्वनर जैकिन्सन तथा पंजाब के प्रीमियर (मुख्यमंत्री) खिज्र हयात खां ने 24 जनवरी, 1947 को केन्द्र से बिना पूछे पंजाब में रा.स्व. संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। यह वह समय था जब ब्रिटिश सरकार को हिन्दू शिविरों के तेजी से बढ़ने के समाचार मिल रहे थे। परिस्थितियों को भांपते हुए भारत मंत्री पैंटिक लारेंस ने भारत के वायसराय लार्ड वेवल से जानकारी ली। परिणामस्वरूप पंजाब के गवर्नर तथा प्रीमियर को फटकार पड़ी तथा पांच दिन बाद ही प्रतिबंध का आदेश वापस लेना पड़ा।

संघ तथा असली कांग्रेस

वस्तुत: विभाजन से पूर्व गांधी जी की कांग्रेस के अनेक प्रसिद्ध नेताओं ने संघ को अत्यंत निकट से देखा तथा उसके विस्तार तथा विकास हेतु समर्थन व  शुभकामना दी। 1927 में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से डा.हेडगेवार की भेंट हुई थी। तब डा.साहब ने उन्हें संघ का तत्व ज्ञान समझाया था। नेता जी को लगा था कि संघ भारत में पुनर्जीवन का मार्ग बन सकता है। 1940 में नेताजी पुन: नागपुर आये पर उस समय डा. हेडगेवार अस्वस्थ थे, नेताजी जल्दी में थे, इसलिए उनसे बिना मिले ही चले गए। अप्रैल, 1929 में पं. मदन मोहन मालवीय नागपुर स्थित मोहिते के बाड़े में संघ की शाखा पर आए। अपने भाषण में उन्होंने कहा, 'अन्य संस्थाओं के पास बड़ी बड़ी इमारते हैं और बहुत-सा कोष है, पर तुम्हारे संघ में मनुष्य बल अच्छा है, यह देखकर मुझे आनंद हुआ।' बाद में मालवीय जी ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में ही संघ का कार्यालय बनाने की स्वीकृति दी।

दिसम्बर, 1934 में जब वर्धा में संघ का शिविर लगा हुआ था। उसके पास ही सत्याग्रह आश्रम में ठहरे गांधी जी को शिविर देखने की उत्सुकता हुई। वहां उन्होंने ब्राह्मण, महार, मराठे-सभी को एक साथ भोजन करते देखा। गांव के किसान तथा मजदूर भी देखें। गांधी जी ने भगवा ध्वज को संघ के ढंग से प्रणाम किया। गांधी जी बोले, 'मैं सचमुच प्रसन्न हूं। इतना प्रभावी दृश्य मैंने अभी तक कहीं नहीं देखा अगले दिन डा.हेडगेवार उनसे मिलने गए। गांधी जी ने अपने पूर्व दिवस का वर्णन करते हुए कहा, 'डाक्टर जी, अपने चरित्र तथा कार्य पर अटल निष्ठा के बल पर आप अंगीकृत कार्य में निश्चित सफल होंगे।' इसके अनेक वर्षों बाद जब विभाजन के कालखण्ड में समस्त पंजाब में दंगे हो रहे थे, तब गांधी जी की इच्छा पर श्री गुरुजी उनसे मिलने दिल्ली गए। यह भेंट 12 सितम्बर, 1947 को हुई। गांधी जी ने मिलते ही कहा 'मेरी अब कोई सुनता ही नहीं।' श्री गुरुजी की बातों से संतुष्ट होकर 16 सितम्बर को, 1947 उन्होंने स्वयंसेवकों के सम्मुख कहा 'डा. हेडगेवार के जीवन काल में मैंने वर्धा में संघ का शिविर देखा था। उसके बाद से अब संघ बहुत बढ़ गया है। यह मानी हुई बात है कि उच्च सेवा के ध्येय तथा त्याग की भावना से प्रेरित कोई भी संगठन शक्तिशाली ही बनेगा।'

स्वतंत्र भारत के पहले गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल भली भांति जानते थे कि संघ यदि सचेत व मदद न करता तो 10 सितम्बर, 1947 को दिल्ली के लालकिले पर मुस्लिम लीग का झंडा फहरा रहा होता। उन्होंने पाकिस्तान से आये पीड़ितों के प्रति संघ के स्वयंसेवकों की नि:स्वार्थ सेवा को भी देखा था। साथ ही कश्मीर में कबाईलियों के अचानक आक्रमण के समय स्वयंसेवकों के बलिदान की जानकारी भी थी। उन्होंने 6 जनवरी, 1948 को लखनऊ में अपने भाषण में कहा था, 'संघ के लोग स्वार्थ के लिए झगड़ने वालों में से नहीं हैं। वे तो अपनी मातृभूमि से प्रेम करने वाले देशभक्त हैं।' 1975 में श्रीमती इन्दिरा गांधी के अधिनायकवाद के विरुद्ध सम्पूर्ण क्रांति के प्रणेता श्री जयप्रकाश नारायण ने बहुत समय पूर्व, जब उनका संघ से निकट का संबंध भी नहीं था, 1948 में काशी में 'साम्प्रदायिकता विरोधी सप्ताह' का उद्घाटन करते हुए कहा था, 'संघ के स्वयंसेवकों की अनुशासनप्रियता, चारित्र्य, दृढ़ता तथा प्रेम सचमुच में प्रशंसनीय है। संघ ने समाज के लिए पर्याप्त ठोस काम किया है और इसीलिए अभी तक टिका हुआ है। कानून से हम उसे बंद नहीं कर सकते।'

प्रसिद्ध विद्धान श्री कन्हैयालाल माणिक लाल मुंशी संघ के कार्यों से अत्यधिक प्रभावित थे। उन्होंने लिखा था, 'देश-विभाजन के दुर्दिनों में संघ के नवयुवकों ने पंजाब और सिंध में अतुलनीय वीरता प्रकट की। उन नवयुवकों ने आततायी मुसलमानों का सामना कर हजारों स्त्रियों व बच्चों के मान और जीवन बचाये, अनेक नवयुवक इस कर्तव्य पालन में काम आये।'

नकली कांग्रेस और संघ

पर इसके साथ यह भी सत्य है कि गोविंद सहाय जैसे गपोड़ ने संघ का 'फासीस्ट' कहना शुरू किया था। यहां तक की पंडित नेहरू, जो अपने को संयोग से हिन्दू मानते थे, संघ विरोध में आगे आये तथा संघ को 'साम्प्रदायिक' कहने लगे थे। इससे भी अधिक खतरा उन्हें सरदार पटेल के गुट से हो रहा था, जिसका कांग्रेस संगठन पर पूरा नियंत्रण था। दुर्भाग्य से 30 जनवरी, 1948 को गांधी जी की हत्या कर दी गई थी। नेहरू गुट को अवसर मिल गया। नेहरू और पटेल दोनों गुटों में परस्पर कटु विवाद के बाद ही 4 फरवरी, 1948 को संघ पर प्रतिबंध लगाया गया। लगभग बीस हजार स्वयंसेवक बंदी बनाये गये थे। संघ पर प्रतिबंध लगा देख देश के अनेक राष्ट्रवादी नेता स्तंभित हो गये। जिन्हें भारत रत्न मिला, ऐसे कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता डा.भगवान दास ने 1948 में ही इसका विरोध किया। उन्होंने कहा, 'उत्साह तथा बलिदानों की भावना से भरे इन नवयुवकों ने उस समय उस षड्यंत्र (10 सितम्बर, 1947) की सूचना न दी होती तो आज के भारत का अस्तित्व  ही न होता।' 15 सितम्बर, 1948 को दिल्ली में श्री विनोबा भावे ने लिखा, 'मुझे पूरा विश्वास है कि संघ के कार्यकर्तायों के बारे में गलत धारणा दूर होगी, जोकि उच्च आदर्शों तथा स्वयं त्याग से प्रेरित हैं।'

प्रतिबंध न हटने पर 9 दिसम्बर, 1948 से संघ का सत्याग्रह प्रारंभ हुआ तब 12 जुलाई 1949 को बिना किसी शर्त के प्रतिबंध हटा लिया गया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार सत्याग्रह में 60,000 स्वयंसेवकों ने भाग लिया जबकि संघ के अनुसार इसमें 90,000 लोगों ने भाग लिया। संघ गांधी जी हत्या के झूठे आरोप में पूर्णत: निर्दोष साबित हुआ।

बहरहाल, प्रतिबंध हटने के बाद संघ पुन: सांस्कृतिक तथा राष्ट्रोत्थान के अपने कार्य में लग गया। चीन द्वारा भारत पर हमले के बाद 1963 में पं. नेहरू के अनुरोध पर संघ ने 26 जनवरी की गणतंत्र दिवस परेड में भाग लिया।  1965 के पाकिस्तान के साथ युद्ध के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री संघ के सरसंघचालक श्री गुरुजी एवं सरकार्यवाह श्री एकनाथ रानाडे तथा श्री गुरुजी से मिलते रहे तथा ताशकंद जाने से पूर्व भी उनसे वार्ता की। श्रीमती इंदिरा गांधी ने कांग्रेस में परस्पर फूट तथा राजसत्ता छूट जाने के डर से जब आपातकाल लगाकर लोकतंत्र को कलंकित किया तब उसके विरोध में संघ के स्वयंसेवकों की भागीदार विश्व में हुए किसी भी आंदोलन से अधिक थी। संघ के इस पूरे इतिहास में एक भी घटना ऐसी नहीं है जिससे उसकी या हिन्दू समाज की आतंकवादी घटना कहा जा सके। कांग्रेस सरकार ने एन.आई.ए. की मदद से कुछ हिन्दुओं को कुछ आतंकवादी घटनाओं में आरोपी बनाकर जेलों में भले बंद कर रखा है, पर उनके खिलाफ भी कोई ठोस सुबूत नहीं हैं और न ही किसी न्यायालय में उन्हें दोषी सिद्ध किया जा सका है। हां, यह अवश्य है, कि जब भी कांग्रेस में परस्पर की फूट बढ़े या राजसत्ता खिसकती दिखे, तो कांग्रेस के नेताओं को दौरा-सा पड़ जाता है। वे मुस्लिम वोट को संघ के लिए साम्प्रदायिक, गांधी जी का हत्यारा या फासीस्ट जैसे उपमा देते हैं, फिर माफी मांगते हैं। पर मुस्लिम वोटों की लिप्सा ऐसी है कि आदमी को फिर सूर्य पर थूकने को विवश कर देती है, जो उसी के मुंह पर आकर गिरता है।

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