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नागालैण्ड के अलगाववादी संगठन नेशनल काउंसिल आफ नागालैण्ड (आइजक-मुइवा) के इशारे पर गत 12 व 13 जनवरी को दिल्ली के इंडियन इस्लामिक सेंटर में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया था। इंडियन सिविल सोसाइटी आर्गेनाइजेशन के बैनर तले आयोजित इस संगोष्ठी में इसके संयोजक ई. दीन दयालन ने अलगाववादी गुट से केन्द्र सरकार की वार्ता को सार्थक बताते हुए एनएससीएन (आईएम) की अधिकांश मांगों का समर्थन किया। दीन दयालन ने 2 पृष्ठों का एक प्रस्ताव संगोष्ठी में रखा, जिस पर दो दिन तक विचार-विमर्श हुआ। अधिकांश वक्ताओं ने मुइवा की अलगाववादी मांगों का समर्थन किया और केन्द्र सरकार से उसे मान लेने की गुहार लगायी। वस्तुत: इस संगोष्ठी का उद्देश्य केन्द्र सरकार पर दबाव बनाना तो था ही, 23 फरवरी को होने जा रहे नागालैण्ड विधानसभा चुनावों में नेशनल पीपुल्स फ्रंट के लिए माहौल तैयार करना भी था। हालांकि केन्द्र सरकार ने शांति वार्ता के बीच मुइवा को स्पष्ट बता दिया है कि नागालैण्ड की आजादी तथा मणिपुर, असम व अरुणाचल प्रदेश के नागाबहुल स्थानों व जिलों को मिलाकर 'वृहत्तर नागालैण्ड' का निर्माण किसी भी प्रकार से संभव नहीं है। किन्तु नागालैण्ड बैप्टिस्ट काउंसिल आफ चर्चेज (एनबीसीसी) इसे मानने के लिए तैयार नहीं है। वह नागालैण्ड को भारत से काटकर अलग देश बनाने के षड्यंत्र में जुटा हुआ है। नागा होहो (संगठन), फोरम फार नागा रिकन्सिलेशन (नागा समझौता मंच) तथा नागालैण्ड का राजनीतिक दल नागा पीपुल्स फ्रण्ट- ये एनएससीएन-(आईएम) के अग्रिम संगठन हैं जो नागा समस्या के समाधान के लिए बड़े बेचैन दिखाई दे रहे हें। वे चाहते हैं कि 23 फरवरी को होने वाले विधानसभा चुनाव के पूर्व ही मुइवा की मांग मान ली जाए, ताकि इसका श्रेय लेकर नागा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) चुनावी लाभ उठा सके। टी. मुइवा और इसाक चिसू कश्मीर की तरह अलग झंडे एवं भारतीय संविधान में विशेष प्रावधान बनाकर ऐसी स्वायतत्ता की मांग कर रहे हैं जिसके प्राप्त हो जाने पर नागालैण्ड भारत-विरोधी देशों- जैसे चीन, पाकिस्तान, बंगलादेश व अमरीका, ब्रिटेन सहित सभी ईसाई देशों से अपना राजनीतिक एवं व्यापारिक संबंध स्वतंत्र रूप से स्थापित कर सकेऔर भारत सरकार पंगु बनी रहे, वह कुछ भी न बोल सके। फीजो व मुइवा के आतंकवाद व अलगाववाद तथा नागाओं के ईसाई-मतांतरण को चर्च तथा उसके आतंकवादी संगठन 'नागाओं का विशिष्ट इतिहास' की संज्ञा देकर नागा समाज को शेष भारत से एकदम अलग प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं। वास्तव में, उत्तर पूर्व में कार्यरत सभी आतंकवादी संगठनों की शक्ति तथा प्रेरणा का स्रोत चर्च ही है, धन-स्रोत भी वही है।
माओवादी मुइवा का ईसाई रूपान्तरण
फीजो के शिलांग समझौते (1975) को मुइवा ने नहीं माना था और वह अपने साथियों के साथ चीन भाग गया था। शस्त्र प्रशिक्षण तथा चीनी साम्यवाद में प्रशिक्षित होने के बाद उसने 1980 में एनएससीएन तथा सन् 1988 में खापलांग गुट के अलग हो जाने पर एनएससीएन (आईएम) बनाया और सभी शीर्ष पदों पर तांग्खुल पदाधिकारियों को बैठाया। मुइवा खुद मणिपुर के उखरूल जिले के सोमदल गांव का रहने वाला एक तांग्खुल नागा है। इसने नागालैण्ड लौटकर गैरतांग्खुल नागाओं का जो सामूहिक नरसंहार किया, वह इतना भयावह है जिसका वर्णन भी नहीं किया जा सकता। इसने मोन व ट्वेनसांग जिले के 300 चर्चों को जला दिया और कई हजार फीजो समर्थकों की नृशंस हत्या करवा दी। चर्चों को इसलिए जलवा दिया तथा पादरियों व नागा नेशनल काउंसिल (एनएनसी) के गोरिल्लाओं को इसलिए मरवा दिया क्योंकि उस समय वह एक माओवादी नेता बन गया था। सन 1980 सन 2005 तक इसने खुला नरसंहार किया, किन्तु इसकी चाल नहीं चली और वह अपने षड्यंत्र में स्वयं फंसता चला गया। चीन ने भी उसे अपेक्षित मदद नहीं की। घूम-घामकर, विवश होकर मुइवा को अब कट्टर ईसाई होने का ढोंग रचना पड़ रहा है। वैसे तो चर्च मुइवा के विश्वासघात से आहत है, किन्तु ईसाई मिशनरियों को कोई विकल्प नहीं मिल रहा है, इसलिए विवश होकर वह मुइवा के पक्ष में अपना पूर्ण समर्थन झोंक रहा है, क्योंकि नागालैण्ड को भारत से अलग कर एक ईसाई देश के रूप में दक्षिण पूर्व एशिया में स्थापित करना चर्च का पहला एजेण्डा है। इसे प्राप्त करने के लिए नैतिक-अनैतिक, अहिंसा-हिंसा, कुछ भी करने के लिए चर्च सदैव तत्पर रहता है।
अपनी ईसाइयत को प्रमाणित करने के लिए मुइवा भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा है। बाइबिल सदा उसके पास रहती है, नियमित रूप से चर्च जाता है और भाषण देते समय ईसाई प्रचारकों के समान प्रेज द लार्ड (ईश्वर को स्मरण करो) और हेलोलुइया का उच्चारण करवाता है। उसके 'लेटर पैड' पर 'नागालैण्ड फॉर क्राइस्ट' छपा रहता है। जब वह चीन से वार्ता करता है तो कट्टर माओवादी के समान खुद को प्रस्तुत करता है और जब अमरीका, ब्रिटेन तथा अन्य ईसाई देशों से मदद मांगता है तो वह खुद को समर्पित तथा संकल्पबद्ध ईसाई प्रचारक एवं अमरीका के पोषित हित-चिंतक के रूप में प्रस्तुत करता है।
चर्च का पाखण्ड
नागालैण्ड व मणिपुर के स्थानीय नागा प्रमुख बताते हैं कि मुइवा ने मुम्बई के शेयर बाजार में छद्म नामों पर सैकड़ों करोड़ रुपए का निवेश किया है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों में भी इसने अपना धन लगाया है। अन्तरराष्ट्रीय चर्च संगठनों जैसे वर्ल्ड काउंसिल आफ चर्चेज, वर्ल्ड विजन तथा बैप्टिस्ट वर्ल्ड एलाएंस आदि से भी यह खूब पैसा ऐंठता है। इसके बदले यह चर्च प्रचारक और भारत का शत्रु बना हुआ है। मुइवा को दंडित करने के स्थान पर मूर्खतापूर्ण ढंग से केन्द्र सरकार अफजल गुरु के समान मुइवा को भी दीमापुर के पास हेब्रान कैंप में रखकर घी-मलाई खिला रही है और उसकी सुरक्षा में भारतीय सेना को लगा रखा है। सन 2005 में मुइवा ने अपने अध्यक्ष आइजक चिसू के मुंह से अमरीका के बोरेविली हिल्स नामक स्थान पर भाषण दिलाते समय यह घोषणा करवा दी कि निकट भविष्य में एनएससीएन (आईएम) दस हजार नागा ईसाई मिशनरियों की एक सेना खड़ी करेगा, जो भारत, नेपाल, भूटान, म्यांमार एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देशों में ईसाई प्रचार का कार्य करेंगे। मुइवा के इस नवीन अवतार को देखकर तथा उसके मिशन को सुनकर चर्च गद्गद् है और मुइवा के आतंकवाद का समर्थन कर रहा है। मुइवा की इस चाल को केन्द्र सरकार, स्वार्थी राजनीतिक दल, कुछ सेकुलर व गैर-सरकारी संगठन एवं पाखंडी मानवाधिकारवादी व्यक्ति भले न समझते हों अथवा स्वार्थ के वशीभूत अन्धे होने का स्वांग रचते हों, किन्तु नागा समाज का बड़ा वर्ग जिनकी आयु 25-45 वर्ष है, मुइवा व चर्च की चाल को खूब समझ रहा है। आज से 10-12 वर्ष पूर्व जब आतंकवाद अपनी चरम-सीमा पर था तब आहत नागा समाज बंदूक के भय से चुपचाप आहें भर रहा था। आज का नागा युवा वर्ग उससे अज्ञात नहीं है। जहां मुइवा सहित उसके बन्दूकधारियों की कलई खुल गई है और चर्च नेताओं की बेईमानी उजागर हो गई है, वहीं उसे अनेक कमजोरियों के बावजूद भारत की महानता का आभास हो गया है। मुइवा की गोलियों से जिन बच्चों के पिता अथवा बड़े भाई मारे गये थे, उनकी मां अथवा बहन विधवा हो गई थीं, वे बच्चे अनाथ हो गये थे, आज वे जवान हो चुके हैं और मुइवा को कच्चा खा जाने की ताक में हैं। वे चर्च के पाखंडियों को भी नहीं छोड़ रहे हैं। निर्भय होकर वे उनको महाबेईमान और पाखंडी बता रहे हैं।
भारत भक्त नागा समाज
नागालैण्ड के पूर्वी चार जिलों- मोन, ट्वेनसांग, लांगलेंग तथा किफिरे को सीमान्त नागालैण्ड के नाम से अब संबोधित किया जाने लगा है, क्योंकि यहां बसने वाली नागा जातियों- कोन्याक, चाड्, साड्तम, फोम, चिमचिंगुर और खेमुंगन सीमांत नागालैण्ड के नाम से अलग नागा प्रदेश की मांग कर रहे हैं। वहां मुइवा तथा एनएससीएन (आईएम) के आतंकवादियों का प्रवेश वर्जित है। पेरेन जिला के जेलियांगरांग नागा भी आहत हैं, जहां रानी मां के सैनिकों तथा हरक्का अनुयायियों को गोलियों से भून डाला गया था, उन्हें गोलियों की नोक पर ईसाई बनाया गया था। यहां तक कि मुइवा के आतंकवादी छवि के कारण आज का तांग्खुल नागा अपनी पहचान बताने में शर्म करने लगा है। वे मुइवा को कोसते हैं।
कोहिमा, मोकोक्चुंग, जोनोबोतो, वोखा व फेक जिलों के नागा-अंगामी, आओ, सेमा लोथा व चाखेसाड् भी मुइवा की असलियत जानते हैं। वे शिक्षित हैं, धनी हैं और प्रदेश की राजनीति एवं शासन-प्रशासन में हावी हैं। वे मुइवा को घास नहीं डालते, उसकी परवाह नहीं करते और अपने क्षेत्र में आने भी नहीं देते। डा. एस.सी. जमीर नागालैण्ड के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे हैं। वे भारत की अखण्डता एवं सार्वभौमिकता के पुजारी हैं, कांग्रेसी हैं किन्तु कट्टर राष्ट्रवादी हैं। उन्होंने सन् 2000 में 16 पृष्ठ की पुस्तिका 'नागा समाज की आधारशिला' लिखी और हजारों की संख्या में पूरे नागालैण्ड में मुफ्त बंटवायी, जिससे मुइवा के आतंकवादी आन्दोलन की हवा निकल गई और मुइवा का झूठ उजागर हो गया। उसने श्री जमीर को मारने के लिए पांच बार जानलेवा आक्रमण करवाए, अपनी 'हिट-लिस्ट' में जमीर का नाम नं. 1 पर लिखवाया। सन् 1998 में नई दिल्ली के नागालैण्ड हाउस में एनएससीएन (आईएम) ने श्री जमीर के शरीर को ए.के. 47 की गोलियों से छलनी करने की कोशिश की, वर्ष 2002 में राजपथ सं. 39 पर पिफेमा और मेदजी फेमा के बीच जमीर के काफिले पर 14 शक्तिशाली बम विस्फोट करके जान लेने का प्रयास किया, किन्तु श्री जमीर बच निकले।
नागालैण्ड के युवक अब 'मुइवा एण्ड कम्पनी' के इन अपराधों को याद कर उसे कोस रहे हैं। उनका मानना है कि मुइवा जब तक जीवित रहेगा तब तक नागालैण्ड में शांति नहीं आयेगी। इसलिए वे मन ही मन प्रार्थना कर रहे हैं कि भगवान जल्दी से उसको अपने पास बुला ले ताकि नागालैण्ड में पुन: शांति आ सके। किन्तु चर्च नेता मुइवा की ही भाषा बोल रहे हैं। अब तक के अपने सभी प्रयासों में मार खाने के बाद अब मुइवा ने दिल्ली में सभी सांसदों, विधि विशेषज्ञों, सत्ताधारी एवं विपक्ष के राजनीतिक नेताओं, मानवाधिकारवादियों, देशी एवं विदेशी चर्च संगठनों, छद्मवेशी गैरसरकारी संगठनों एवं समर्थक व्यक्तियों से व्यापक संपर्क अभियान शुरु कर दिया है। संसद में अपनी राष्ट्रविरोधी एवं अलगाववादी मांगों का समर्थन करने के लिए सांसदों का समर्थन प्राप्त करने के प्रयास में भी चर्च जुटा हुआ है।











