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मकर संक्राति के दिन गंगा सागर में स्नान को अति प्रभावशाली माना गया है। प्राचीन काल से ही गंगा सागर के विषय में एक उक्ति प्रसिद्ध है 'सारे तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार'। इस उक्ति को कहे जाने के पीछे कारण यह रहा है कि गंगा सागर आरंभ से ही दुर्गम तीर्थों की श्रेणी में गिना जाता रहा है। गंगा, हुगली व बारामती नदी के विशाल डेल्टा व समुद्र के बीच एक द्वीप पर स्थित इस तीर्थ तक जाना प्राचीन काल में बिल्कुल भी सहज नहीं था। भारी चक्रवातों व समुद्री तूफानों से इस द्वीप व यहां आने के रास्ते को सदा से भारी क्षति पहुंचती रही है। परन्तु आज स्थितियां पहले जैसी नहीं रहीं। यातायात के साधनों का समुचित विकास होने से यहां वर्ष में कभी भी आया जा सकता है। हालांकि इस द्वीप व आसपास के क्षेत्र को आज भी समुद्र धीरे-धीरे निगल रहा है। यहां आने के लिए सर्वप्रथम कोलकाता महानगर पहुंचें। यहां से विभिन्न वाहनों, बसों इत्यादि द्वारा डायमंड हार्बर (60कि.मी.) व नूतन रास्ता (40कि.मी.) होते हुए लट नम्बर 8 तक आना होता है। लट नम्बर आठ वास्तव में वह समुद्री किनारा या बंदरगाह है जहां से छोटे समुद्री स्टीमर सागरद्वीप नामक टापू के कचुबेडिया घाट तक यात्रियों को ले जाते हैं। कचुबेडिया उसी द्वीप का एक किनारा है जहां कपिल मुनि का मंदिर व गंगा सागर का मुख्य समुद्री तट है जहां स्नान का महत्व है। कचुबेडिया से द्वीप के दूसरे छोर पर स्थित मंदिर की दूरी 30 कि.मी. है। यहां तक आने के लिए स्थानीय स्तर पर वाहन उपलब्ध हो जाते हैं। यात्री इन वाहनों से मंदिर तक आसानी से पहुंच जाते हैं। 214 वर्ग कि.मी. में फैले इस द्वीप का नाम महाराजा सगर के नाम पर ही सागरद्वीप पड़ा। यह द्वीप सुंदरबन के 55 द्वीपों में से सबसे बड़ा है। यहां की जनसंख्या आज लगभग दो लाख है।
प्रचलित कथा
कपिल मुनि के मंदिर के विषय में मान्यता है कि यह वही स्थान है जहां त्रेतायुग में भगवान विष्णु के अवतार महामुनि कपिल का आश्रम बसा हुआ था। इसी आश्रम में राजा सगर के साठ हजार पुत्रों की गति के लिए भगीरथ तप द्वारा मां गंगा को स्वर्ग से लेकर आए थे। शास्त्रों के अनुसार भगवान राम के पूर्वज राजा सगर ने विश्वविजय के लिए एक बार अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया। जब यज्ञ के घोड़े को विचरण के लिए छोड़ा गया तो उसकी रक्षा के लिए राजा सगर के 60 हजार पुत्र उसके पीछे-पीछे भेजे गए। स्वर्ग के राजा इंद्र को जब यज्ञ के विषय में पता चला तो उसके मन में संदेह उत्पन्न हो गया कि यदि यह यज्ञ पूर्ण हो गया तो राजा सगर उसके समकक्ष हो जाएंगे। अत: उसने यज्ञ में विघ्न डालने का निश्चय किया। जब यह अश्व चरते हुए कपिल मुनि के आश्रम के निकट पहुंचा तो इंद्र ने जानबूझ कर इसे आश्रम के अंदर बांध दिया। इस बीच राजा सगर के पुत्र अश्व को खोजते हुए आश्रम तक आ पहुंचे। जब उन्होंने अश्व को पेड़ से बंधे हुए देखा तो क्रोध से बिना कुछ सोचे-समझे गर्जन करने लगे। कोई भी जानकारी एकत्रित किए बिना ही उन्होंने पास ही ध्यान कर रहे कपिल मुनि को इस अपराध का दोषी मान लिया। वे ध्यान मग्न ऋषि को अपशब्दों द्वारा अपमानित करने लगे। जिस कारण ऋषि का ध्यान भंग हो गया। जब उन्होंने क्रोध वश अपनी आंखें खोलीं तो उन आंखों की क्रोधाग्नि से राजा सगर के 60 हजार पुत्र उसी स्थान पर भस्म हो गए। लंबे समय तक जब यज्ञ के अश्व व सेना की कोई खबर नहीं आई तो राजा सगर के प्रपौत्र अंशुमन उन्हें खोजते हुए कपिल मुनि के आश्रम तक आ पहुंचे। यहां आकर उन्हें पूरी घटना का पता चला तो बहुत दु:खी हुए।
इस बीच राजा सगर भी यहां आ पहुंचे। अंशुमन व सगर ने विनय पूर्वक कपिल ऋषि की स्तुति की तथा उनसे अपने पुत्रों की गति का उपाय पूछा। तब मुनि ने उन्हें बताया कि इन पुत्रों की मुक्ति के लिए तप द्वारा गंगा को धरती पर लाना होगा। उन्होंने कहा कि जब गंगा की धारा इस राख के ढेर से होकर गुजरेगी तो उन आत्माओं को सदा के लिए मुक्ति मिल जाएगी। इस प्रकार राजा सगर तथा उनके पश्चात् राजा अंशुमन आजीवन मां गंगा को धरती पर लाने का प्रयास करते रहे। उनके उपरांत उनके वंशज राजा दिलीप ने भी यह प्रयास जारी रखा। परन्तु माता गंगा को स्वर्ग से धरती पर लाने का श्रेय इनके ही वंशज महातपस्वी राजा भागीरथ जी को प्राप्त हुआ। स्वर्ग से धरती पर आकर देवप्रयाग, ऋषिकेश, हरिद्वार, प्रयागराज, वाराणसी इत्यादि विभिन्न तीर्थों का निर्माण करती हुईं गंगा जी भगीरथ के पीछे-पीछे चलती कपिल मुनि के आश्रम से गुजरीं और सागर की गोद में समा गईं। मुनि के आश्रम में राजा सगर के पुत्रों की अस्थियों को गंगा जी के छूते ही उन आत्माओं को मुक्ति मिल गई। इसी दिन से हिंदू धर्म में अस्थियों को मरणोपरांत गंगा जी में विसर्जित करने की परम्परा चल पड़ी। जिस दिन मां गंगा का यहां आगमन हुआ वह पवित्र दिन मकर सक्रांति का ही था। तभी से मकर सक्रांति के अवसर पर यहां मेले का आयोजन होने लगा। प्राचीन काल में तो केवल मेले के एक मास के समय में ही यहां लोगों का आगमन होता था परन्तु अब तो वर्ष भर यहां श्रद्धालु आते रहते हैं।
कपिलमुनि का मन्दिर
इस तीर्थ में स्थापित कपिल मुनि का मंदिर कई बार सागर की गोद में समा चुका है। क्योंकि सदियों से समुद्री चक्रवात यहां की भूमि को अपनी चपेट में लेते रहे हैं। इसी कारण आज भी धरती का क्षरण इस द्वीप व आसपास के क्षेत्र में रुका नहीं है। वर्तमान में जो मंदिर यहां स्थापित है उसका निर्माण 70 के दशक में किया गया। सिन्धु के कोप से बचाने के लिए इसे तट से 500मी की दूरी पर बनाया गया है। गंगा सागर में स्नान के पश्चात् ही भक्तजन मंदिर में दर्शन हेतु आते हैं। गर्भ गृह में मुख्य मूर्ति विष्णु अवतार कपिल महाराज की है। ये पद्मासन की मुद्रा में अपने आसन पर विराजमान हैं। उनके वामहस्त में कमंडल है, यह वस्तुत: गांगेय का चिह्न है। उठे हुए दूसरे हाथ में जपमाला है। पांच फनों वाले शेषनाग ने इनके शीर्ष पर छत्रवत् छाया की हुई है। पहले हनुमान गढ़ी के संत मेले के दौरान कपिल मुनि की मूर्ति को नाव द्वारा यहां लाते थे और मेला समाप्ति के उपरांत वापस ले जाते थे। परंतु नया मंदिर बनने के पश्चात् मूर्ति को स्थाई रूप से यहीं स्थापित कर दिया गया। भगवान कपिलदेव के दक्षिण भाग में मां गंगा की चतुर्भुजा व मकरवाहिनी मूर्ति स्थापित है। इनके श्रीहस्त में शंख, चक्र, रत्नकुंभ एंव वरमुद्रा है। माता के अंक में भगीरथ विद्यमान हैं। कपिलदेव के वाम भाग में राजा सगर विराजमान हैं। वे यहां भक्त, दीन, विनम्र, तप में लीन तथा आत्मविस्मृत भाव से भरे हुए हैं। इनसे कुछ दूरी पर सिंहरुढ़, अष्टभुजा माता विशालाक्षी देवी अधिष्ठित हैं। मां के कर कमलों में त्रिशूल, खड्ग, चक्र आदि आयुध व कमल पुष्प सुशोभित हैं। यहीं पर महावीर भगवान हनुमान की प्रतिमा भी स्थापित है। इस कथा के खलनायक देवराज इंद्र को भी यहां स्थान मिला है। चूंकि इन्होंने यज्ञ का घोड़ा चुराया और इसी बहाने हम धरतीवासियों को मां गंगा की प्राप्ति हुई। इसी सात्विक आधार पर इंद्र देव को भी यहां पूजा जाता है। इनके दक्षिण हाथ में धनुष, वाम स्कंद पर तरकश तथा वाम हस्त में यज्ञ अश्व की वल्गा है। यज्ञ अश्व श्याम कर्ण की मूर्ति भी यहां उपस्थित है। सभी मूर्तियां सिंदूर मण्डित हैं। मंदिर प्रांगण में ही शिव परिवार व राधाकृष्ण के विग्रह अवस्थित हैं। यहां दिन में पांच बार आरती की जाती है।
मंदिर की व्यवस्था रामानन्दीय निर्वाणी अखाड़ा द्वारा संचालित होती है। किसी समय में यहां यात्रियों के ठहरने की कोई व्यवस्था नहीं थी जिसे देखते हुए 19वीं शती में सर्वप्रथम भारत सेवाश्रम संघ के संतों द्वारा यहां मंदिर व आश्रम की स्थापना की गई। इस प्रकार गंगा सागर नित्य तीर्थ में परवर्तित हो गया। पुरातन काल से ही यहां पूर्वजों को तर्पण देने तथा गोदान का विशेष महत्व माना गया है। भगवान कपिल मंदिर के साथ-साथ यहां भारत सेवाश्रम, शंकराचार्य मठ, चिंताहरणेश्वर मंदिर, योगेन्द्र मठ, लक्ष्मीनारायण मंदिर, स्वामी कपिलानंद सांख्यकुटीर, मनानंद आश्रम, वल्लभाचार्य बैठक इत्यादि कई आश्रम व मंदिर दर्शनीय हैं। सभी आश्रमों में रहने व खाने का आज समुचित प्रबंध है। वैसे कोलकाता से सुबह जल्दी चलकर संध्याकाल तक वापस भी आया जा सकता है। हर वर्ष गंगा सागर मेले का आयोजन पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा किया जाता है। अंग्रेजों के समय से यहां मेले के दौरान तीर्थ यात्रियों से कर या जजिया लिया जाता था। जिसे आचार्य विनोवा भावे के प्रयासों से बन्द करवाया गया। परन्तु सरकार ने इसे फिर से लगा दिया है। श्रद्धालुओं की भावनाएं इस बात से बहुत आहत होती हैं।











