वैचारिक घुसपैठ का संभ्रम-3
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वैचारिक घुसपैठ का संभ्रम-3
डा. मनमोहन वैद्य
अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख, रा.स्व.संघ
(गतांक से जारी–समापन भाग)
टॉम नेविन कहता है कि ऐसा क्यों हुआ? अपाची लोगों के पास ऍ़झटेक या इंकाज की सेना की तुलना में सबल सेना या शस्त्रास्त्र नहीं थे, और स्पैनिश सेना पहले की तुलना में कमजोर नहीं बल्कि मजबूत ही हुई थी, फिर क्या हुआ? नेविन बताता है कि, 'अपाची समाज अलग तरीके से संगठित था। उसका शक्तिकेन्द्र या प्राणशक्ति एक ही स्थान पर केन्द्रित नहीं थी। वह संपूर्ण समाज में बिखरी थी, विकेन्द्रित थी। वे असंगठित नहीं थे, विशेष तरह से संगठित थे। उनके नियम थे, परम्पराएं थीं, लेकिन वह सत्ताधारियों की ओर से लादी नहीं जाती थीं। उनके समाज में अनेक आदर्श थे, उन्हें देखकर समाज उनका अनुसरण करता था। उनके पास सत्ताधारियों से अधिक प्रभावी आध्यात्मिक-सांस्कृतिक नेतृत्व था, उन्हें नंतन कहते थे। वे नंतन समाज से कम से कम लेकर समाज के लिए जीते थे। उनकी ओर देखकर वह समाज अपना आचरण निश्चित करता था। ऐसा नंतन एक नहीं था, अनेक थे, समाज में बिखरे हुए थे। वे समाज के साथ रहते थे। समाज के सामने उनका संपूर्ण जीवन पारदर्शी कांच के समान था। वे लोगों को 'तुम ऐसा करो', का उपदेश नहीं देते थे। वे केवल जो योग्य है, वही आचरण करते और समाज उनका अनुसरण करता जाता। इस समाज-शक्ति के सामने स्पैनिश सेना हार गई। यह समाज शक्ति का प्रताप था।
उक्त कहानी इतने विस्तार से बताने का कारण इतना ही है कि राजनीतिक सत्ता का समाज पर से वर्चस्व कम कर, सिर्फ सत्ता के हाथों में समाज का सर्वस्व रहने की संकल्पना को समाज के भीतर से निकालकर स्वावलंबी, स्वयंसिद्ध, स्वयंपूर्ण समाज रचना और व्यवस्था नए सिरे से प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता है।
छठी घुसपैठ
सब शहर में ही क्यों?
राजसत्ता केन्द्रित समाज रचना के समान ही सत्ता का केन्द्रीकरण भी अनुचित ही है। सत्ता विकेन्द्रित न रहकर एककेन्द्रीय रही तो भ्रष्टाचार और अत्याचार की संभावना बढ़ती है। पहले गांवों- देहातों के निर्णय गांव- देहातों में ही होते थे। अब यह निर्णय दिल्ली या मुम्बई में होने के दुष्परिणाम हम भुगत ही रहे हैं। मेरे एक परिचित ने अपने गांव में ही बच्चों को अच्छी शिक्षा उपलब्ध कराने हेतु पाठशाला स्थापित करने का निर्णय लिया। अनुमति के लिए उन्हें कई बार मुम्बई के चक्कर लगाने पड़े, फिर भी अनुमति नहीं मिली। गांव की प्राथमिक आवश्यकताओं के लिए गांव स्वावलंबी क्यों न हों? पहले गांव स्वावलंबी थे, इस कारण गांव की एकता थी, खुशहाली थी, शांति थी, गांव सशक्त थे। आज सारी सत्ता, शक्ति, ऊर्जा और पैसा देश और राज्यों की राजधानी में जमा हुआ है। यह व्यवस्था बदलकर अधिकारों का आधिकाधिक विकेन्द्रीकरण करने वाली, लेकिन देश की एकता अबाधित रखने वाली नई व्यवस्था लाने का विचार करना चाहिए।
सातवीं घुसपैठ
बाजारीकरण
भारत की आत्मा आध्यात्मिक होने के कारण हमारे यहां जीवन एक यज्ञ था, एक उत्सव था। आज उसका बाजारीकरण हो चला है। इस बाजारीकरण ने समाज के जीवन मूल्य ही बदल डाले हैं। भौतिकतावाद और उपभोग पर आधारित विकास की संकल्पना के झांसे में आकर हमने यह बाजारीकरण की घुसपैठ मान्य की है। पहले दुनिया श्रेष्ठ जीवन पद्धति और संस्कृति से युक्त एक देश के रूप में भारत की ओर आकर्षित होती थी। आज एक बड़े बाजार के रूप में भारत का आकर्षण बढ़ रहा है। इस देश के नागरिक 'ग्राहक' हैैं, उन्हें क्या चाहिए, क्या नहीं, यह सब बाजार तय कर रहा है। पहले आवश्यकता को ध्यान में रखकर वस्तुओं का उत्पादन किया जाता था, मांग के अनुसार पूर्ति का प्रयास रहता था। अब लोगों की आवश्यकताएं उत्पादक तय करते हैं और इसके लिए विज्ञापनों के माध्यम से आवश्यकता निर्माण की जाती है। क्रय-शक्ति बढ़ाने के लिए कर्ज दिया जाता है। मांग बढ़नी चाहिए, इसलिए विज्ञापन का जोर बढ़ रहा है। इस सबके लिए होने वाला अधिक व्यय ग्राहकों से वसूल कर लाभ भी कमाया जा रहा है। उपभोग की कामना जगाकर उपभोग के लिए पैसा और पैसे के लिए पागलों के समान भागना, इसमें हम अपनी आत्मा, आनंद, समाधान, सुख सब खो रहे हैं।
भारतीय संस्कृति
भारतीय संस्कृति उपभोगवादी नहीं अध्यात्मवादी है। यहां का चिंतन है कि हर एक में देवत्व है और यह देवत्व प्रकट कर मुक्ति का आनंद लेना, यही मानव जीवन का उद्दिष्ट है। इसके लिए हमारे यहां भक्तियोग, ध्यानयोग, कर्मयोग और ज्ञानयोग में से किसी एक या अनेक, अथवा सबका उपयोग कर मुक्त होना चाहिए, ऐसा दर्शन है।
आधुनिक बाजारीकरण में अनावश्यक आवश्यकताएं निर्माण कर स्पर्धा, असूया, लोभ, आसक्ति का आधार लेकर उत्पादनों की अवास्तविक मांग निर्माण की जा रही है। इस कारण शांति मरीचिका के समान दूर भाग रही है। इसलिए बाजारीकरण की इस अभारतीय व्यवस्था की घुसपैठ को समाप्त कर अपने शाश्वत जीवनमूल्यों को संजोने वाली आधुनिक लेकिन हमारी अपनी व्यवस्था स्थापित करनी चाहिए।
इन सब घुसपैठों से मुक्त होने का मार्ग भले दुष्कर लगता हो, लेकिन वह असंभव तो निश्चित ही नहीं है। लेकिन इसके लिए हमें अपना 'स्व' जगाना होगा। हम स्वतंत्र, स्वराज्य, स्वाभिमान जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं, लेकिन इसमें 'स्व' अर्थात हम, राष्ट्र के रूप में कौन हैं। प्राचीन समाज के रूप में हमारी क्या पहचान है, पहले इसका उत्तर खोजना आवश्यक है। सैम्युएल हंटिग्टन नामक विख्यात अमरीकी चिंतक की एक बहुचर्चित पुस्तक है- 'हू आर वी'। उसमें वे कहते हैं, 'जब तक समाज के रूप में हम कौन हैं, यह हम तय नहीं करते, तब तक हम राष्ट्र के रूप में हमारी प्राथमिकताएं, हमारी दिशा तय नहीं कर सकते।'
क्या करें?
दुनिया के हर राष्ट्र को इसकी स्पष्ट कल्पना है कि वे कौन हैं, उनकी अस्मिता, उनकी पहचान, उनका मूल, उनके पूर्वज कौन हैं। दुर्भाग्यवश भारत में इस बारे में संभ्रम पैदा किया गया। यह संभ्रम दूर कर अपने प्राचीन समाज की एकता का आधार पहचान कर, अपने 'स्व' को पहचानकर उसके प्रकाश में अपनी नीतियों का विचार किया जाए तो हम इस संभ्रम के, आत्मविस्मृति के घेरे से बाहर निकल सकेंगे। हमारा 'स्व' यदि जग गया और हम स्वाभिमान से भर गए तो हमारा पुरुषार्थ जागेगा और उसके बल पर हम इन सब घुसपैठियों को सीमा पार भगाकर, हमारे ऊपर के सब संकटों को ध्वस्त कर फिर एक बार पुरुषार्थ और पराक्रम से युक्त, संपन्न, समाधानी और आनंदपूर्ण समाज जीवन निर्माण कर सकेंगे। जीवन जीने और मनुष्य जन्म सार्थक करने का हमारा यह स्वयंसिद्ध आदर्श दुनिया के सामने प्रस्तुत कर संघर्ष, स्पर्धा, असूया से ग्रस्त मानव जाति को चिरशांति, समन्वय और संवाद का मार्ग दिखाने वाला दीपस्तंभ भी हम बन सकेंगे।
स्वामी विवेकानंद ने भारत के लिए यही स्वप्न देखा था और यही आदर्श निर्माण करने का आह्वान भारतमाता के सपूतों से किया था। वयं अमृतस्य पुत्रा: कहकर उन्होंने भारतीय समाज का सिंहत्व जगाने का आवाहन किया था। इस वर्ष उनके जन्म को 150 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं, इस उपलक्ष्य में यह 'स्व' जागरण का पुरुषार्थ हम सब मिलकर प्रकट करें।
भूल सुधार
'वैचारिक घुसपैठ का संभ्रम' आलेख श्रृंखला के अन्तर्गत प्रथम भाग (16 दिसम्बर) में स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक शिकागो भाषण का वर्ष 1893 के स्थान पर भूलवश 1983 प्रकाशित हो गया है। इसी प्रकार दूसरे भाग (23 दिसम्बर) में प्रकाशित भाग में इंकाज पर स्पैनिश लुटेरों का आक्रमण 1532 के स्थान पर 1952 प्रकाशित हुआ है। टंकण में हुई इस भूल पर हमें खेद है- सं.











