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-डा. गीता गुण्डे, सुप्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता
कार्यशाला के संदर्भ में डा. गीता ताई से संक्षिप्त बातचीत के अंश-
महिला समन्वय कार्यशाला का उद्देश्य क्या है?
देशभर में राष्ट्रवादी विचारों से प्रेरित संगठनों के कार्यकर्ता संगठन समाज- संरचना के कार्यों में जुटे हैं। कार्य विस्तार के लिए ये कार्यकर्ता पूरे देश का भ्रमण करते रहते हैं। साल में एक बार इन सभी कार्यकर्ताओं के एक साथ बैठने से देश के विभिन्न समाजों के बीच बह रही अन्तरधारा का अहसास होता है। इसीलिए हम इस तरह की कार्यशाला का आयोजन करते हैं।
इन कार्यशालाओं के विषय क्या रहते हैं?
आम तौर पर महिलाओं से जुड़े विषयों को प्राथमिकता दी जाती है। जैसे इस कार्यशाला का विषय सामाजिक समरसता है। इसी प्रकार पूर्व में महिलाओं के लेकर बने कानून, परिवार व्यवस्था का हनन, प्रचार माध्यमों में महिलाओं के चित्रण आदि विषयों पर कार्यशालाएं आयोजित हुई हैं, जिनके काफी सकारात्मक और प्रभावी परिणाम सामने आए हैं।
प्रचार माध्यमों, विशेष रूप से इलेक्ट्रानिक माध्यमों में महिलाओं का जिस तरह चित्रण हो रहा है, उसके बारे में आपके क्या विचार हैं?
फिल्मों में जिस तरह से महिलाओं को विलासिता की वस्तु के रूप में चित्रित किया जाता है, उसका असर मुश्किल से 5 से 7 प्रतिशत महिलाओं में होता है। इस प्रदर्शन का बाकी समाज पर मानसिक असर तो है, लेकिन वह असर उनके व्यवहार और उनके पहनावे पर नहीं दिखता है। इसलिए फिल्मों में महिलाओं के चित्रण का समाज पर प्रभावी असर दिख रहा हो, ऐसा कहना सही नहीं है। मैं तो यह कहना चाहती हूं कि पहले के मुकाबले समाज में रचनात्मक और सकारात्मक कार्यों के प्रति ज्यादा जागरुकता बढ़ी है। आज अच्छे काम करने वाले लोगों को समाज ज्यादा सम्मान से देखता है। उनके काम की परिस्थितियों का बेहतर आकलन करता है। फिल्मों में क्या दिखाया जा रहा है इसके प्रति वह बहुत ज्यादा गंभीर नहीं है, वह तो उसे सिर्फ मनोरंजन की दृष्टि से देखता है।
राष्ट्रवादी विचारों से जुड़ी महिला कार्यकर्ताओं और तथाकथित प्रगतिशील कार्यकर्ताओं में आप क्या अंतर देखती हैं?
हमारा काम ही हमारी पहचान है।
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