क्या आपने कभी प्रतीकात्मक आक्रोश की राजनीति को भारत की भ्रंश रेखाओं के बूते पांव पसारते अनुभव किया है! यदि नहीं तो यह आपके जागने का समय है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक जब विश्व में भारतीय एकात्मता और बंधुत्व के भाव का प्रसार कर रहे थे, तब कुछ लोगों को यह बात बहुत खल रही थी। भारत, हिंदुत्व और एकता की इस शक्ति से तिलमिलाने वालों को और कुछ नहीं मिला तो उन्होंने हमारे तिरंगे को निशाना बनाया। क्या इसे बर्दाश्त किया जा सकता है? वैसे ही, क्या इसे बर्दाश्त किया जा सकता है कि कोई जौहर की सती माताओं को कायर कहने का दुस्साहस करे, जिनके बलिदान को यादकर आज भी लाखों-करोड़ों हिंदुस्तानियों की मुट्ठियां भिंच जाती हैं और आंखें भीग जाती हैं? क्या परिवारवादी राजनीति के अराजक प्रतीक को बार-बार इस देश के महापुरुष सावरकर को कुछ भी अनर्गल बोलने की आजादी दी जा सकती है?
बर्दाश्त नहीं कर सकते। लेकिन क्या करें, इसपर आने से पहले यह विश्लेषण आवश्यक है कि- यह सब आखिर क्या है? अनायास, अकस्मात प्रतिक्रियाएं या आक्रोश के जरिए अराजकता की राजनीति की चौसर बिछाने का खेल!
आस्था, सम्मान को आहत करने का कुचक्र
किसी भी सभ्य समाज में असहमति हेय नहीं, और भारत कोई अपवाद नहीं। सरकार की आलोचना हो सकती है; इतिहास की नई व्याख्या हो सकती है; किसी विचारधारा या राजनीतिक दिशा से तीखी असहमति हो सकती है। लेकिन, लोकतंत्र इसी स्वतंत्रता से जीवित रहता है। समस्या तब शुरू होती है जब बार-बार ऐसे प्रतीकों, व्यक्तित्वों और स्मृतियों को विवाद के केंद्र में लाया जाने लगे, जिनसे करोड़ों भारतीयों की पहचान, आस्था, सम्मान और राष्ट्रीय भावना जुड़ी हो।
तिरंगा इसका सबसे सीधा उदाहरण है। वह केवल तीन रंगों का कपड़ा नहीं है। उसमें स्वतंत्रता संग्राम की स्मृति है, बलिदान है। यह सर्वहितकारी संविधान का उद्घोष है और भारत की एकात्मकता की पहचान है। इसलिए जब तिरंगे के अपमान का कोई दृश्य सामने आता है तो प्रतिक्रिया केवल किसी राजनीतिक दल तक सीमित नहीं रहती। सामान्य नागरिक भी आहत होता है। यहां एक बात बहुत साफ है। किसी दल, संगठन या किसी व्यक्ति का विरोध अलग बात है और भारत के राष्ट्रीय ध्वज का अपमान बिल्कुल अलग बात है।
किन्तु आज की राजनीति में कई बार इन सीमाओं को जान-बूझकर धुंधला कर दिया जाता है। यही बात इतिहास के नायकों पर भी लागू होती है। वीर सावरकर को लेकर मतभेद पुराने हैं। उनके विचारों, राजनीतिक भूमिका पर इतिहासकार बहस करते रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। वैसे ही, जैसे विभिन्न अन्य लोगों ने क्या किया और क्या कर सकते थे, इस पर अलग-अलग तरीके से व्याख्या की जाती है। यह समीक्षा किसी भी तरह गलत नहीं, और न इस भूमि पर कोई समीक्षा से परे रहा। हमारी परंपरा और संस्कृति ने देव, ईश किसी को भी इससे छूट नहीं दिया। शास्त्रार्थ के लिए प्रख्यात इस माटी में विभिन्न विचारों को सम्मान दिया जाता रहा। हां, इतना अवश्य है कि यह वैचारिक टकराव दूरी बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि सत्य और तथ्य की उंगली थामकर सहमति के बिंदु तक पहुंचने के लिए था। लेकिन ऐतिहासिक समीक्षा और अपमान की भाषा में अंतर होता है। जब किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व को केवल इसलिए नीचा दिखाने की कोशिश होती है कि उससे आज किसी राजनीतिक पक्ष को चोट पहुंचे, तब इतिहास ज्ञान का विषय कम और वर्तमान राजनीति का हथियार अधिक बन जाता है।
यही स्थिति छत्रपति शिवाजी, बाबा साहेब आंबेडकर, महाराणा प्रताप, भगत सिंह या दूसरे ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के साथ भी बन सकती है। किसी एक दल को चोट पहुंचाने के लिए कही गई बात कई बार पूरे समाज को आहत कर देती है। हाल में वीर सतियों के जौहर पर एक अल्पचर्चित विवादित अभिनेत्री की आपत्तिजनक टिप्पणी भी इसी कठिन समीकरण का उदाहरण है। सती होने वाली वीरांगनाओं में पवित्रता से तेजोदीप्त वीरता थी, न कि यह उनकी कायरता थी। विदेशी आक्रमण, पराजय, बंदी बनाए जाने का भय, स्त्रियों पर होने वाली अमानवीय हिंसा और सम्मान बचाने की उस समय की सामाजिक धारणा को समझे बिना जौहर की चर्चा पूरी नहीं हो सकती।
उन स्त्रियों की स्मृति करोड़ों लोगों के लिए केवल इतिहास की घटना नहीं, बलिदान और पीड़ा की स्मृति भी है। और क्या इस बात का भान है कि इस तर्क को आगे बढ़ाते हुए आप कहां तक पहुंच जाएंगे? क्या तब मातृभूमि की रक्षा के लिए स्वयं को बलिदान कर देने को वीरता माना जाएगा या जीने की व्यैक्तिक स्वतंत्रता का हनन? ईमानदारी के रास्ते पर चलते हुए संघर्ष को गले लगाने को चारित्रिक गुण माना जाएगा या अवगुण? इसी रास्ते पर आगे बढ़ते हुए आपको गैर-कानूनी बनाम अनैतिकता का भी टकराव मिलेगा जिसमें जोर इस बात पर होगा कि अगर कोई काम कानून विरोधी नहीं, तो स्वीकार्य होना चाहिए। किंतु यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि किसी भी समाज या राष्ट्र के चरित्र का निर्माण कानून से नहीं बल्कि नैतिकता से होता है। इसीलिए यह समझना आवश्यक है कि जब शब्द आत्म सम्मान को आहत करने वाले हथियार बन जाएं और समाज रणभूमि, तो इसका प्रतिकार कैसे हो।
प्रतीकात्मक आक्रोश और राजनीति
इसी बिंदु पर प्रतीकात्मक आक्रोश की राजनीति को समझना जरूरी है। इस राजनीति का पहला चरण बहुत सरल होता है। ऐसा विषय चुनिए जिससे बड़ी संख्या में लोगों का भावनात्मक नाता हो- कोई राष्ट्रीय प्रतीक, कोई धार्मिक आस्था, कोई महापुरुष, कोई ऐतिहासिक बलिदान या कोई सामूहिक स्मृति। फिर उसके बारे में ऐसा कथन सामने आता है जो तीखी प्रतिक्रिया पैदा कर सके।
इसके बाद पूरे कथन के स्थान पर एक छोटा वीडियो, एक पंक्ति या कुछ शब्द सामाजिक माध्यमों पर फैलते हैं। कुछ ही घंटों में चर्चा इस बात से हट जाती है कि वास्तव में क्या कहा गया था। नया भाव पैदा होता है कि शब्द या प्रतीक से उत्पन्न आघात कितना गहरा है।
व्यक्ति पर हुई चोट पूरे समुदाय की चोट बन जाती है। ऐसे में बार-बार सामने आते हैं कुछ राजनीतिक चेहरे। मत भूलिए कि जो चोट पर मरहम रखने के बजाय नमक बेचता है, वही आक्रोश की राजनीति करता है। फिर आता है सबसे खतरनाक चरण। लोग उत्तर देना शुरू करते हैं। बहुत से लोग तथ्य रखते हैं। कुछ शांतिपूर्ण विरोध करते हैं। कुछ कानूनी कार्रवाई की मांग करते हैं। लेकिन कुछ लोग आक्रोश में अभद्र हो जाते हैं। कोई धमकी तक पहुंच जाता है। कोई कानून हाथ में लेने की बात करने लगता है। बस यहीं पूरी कहानी पलट सकती है।
मान लीजिए किसी व्यक्ति ने ऐसा बयान दिया जिससे लाखों लोग आहत हुए। यदि उसके विरोध में कोई हिंसा कर बैठता है, तो अगले दिन मूल बयान पीछे चला जाएगा। देश और दुनिया में मुख्य खबर यह बन सकती है कि भारत में विचार रखने पर किसी कलाकार, नेता या वक्ता पर हमला हुआ।
जिस व्यक्ति के बयान से विवाद शुरू हुआ था, वह पीड़ित के रूप में दिखाई देने लगेगा और जो आहत होकर कानून तोड़ बैठा, वह आरोपी बन जाएगा। यानी चिंगारी किसी और ने फेंकी, लेकिन घर में आग हमने खुद लगा ली। यही वह बात है जिसे समाज को सबसे अधिक समझने की जरूरत है।
उकसाने वाले कथन की असली ताकत केवल कथन में नहीं होती। उसकी ताकत हमारी प्रतिक्रिया में भी होती है। यदि कोई हमारे गुस्से को नियंत्रित कर लेता है, तो वह कुछ समय के लिए हमारे व्यवहार को भी दिशा देने लगता है। इसलिए गुस्सा होना और गुस्से के अधीन हो जाना, दोनों अलग बातें हैं।
भारत के लिए यह राजनीति इसलिए अधिक खतरनाक है क्योंकि हमारे समाज में कई भ्रंश रेखाएं पहले से हैं। जाति और आरक्षण, सवर्ण और वंचित, भिन्न आस्थाएं, उत्तर और दक्षिण, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएं, पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी। यहां तक कि अब एक ही जाति, एक ही धर्म या एक ही समुदाय के भीतर भी राजनीतिक पहचान के आधार पर कटुता की रेखाएं खींचने का खेल दिखता है।
ऐसे में उत्पातियों के लिए एक नई चिंगारी को बस मौके पर गिरना होता है।
फिर सामाजिक माध्यम अपना काम करते हैं। आधी जानकारी, छोटा वीडियो, अपमानजनक टिप्पणी और गुस्से से भरे उत्तर। कुछ ही समय में समाज दो खेमों में खड़ा दिखाई देने लगता है। धीरे-धीरे असहमति विचार की नहीं, पहचान की लड़ाई बन जाती है।
समाज की भूमिका बड़ी
किसी भी समाज के लिए यह क्षण और घटनाक्रम सबसे खतरनाक मोड़ होता है। गृह संघर्ष हमेशा टैंक और बंदूक लेकर शुरू नहीं होता। पहले समाज की भाषा बदलती है। फिर असहमति दुश्मनी बनती है। फिर सामने वाला इंसान कम और शत्रु अधिक दिखाई देने लगता है। उसके बाद हिंसा के लिए कारण और तर्क खोजे जाने लगते हैं। देश कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, भीतर का सामाजिक भरोसा टूट जाए तो राष्ट्रीय शक्ति कमजोर पड़ती है।
सेना सीमा की रक्षा कर सकती है। सरकार आतंकवाद के विरुद्ध अभियान चला सकती है। पुलिस अपराधियों को पकड़ सकती है। लेकिन करोड़ों नागरिकों के मन में एक-दूसरे के प्रति पैदा हुए अविश्वास को समाप्त करने के लिए कोई सैन्य अभियान नहीं चलाया जा सकता। शब्दों से लगी आग को समाज को ही बुझाना पड़ता है। यह लड़ाई केवल देश के भीतर की भी नहीं है। आज भारत दुनिया में आर्थिक, सामरिक, तकनीकी और कूटनीतिक शक्ति के रूप में आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में यदि लगातार धार्मिक तनाव, जातीय संघर्ष, गाली, धमकी, हिंसा और सामाजिक टूटन के दृश्य दुनिया तक पहुंचते हैं, तो भारत की उपलब्धियों के साथ एक विभाजित समाज की तस्वीर भी बाहर जाती है। भारत विरोधी शक्तियों को तब अलग से कहानी गढ़ने की जरूरत भी नहीं पड़ती। सामग्री हम खुद उपलब्ध करा देते हैं।
किसी रणनीति या सुनियोजित प्रयास के आरोप तब मन में जमने लगते हैं जब बार-बार एक जैसा ढांचा, तौर-तरीके दिखाई दें। लगातार उन्हीं संवेदनशील प्रतीकों को निशाना बनाया जाए, प्रसार का संगठित तरीका मिले और उससे किसी समूह को स्पष्ट राजनीतिक लाभ मिलता दिखाई दे।
षड्यंत्र कहने मात्र से संकट समाप्त नहीं होते। किसी कथन का उद्देश्य कुछ भी रहा हो, यदि उसका परिणाम समाज में नफरत, अविश्वास, कटुता और हिंसा बढ़ाना है, तो उस परिणाम को गंभीरता से समझना ही होता है।
भारत को ऐसी नागरिक शक्ति चाहिए जो अपमान का उत्तर तथ्य से दे। गलत इतिहास का उत्तर सही इतिहास से दे। अपराध का उत्तर कानून से दे। झूठ का उत्तर प्रमाण से दे। और उकसावे का उत्तर ऐसे संयम से दे जो कमजोरी नहीं, आत्मविश्वास की निशानी हो। कई बार देश को सबसे बड़ा नुकसान चिंगारी फेंकने वाला नहीं पहुंचाता। असली नुकसान तब होता है जब हम सब अपने-अपने गुस्से की मुट्ठी में तेल लेकर उस चिंगारी के पीछे दौड़ पड़ते हैं।
आग लगाने वाले की असली जीत तब होती है, जब जलने वाले खुद हवा देने लगें। बढ़ते भारत की सबसे बड़ी शक्ति केवल उसकी अर्थव्यवस्था, सेना, तकनीक या सरकार नहीं होगी। उसकी सबसे बड़ी शक्ति वह समाज होगा जो उकसावे को पहचान सके, असहमति सह सके, अपमान का लोकतांत्रिक संवैधानिक उत्तर दे सके और अपनी अंदरूनी दरारों को किसी भी राजनीति का हथियार न बनने दे। यह सामाजिक समझ पैदा करना जरूरी है। यह समझ जरूरी है कि बड़े से बड़े दावानल की आरंभिक चिंगारी भी समय पर एक बूंद पानी से बुझाई जा सकती है।
X@hiteshshankar

















