इस श्लोक में जीवन, समाज और राष्ट्र की प्रगति के चार मूल स्तंभों का सुंदर वर्णन किया गया है।
श्लोक-
सामर्थ्यमूलं स्वातन्त्र्यं श्रममूलं च वैभवम्।
न्यायमूलं सुराज्यं स्यात् संघमूलं महाबलम्॥
भावार्थ-
सामर्थ्यमूल स्वतन्त्रता व श्रममूल वैभव न्यायमूल सुराज्य तथा संगठन मूल द्वारा महाबल प्राप्त होता है।
सामर्थ्यमूलं स्वातन्त्र्यं: वास्तविक स्वतंत्रता सामर्थ्य (क्षमता, शक्ति और आत्मनिर्भरता) पर टिकती है। बिना सामर्थ्य के स्वतंत्रता केवल नाममात्र की होती है।
श्रममूलं च वैभवम्: वैभव, समृद्धि और संपत्ति कठिन परिश्रम तथा निरंतर श्रम से ही प्राप्त होती है।
न्यायमूलं सुराज्यं स्यात्: एक अच्छे राज्य या सुशासन (Good Governance) का मुख्य आधार न्याय है। जहाँ न्याय सर्वोपरि है, वहीं सच्चा सुराज्य संभव है।
संघमूलं महाबलम्: संगठन और एकता ही सबसे बड़ी शक्ति (महाबल) का मूल कारण हैं।
आज के समय में प्रासंगिकता
आत्मनिर्भरता और सामर्थ्य : आज के वैश्विक युग में वही व्यक्ति या देश वास्तव में स्वतंत्र और स्वाभिमानी है, जो तकनीकी, आर्थिक और सैन्य रूप से समर्थ (Self-reliant) है।
परिश्रम और नवाचार : केवल इच्छा रखने से समृद्धि नहीं आती। चाहे स्टार्टअप हो, शिक्षा हो या देश की अर्थव्यवस्था, वास्तविक विकास कड़ी मेहनत और प्रयास से ही संभव है।
कानून का शासन : किसी भी समाज में शांति और सुशासन तभी कायम रह सकता है जब सभी नागरिकों को समान न्याय मिले। पक्षपातहीन व्यवस्था ही सुशासन की पहचान है।
सामूहिक शक्ति और एकता : अकेले व्यक्ति की क्षमता सीमित होती है, लेकिन जब लोग एकजुट होकर कार्य करते हैं (टीमवर्क या सामुदायिक शक्ति), तो बड़ी से बड़ी चुनौतियों को पार किया जा सकता है।

















