भुवनेश्वर : स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की जन्म शताब्दी के अवसर पर वर्षभर चलने वाले समारोहों का शुभारंभ शुक्रवार को उनके जन्मस्थल गुरुजांग, तालचेर, अनुगोल में भव्य समारोह के साथ हुआ। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी, विधानसभा अध्यक्ष सुरमा पाढ़ी, पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं संबलपुर सांसद धर्मेंद्र प्रधान, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्रीय कार्यवाह दुर्गा प्रसाद साहू सहित कई साधु-संत और गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
समारोह के दौरान मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने स्वामीजी की जन्मस्थली गुरुजांग गांव को ‘हेरिटेज विलेज’ के रूप में विकसित करने तथा गुरुजांग ग्राम पंचायत को ‘आदर्श पंचायत’ बनाने की घोषणा की।
‘स्वामीजी हमारे समाज के गुरु, ग्रंथ और गरिमा’
मुख्यमंत्री माझी ने अपने संबोधन में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती को केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक महान आदर्श, सामाजिक सेवा की प्रेरक शक्ति और सनातन धर्म के मार्गदर्शक के रूप में स्मरण किया। उन्होंने कहा कि स्वामीजी ने आधुनिक सुख-सुविधाओं का त्याग कर कंधमाल के दुर्गम एवं घने वन क्षेत्रों में रहकर वंचित वनवासी समाज की सेवा में अपना जीवन समर्पित किया।
उन्होंने बताया कि स्वामीजी ने चकापाद और जलेशपटा आश्रम तथा कन्या गुरुकुल की स्थापना कर वनवासी बालिकाओं को संस्कृत शिक्षा, संस्कार और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाया। उनके प्रयासों से शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और सांस्कृतिक चेतना को व्यापक आधार मिला। मुख्यमंत्री ने कहा कि स्वामीजी ने समाज में जो सांस्कृतिक चेतना के बीज बोए थे, वे आज बड़े वृक्ष का रूप ले चुके हैं।
माझी ने स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती को समाज के ‘गुरु, ग्रंथ और गरिमा’ का प्रतीक बताते हुए कहा कि उनके विचार और सेवा-कार्य आज भी समाज का मार्गदर्शन कर रहे हैं।
स्वामीजी की स्मृति में ₹13 करोड़ के विकास कार्य
स्वामीजी के त्याग और सेवा को सम्मान देने के लिए राज्य सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि फूलबाणी सरकारी मेडिकल कॉलेज का नाम बदलकर ‘स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती मेडिकल कॉलेज’ किया गया है।
इसके अलावा जलेशपटा आश्रम, आश्रम स्कूल और कन्याश्रम के विकास तथा विरासत संरक्षण के लिए मुख्यमंत्री विशेष सहायता (CMSA) कोष से ₹13 करोड़ मंजूर किए गए हैं। इस राशि में से ₹5 करोड़ की लागत से 300 सीटों वाला छात्रावास छात्राओं के लिए बनाया जाएगा। वहीं ₹3 करोड़ विरासत स्थलों के संरक्षण पर खर्च किए जाएंगे। स्थानीय लोगों के लिए पेयजल सुविधा को मजबूत करने के उद्देश्य से एक मेगा रिवर लिफ्ट परियोजना भी लागू की जाएगी।
2008 हत्याकांड पर मुख्यमंत्री ने उठाए सवाल
स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की वर्ष 2008 में जन्माष्टमी की रात हुई हत्या का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री माझी ने तत्कालीन सरकार पर विफलता, लापरवाही और तुष्टीकरण की राजनीति का आरोप लगाया।
उन्होंने कहा कि हत्याकांड की जांच के लिए गठित न्यायमूर्ति महापात्र आयोग और न्यायमूर्ति नायडू आयोग की रिपोर्टों तथा संबंधित फाइलों का लोकसेवा भवन से गायब होना गंभीर विषय है। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि दस्तावेजों का गायब होना अपराधियों को बचाने की एक सोची-समझी कोशिश का हिस्सा था।
माझी ने ओडिशा की जनता को आश्वस्त करते हुए कहा कि स्वामीजी के बलिदान का न्याय होगा और इस मामले की सच्चाई सामने लाना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार इस विषय में पूरी गंभीरता और प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ रही है।
‘सबका साथ, सबका विकास’ में अंत्योदय की भावना
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘सबका साथ, सबका विकास’ के मंत्र का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि इसमें स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की अंत्योदय की भावना भी निहित है। उन्होंने कहा कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचकर उसकी सेवा करने का स्वामीजी का दृष्टिकोण आज भी प्रासंगिक है। मुख्यमंत्री ने युवा पीढ़ी, विशेषकर Gen Z, से अपनी मूल शिक्षा, संस्कृति, वेद, संस्कृत, गो-संरक्षण और सनातन परंपराओं से जुड़े रहने का आह्वान किया। उन्होंने युवाओं से देशभक्ति, साहस और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ राष्ट्र एवं समाज निर्माण में सक्रिय योगदान देने की अपील की।
विधानसभा अध्यक्ष ने भी स्वामीजी के आदर्शों को याद किया
ओडिशा विधानसभा अध्यक्ष सुरमा पाढ़ी ने स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के आध्यात्मिक और सामाजिक योगदान को याद करते हुए कहा कि उनकी जीवन यात्रा त्याग, सेवा और संस्कार की प्रेरणा देती है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान युवा पीढ़ी को अपने मूल्यों, नैतिक शिक्षा और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए स्वामीजी के जीवन और संघर्ष से प्रेरणा लेनी चाहिए। उन्होंने समाज से स्वामीजी द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलने और उनके आदर्शों को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।
50 हजार गांवों तक पहुंचाई जाएगी स्वामी लक्ष्मणानंद की जीवनी और तस्वीरें: धर्मेंद्र प्रधान
जन्म शताब्दी समारोह के अवसर पर उनके जीवन और कार्यों पर आधारित एक प्रामाणिक ग्रंथ का स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती स्मृति न्यास की ओर से ओड़िया और हिंदी भाषाओं में विमोचन किया गया। इस अवसर पर पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं संबलपुर सांसद धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि स्वामीजी के अनुयायियों का प्रयास होना चाहिए कि उनकी जीवनी और तस्वीरें ओडिशा के 50,000 गांवों, अर्थात राज्य के प्रत्येक गांव तक पहुंचाई जाएं।
‘स्वामीजी महान युगपुरुष और सनातन संस्कृति के प्रहरी थे’
धर्मेंद्र प्रधान ने स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती को महान युगपुरुष, आध्यात्मिक साधक और सनातन संस्कृति का प्रहरी बताते हुए कहा कि उनका त्याग, सेवा, वनवासी कल्याण और राष्ट्रहित के प्रति समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शन का स्रोत रहेगा। उन्होंने कहा कि संत भीम भोई के विचार “मेरा जीवन चाहे नरक में पड़े, लेकिन जगत का उद्धार हो” से प्रेरणा लेकर स्वामीजी ने अपना जीवन ओडिशा के जनजातीय एवं वंचित समाज के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया।
शिक्षा, संस्कार और आत्मनिर्भरता पर जोर
प्रधान ने कहा कि स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती ने कंधमाल और फूलबाणी जैसे दुर्गम क्षेत्रों में आश्रम, संस्कृत विद्यालय और कन्याश्रम स्थापित कर शिक्षा, संस्कार और सांस्कृतिक चेतना के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि स्वामीजी ने स्थानीय समाज को आत्मनिर्भर बनाने के लिए आधुनिक कृषि, वृक्षारोपण और अन्य सामाजिक पहल को बढ़ावा दिया। साथ ही, गो-संरक्षण और सांस्कृतिक पहचान के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए भी उन्होंने कार्य किया।
प्रधान के अनुसार, स्वामीजी का उद्देश्य समाज के वंचित वर्गों को केवल सहायता उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर, जागरूक और स्वाभिमान के साथ जीवन जीने में सक्षम बनाना था।
‘स्वामीजी के आदर्शों को आत्मसात करना हमारी जिम्मेदारी’
धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि भाषा के आधार पर गठित ओडिशा के अगले शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ने से पहले स्वामीजी की जन्म शताब्दी को उनके आदर्शों को आत्मसात करने और समाज में लागू करने का अवसर बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्वामीजी की सेवा, सामाजिक जागरण और सांस्कृतिक चेतना का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है और नई पीढ़ी को उनके जीवन से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है।
गुरुजांग को ‘तीर्थक्षेत्र’ और ‘हेरिटेज विलेज’ के रूप में विकसित करने पर जोर
प्रधान ने स्वामीजी की जन्मभूमि गुरुजांग को पवित्र ‘तीर्थक्षेत्र’ अथवा ‘हेरिटेज विलेज’ के रूप में विकसित करने के लिए राज्य सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि गुरुजांग को केवल एक स्मारक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार, स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता की प्रयोगशाला के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, जहां स्वामीजी के विचारों को व्यवहार में उतारा जा सके।
वंचित वर्गों का सशक्तीकरण ही सच्ची श्रद्धांजलि
प्रधान ने कहा कि ओडिशा के वंचित वर्गों, बच्चों, महिलाओं, युवाओं और किसानों को सशक्त बनाना तथा उन्हें समाज में सम्मान, गरिमा और स्वाभिमान के साथ जीवन जीने की क्षमता प्रदान करना ही स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि स्वामीजी की सेवा, संस्कार और सामाजिक जागरण की अमर ज्योति आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित करती रहेगी और समाज को सकारात्मक दिशा प्रदान करेगी। स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती ने छह दशक पहले ही ‘पंच
परिवर्तन’ का व्यवहारिक प्रयोग कर दिखाया: दुर्गा प्रसाद साहू
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्रीय कार्यवाह दुर्गा प्रसाद साहू ने स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती को दूरदर्शी संन्यासी और असाधारण व्यक्तित्व का धनी बताते हुए कहा कि संघ जिस ‘पंच परिवर्तन’ की बात आज कर रहा है, उसके अनेक आयामों पर स्वामीजी ने करीब छह दशक पहले ही कंधमाल में व्यवहारिक रूप से काम करके दिखाया था।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर व्यक्ति निर्माण, व्यवस्था परिवर्तन और समाज परिवर्तन के प्रयासों को और गति देने के लिए ‘पंच परिवर्तन’ का आह्वान कर रहा है। हालांकि, स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती ने अपने जीवन और कार्यों के माध्यम से इन सिद्धांतों को वर्षों पहले ही जमीन पर उतार दिया था।
‘स्व’ जागरण से स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता तक
साहू ने कहा कि ‘पंच परिवर्तन’ का पहला आयाम ‘स्व’ का जागरण है। उनके अनुसार, स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती ने कंध जनजाति के लोगों को उनके गौरवशाली अतीत, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक पहचान से परिचित कराया। इसका उद्देश्य समुदाय में आत्मविश्वास, स्वाभिमान और अपनी क्षमताओं के प्रति विश्वास पैदा करना था।
उन्होंने कहा कि स्वामीजी का दृष्टिकोण केवल बाहरी सहायता उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं था। वह चाहते थे कि समाज अपनी समस्याओं को स्वयं समझे, उनके समाधान तलाशे और आत्मनिर्भर बने। इसी सोच के तहत उन्होंने कंध समाज में बहुमुखी कृषि, सिंचाई व्यवस्था, जैविक खाद के उपयोग, फलोद्यान,
गोपालन और गो-संवर्धन जैसे प्रयासों को प्रोत्साहित किया।
साहू के अनुसार, इन पहलों के माध्यम से स्वामीजी ने कंधमाल में सामाजिक और आर्थिक स्वावलंबन का ऐसा मॉडल विकसित करने का प्रयास किया, जिसमें स्थानीय समुदाय अपने विकास में स्वयं भागीदार बने।
सामाजिक समरसता के लिए जमीनी पहल
‘पंच परिवर्तन’ के दूसरे आयाम सामाजिक समरसता का उल्लेख करते हुए साहू ने कहा कि स्वामीजी ने समाज में विभाजन और भेद को समाप्त करने तथा सामाजिक एकजुटता को मजबूत करने के लिए निरंतर प्रयास किया। उन्होंने बताया कि स्वामीजी लोगों के घरों में ठहरते थे और परिवारों को भागवत पाठ, सत्संग और कीर्तन जैसी गतिविधियों से जोड़ते थे।
साहू ने कहा कि कंध जनजातीय समाज की भाषा और स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं को माध्यम बनाकर ‘लक्ष्मी पुराण’ के पाठ, सहभोज और सत्संग जैसी गतिविधियों के जरिए स्वामीजी ने सामाजिक समरसता को जमीनी स्तर तक पहुंचाने का व्यावहारिक प्रयोग किया। उन्होंने स्थानीय समाज को साथ जोड़ने के लिए ऐसे सांस्कृतिक माध्यमों का उपयोग किया, जो लोगों के दैनिक जीवन और परंपराओं से सीधे जुड़े हुए थे।
पर्यावरण संरक्षण को सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ा
‘पंच परिवर्तन’ के तीसरे आयाम पर्यावरण संरक्षण पर बोलते हुए साहू ने कहा कि स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती ने प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को अपने सामाजिक कार्यों का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। उन्होंने बताया कि स्वामीजी ने वृक्षारोपण, जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जागरूकता को बढ़ावा दिया।
साहू ने ‘धरणी पेनु’, अर्थात धरती माता की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वामीजी ने पर्यावरण संरक्षण को केवल प्रशासनिक या विकास का विषय न मानकर उसे सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना से जोड़ने का प्रयास किया।
कुटुंब प्रबोधन से संस्कारयुक्त परिवार की अवधारणा
‘पंच परिवर्तन’ के चौथे आयाम कुटुंब प्रबोधन पर साहू ने कहा कि स्वामीजी परिवार को समाज के निर्माण और परिवर्तन की मूल इकाई मानते थे। उनका जोर परिवार में ऐसा वातावरण तैयार करने पर था, जहां संस्कार, अनुशासन और सांस्कृतिक मूल्यों को व्यवहार में उतारा जाए। उन्होंने कहा कि स्वामीजी परिवार के सभी सदस्यों को सत्संग, पूजा-पाठ और धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन में सहभागी बनने के लिए प्रेरित करते थे। वह परिवार में साथ बैठकर भोजन करने, पारंपरिक जीवनशैली अपनाने तथा तिलक जैसे सांस्कृतिक प्रतीकों को बनाए रखने के लिए भी लोगों को प्रोत्साहित करते थे।
उन्होंने कहा कि स्वामीजी के ये प्रयोग परिवार और समाज के बीच सांस्कृतिक निरंतरता कायम करने की दिशा में महत्वपूर्ण थे।
नागरिक कर्तव्य
‘पंच परिवर्तन’ के पांचवें आयाम नागरिक कर्तव्य का उल्लेख करते हुए साहू ने कहा कि समाज में नागरिकों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने के साथ-साथ उनके कर्तव्यों के प्रति भी संवेदनशील बनाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि स्वामीजी लोगों को सामाजिक अनुशासन, नियमों के पालन और जिम्मेदार नागरिक के रूप में अपनी भूमिका समझने के लिए प्रेरित करते थे। साहू के अनुसार, लोकतांत्रिक समाज में अधिकार और कर्तव्य एक-दूसरे के पूरक हैं और नागरिक जिम्मेदारी के बिना सामाजिक परिवर्तन अधूरा रहता है।
स्वामीजी की हत्या के मामले में उठाए सवाल
स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या का उल्लेख करते हुए साहू ने कहा कि राष्ट्र और समाज के लिए उनका बलिदान विशेष रूप से संत समाज सहित पूरे समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने कहा कि हत्या के मामले में जिन लोगों को आरोपी अथवा कथित हत्यारों के रूप में चिन्हित किया गया था, उनमें से कुछ के धीरे-धीरे जेल से बाहर आने की स्थिति ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनके अनुसार, इससे यह आशंका उत्पन्न होती है कि इस मामले के वास्तविक हत्यारों तथा षड्यंत्र में शामिल लोगों की भूमिका अब तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाई है।
श्री साहू ने राज्य सरकार से आग्रह किया कि मामले की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए इसकी गहन समीक्षा की जाए और सभी पहलुओं की निष्पक्ष पड़ताल कर सच्चाई सामने लाने की दिशा में प्रभावी कदम उठाए जाएं।
विकास के साथ स्वाभिमान और पहचान भी जरूरी
श्री साहू ने कहा कि विकास का अर्थ केवल सड़क, आवास, भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार, इन सुविधाओं के साथ व्यक्ति और समाज को अपनी पहचान, संस्कृति और आत्मसम्मान के साथ जीने की क्षमता भी मिलनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दृष्टि में बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ सांस्कृतिक चेतना और स्वाभिमान भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने वर्तमान सरकार को ‘स्वाभिमान और अस्मिता की सरकार’ बताते हुए कहा कि सामाजिक आत्मविश्वास तभी मजबूत होगा, जब लोगों की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के प्रति सम्मान का वातावरण बने।
अवैध कनवर्जन और गो-हत्या पूर्ण रुप से बंद करना स्वामी जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि
श्री साहू ने कहा कि समाज तभी वास्तविक अर्थों में स्वाभिमान के साथ आगे बढ़ सकता है, जब उसकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहे। उन्होंने ओडिशा में प्रलोभन, दबाव या धोखे के माध्यम से किए जा रहे कथित अवैध धर्मांतरण पर प्रभावी रोक लगाने तथा गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इन मुद्दों पर ठोस और प्रभावी कार्रवाई करना स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के प्रति समाज की सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उनके अनुसार, स्वामीजी का जीवन समाज की सांस्कृतिक पहचान, आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान को मजबूत करने के लिए समर्पित था।
‘योगजन्मा’ संन्यासी के रूप में स्मरण
अंत में श्री साहू ने स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती को ऐसा ‘योगजन्मा’ संन्यासी बताया, जिन्होंने अपने जीवनकाल में जिन कार्यों की कल्पना की, उनमें से अनेक को अपनी आंखों के सामने आकार लेते देखा।
उन्होंने कहा कि स्वामीजी का जीवन आध्यात्मिक साधना के साथ-साथ शिक्षा, सामाजिक जागरण, आत्मनिर्भरता, पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक चेतना के समन्वय का उदाहरण था। उनके विचार और कार्य आने वाली पीढ़ियों को समाज सेवा तथा राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित करते रहेंगे।
उल्लेखनीय है कि आज से शुभारंभ हुए जन्म शताब्दी समारोह नवंबर 2027 तक जारी रहेंगे। इस दौरान ओडिशा के साथ-साथ देश के विभिन्न हिस्सों में व्यापक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। आयोजकों के अनुसार, ओडिशा में करीब 25,000 स्थानों पर शताब्दी से जुड़े कार्यक्रम आयोजित करने की योजना है। इसके अलावा हरिद्वार, दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और कोलकाता सहित प्रमुख शहरों में भी बड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

















