क्या स्वाधीनता संग्राम के महान योद्धा स्वयंसेवक राजगुरु वंदे मातरम् का अपमान सहते?
October 3, 2026
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महान क्रांतिकारी राजगुरु की जयंती : क्या स्वाधीनता संग्राम के महान योद्धा स्वयंसेवक राजगुरु वंदे मातरम् का अपमान सहते?

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कांग्रेस और उनके सहयोगी जब पुनः राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के विभाजन की बात करते हैं,तो उनके मुस्लिम तुष्टिकरण के इतिहास की पुनरावृत्ति होने लगती है,

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Aug 24, 2026, 01:48 pm IST
inभारत, विश्लेषण

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कांग्रेस और उनके सहयोगी जब पुनः राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के विभाजन की बात करते हैं,तो उनके मुस्लिम तुष्टिकरण के इतिहास की पुनरावृत्ति होने लगती है, जिसके कारण पहले राष्ट्रगीत वंदे मातरम् का विभाजन, फिर अखंड भारत का विभाजन हुआ। प्रश्न उठता है कि क्या राम प्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, भगत सिंह, सुखदेव सहित अनेक महान् क्रान्तिकारी अखंड भारत का विभाजन स्वीकार करते? उत्तर है, कभी नहीं। उन्होंने तो वंदे मातरम् के जय घोष के साथ ही अपना बलिदान दिया। वंदे मातरम् क्रांतिकारियों सहित समस्त भारतीयों का ब्रह्म वाक्य रहता है, तो क्या सन् 1937 में भारत माता की आत्मा का गान, वंदे मातरम् का विभाजन कांग्रेस को करना चाहिए था ?

धर्म के नाम पर अखंड भारत के विभाजन के उपरांत भी कांग्रेस ने वंदे मातरम् की उपेक्षा क्यों की? अब जब सरकार और जनमत संपूर्ण वंदे मातरम् की प्रतिबद्धता को स्वीकार कर चुकी है, तब भी कांग्रेस और उनके सहयोगी विभाजित वंदे मातरम् गीत को स्वीकारने की पैरवी कर रहे हैं। इस तरह कांग्रेस पुनः तुष्टिकरण की राह पर चल रही है, इसलिए समस्त भारतीयों को गंभीरता से समझना होगा, और इसका विरोध करना होगा अन्यथा भविष्य में गंभीर परिणाम हो सकते हैं। क्योंकि इतिहास का अत्यंत प्राचीन सिद्धांत है, “इतिहास इतिहास को दोहराता है।”

भारतीय स्वाधीनता संग्राम का दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि सर्वप्रथम ब्रिटिश सरकार ने ही जनजातीय योद्धाओं और क्रांतिकारियों के इतिहास को मिटाने का प्रयास किया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सशस्त्र क्रांतिकारियों के योगदान और इतिहास को उपेक्षित करने या मुख्यधारा के इतिहास से दूर रखने के कई मुख्य कारण रहे हैं। स्वाधीनता के बाद एकपक्षीय इतिहास लेखन, वैचारिक अंतर और औपनिवेशिक नीतियों के कारण कई वीर नायकों के नाम पीछे छूट गए। अंग्रेजों ने अपने शासनकाल में क्रांतिकारियों को ‘आतंकवादी’ या ‘अपराधी’ घोषित किया और उनके दस्तावेजों व नेटवर्क को नष्ट कर दिया। स्वतंत्रता के बाद दशकों तक मुख्यधारा के इतिहास में कांग्रेस के उदारवादी,अहिंसक आंदोलनों को अधिक प्रमुखता दी गई, जिससे क्रांतिकारी धारा का प्रभाव कम आंका गया।

परंतु कांग्रेस के उदारवादी गुट ने तो अति कर दी, वे प्रारम्भ से ब्रिटिश सरकार के साथ थे और अंत तक उसी के कृपा पात्र भी बने रहे। इसलिए सत्ता भी उन्हीं को मिली। कांग्रेस के उदारवादी गुट ने अपने लोगों तक को नहीं छोड़ा और कांग्रेस के अंदर उग्रवादी गुट को ध्वस्त करके ही माने। इसलिए बंकिम चंद्र चटर्जी ने इनकी पद लोलुपता को देखते हुए इन्हें “पदों के भूखे राजनीतिज्ञों ” की संज्ञा दी थी। लोकमान्य तिलक ने कांग्रेस को “चापलूसों का सम्मेलन” और कांग्रेस के अधिवेशनों को “छुट्टियों का मनोरंजन ” बतलाया था। वही लाला लाजपत राय ने कांग्रेस के सम्मेलनों को ” शिक्षित भारतीयों के वार्षिक राष्ट्रीय मेले” की संज्ञा दी थी। आगे भी कांग्रेस के इस गुट ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस और सरदार वल्लभभाई पटेल को भी नहीं छोड़ा।

कांग्रेस का यह गुट भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के मामले में चुप्पी सी साध लेता है, आखिर क्यों? भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास लेखन का सबसे दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह रहा कि ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध जितने भी सशस्त्र स्वतंत्रता संग्राम हुए उन्हें विद्रोह, गदर, लूट, डकैती और आतंकवाद की संज्ञा दे दी गई और सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर शासन में सहभागिता कर रही कांग्रेस ने भी तथाकथित स्वाधीनता संग्राम लड़ते हुए यही विचार रखा।

अंत तक डोमिनियन स्टेट की मांग करती रही कांग्रेस

क्रांतिकारियों ने ही सर्वप्रथम स्वतंत्रता की मांग की थी, जबकि कांग्रेस और उनके समर्थक अंत तक डोमिनियन स्टेट्स की मांग करते रहे। कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार के कंधे से कन्धा मिलाकर शासन करते हुए ऐसा विचित्र स्वतंत्रता संग्राम लड़ा कि एक भी बड़े नेता को न फांसी दी गई, न गोली मारी गई और न ही काला पानी की सजा हुई, फिर स्वाधीनता का पूरा श्रेय कांग्रेस के उदारवादी धड़े ने लूट लिया।

वामपंथियों ने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया

वामपंथियों ने तो हद कर दी। द्वितीय विश्व युद्ध के आरम्भ होते ही पाला बदल लिया और इंग्लैंड के पक्ष में भारत छोड़ो आंदोलन का घनघोर विरोध किया। सत्ता के भूखे ऐसे लोग क्रांतिकारियों को अंग्रेजों के साथ और वामपंथियों के सहयोग से आतंकवादी कहते रहे। क्रांतिकारियों को कभी लुटेरा, कभी पागल और कभी डकैत तक कहा गया।

कांग्रेस और वामपंथियों की साजिश

कांग्रेस, तथाकथित सेक्युलरों और वामियों ने ठीक उपर्युक्त प्रकार की रणनीति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विरुद्ध अपनाई। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आद्य सरसंघचालक केशव राव बलिराम हेडगेवार का योगदान सर्वविदित और अविस्मरणीय है और उनके निर्देश पर स्वाधीनता संग्राम में हजारों स्वयंसेवकों ने प्रत्यक्ष और परोक्ष रुप में आहुतियां दीं, परन्तु अत्यंत दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह रहा कि उसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कांग्रेस पोषित इतिहासकारों ने रेखांकित ही नहीं किया। हद तो तब हो गई जब 30 जनवरी सन् 1948 को महात्मा गांधी की हत्या का ठीकरा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर फोड़कर उसे प्रतिबंधित कर छवि धूमिल करने का दुष्कृत्य किया।

यह ठीक उसी प्रकार हुआ, जिस प्रकार ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध जितने भी सशस्त्र स्वतंत्रता संग्राम हुए, उनको विद्रोह, गदर, लूट, डकैती और आतंकवाद की संज्ञा दे दी गई और बरतानिया सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर शासन में सहभागिता कर रही कांग्रेस ने भी तथाकथित स्वाधीनता संग्राम लड़ते हुए यही विचार रखा।

स्वाधीनता के उपरांत भी न्याय नहीं हुआ। कांग्रेस सरकार में लगातार 11 वर्ष मौलाना अब्दुल कलाम आजाद भारत के शिक्षा मंत्री रहे और उन्होंने इतिहास के पन्नों को और विषाक्त कराया। यही नहीं, रही सही कसर कांग्रेस ने राज्य सभा से नुरुल हसन को प्रविष्ट कराकर सन् 1971 से सन् 1977 तक भारत का शिक्षा मंत्री बनाकर पूरी की।

कांग्रेस ने वामपंथियों और तथाकथित सेक्युलर इतिहासकारों की जमात भारत के सभी विश्वविद्यालय और महाविद्यालय में बैठा दी फलस्वरूप इन्होंने भी ब्रिटिश सरकार और कांग्रेस के इतिहास को बुलंद करते हुए, सशस्त्र स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के इतिहास को क्षत-विक्षत किया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास को विलोपित ही कर दिया।

इसलिए जब भी स्वाधीनता संग्राम में संघ के योगदान को रेखांकित किया जाता है,तो कांग्रेस सहित सभी हिंदू विरोधी खेमे एकत्र होकर हंगामा खड़ा करने लग जाते हैं। अब देखिए न, क्रांतिकारियों को आतंकवादी, पागल, लुटेरा बताने वाले कांग्रेसियों और वामियों को महान् क्रांतिकारी राजगुरु के स्वयंसेवक होने पर इतना दर्द क्यों होना चाहिए? क्यों हो रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि राष्ट्र निर्माण और स्वतंत्रता संग्राम में संघ के योगदान को रेखांकित करने से कांग्रेस और वामियों के पैरों के नीचे से जमीन खिसक जाएगी? ये तो समय ही बताएगा, परन्तु महारथी राजगुरु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कर्मठ स्वयंसेवक थे। इस बात के संदर्भ और पुख्ता साक्ष्य उपलब्ध हैं।

अब जब से प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी ने संघ शताब्दी वर्ष में स्वाधीनता संग्राम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अवदान को रेखांकित किया है, तब से कांग्रेस और उनके समर्थकों के पेट में दर्द शुरू हो गया है। कांग्रेस और उनके समर्थकों का वश चलता तो वो ये भी कह देते कि डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने स्वाधीनता संग्राम में भाग ही नहीं लिया और न ही कभी राजगुरु से उनकी मुलाक़ात हुई! भला हो अनिल वर्मा जी का जिन्होंने अपनी पुस्तक, “अजेय क्रांतिकारी राजगुरु “में पृष्ठ क्रमांक 29 में डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार और महारथी राजगुरु का अमरावती में मिलने का वृतांत लिखा और ये पुस्तक अगस्त सन् 2008 में कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में सूचना प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार ने प्रकाशित की है।

राजगुरु की वीरोचित गाथा

राजगुरु की वीरोचित गाथा भी सुनिये। 17 दिसंबर 1928 को राजगुरु ने पंजाब केसरी लाला लाजपत राय के हत्यारे जे.पी. सांडर्स पर पहला फायर खोल दिया। उसके उपरांत सरदार भगत सिंह और महारथी सुखदेव ने सांडर्स का वध कर दिया। शिवराम हरि राजगुरु के दो कोड नाम क्रमशः रघुनाथ और एम याने महाराष्ट्र थे। शिवराम हरि राजगुरु भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान् क्रान्तिकारी थे और उनका बलिदान एक महत्वपूर्ण घटना थी।

राजगुरु का जन्म 24 अगस्त, सन् 1908 में पुणे जिला के खेड़ा गांव (अब राजगुरु नगर) में हुआ था। महज 6 वर्ष की आयु में पिता का निधन हो गया। वे बहुत छोटी उम्र में ही वाराणसी विद्याध्ययन करने एवं संस्कृत सीखने आ गये थे। हिन्दू धर्म-ग्रंन्थों तथा वेदों का अध्ययन तो किया ही लघु सिद्धान्त कौमुदी जैसा क्लिष्ट ग्रन्थ बहुत कम आयु में कण्ठस्थ कर लिया था। उन्हें कसरत (व्यायाम) का बेहद शौक था और छत्रपति शिवाजी की छापामार युद्ध-शैली के बड़े प्रशंसक थे। वाराणसी में विद्याध्ययन करते हुए राजगुरु का सम्पर्क अनेक क्रान्तिकारियों से हुआ।

बेहतरीन निशानेबाज थे राजगुरु

चन्द्रशेखर आजाद से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उनकी पार्टी हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से तत्काल जुड़ गये। आजाद की पार्टी के अन्दर राजगुरु को रघुनाथ के छद्म-नाम से जाना जाता था। चन्द्रशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह और यतीन्द्रनाथ दास आदि क्रान्तिकारी इनके अभिन्न मित्र थे। राजगुरु, हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन में बेहतरीन निशानेबाज माने जाते थे।

साण्डर्स का वध करने में राजगुरु ने भगत सिंह तथा सुखदेव का पूरा साथ दिया था जबकि चन्द्रशेखर आजाद ने छाया की भाँति इन तीनों को सामरिक सुरक्षा प्रदान की थी। 23 मार्च सन् 1931 को उन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव के साथ लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी के तख्ते पर झूल कर अपने नाम को भारत के अमर बलिदानियों में प्रमुखता से साथ दर्ज करा दिया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रचारक एवं पत्रकार नरेंद्र सहगल जी ने प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर ‘भारतवर्ष की सर्वांग स्वतंत्रता’ पुस्तक लिखी, जिसके अनुसार, ‘सरदार भगत सिंह और राजगुरु ने अंग्रेज अफसर सांडर्स को लाहौर की मालरोड पर गोलियों से उड़ा दिया। फिर दोनों लाहौर से निकल गए। राजगुरु नागपुर आकर डॉ. हेडगेवार से मिले। राजगुरु संघ के स्वयंसेवक थे’।

मोहिते के बाड़ा की शाखा में थे स्वयंसेवक

नरेंद्र सहगल की पुस्तक में प्रमाणित किया गया कि राजगुरु संघ की मोहिते के बाड़ा की शाखा के स्वयंसेवक थे। सहगल की लिखी पुस्तक के अनुसार नागपुर के भोंसले वेदशाला के छात्र रहते हुए राजगुरु, संघ संस्थापक हेडगेवार के बेहद करीबी रहे। पुस्तक में यह भी दावा किया गया है कि सुभाष चंद्र बोस भी संघ से काफी प्रभावित थे। भारतवर्ष की सर्वांग स्वतंत्रता’ की भूमिका सरसंघचालक श्री मोहन भागवत जी ने लिखी है।

यह इसलिए भी प्रमाणित है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आद्य संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार, कलकत्ता में अपने अध्ययन कल से ही क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति के अंतरंग समिति के सदस्य थे, और विभिन्न क्रांतिकारी संगठनों के क्रान्तिकारी, ब्रिटिश सरकार की पकड़ से दूर रहकर गुप्त प्रवास हेतु बुंदेलखंड, महाकौशल और नागपुर आते थे। नागपुर उस समय मध्य प्रांत और बरार की राजधानी था, तथा भौगोलिक दृष्टि से गुप्त प्रवास के लिए अत्यंत सुरक्षित था और डॉ. हेडगेवार ने भी नागपुर आकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना कर ली थी। इसलिए क्रांतिकारियों का ब्रिटिश सरकार की पकड़ से दूर रहने के लिए,डॉ. हेडगेवार के पास गुप्त प्रवास पर आना स्वाभाविक था, साथ ही शाखाओं में स्वयंसेवक के रूप भाग लेना, गुप्त प्रवास का ही एक हिस्सा रहा होगा। राजगुरु निश्चित ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक थे और इसलिए उन्होंने संघ में प्रचलित काली टोपी सदैव धारण की।

कांग्रेस सरकार के समय प्रकाशित हुई पुस्तक

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में अगस्त 2008 को अनिल वर्मा की पुस्तक “अजेय क्रांतिकारी राजगुरु” प्रशासन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार द्वारा प्रकाशित की गई, जिसमें डॉ. हेडगेवार और राजगुरु के मिलन के संबंध में प्रकाश डाला गया है। इस पुस्तक के पृष्ठ क्रमांक 28 में अनिल वर्मा लिखते हैं कि ” राजगुरु बनारस से अमरावती पहुंचे। उन्होंने अमरावती जाकर हनुमान प्रसारक मंडल की ग्रीष्मकालीन शिविर में प्रशिक्षण हेतु अपना नाम दर्ज करवा लिया। पृष्ठ क्रमांक 29 में लिखते हैं कि ” यहां राजगुरु ने युवकों से चर्चा करते हुए अंग्रेजों को देश के बाहर निकालने एवं मातृभूमि को स्वतंत्र कराने की इच्छा जाहिर की। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) के संस्थापक सरकार्यवाहक डॉ.केशव बलिराम हेडगेवार इस शिविर में पधारे, एक वर्ष पूर्व ही उन्होंने सन् 1925 में इस संगठन की नींव रखी थी। फिर राजगुरु करीब एक वर्ष तक अमरावती में सामाजिक एवं देशभक्ति से संबंधित कार्यों में संलग्न रहे।”

पुस्तक के हवाले से स्पष्ट है कि सन् 1926 में ही डॉ. हेडगेवार और राजगुरु की अमरावती में भेंट हो गई थी और लेखक महोदय ने एक वर्ष तक साथ कार्य करने का संकेत भी दिया है। इन बातों से स्पष्ट है कि राजगुरु का संघ से गहरा नाता था।

राजगुरु की डॉ हेडगेवार से मुलाकात

सांडर्स के वध के उपरांत राजगुरु अमरावती आ गए। यहां से अकोला गए और राजराजेश्वर मंदिर के समीप एक किराए के घर में रहने लगे, जिसका इंतजाम बापू साहब सहस्त्रबुद्धे ने किया था। इसी दौरान, 1929 में जब राजगुरु नागपुर में थे, तब उनकी मुलाकात पुनः डॉ. हेडगेवार से हुई। सरसंघचालक ने उन्हें सलाह दी कि वे पुणे न जाएं। ब्रिटिश सरकार से बचाने के लिए उन्होंने राजगुरु के रहने की व्यवस्था भैयाजी दाणी के उमरेड स्थित एक स्थान पर कर दी थी। हालांकि, राजगुरु ने इस सलाह को नहीं माना और पुणे चले गए, जहां 30 सितंबर 1929 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। सन्दर्भ के लिए देखें पुस्‍तक- द फाउंडर ऑफ आर. एस. एस. : डॉ. हेडगेवार (ची. प. भिशीकर, केशव संघ निर्माता, सुरुचि प्रकाशन: नई दिल्ली, 1979, पृष्ठ 70)

डॉ. हेडगेवार से राजगुरु के दोबारा नागपुर में मिलने की पुष्टि अनिल वर्मा ने की है। उन्होने अपनी पुस्तक ‘अजेय क्रन्तिकारी राजगुरु’ के पृष्ठ क्रमांक 106 में लिखा है कि ” राजगुरु ने फरारी के इस दौर में नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक कार्यकर्ता के यहां शरण ली थी और आर.एस.एस. के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार से भी मुलाकात की थी।”

उपरोक्त साक्ष्यों के आलोक में यह प्रमाणित हो जाता है कि महान् क्रांतिकारी महारथी राजगुरु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भारत के स्वाधीनता संग्राम में अविस्मरणीय योगदान रहा है।

अंग्रेजों की क्रूरता और साजिश

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में 23 मार्च सन् 1931 का दिन बलिदान दिवस के रूप में जाना जाता है, परंतु वास्तविकता यह है कि लाहौर षड्यंत्र केस में ब्रिटिश सरकार द्वारा इस दिन कानून और न्याय की हत्या कर,सजा के एक दिन पूर्व ही 23 मार्च को निर्दोष भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी पर चढ़ा दिया था। अति तो तब हुई जब ब्रिटिश सरकार ने इन महारथियों के पार्थिव शरीर को काटकर उनके टुकड़ों को सतलज नदी के किनारे हुसैनीवाला में चुपके से फेंक कर जला दिया और हैवानियत तथा क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं । अतः यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का काला दिन और प्रथम न्यायिक हत्या थी। औपनिवेशिक न्याय प्रणाली का एक काला अध्याय है।

सब कुछ पूर्व निर्धारित था, जिस सांडर्स मर्डर केस (सन् 1928) में फांसी हुई, उसकी मूल एफ.आई.आर. में भगत सिंह, सुखदेव या राजगुरु का नाम नहीं था, उसमें केवल दो अज्ञात लोगों का उल्लेख था। विचारण भी गैर-कानूनी था, क्योंकि एक विशेष ट्रिब्यूनल के माध्यम से मुकदमा चलाया गया था, यह भी वैधानिक नहीं था । यह ट्रिब्यूनल निष्पक्ष नहीं था, जिसने बचाव पक्ष को साक्ष्य पेश करने का उचित मौका नहीं दिया। दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह था कि ट्रिब्यूनल के विरुद्ध अपील भी नहीं सकती थी। यह सजा नहीं साजिश थी जब निर्दोष स्वातंत्र्य वीरों को फांसी पर एक दिन पहले लटका दिया गया।

परन्तु क्या यह अन्याय नहीं है? कांग्रेस अंग्रेजों के साथ खड़ी थी। यह विचारणीय नहीं है कि गांधी जी स्वामी श्रद्धानंद के हत्यारे अब्दुल रशीद का केस लड़ने तैयार थे परंतु गांधी जी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के मामले में चुप्पी सी साध लेते हैं, आखिर क्यों?

Topics: वंदे मातरम पर विवादराजगुरभगत सिंहराष्ट्रगीतकांग्रेस की साजिशस्वाधीनता संग्रामसुखदेवकांग्रेस वंदे मातरम
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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