अविभाजित भारत में जैन समुदाय संख्या में छोटा, लेकिन अपने प्रभाव और सामाजिक-आर्थिक भूमिका की दृष्टि से महत्वपूर्ण था। वर्तमान पाकिस्तान में लाहौर, सिंध, स्यालकोट, पेशावर, रावलपिंडी और मुल्तान जैसे शहरों में जैन समुदाय की उल्लेखनीय उपस्थिति थी। हालांकि उस पूरे क्षेत्र की आबादी में उनकी संख्या एक प्रतिशत से भी कम थी। 1941 की जनगणना में वर्तमान पाकिस्तान में आने वाले पश्चिमी पंजाब के क्षेत्र में जैन आबादी करीब 0.1 प्रतिशत दर्ज की गई थी।
लाहौर, स्यालकोट, रावलपिंडी और दूसरे नगरों में जैन समाज के मंदिर, स्थानक, धर्मशालाएं और अन्य सामुदायिक संस्थाएं थीं। स्यालकोट में विभाजन से पहले कई जैन मंदिर थे। रावलपिंडी का भाभरा बाजार भी जैन व्यापारी समुदाय की पुरानी उपस्थिति की स्मृति है। लाहौर में भी अनेक जैन मंदिर थे। जैन संत इन शहरों में चातुर्मास करते थे। चातुर्मास वर्षा के वे चार महीने होते हैं, जब यात्रा रोक दी जाती थी।
संत धार्मिक संस्थानों में ही रहते और वहां श्रद्धालुओं को प्रतिदिन धार्मिक मार्गदर्शन देते थे। जैन समुदाय का जीवन धार्मिक संस्थानों तक सीमित नहीं था। व्यापारिक मार्गों से जुड़े इन नगरों में जैन व्यापारी कपड़े, अनाज, सामान्य व्यापारिक वस्तुओं, आभूषण और बैंकिंग के कारोबार में सक्रिय थे। इस प्रकार मंदिर, स्थानक, धर्मशालाएं और व्यापारिक प्रतिष्ठान जैन समाज के सामाजिक जीवन का अभिन्न हिस्सा थे।
मुल्तान के पार्श्वनाथ जैन श्वेतांबर मंदिर में पूरे पंजाब की श्रेष्ठतम लघुचित्र कला में से कुछ उदाहरण मौजूद हैं। इसका निर्माण नाहटा परिवार ने कराया था। यह परिवार बहावलपुर के नवाबों और खान-ए-कलात के दरबारी जौहरी थे। मंदिर की छतों पर सुंदर आकृतियां और चित्रांकन किया गया है, जिनमें शत्रुंजय, शिखरजी और गिरनारजी पर्वतों जैसे पवित्र तीर्थस्थलों को भी चित्रित किया गया है। इन चित्रों में नीला रंग तैयार करने के लिए अफगानिस्तान से आने वाले महंगे लैपिस लाजुली पत्थर को पीसकर इस्तेमाल किया गया था।
जैन धर्म से जुड़ी अनेक कलाकृतियां लाहौर संग्रहालय, उमरकोट संग्रहालय और बहावलपुर संग्रहालय में रखी हैं। दुखद बात यह है कि प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता और खोजकर्ता ऑरेल स्टीन द्वारा उत्खनन में प्राप्त जैन मूर्तियों का संग्रह आज भी लाहौर संग्रहालय के भंडार में बंद है। जैन साहित्य भी लाहौर संग्रहालय की लाइब्रेरी, पंजाब विश्वविद्यालय के वूल्नर संग्रह, रबवाह की खिलाफत लाइब्रेरी और लाहौर की पंजाब पब्लिक लाइब्रेरी में सुरक्षित है।
विभाजन का आघात
जब मुस्लिम लीग ने भारत के विभाजन के लिए आंदोलन तेज किया और यह स्पष्ट होने लगा कि ब्रिटिश वास्तव में भारत को विभाजित कर देंगे, तब जैन समुदाय के लोगों में भी असुरक्षा की भावना पैदा हुई। उन्हें अपने जीवन, महिलाओं और बच्चों की गरिमा, भविष्य तथा अपने धार्मिक और सामाजिक संस्थानों की सुरक्षा को लेकर चिंता होने लगी। विभाजन के कारण जैन परिवारों को भी अपनी पैतृक भूमि, घर और व्यापारिक प्रतिष्ठान छोड़ने पड़े। उन्हें जल्दी ही समझ में आ गया कि उनकी अचल संपत्तियां-घर, स्कूल, पुस्तकालय, मंदिर, दुकानें और व्यापारिक प्रतिष्ठान आदि-पीछे छूट जाएंगी। इसलिए वे अपने परिवारों और जितनी संपत्ति साथ ले जा सकते थे, उसे लेकर भारत के शहरों की ओर निकल गए।
हिंसा और विस्थापन से जैन परिवार भी प्रभावित हुए। उनके लिए यह केवल घर छोड़ने की त्रासदी नहीं थी। उनके पीछे वे मंदिर, स्थानक, धर्मशालाएं, पुस्तकालय और सामुदायिक संस्थाएं भी छूट गईं, जो पीढ़ियों से उनके धार्मिक और सामाजिक जीवन का केंद्र थीं। 1947 के बाद पाकिस्तान में बचे अनेक जैन धार्मिक स्थल धीरे-धीरे दूसरे उपयोगों में चले गए या नष्ट हो गए।
जैन समुदाय के विस्थापन का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि उन्होंने अपने धार्मिक प्रतीकों और साहित्य को यथासंभव साथ ले जाने का प्रयास किया, लेकिन अचल संपत्तियां और अनेक संस्थान पाकिस्तान में ही रह गए। उपलब्ध अध्ययनों के अनुसार, विभाजन के समय पाकिस्तान की जैन आबादी का लगभग पूरा हिस्सा भारत चला गया।
भारत में सुरक्षित पहुंचने के बाद उन्होंने अपने इस पलायन के विषय में सार्वजनिक रूप से बहुत कम बोलना पसंद किया। परिणाम यह हुआ कि उनके विस्थापन और पलायन का कोई विस्तृत सार्वजनिक रिकॉर्ड मुश्किल से उपलब्ध है।
नई जगहों पर नया जीवन
जैन परिवार मुख्य रूप से दिल्ली, लुधियाना, जयपुर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे शहरों में छोटे-छोटे समूहों के रूप में जाकर बसे। पश्चिमी पंजाब से आए भाभरा जैन परिवारों का बड़ा हिस्सा लुधियाना और अंबाला जैसे शहरों में बस गया। दिल्ली में भी पश्चिमी पंजाब से आए जैन परिवारों की महत्वपूर्ण उपस्थिति बनी।
रावलपिंडी सहित पश्चिमी पंजाब और पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों से आए परिवारों ने उत्तर भारत के विभिन्न नगरों में अपना नया सामाजिक जीवन खड़ा किया। मेरठ का जैन नगर भी विभाजन से जुड़े जैन विस्थापन की स्मृतियों से जोड़ा जाता है। हालांकि इस तरह के स्थानीय पुनर्वास की प्रत्येक कहानी का विस्तृत दस्तावेजी रिकॉर्ड अलग-अलग स्तर पर उपलब्ध है, इसलिए इसे व्यापक जैन पुनर्वास का एक उदाहरण मानना अधिक उचित है।
भाभरा व्यापारी समुदाय, जो मुख्य रूप से जैन था, हालांकि उसका एक छोटा हिस्सा सिख पंथ को मानता था, ने लाहौर के थारी भाभरियां और रावलपिंडी के भाभरा बाजार जैसे अपने पुराने निवास-क्षेत्र खाली कर दिए। व्यापार, बैंकिंग और सोने-चांदी के कारोबार में अग्रणी इस समुदाय के लोग अपने साथ अपनी व्यावसायिक दक्षता भी नई जगहों पर लेकर गए।
पूर्वी पाकिस्तान, यानी वर्तमान बांग्लादेश में रहने वाले जैन भी विभाजन से समान रूप से प्रभावित हुए। उस कठिन समय में उन्हें अनेक खतरों का सामना करना पड़ा। फिर भी, उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उन्होंने अहिंसा के सिद्धांत से विचलित होकर किसी से प्रतिशोध नहीं लिया। इसकी जानकारी 2013 में कैलिफोर्निया, अमेरिका स्थित क्लेरमोंट लिंकन यूनिवर्सिटी के शोधार्थी मैथ्यू फिशर द्वारा करीब 40 जैन बचे हुए लोगों के वीडियो-रिकॉर्ड किए गए साक्षात्कारों से सामने आई।

पाकिस्तान में जैन धर्म की प्राचीन जड़ें
वर्तमान पाकिस्तान में जैन समुदाय की जड़ें कई शताब्दियों पुरानी हैं। जैन समुदाय की मान्यता है कि इस क्षेत्र में उनकी उपस्थिति भगवान महावीर के समय से रही है। कहा जाता है कि महावीर जी ने पंजाब के भेरा की यात्रा की थी, जहां 15वीं शताब्दी में उनके सम्मान में एक मंदिर बनाया गया। इसके बाद महावीर जी सिंध के थारपारकर जिले के रास्ते गुजरात गए। माना जाता है कि जैन समुदाय के सबसे पुराने केंद्रों में टैक्सिला और थारपारकर शामिल थे। बाद में व्यापारिक मार्गों के जरिए जैन समुदाय पंजाब और सिंध के दूसरे क्षेत्रों में फैल गया।
परंपरा के अनुसार टैक्सिला का संबंध जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋ षभदेव, जिन्हें आदिनाथ या ऋ षभनाथ भी कहा जाता है, से जुड़ा है। मान्यता है कि उन्होंने अयोध्या का क्षेत्र अपने पुत्र भरत को और टैक्सिला का क्षेत्र अपने दूसरे पुत्र बाहुबली को दिया था।
श्वेतांबर जैन ग्रंथों आवश्यक चूर्णि और आवश्यक निर्युक्ति के अनुसार ऋ षभनाथ एक बार विचरण करते हुए मुनि के रूप में टैक्सिला पहुंचे थे। बाहुबली उस समय यात्रा पर थे। उन्हें जब अपने पिता के वहां आने की जानकारी मिली तो वे उनका स्वागत करने के लिए नगर की ओर लौटे, लेकिन तब तक ऋषभनाथ वहां से जा चुके थे। इसके बाद बाहुबली ने उनके चरणचिह्नों की प्रतिष्ठा की। उन्होंने वहां एक सिंहासन स्थापित किया और उसके ऊपर धर्म का विशाल चक्र बनवाया।
महानिशीथ सूत्र में इस धर्मचक्र को धर्मचक्र तीर्थ कहा गया है और इसे आठवें तीर्थंकर चंद्रप्रभु का निवास बताया गया है। इसी कारण टैक्सिला को ‘धर्मचक्र भूमि’ भी कहा जाता है।
मौर्य सम्राट संप्रति ने अपने पिता और सम्राट अशोक के नेत्रहीन पुत्र कुणाल की स्मृति में टैक्सिला में एक जैन मंदिर बनवाया था, जिसे कुणाल स्तूप कहा जाता है। दूसरी-तीसरी शताब्दी के ग्रंथ प्रभावकचरित में उल्लेख मिलता है कि उस समय टैक्सिला में
लगभग 500 जैन मंदिर थे और वहां जैन समुदाय की अच्छी-खासी आबादी थी।
सिकंदर के साथ आए इतिहासकारों ने ऐसे लोगों का उल्लेख किया है जिन्हें उन्होंने ‘जिम्नोसोफिस्ट’ यानी नग्न साधु या दार्शनिक कहा। संभव है कि इनमें जैन साधु भी शामिल रहे हों। टैक्सिला में कई जैन स्तूप थे, जिनमें से एक की पहचान ब्रिटिश पुरातत्ववेत्ता जॉन मार्शल ने की। इसके बाद हुए उत्खननों में भी जैन धर्म से जुड़ी संरचनाएं सामने आई हैं। इनमें चकवाल जिले के मूर्ति मंदिर स्थल पर मिले चिराना पादुका भी शामिल हैं।टैक्सिला में जॉन मार्शल ने सिरकप के ‘एफ’ और ‘जी’ ब्लॉक में स्थित मंदिरों को जैन मंदिर माना था। उनका मानना था कि इनकी स्थापत्य शैली मथुरा के जैन स्तूप कंकाली टीला से मिलती-जुलती है।
दिलचस्प बात यह है कि आचार्य धनेश्वरसूरि के शत्रुंजय माहात्म्य में उल्लेख मिलता है कि महुवा के व्यापारी जावड़ शाह ने विक्रम संवत 108 अर्थात 51 ईस्वी में पालिताना के मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया था। वह टैक्सिला से ऋ षभनाथ की एक प्रतिमा अपने साथ लेकर आया और उसे शत्रुंजय मंदिर समूह के मुख्य मंदिर में प्रमुख देवता के रूप में स्थापित किया। गुजरात स्थित जैन तीर्थ शत्रुंजय के अभिलेखों में टैक्सिला के जादव शाह नामक व्यक्ति द्वारा दिए गए दान का भी उल्लेख मिलता है।
चीनी यात्री ह्वेनसांग (Xuanzang) ने सातवीं शताब्दी में जैन धर्म के दिगंबर और श्वेतांबर, दोनों संप्रदायों के साधुओं से मुलाकात की थी।
पाकिस्तानी पुरातत्वविद् डॉ. मुहम्मद हमीद ने इस क्षेत्र में जैन धर्म के इतिहास को तीन चरणों में विभाजित किया है। पहला चरण पहली और दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व का है, जब सिरकप और टैक्सिला में जैन धर्म के शुरुआती प्रमाण मिलते हैं। इसी प्रकार के प्रमाण चकवाल जिले के मूर्ति में भी मिले हैं। इनसे जुड़े अवशेष लाहौर संग्रहालय में सुरक्षित हैं।
दूसरे चरण में, आठवीं से 12वीं शताब्दी ईस्वी के बीच जैन धर्म सिंध के थारपारकर क्षेत्र में फैला और इस दौरान अनेक मंदिरों का निर्माण हुआ।
तीसरे चरण में मुगल काल से लेकर ब्रिटिश शासन तक जैन मंदिरों, सामुदायिक भवनों और स्थानकों का निर्माण जारी रहा। यह परंपरा 1947 में अचानक विस्थापन के साथ थम गई।
सिंध का थारपारकर क्षेत्र गुजरात और राजस्थान के जैन व्यापारियों से गहरे रूप से जुड़ा हुआ था। मध्यकाल में व्यापारिक मार्गों से जुड़े पंजाब के लगभग सभी प्रमुख नगरों में जैन मंदिर बनने लगे। यही कारण था कि विभाजन के समय जैन समुदाय के बहुत से लोग गुजरात और राजस्थान की ओर चले गए।

जैन समुदाय के लोग कपड़ा, अनाज, सामान्य व्यापारिक वस्तुओं, आभूषण और बैंकिंग के कारोबार में बड़े पैमाने पर सक्रिय थे। 1947 में सिंध में कुछ जैन परिवार रह गए थे, लेकिन 1970 के दशक में हुए दंगों के दौरान उन्होंने भी सिंध छोड़ दिया। विभाजन ने जैन समाज को केवल भौगोलिक रूप से नहीं बांटा, बल्कि उसकी सदियों पुरानी संस्थागत विरासत को भी दो हिस्सों में छोड़ दिया।
भारत में जैन परिवारों ने नए नगर बसाए, जबकि पाकिस्तान में छूटे मंदिर, मूर्तियां, पुस्तकें और पुरातात्विक अवशेष उनके अतीत की गवाही देते रहे।
आज यह विरासत याद दिलाती है कि उपमहाद्वीप का इतिहास केवल राजनीतिक सीमाओं का इतिहास नहीं, बल्कि उन समुदायों की साझा सभ्यता का भी इतिहास है जिन्हें विभाजन ने बिखेर दिया।
(लेखिका की एक चर्चित पुस्तक ‘बलूचिस्तान: इतिहास के निशाने पर’है)

















