इस समय असम के अनेक जिले बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हैं। असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एएसडीएमए) ने बताया है कि शिवसागर, चराइदेव, जोरहाट, गोलाघाट, धेमाजी, लखीमपुर और बिश्वनाथ जिले में बाढ़ का प्रकोप है। 12 लाख से अधिक लोग प्रभावित हैं। करीब 3,500 गांव डूब गए हैं। हजारों घर पूरी तरह नष्ट हो गए हैं। लोगों के पास तन पर पहने कपड़ों के अलावा और कुछ भी नहीं बचा है। अब तक 90 के आसपास शव मिल चुके हैं। मौत की यह संख्या और बढ़ने की संभावना है।
कुछ ही घंटों में बाढ़ का पानी सैकड़ों किलोमीटर क्षेत्र में फैल गया। पानी के साथ आ रही मिट्टी में लोग अपने घरों में ही जिंदा दब गए। अब पानी कम होने के साथ ही सरकारी और सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ता गांवों में पहुंच रहे हैं। वे लोग वहां दबे लोगों के शवों को बाहर निकाल रहे हैं। इस बीच कुछ लोगों पर प्रभु की बड़ी कृपा भी हुई। कई दिनों तक कीचड़ में दबे रहने के बाद भी अनेक लोग जिंदा बच गए हैं।
ऐसी ही एक महिला शिवसागर जिले में मिली है। वह गले तक 10 दिन तक कीचड़ में दबी रही। उस पर इतना कीचड़ था कि वह अकेले दम पर उससे बाहर नहीं हो सकती थी। पानी कम होने पर सेवा भारती के कार्यकर्ता उसके गांव में पहुंचे तो उनकी नजर उस पर पड़ी। उन्होंने तत्काल कीचड़ हटाकर उसे बाहर निकाला। ऐसे ही बड़ी संख्या में पशुधन का नुकसान हुआ है। जगह-जगह पशु मारे गए हैं। बाढ़ के शुरुआती दिनों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सेवा भारती के कार्यकर्ताओं ने राहत कार्य चलाया।
40,168 परिवारों तक पहुंची सहायता
20 जुलाई से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विभिन्न संगठनों के लगभग 1,912 स्वयंसेवक बचाव, राहत, घर निर्माण तथा सफाई अभियान में लगे हैं। बाढ़ प्रभावित शिवसागर, चराईदेव और जोरहाट जिलों के लगभग 378 गांवों के करीब 40,168 परिवारों को स्वयंसेवकों ने राहत सामग्री प्रदान करने के साथ-साथ विभिन्न प्रकार से सहायता पहुंचाई है। शिवसागर जिले के बेतबारी क्षेत्र के काकती गांव, डी-गांव, 2 नंबर कोंवर गांव, नेपाली खूंटी, बिहुबोर और चेतिया कैवर्ता गांव में स्वयंसेवकों ने बचाव अभियान चलाकर 200 से अधिक लोगों को बाढ़ के प्रकोप से बचाकर सुरक्षित स्थानों और राहत शिविरों में स्थानांतरित किया। सुंदर पुखुरी, बामुन पुखुरी, गेलेकी और राजाबारी जैसे जलमग्न क्षेत्रों में छोटी नावों की सहायता से फंसे हुए परिवारों तक पहुंचकर पका हुआ भोजन, शुद्ध पेयजल, जीवनरक्षक दवाइयां, कपड़े और अन्य आवश्यक सामग्री वितरित की गई है। वहीं, जोरहाट जिले के एलेंगमोरा, कातिराम चुक, कुलाई चुक, नालिया चुक, शेनचोवा चुक और चारिघरिया चुक में भी राहत अभियान जारी है। बाढ़ पीड़ित परिवारों को दी गई प्रमुख राहत सामग्रियों में चावल, चीनी, दाल, शिशु आहार, नमक, आलू, पहनने व बिछाने के कपड़े, बर्तन, तिरपाल, मोमबत्ती, मच्छर भगाने की कॉइल, सूखा भोजन, बिस्कुट, शुद्ध पेयजल, साबुन, फिटकरी और आवश्यक दवाइयों सहित अन्य उपयोगी वस्तुएं शामिल हैं।
पीड़ितों तक राशन, पीने का पानी, दवाइयां, कपड़े, मच्छरदानी आदि वस्तुएं पहुंचाई गईं। कई दिनों से बचाव कार्य में लगे सेवा भारती के कार्यकर्ता पापू बारदोलोई बताते हैं, “सेवा भारती के कार्यकर्ता नाव से कई घंटे की यात्रा के बाद शिवसागर जिले की नेपाली बस्ती में पहुंचे, तो वहां का मंजर देखकर दंग रह गए। गांव में कुछ भी नहीं बचा है। सारे घर मिट्टी में दब गए हैं। कार्यकर्ताओं को कुछ शव मिले हैं।”
उन्होंने यह भी बताया,“जहां बाढ़ की संभावना नहीं है, वहां बाढ़ आई है। और ऐसी बाढ़ कि इसके पीड़ित जिंदगी भर इसे भूल नहीं सकते।” जोरहाट के सामाजिक कार्यकर्ता अमल गोस्वामी बताते हैं, “घरों से जैसे-जैसे पानी निकल रहा है, वैसे-वैसे संघ और सेवा भारती के कार्यकर्ता उनकी सफाई में लगते हैं। इससे बाढ़ पीड़ितों को बड़ी मदद मिल रही है। हालांकि अधिकांश घर खराब हो गए हैं।”

बाढ़ ने लोगों को पूरी तरह उजाड़ दिया है। बाढ़ के पानी में उनका सब कुछ बह गया है। सबसे बड़ी चुनौती है पीड़ितों के लिए घर का निर्माण करना। अच्छी बात यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सेवा भारती के कार्यकर्ताओं ने इस चुनौती को स्वीकार किया है। शिवसागर, चराइदेव जैसे जिलों में इन कार्यकर्ताओं ने बाढ़ पीड़ितों के लिए बांस से घर बनाने का काम शुरू कर दिया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, चराइदेव जिले के कार्यवाह कीर्ति गोगोई ने बताया, ”बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में संघ और सेवा भारती के कार्यकर्ता गृह निर्माण में लगे हैं। कोई कार्यकर्ता बांस काटता है, कोई उसे वहां पहुंचाता है, जहां घर बनाए जाने हैं।
घर बनाने में ऐसे कार्यकर्ताओं को लगाया गया है, जो इसके विशेषज्ञ हैं। साधन कम हैं, फिर भी कार्यकर्ता अपने स्तर से काम में लगे हैं। उनका एक ही लक्ष्य है कि जल्दी से जल्दी बाढ़ पीड़ितों को सिर छुपाने की जगह मिले, भले ही वह बांस से बना घर ही क्यों न हो।” उन्होंने यह भी बताया कि हर जिले में संघ के स्वयंसेवक और सेवा भारती के लगभग 200 कार्यकर्ता बांस से घर बनाने के काम में लगे हैं।
शिवसागर जिले के सामाजिक कार्यकर्ता नाबा गोागोई कहते हैं, “इतने घर नष्ट हुए हैं कि उन्हें बनाने में कम से कम छह महीने का समय लगेगा। इसी से बाढ़ की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है।” सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ता तो बाढ़ पीड़ितों के बीच काम कर ही रहे हैं, असम सरकार के कारिंदे भी दिन-रात इस काम में लगे हैं। स्वयं मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा राहत और पुनर्वास कार्य की देखरेख कर रहे हैं। इन सबको देखते हुए उम्मीद की जा सकती है कि जल्दी ही सभी बाढ़ पीड़ितों को सिर छुपाने के लिए एक घर मिल जाएगा।

















