यह श्लोक आधुनिक दौर में राष्ट्र निर्माण और नागरिक दायित्व की नई परिभाषा प्रस्तुत करता है:-
श्लोक-
कायेन मनसा वाचा धनेनापि जनेन च।
स्वदेशरक्षणार्थाय यतेत मतिमाज्जनः॥
भावार्थ-
शरीर, मन, वचन, कर्म, धन तथा जन किसी के भी द्वारा (या सभी से) बुद्धिमान् जन ‘स्वदेशरक्षा’ के प्रयत्न करे।
आज के संदर्भ में प्रासंगिकता : सक्रिय बुद्धिमत्ता, देश सेवा केवल सीमा पर नहीं, बल्कि बौद्धिक और व्यावहारिक स्तर पर भी। अपने कार्यक्षेत्र में पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी से कार्य करना।
समाज में सद्भाव, सत्य और राष्ट्र की एकता को मजबूत करने वाली भाषा का प्रयोग। देश की आर्थिक प्रगति में योगदान देना, सामाजिक एकजुटता, जन-जागरूकता और आपदा या संकट के समय समाज को संगठित करना। आज “स्वदेश रक्षा” केवल सीमा पर हथियार उठाने तक सीमित नहीं है; यह एक जागरूक, जिम्मेदार और आर्थिक-बौद्धिक रूप से सशक्त नागरिक बनने का संकल्प है।
















