बगराम एयरबेस को लेकर पिछले कुछ दिनों से अमेरिका और अफगानिस्तान की तालिबान हुकूमत के बीच तीखी तकरार कम होने की बजाय लगातार बढ़ती जा रही है। यह विवाद अफगानिस्तान की रणनीतिक स्थिति को प्रभावित करने वाला है इसलिए तालिबान इस बार के कार्यकाल में फूंक—फूंककर कदम रख रहा है। उधर अमेरिका अपनी क्षेत्रीय नीतियों, तालिबान की वैधता और मध्य एशिया में शक्ति-संतुलन के संदर्भ में अपने इस कदम को आंक रहा है। लेकिन अब तालिबान का ताजा बयान साफ बताता है कि बगराम पर वही ट्रंप की धमकियों को नजरअंदाज करने के मूड में है।
यह बगराम एयरबेस अफगानिस्तान की राजधानी काबुल से लगभग 65 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। यही वह बेस है जो अमेरिका और नाटो सेनाओं के लिए 2001 के बाद से सबसे महत्वपूर्ण सैन्य अड्डा रहा है। यहां से अमेरिका ने तालिबान, अल-कायदा और बाद में आईएसआईएस—के गुट पर हवाई हमले संचालित किए थे।
इस एयरबेस में लंबे रनवे होने की वजह से भारी भरकम B-52 बमवर्षक विमान और सी-17 परिवहन विमान आसानी से उतर सकते हैं। इसके अलावा यह चीन, ईरान, मध्य एशिया और पाकिस्तान के बीच रणनीतिक महत्व रखता है यानी किसी भी बड़े सैन्य या खुफिया अभियान के लिए यह एक ‘हब’ की तरह काम कर सकता है।
हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से तालिबान को चेतावनी दी थी कि अगर उन्होंने अमेरिका को बगराम एयरबेस के उपयोग की अनुमति नहीं दी, तो ‘गंभीर परिणाम’ भुगतने होंगे। ट्रंप की इस धमकी को दो संदर्भों में देख जा सकता है।
1, अमेरिका के लिए यह एयरबेस चीन और रूस पर निगरानी रखने का अहम केंद्र बन सकता है। अफगानिस्तान में अब अमेरिका की कोई स्थायी सैन्य मौजूदगी नहीं है, लेकिन बगराम को पुनः नियंत्रण में लेने से उसे मध्य एशिया में पुन: अपना दबदबा बनाने का मौका मिलेगा। 2, ट्रंप 2024 के चुनावों के बाद से लगातार बाइडन प्रशासन की अफगानिस्तान से वापसी नीति की आलोचना करते आए हैं। इस तरह की बयानबाजी ‘मजबूत नेता’ की उनकी छवि को भी ताकत देती है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि अगर तालिबान समझौते की भावना को तोड़ते हैं, तो अमेरिका के पास उनके खिलाफ कठोर कदम उठाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत दिया कि अमेरिका या तो आर्थिक प्रतिबंध बढ़ा सकता है या क्षेत्र में सैन्य दबाव बना सकता है। ट्रंप की इस धमकी के बाद तालिबान प्रवक्ता ने काबुल से एक सख्त बयान जारी किया है।
तालिबान के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने बयान में कहा है, ‘बगराम एयरबेस अफगानिस्तान की संप्रभुता का हिस्सा है। इसे किसी विदेशी ताकत को सौंपने का सवाल ही नहीं उठता।’ तालिबान ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अमेरिकी के कैसे भी दबाव में नहीं आने वाले हैं। वे अफगानिस्तान की धरती का उपयोग किसी बाहरी शक्ति के सैन्य अभियानों के लिए नहीं होने देंगे।
तालिबान के इस रुख की बात करें तो इसके पीछे तीन कारण बहुत स्पष्ट रूप से समझ आते हैं। 1, तालिबान अब खुद को एक वैध और स्वतंत्र शासन के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है। एयरबेस सौंपना उनकी जनता और लड़ाकों के बीच उनकी स्थिति को कमजोर कर सकता है। 2, बगराम पर नियंत्रण तालिबान की सैन्य-संरचनात्मक ताकत का प्रतीक है। इसे छोड़ा तो समझो ये एक बड़ा ‘रणनीतिक आत्मसमर्पण’ होगा। 3, चीन, रूस और ईरान जैसे देशों से तालिबान के संबंधों को देखते हुए, अमेरिका को एयरबेस सौंपना उनके भू-राजनीतिक समीकरणों को भी बिगाड़ सकता है।
लेकिन यहां यह भी सच है कि इस विवाद का असर सिर्फ अमेरिका और तालिबान तक सीमित नहीं रहने वाला है। चीन की बात करें तो अफगानिस्तान में स्थिरता और अमेरिकी उपस्थिति न होना चीन के लिए फायदे की स्थिति है। वह अपनी बेल्ट एंड रोड परियोजना को अफगानिस्तान तक बढ़ाना चाहता है।
इधर रूस भी मध्य एशिया में अमेरिका को फिर से प्रभावी होने देने से रोकना चाहता है। उधर पाकिस्तान तालिबान का समर्थन करते हुए भी यह नहीं चाहता कि अमेरिकी दबाव से उसकी सेना के ऊपर तनाव बढ़े। अगर अमेरिका बगराम को फिर से अपने नियंत्रण में लेने के लिए कोई कड़ा कदम उठाता है, तो इससे क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन में खतरनाक बदलाव हो सकते हैं। इसमें आतंकवादी संगठनों के पुनर्सक्रिय होने और अफगानिस्तान में हिंसा बढ़ने की भी आशंका है।
बगराम एयरबेस को लेकर अमेरिका और तालिबान के बीच जो टकराव उभर रहा है, वह केवल एक सैन्य ठिकाने की लड़ाई नहीं है—यह शक्ति, वैधता और भू-राजनीतिक नियंत्रण की जंग है। अमेरिका इसे मध्य एशिया में अपनी रणनीतिक वापसी के रूप में देखता है। तालिबान इसे अपनी संप्रभुता और आत्मसम्मान के प्रतीक के रूप में देखता है। क्षेत्रीय शक्तियां इस टकराव को अपने-अपने हितों के हिसाब से संतुलित करने की कोशिश करेंगी।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या ट्रंप प्रशासन इस मुद्दे पर आर्थिक/राजनयिक दबाव बढ़ाएगा या तालिबान की सख्ती के बाद वहां सैन्य विकल्पों पर भी विचार करेगा।

















