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शाश्वत मानवाधिकार की प्रबल पोषक : गीता

गीता और कानून वस्तुतः दोनों ही मानवता के लिए हित साधक एवं समाज के पोषक हैं। न कानून कुछ लोगों के स्वार्थ साधन के लिए बने हैं और न ही गीता धर्मविशेष को जन्मगत अधिकार देने की वकालत का पोथा है। दोनों में शाश्वत जीवन मूल्यों का बोध समाया है।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Dec 3, 2022, 10:17 am IST
in भारत, धर्म-संस्कृति
अर्जुन को गीता का उपदेश देते भगवान श्रीकृष्ण

अर्जुन को गीता का उपदेश देते भगवान श्रीकृष्ण

-डॉ. प्रणव पण्ड्या
इन दिनों दो आवाजें जोरदार ढंग से सुनने को मिलती हैं। एक गीता, दूसरी मानवाधिकार। गीता पर प्रवचन, भाष्य, कथाएँ व लेख आम हो चली हैं, वहीं मानवाधिकार पर जगह-जगह उठती आवाजें कहीं से सुनने, देखने, पढ़ने को मिल जायेंगी। मानवाधिकार अर्थात् मानवीय मूल्यों को जहाँ संरक्षण मिले, मानवीय विकास में आने वाली बाधाएँ जहाँ से दूर की जायें और श्रेष्ठता की दिशा में बढ़ने का संबल हर नागरिक को सहज रूप से मिल सके। न्यायिक दृष्टि से हर नर-नारी को इस तंत्र से भेद-भाव रहित न्याय पाने का अधिकार है। जिस तरह मानवाधिकार संगठन मानव जीवन के बाह्य अवरोधों को समाप्त करके जीने का मार्ग प्रशस्त करता है, ठीक उसी भाँति गीता मानव जीवन के आंतरिक प्रगति पर बल देती है।
गीता को एक धर्म विशेष के ग्रंथ से अक्सर जोड़ दिया जाता है, किंतु गीता में हिंदू, मुसलमान, ईसाई आदि मत—पंथ का विचार ही नहीं है। वह ग्रंथ इन सारे पंथ-भेदों से परे है, मानव जीवन को सत्य की ओर ले जाने की राह दिखाता है। इससे किसी को ‘आत्मज्ञान’ मिला, किसी को ‘भक्तियोग’ का लाभ, किसी ने उससे ‘चित्तवृत्तिनिरोधः’ का योग साधा। किसी को ‘कर्मयोग’ की स्फूर्ति मिली, तो किसी को उससे ‘अनासक्ति’ का बोध हुआ। राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में संलग्न राष्ट्र-भक्तों के लिए गीता सशक्त प्रेरणा-पुंज रही है। इस तरह इसमें मानव के स्वभावजन्य विकास, राष्ट्रीय उत्थान, जड़ता का निरोध जैसे भाव समाये हैं। गीता का बोध अत्यंत व्यापक है, बच्चों, बूढ़ों सभी के लिए हितकर, संसार में काम करने वाले लोगों और मोक्षपरायण निवृत्त मनुष्यों, सभी के उत्थान की दृष्टि इसमें है, जो सुख और दुख दोनों में समान मदद पहुँचाती है।
आम समाज कानून शब्द सुनते-सुनते ऊब चुका है, क्योंकि इन्हीं कानून के तथाकथित नुमाइंदों से उसका जीवन जटिल से जटिलतर होता जा रहा है। इसीलिए मानवाधिकार को लेकर लोग सशंकित हो उठते हैं, परन्तु गीता और कानून वस्तुतः दोनों ही मानवता के लिए हित साधक एवं समाज के पोषक हैं। न कानून कुछ लोगों के स्वार्थ साधन के लिए बने हैं और न ही गीता धर्मविशेष को जन्मगत अधिकार देने की वकालत का पोथा है। दोनों में शाश्वत जीवन मूल्यों का बोध समाया है। दोनों सत्य के संरक्षक हैं। दोनों में स्वतंत्रता, समरसता, समानता को बल देने वाले विचार हैं। गीता व्यापारी को व्यापार से तथा किसान को खेती से जीवन के परम लक्ष्य की प्राप्ति करा देती है, तो विद्यार्थी को विद्या का और तरुणों को इसके अध्ययन में यौवन के सदुपयोग का सहज बोध होता है। इस प्रकार की उदार समता, स्वतंत्रता इस ग्रंथ में समाई होने के कारण यह ‘सा ययोग’ है, जो समाज की जीवन शैली बदल सकता है, क्योंकि राष्ट्र जागरण के शाश्वत मूल मंत्र इसमें समाये हैं।
हमारे देश के सामने अशिक्षा, बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार, बालश्रम, साहित्यधारा में सृजनात्मकता का अभाव, धार्मिक अंधविश्वास, नारी शक्ति की उपेक्षा, दहेज जैसा विराट कुरुक्षेत्र खड़ा है। ग्लोबल स्तर पर इन दिनों औचित्य-अनौचित्य-परक टक्कर चल रही है। भलाई की राह न छोड़ते हुए, बुराई से संघर्ष के दौरान देश की गौरवमयी लोकतंत्र की परम्परा का पालन करते हुए बिल्कुल शांत चित्तवृत्तियों से काम लेने तथा श्रद्धा-समर्पण और बुद्धि को गीता समान रूप से महत्त्व देती है। अर्जुन को पूरा उपदेश सुनाने के बाद भगवान् उससे कहते हैं कि यह विचार अगर तुझे जँचे, तो इस पर अमल कर। इस तरह गीता सबको अद्भुत स्वातंत्र्य देकर जीवन व्यवहार में अनिर्णय की स्थिति से उबारने का साहस बँधाती है। ‘प्रज्ञा’ गीता का एक श्रेष्ठ शब्द है। जड़तापरक बंधन से रहित, मुक्त मन ‘प्रज्ञा’ है। बिना किसी रुकावट के उड़ने वाली स्वतंत्र बुद्धि प्रज्ञा है। गीता यही स्वतंत्रता हर वर्ग में चाहती है। इसीलिए गीता सब संप्रदायों से परे है। गीता दबंगों की तरह अपने निर्णय थोपती नहीं, न ही अनिर्णय में रहने देना चाहती है। वह विश्व को एक घटक मानते हुए भी सबको स्वतंत्र प्रगति की प्रेरणा देती है। वैसे भी बाह्य जीवन के विकास के लिए न्याय चाहिए और अन्तःशक्ति के विकास हेतु प्रज्ञाशक्ति। वह हर व्यक्ति, हर परिवार, हर राष्ट्र को सशक्त इकाई के रूप में देऽना चाहती है। यदि गीता के तत्व चिंतन को हमारा राष्ट्र, हमारी सरकार, हमारा प्रशासन एवं अंतःराष्ट्रीय जगत अपना सके, तो मानवाधिकार के हनन का प्रश्न ही न उठे। सबके स्वत्व स्वतः सुरक्षित रहें। यही जीवन मोक्ष है, यही निष्काम कर्म भी। आइये गीता जयंती पर मिलकर आत्म-चिंतन करें, बोध जगायें और गीता जयंती पर शाश्वत मानवाधिकार की संरक्षक गीता की सार्थकता सिद्ध करें।
(लेखक देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार के कुलाधिपति हैं)

 

गीता का माहात्मय
गीता में भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य वाणी है। इसका महत्व अपरिमित है। शेष, महेश, गणेश भी इसकी महिमा का पूर्णरूपेण गान नहीं कर सकते। इतिहास, पुराणों आदि में जगह-जगह इसकी महिमा का उल्लेख किया गया है। सत्य कथन तो यह है कि इसकी महिमा का पूर्णतया वर्णन हो ही नहीं सकता। गीता एक परम अद्भुत रहस्यमय दार्शनिक ग्रन्थ है। इसमें पूर्ण वेदों के सार अंश का संग्रह किया गया है। इसका आशय इतना गूढ़ और गंभीर है कि आजीवन निरन्तर अभ्यास करते रहने पर भी यह पूर्ण रूप से बोधगम्य नहीं हो पाता। फिर भी एकाग्रचित्त होकर श्रद्धा-भक्ति सहित विचार करने से इसके प्रत्येक पद में जीवन का गूढ़तम रहस्य छिपा हुआ प्रतीत होता है।
भगवान् के गुण, प्रभाव, स्वरूप, तत्त्व, रहस्य और उपासना तथा कर्म एवं ज्ञान का वर्णन जिस प्रकार इस गीता शास्त्र में किया गया है, वैसा अन्य ग्रन्थों में एक साथ मिलना असंभव है। महाभारत में भी कहा गया है- ‘सर्व शास्त्रमयी गीता’, परन्तु इतना ही कहना यथेष्ट नहीं है, क्योंकि सम्पूर्ण शास्त्र की उत्पत्ति वेदों से हुई। वेदों का प्राकट्य भगवान् ब्रह्माजी के मुख से हुआ और ब्रह्माजी भगवान् के नाभि-कमल से उत्पन्न हुए। इस प्रकार शास्त्र और भगवान् के मध्य अत्यधिक दूरी हो गई है, किन्तु गीता तो स्वयं भगवान् के मुख-कमल से निकली है। इसलिए उसे शास्त्र से बढ़कर माना गया है। इसकी पुष्टि के लिए स्वयं वेदव्यास का कथन द्रष्टव्य है-
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः।
या स्वयं पप्रनाभस्य मुऽपप्राद्विनिःसृता।।
(महा- भीष्म 43/1)
अर्थात् गीता का ही भली प्रकार से श्रवण कीर्तन, पठन-पाठन, मनन और धारण करना चाहिए, अन्य शास्त्र के संग्रह की क्या आवश्यकता है? क्योंकि वह स्वयं भगवान् के साक्षात् मुख-कमल से निकली हुई है।
गीता गंगाजी से भी श्रेष्ठ है। शास्त्रों में गंगा-स्नान का फल मुक्ति है, परन्तु गंगा में स्नान करने वाला स्वयं मुक्त हो सकता है, वह दूसरों को तारने में असमर्थ होता है, किन्तु गीता रूपी गंगा में गोते लगाने वाला स्वयं तो मुक्त होता ही है, वह दूसरों को भी तारने में समर्थ हो जाता है। गंगा तो भगवान् के चरणों से उत्पन्न हुई है और गीता साक्षात् भगवान् नारायण के मुखारविन्द से निकली है।
अन्त में, गीता को स्वयं भगवान् से भी श्रेष्ठ कहें तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। भगवान् ने स्वयं वाराह पुराण में कहा है- ‘‘मैं गीता के आश्रय में रहता हूँ, गीता मेरा श्रेष्ठ घर है। गीता के ज्ञान का सहारा लेकर ही मैं तीनों लोकों का पालन करता हूँ।’’
इसके अतिरिक्त भगवान् ने गीता में मुक्तकण्ठ से यह घोषणा की है कि जो कोई मेरी इस गीतारूप आज्ञा का पालन करेगा, वह निःसंदेह ही मुक्त हो जाएगा। जो मनुष्य इसके उपदेशों के अनुसार अपना जीवन बना लेता है और इसका रहस्य भक्तों को धारण कराता है, उसके लिए तो भगवान् कहते हैं कि वह मुझको अत्यधिक प्रिय है। भगवान् अपने ऐसे भक्तों के अधीन बन जाते हैं।
सारांश यह है कि गीता भगवान् की वाणी है, हृदय है और भगवान् की वाघ्मयी मूर्ति है। जिसके हृदय में, वाणी में, शरीर में तथा समस्त इन्द्रियों एवं उनकी क्रियाओं में गीता व्याप्त हो गई है, वह पुरुष साक्षात् गीता की मूर्ति है। उसके दर्शन, स्पर्श, भाषण एवं चिन्तन से भी दूसरे मनुष्य परम पवित्र बन जाते हैं। वास्तव में, गीता के समान संसार में यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत, संयम और उपवास आदि कुछ भी नहीं है।
(शान्तिकुंज फीचर्स, हरिद्वार)

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