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राजनीतिक महत्वाकांक्षा से पैदा हो रही सामाजिक बीमारी, हिंदू एकता और समरसता के लिए संघ जरूरी: संजय गुप्त

संजय गुप्त जी ने कहा कि अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या उसके मूल्यों से प्रेरित संगठन ना हों तो वह दिन दूर नहीं जब वर्तमान स्वरूप की हिन्दू जीवन पद्धति जाति-पाति के आधार पर संविधान में अलग से परिभाषित हो जाए और एक बार फिर हिन्दू समाज बंट जाए।

Published by
Mahak Singh

नागपुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के विजयादशमी उत्सव में प्रमुख अतिथि एवं दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्त जी ने सामाजिक समरसता, राष्ट्र निष्ठा और हिन्दू समाज की एकता पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि वोट की राजनीति के चलते राजनीतिक महत्वाकांक्षा एक अलग तरह की सामाजिक बीमारी को जन्म दे देती है। ऐसे में कुछ राजनीतिक नेताओं को छोड़ दें तो अधिकांश पर जनता को कम से कम अपने स्वयं विकास के मामले में उन पर भरोसा नहीं होता। ऐसे में संघ और संघ प्रेरित संगठनों की आवश्यकता और सामयिकता अधिक बढ़ जाती है।

हिंदू समाज की एकता, सामाजिक समरसता और चरित्र निर्माण ही संघ की प्राथमिकता

संजय गुप्त जी ने कहा कि अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या उसके मूल्यों से प्रेरित संगठन ना हों तो वह दिन दूर नहीं जब वर्तमान स्वरूप की हिन्दू जीवन पद्धति जाति-पाति के आधार पर संविधान में अलग से परिभाषित हो जाए और एक बार फिर हिन्दू समाज बंट जाए। उन्होंने संत शिरोमणि रविदास जी महाराज के 650वें जन्म जयंती वर्ष के निमित्त संघ शाखाओं में आयोजित हो रहे कार्यक्रमों का उल्लेख करते हुए कहा कि संत रविदास जी के जीवन और कार्य की जानकारी देने वाले कार्यक्रम हो रहे हैं। उनके द्वारा परिश्रम, तपस्या, त्याग, व स्वयं के जीवन के उदाहरण से समाज में भक्ति, स्वधर्मनिष्ठा तथा सामाजिक समरसता का भावजागरण किया गया, जब देश विदेशी आक्रान्ताओं के एतद्देशीय धर्म को मानने वाले देशवासियों पर अत्याचार से पीड़ित था।

संजय गुप्त जी ने अपने विचारों में भारतीयता और हिन्दुत्व की वैश्विक पहचान का उल्लेख करते हुए कहा कि आज भारतीयता और हिन्दुत्व की विश्व में अपनी धमक है तो इसका श्रेय प्रमुख रूप से संघ को दिया जाना चाहिए। उन्होंने संघ के समक्ष भविष्य की चुनौतियों पर विचार व्यक्त करते हुए चरित्र निर्माण को महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, राष्ट्र के प्रति निष्ठा और कर्तव्य एक चरित्रवान नागरिक के जरुरी पहलू हैं। भारत को स्वर्णिम काल में वापस ले जाने के लिए चरित्र निर्माण आवश्यक है। RSS विजयादशमी उत्सव में दिए गए इन विचारों में सामाजिक समरसता, हिन्दू समाज की एकता, भारतीयता और राष्ट्र के प्रति नागरिकों के कर्तव्यों को प्रमुखता से रेखांकित किया गया।

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