महाराष्ट्र

विजयदशमी पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का संबोधन:स्वबोध संदेश और विविधता में एकता का आह्वान किया

सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने विजयदशमी पर कहा कि संविधान की प्रस्तावना में निहित “हम भारत के लोग” का स्वबोध ही प्राचीन काल से भारत को एक सूत्र में बांधे हुए है। विविधता में एकता और सनातन परंपरा पर बल।

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कुलदीप सिंह

विजय दशमी के मौके पर नागपुर स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालय में विजयदशमी का उत्सव मनाया गया। इस दौरान सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी ने का कि ये वर्ष संत रविदास की 650 जयंती का वर्ष है। इसके तहत देशभर में संघ की शाखाओं में संत रविदास जी के बारे में बताया जा रहा है।

इस दौरान सरसंघचालक जी ने कहा कि जब देश में विदेशी आक्रांता स्वधर्म पर चलने वालों को प्रताड़ित कर रहे थे, ऐसे वक्त में भी संत रविदास ने स्वधर्म निष्ठा, सामाजिक समरसता और भक्ति का प्रचार किया। ऐसे ही स्वातंत्र्य बलिदानी स्वामी श्रद्धानंद का भी 100 वर्ष हुआ। उसी तरह उड़ीसा वनवासी बंधुओं के कल्याण के लिए काम करने वाले स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की भी जन्म शताब्दी अभी चल रही है। इसके अलावा महात्मा फुले जी जन्म शताब्दी का 200वां वर्ष चल रहा है। इसी तरह बंगाल के राजनारायण बसु ने भी स्व का बोध जगाया। इन सभी महापुरुषों का स्मरण भारत को संगठित करने के लिए आवश्यक है।

स्व बोध

स्व बोध के आधार पर पिछले 100 वर्षों से भारत को संगठित, बल संपन्न के लिए चलाया जा रहा है। स्व बोध की व्याख्या संविधान की प्रस्तावना में भी की गई है। संविधान में कहा गया है-हम भारत के लोग। सरसंघचालक जी कहते हैं कि ‘हम’ नामक ‘स्व’ का जो बोध है उसी ने प्राचीन काल से देश को एकता के सूत्र में पिरो कर रखा। ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि हमारे पूर्वजों के पास संपूर्ण एकता की शक्ति की अनुभूति थी। हमारे पास भी वही विरासत है। लेकिन, जब हम इसे भूले तो हमारा पतन शुरू हो गया। इसके कारण हम मानसिक रूप से इतने निकृष्ट हो गए कि हमें सैकड़ों वर्षों की गुलामी की दासता में रहना पड़ा।

विविधताओं का देश है भारत

अब उस गुलामी की जंजीरों को तोड़कर एक बार फिर से हम आगे बढ़ चुके हैं। अपना भारत विवधताओं से भरा देश है। यहां विविध प्रकार की प्राकृतिक, पंथों, प्रांतों, जातियों आदि की विवधताएं हैं। इन सब के बाद भी हमें एक होकर आगे बढ़ना है, इसके लिए आधार की आवश्यकता है और ये आधार हमारे सनातन काल से चली आई परंपरा से उपजा है। ये परंपरा आंखों देखी है। यही परंपरा परिवर्तनशील है और प्रभावी है।

भगवान ने मनुष्य को विचार का वरदान दिया है। अगर वह इसकी परिशुद्धि करते हुए अपने में साक्षात कर लेता है और उसी के अनुसार जीवन जीता है। ऐसा करने से ही शाश्वत सुख प्राप्त होता है। यही मुनष्यता की सनातन खोज है। इसी परम सुख को प्राप्त करना मनुष्य जीवन का ध्येय है। इसके लिए वसुधैव कुटुम्बकम का विचार चाहिए।

इसी सत्य को विविध पंथ से, विविध पक्ष से, वेदों में हमने गाया था।
निकट बिठाकर इसी सत्य को उपनिषदों में हमने समझाया था।।
मंदिर, मठ गुरुद्वारे जाकर, यही ज्ञान ससत्संग मिलेगा।

मनुष्य को परिवर्तनशील होना चाहिए

सरसंघचालक मोहन भागवत जी विवधता पर जोर देते हुए कहते हैं कि मनुष्य को परिवर्तनशील होना चाहिए। शाश्वत बातों को सदा कायम रखना चाहिए। लचीलापन भी सनातन का ही परिणाम हैं।

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