कट्टरता की सबसे खतरनाक बात यह है कि वह हमेशा अपने असली चेहरे के साथ सामने नहीं आती। कभी वह बंदूक लेकर जंगल में दिखाई देती है, कभी विश्वविद्यालय के किसी कमरे में, कभी इंटरनेट की बंद चैट में और कभी उस जगह, जिसे हम सबसे सुरक्षित और भरोसेमंद मानते हैं। फ्लाईदुबई की उड़ान FZ1073 का घटनाक्रम इसी खतरे की एक भयावह याद दिलाता है।
खतरा बाहर से नहीं आया था। वह उसी कॉकपिट में था, उसी वर्दी में था, उसी विमान को उड़ाने की जिम्मेदारी में शामिल था। यही आतंकवाद और कट्टरता की चुनौती है, खतरा अपनी पहचान छिपाकर भरोसे के घेरे में प्रवेश कर सकता है। कप्तान ने बताया कि सह-पायलट ने प्रार्थना के लिए उठने की बात कही और फिर पीछे से हमला किया। जांच अभी जारी है, इसलिए अंतिम निष्कर्ष जांच एजेंसियों पर छोड़ना चाहिए, लेकिन घटना यह जरूर बताती है कि कट्टर विचार जब हिंसा में बदलता है तो वह किसी पेशे, संस्थान या वर्दी की मर्यादा नहीं देखता।
उदाहरण के तौर पर कश्मीर में जमीन पर लड़ने वाले सुरक्षाकर्मियों के सामने चुनौती इससे भी जटिल होती है। मुठभेड़ में सामने वाला हथियारबंद है, लेकिन उसके पीछे मौजूद वातावरण हमेशा स्पष्ट नहीं होता। एक कमरे में आतंकी छिपा हो सकता है और बाहर परिवार, पड़ोसी तथा भीड़ मौजूद हो सकती है। गोली चलाने का हर फैसला नागरिकों की सुरक्षा, खुफिया सूचना और कानूनी जवाबदेही के बीच संतुलन मांगता है। यही कारण है कि आतंकवाद-रोधी अभियान केवल निशाना साधने का काम नहीं है। यह धैर्य, सूचना और निर्णय क्षमता की परीक्षा भी है।
कश्मीर में बुरहान वानी जैसे आतंकियों की तस्वीरें और संदेश सोशल मीडिया के जरिए युवाओं तक पहुंचे। कुछ मामलों में मारे गए आतंकियों के अंतिम संस्कार बड़े जनसमूह और भावनात्मक लामबंदी का माध्यम बने। 2017 में फैयाज अहमद अशवर के जनाजे में हथियारबंद आतंकियों के पहुंचने और हवाई फायरिंग की घटना सामने आई थी। ऐसे भी मामले हैं जिनमें जनाजे का प्रचार युवाओं को भटकाकर आतंकी रास्ते पर लाने के लिए किया गया।
यहीं इस्लामोफोबिया की ढाल सामने आती है। आतंकी मारा जाता है तो बहस को उसके हथियार, संगठन, हिंसक गतिविधियों और विचारधारा से हटाकर पूरे समुदाय की ओर मोड़ देना उसके समर्थकों के लिए सबसे आसान रास्ता है। इससे दो नुकसान होते हैं। पहला, आतंकी की व्यक्तिगत और संगठनात्मक जिम्मेदारी धुंधली पड़ जाती है। दूसरा, मुसलमानों को रक्षात्मक स्थिति में खड़ा कर दिया जाता है।
सुरक्षा बलों की लड़ाई इसलिए किसी मजहब के खिलाफ नहीं होती। सैनिक के सामने मजहब नहीं, हथियार उठाया हुआ व्यक्ति और उसके पीछे काम कर रहा आतंकवादी तंत्र होता है। यही फर्क बनाए रखना जरूरी है। कट्टरता को आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को कमजोर करती है।

















