लोकतंत्र में विरोध का अधिकार संविधान का मूल तत्व है। लेकिन जब विरोध कानून के दायरे से बाहर निकलकर अतिक्रमण, बॉन्ड तोड़ने और प्रतीकों के दुरुपयोग का रूप ले ले, तो उसे ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन’ कहकर ढाल बनाना राजनीतिक धूर्तता है। हाल के दिनों में जंतर मंतर पर ‘तिरंगा लहराने’ के नाम पर हुई घटना और उसके बाद राहुल गांधी का बयान इसी श्रेणी में आता है। ‘‘शांतिपूर्ण विरोध में तिरंगा लहराना अपराध नहीं। युवाओं को इसके लिए जेल भेजना कायरता है। जंतर मंतर भारत के लोगों का है, हम इसे वापस लेंगे”-यह बयान भावनाओं को उद्वेलित करता है, लेकिन तथ्यों की जांच में यह अधूरा और भ्रामक साबित होता है।
जंतर मंतर घटना: तिरंगा या अतिक्रमण और बॉन्ड का उल्लंघन
12 अक्टूबर 2026 को दिल्ली पुलिस ने जंतर मंतर को निर्दिष्ट विरोध स्थल की सूची से हटा दिया। गृह मंत्रालय की समिति की सिफारिश पर रामलीला मैदान, बुरारी ग्राउंड और सीबीडी ग्राउंड को वैकल्पिक स्थल बनाया गया। यह फैसला लंबे समय से चल रही व्यवस्था का हिस्सा था। इसके अगले दिन कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के सौरव दास, आशुतोष रंका, अजिंक्य शिंदे समेत 14 सदस्य लॉक किए गए गेट पर चढ़कर जंतर मंतर पहुंचे। उन्होंने तिरंगा फहराया और नारेबाजी की। दिल्ली पुलिस ने अतिक्रमण का मामला दर्ज किया।
ये वही लोग थे जिन्हें कुछ दिन पहले गिरफ्तारी के बाद एक साल की शांति और अच्छे आचरण का बॉन्ड देकर रिहा किया गया था। दो दिनों में ही उन्होंने उस बॉन्ड का उल्लंघन किया। बार-बार शांति भंग करने और दूसरों को उकसाने का हवाला देते हुए दास और रंका को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। सीजेपी ने इसे ‘तिरंगा लहराने पर जेल’ बताया, लेकिन वीडियो में स्पष्ट है कि वे गेट फांदकर अंदर घुसे थे। राहुल गांधी का बयान इस कानूनी पहलू को नजरअंदाज करता है। विरोध का अधिकार है, लेकिन निजी संपत्ति या निर्दिष्ट क्षेत्र में बिना अनुमति प्रवेश, बॉन्ड तोड़ना और सार्वजनिक व्यवस्था भंग करना अलग बात है। तिरंगे को ढाल बनाना प्रतीक का अपमान है।
कॉकरोच जनता पार्टी: व्यंग्य से संगठित आंदोलन तक
सीजेपी की शुरुआत मई 2026 में अभिजीत दीपके के एक ट्वीट से हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के ‘बेरोजगार युवा कॉकरोच’ वाले बयान पर प्रतिक्रिया स्वरूप दीपके ने “क्या होगा अगर सभी कॉकरोच एक हो जाएं?” लिखा। यह व्यंग्य तेजी से फैल गया। दीपके पहले आम आदमी पार्टी (आप) की सोशल मीडिया टीम में काम कर चुके हैं। उन्होंने दिल्ली चुनावों में मीम-आधारित कंटेंट बनाया और शिक्षा विभाग से जुड़े रहे। बोस्टन यूनिवर्सिटी से पब्लिक रिलेशंस में मास्टर्स करने वाले दीपके ने सीजेपी को बेरोजगारी, परीक्षा पेपर लीक और चुनावी अनियमितताओं के खिलाफ मंच बनाया।
शुरुआत में यह डिजिटल व्यंग्य था, लेकिन जल्दी ही संगठित विरोध का रूप ले लिया। एनईईटी संबंधी प्रदर्शनों से लेकर सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एसआईआर विरोध तक। संस्थापक और प्रवक्ता आप से जुड़े रहे हैं। दीपके खुद मानते हैं कि उन्होंने आप के साथ काम किया। यह ‘आम जनता का स्वतःस्फूर्त आंदोलन’ नहीं, बल्कि राजनीतिक संचार विशेषज्ञों द्वारा तैयार किया गया मंच है जो युवा असंतोष को संगठित करता है।
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विदेशी फंडिंग और ओस्लो नेटवर्क: विचार से कार्रवाई तक
सार्वजनिक रिकॉर्ड और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सौरव दास, सिटिज़न्स फ़ॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेपी) के प्रमुख प्रवक्ता, को ठाकुर फैमिली फाउंडेशन से अनुदान मिला है। 2021 में पब्लिक हेल्थ रिपोर्टिंग के लिए और बाद में सिविल लिबर्टीज के तहत। फाउंडेशन के रिकॉर्ड सार्वजनिक हैं। दास ने खुद अनुदान के लिए धन्यवाद दिया था। स्क्रॉल मीडिया को भी ठाकुर फैमिली फाउंडेशन से अनुदान मिला है। स्क्रॉल की स्थापना में ओमिडयार नेटवर्क का निवेश रहा है-2014 में और बाद में भी। स्क्रॉल की एक्जीक्यूटिव एडिटर सुप्रिया शर्मा जून 2026 में ओस्लो फ्रीडम फोरम में भारत को ‘अधिनायकवादी’ बताते हुए बोल चुकी हैं। उन्होंने मीडिया, अल्पसंख्यक और विरोध के मुद्दों को एकतरफा पेश किया था। उनके वक्तव्य के अंश सोशल मीडिया पर उपलब्ध हैं।
ओस्लो फ्रीडम फोरम, ह्यूमन राइट्स फाउंडेशन द्वारा आयोजित होता है। यह “विचारों को कार्रवाई में बदलने वाला उत्प्रेरक” होने का दावा करता है। वहां रेजिम चेंज विशेषज्ञ सर्डजा पोपोविक सक्रिय रहे हैं। पोपोविक सर्बिया के ओटपोर आंदोलन से जुड़े हैं, जिसने मिलोसेविच को हटाया। उन्होंने कैनवास (CANVAS) बनाया, जो जेन शार्प के अहिंसक प्रतिरोध सिद्धांत पर आधारित प्रशिक्षण देता है। संगीत, व्यंग्य, युवा ब्रांडिंग और ‘स्तंभों को कमजोर करने’ की रणनीति सिखाई जाती है। कई देशों में ऐसे प्रशिक्षण के बाद आंदोलन उभरे। भारत से जुड़े लोगों का ओस्लो और आसपास के कार्यक्रमों में होना संयोग मात्र नहीं लगता।
रेजिम चेंज टूलकिट: युवा असंतोष का दोहन
जेन शार्प की किताबें और कैनवास का पाठ्यक्रम स्पष्ट बताते हैं कि कैसे असंतोष को संगठित कर सत्ता के स्तंभों-पुलिस, मीडिया, युवा-को प्रभावित किया जाए। व्यंग्य और प्रतीकों का इस्तेमाल (जैसे कॉकरोच ब्रांड) डर को कम करता है और व्यापक अपील पैदा करता है। भारत में बेरोजगारी और परीक्षा संबंधी असली समस्याएं हैं। लेकिन जब ये मुद्दे विदेशी फंडेड मीडिया, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को ‘तानाशाही’ बताने और चुनिंदा तथ्यों (जैसे दंगों के एक पक्ष को छोड़ना) के साथ जोड़े जाते हैं, तो सवाल उठता है।
सुप्रिया शर्मा के प्रस्तुतीकरण में गोदरा की घटना या बाबरी के ऐतिहासिक संदर्भ को नजरअंदाज करना इसी चुनिंदा कथा का उदाहरण है। विपक्ष का इंडिया ब्लॉक इन प्रदर्शनों को ‘संवैधानिक अधिकार’ कहकर समर्थन देता है। अलग-अलग बैनर, एक कारण-यह नारा आकर्षक है, लेकिन कानून का उल्लंघन और प्रतीकों का राजनीतिक हथियार बनाना लोकतंत्र को कमजोर करता है। तिरंगा किसी दल या समूह की संपत्ति नहीं। इसे अतिक्रमण के साथ जोड़ना कायरता है, न कि विरोध।
भारत में असहमति का स्थान है, लेकिन विदेशी नेटवर्क, फंडिंग पैटर्न और प्रशिक्षण वाले टूलकिट के साथ जुड़ा असहमति ‘जन आंदोलन’ नहीं, रणनीतिक अभियान बन जाता है। तथ्यों की जांच, पारदर्शिता और कानून का पालन ही सच्ची लोकतांत्रिक रक्षा है। तिरंगे की आड़ में किसी भी निशाने को स्वीकार नहीं किया जा सकता।















