‘न्यूज आईना टुडे’ नामक सोशल मीडिया हैंडल से जुड़े नदीम अहमद अमीन ने सहायक पुलिस आयुक्त विवेक भगत का एक कथित फर्जी और छेड़छाड़ किया हुआ वीडियो प्रसारित किया, जिसमें पुलिस अधिकारी को आपत्तिजनक यौन आचरण करते हुए दिखाया गया। इसी तरह गत 3 अक्तूबर को मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ एनएसयूआई के प्रदर्शन को कवर करने का दावा करने वाली तीन महिलाओं ने दिल्ली में पुलिसकर्मियों पर दुर्व्यवहार के आरोप लगाए। दूसरी ओर, महिला पुलिसकर्मियों और अधिकारियों ने शिकायत की कि इन प्रदर्शनों में नशे में धुत और उपद्रवी लोगों ने स्वयं को पत्रकार बताकर उनके साथ अभद्रता की और उनका उत्पीड़न किया।
लाख टके का सवाल
राजधानी के बीचोंबीच सामने आईं ये घटनाएं और देश के अलग-अलग हिस्सों से आती ऐसी अनेक खबरें एक बड़े सवाल की ओर संकेत करती हैं-आखिर पत्रकार कौन है? समाचारकर्मी किसे कहा जाए? क्या सड़कों पर कैमरा, मोबाइल और माइक लेकर घूमने वाला हर व्यक्ति पत्रकार या मीडिया प्रतिनिधि कहलाने लगेगा? क्या समाचार, विचार या संपादकीय लिखने वाले या वीडियो बनाने वाले हर व्यक्ति को पत्रकार मान लिया जाना चाहिए?
इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, भारत में लगभग 10 करोड़ डिजिटल क्रिएटर सक्रिय हैं। इनमें नियमित और संगठित रूप से सामग्री तैयार करने वाले क्रिएटरों की संख्या करीब 40 से 45 लाख बताई गई है। हैदराबाद स्थित इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस की जुलाई 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, देश में ऐसे क्रिएटरों की संख्या लगभग 42 लाख है। अब असली सवाल यह है कि क्या जंतर-मंतर पर आयोजित कॉकरोचों, युवा कांग्रेस, आम आदमी पार्टी या वामपंथी धरना-प्रदर्शनों में उमड़े इन सभी क्रिएटर्स या उनके एक छोटे हिस्से को पत्रकार कहा जा सकता है?
केंद्र या राज्यों से मान्यता प्राप्त हों या नहीं, नगर या जिला प्रशासन द्वारा मान्यता प्राप्त हों या नहीं, इनमें से कई क्रिएटर्स, जो प्रदर्शनकारियों का मूल हिस्सा हैं और वीडियो व रील बनाते हैं, खुद को पत्रकार बताते हैं। इनमें से अनेक किसी जाने-माने मीडिया संस्थान से जुड़े नहीं होते और अधिकतर एक व्यक्ति वाले उपक्रम होते हैं। वे माइक्रोफोन और मोबाइल फोन लेकर घूमते हैं और वीडियो व रील बनाने के व्यवसाय में तेजी से लगे रहते हैं। इनमें से बड़ी संख्या ऐसे भुगतान-प्राप्त इन्फ्लुएंसर हैं, जिनके अपने सोशल मीडिया पेज हैं। उन्हें मामूली से लेकर बड़ी रकम तक देकर ऐसी सामग्री फैलाने के लिए किराए पर रखा जाता है, जो नरम, जहरीली या संवेदनशील हो सकती है और समाज पर विनाशकारी प्रभाव डाल सकती है। ये लॉबी, राजनीतिक दलों और कॉर्पोरेट घरानों के इशारे पर भी काम करते हैं। अब क्या हम इन भुगतान-प्राप्त सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को पत्रकार कहेंगे?
नैरेटिव का सौदा
मुंबई में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के हालिया प्रदर्शन, जिसके पहले दिल्ली में प्रदर्शन और राजस्थान जैसे राज्यों में स्कूल-केंद्रित अभियान हुए, ज्यादातर इन्हीं क्रिएटर्स के कारण ऑनलाइन देखे गए या इंटरनेट पर वायरल हुए। क्या इन भुगतान-प्राप्त क्रिएटर्स को मीडिया पेशेवर माना जाना चाहिए? उन्हें किसने भुगतान किया, कितना दिया और असली मकसद क्या था—यह अनुत्तरित सवाल है। सीजेपी के जंतर-मंतर प्रदर्शनों के दौरान फेसबुक, इंस्टाग्राम या लिंक्डइन पर ऐसी कहानियां चलीं, जो ट्रेंडिंग के टॉप-10 में शामिल हुईं और जिनके बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया। इनमें से कुछ क्रिएटर्स रातों-रात प्रसिद्ध हो गए और उनके हैंडल पर हजारों फॉलोअर आ गए। इन हालिया प्रदर्शनों, चाहे वे निर्वाचन आयोग, नीट या दिल्ली विश्वविद्यालय में महिला सुरक्षा से जुड़े हों, में बड़ी संख्या में लोग एक साथ पत्रकार, प्रदर्शनकारी और राजनीतिक कार्यकर्ता, तीनों भूमिकाओं में दिखाई देते हैं।
कैमरे, माइक और वीडियो उपकरणों जैसे साजोसामान के साथ सड़कों पर बार-बार उतरने वाले कई सरकार-विरोधी कार्यकर्ता खुद को पत्रकार के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जबकि कई बड़े मीडिया संस्थानों के पास भी इतने संसाधन उपलब्ध नहीं होते। साथ ही, कुछ ऐसे कार्यकर्ता भी रहे हैं जिनकी विचारधारा अति-वैचारिक है और वे सस्ते कॉलर माइक व मोबाइल रिकॉर्डर लेकर मीडिया-कर्मी बनकर काम करते हैं। इसी तरह, अत्यधिक वैचारिक झुकाव वाले कुछ कार्यकर्ता भी सस्ते कॉलर माइक और मोबाइल फोन से रिकॉर्डिंग करते हुए खुद को मीडिया कर्मी बताते रहे हैं।
हाल के दिनों में प्रदर्शन स्थलों पर पहुंचे कई क्रिएटर्स पहले से ही व्यावसायिक सौदे किए होंगे, जिनमें यह तय होता है कि किस तरह का नैरेटिव फैलाना है और कितने व्यूज चाहिए, चाहे वे वास्तविक हों या कृत्रिम। इससे भी बड़ी बात यह है कि ये ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष’ पत्रकार स्वयं प्रदर्शन का हिस्सा होते हैं और उसी प्रदर्शन की रिपोर्टिंग भी करते हैं, जिससे उनकी रिपोर्टिंग एकपक्षीय और व्यक्तिपरक हो जाती है। ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जहां राजनीतिक आकांक्षा रखने वाले लोग प्रदर्शनकारी रहते हुए पत्रकार की भूमिका में दिखाई दिए।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत पत्रकारों को अपने पेशे से जुड़े निहित अधिकार मौलिक अधिकारों के हिस्से के रूप में प्राप्त हैं। इस प्रावधान के अंतर्गत सूचना प्राप्त करने, उसे संसाधित करने और सामग्री के रूप में प्रसारित करने का अधिकार सुनिश्चित किया गया है। यह स्वतंत्रता तब समाप्त होती है, जब रिपोर्टिंग जानबूझकर या अनजाने में किसी व्यक्ति, संस्था या निकाय की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाती है। भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 499 मीडिया कर्मियों को किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने या लेख, दृश्य, कार्टून अथवा किसी भी अन्य माध्यम से भ्रामक सूचना फैलाने से रोकती है। आईपीसी, 1860 की जगह लेने वाली भारतीय न्याय संहिता, 2023 में इनमें से अधिकांश प्रावधान बरकरार रखे गए हैं।
इन पर मुकदमा क्यों न हो?
खुद को पत्रकार बताने वाले नदीम अहमद अमीन और तीन महिला प्रदर्शनकारियों पर क्या भारतीय न्याय संहिता, 2023 के संबंधित प्रावधानों के तहत मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए? एक ओर उन पर पहचान की धोखाधड़ी, दूसरी ओर पत्रकारों के लिए निर्धारित नियमों के उल्लंघन का मामला बनता है। मीडिया संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग करने वाले पूर्णकालिक पेशेवर पत्रकारों के सामने पहचान का संकट खड़ा है। एक ओर किसी एजेंडे के साथ काम करने वाले भुगतान लेकर सामग्री तैयार करने वाले क्रिएटर हैं, तो दूसरी ओर ऐसे पत्रकार हैं जो भावनाओं और व्यक्तिगत जुड़ाव से अलग रहकर निष्पक्षता के साथ रिपोर्टिंग करने का प्रयास करते हैं। इन दोनों के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है।
पेशेवर पत्रकारों पर तथ्यों के सत्यापन और पत्रकारिता की नैतिकता का दबाव रहता है, जबकि कार्यकर्ता, आंदोलनकारी और सामग्री निर्माता तथ्यों को लेकर अपेक्षाकृत सहज रहते हैं। वे इस बात के अनुसार व्यक्तिपरक, अपमानजनक, विभाजनकारी और एजेंडा-आधारित हो सकते हैं कि उनकी रील, वीडियो या सामग्री के लिए भुगतान कौन कर रहा है। एडवोकेसी समूहों, गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधियों से लेकर भुगतान लेकर काम करने वाले प्रभावशाली लोगों और वैचारिक कार्यकर्ताओं तक, अनेक लोग बड़े पैमाने पर खुद को पत्रकार बताने लगे हैं।
डिजिटल क्रांति ने इस प्रकार की पहचान की धोखाधड़ी के साथ मिलकर दुनिया भर के पेशेवर मीडिया-कर्मियों के सामने पहचान का संकट और गहरा दिया है। ‘नागरिक पत्रकार’ की अवधारणा भारत में स्वतंत्रता आंदोलन से पहले, उसके दौरान और बाद में सामाजिक उत्तरदायित्व तथा मुक्ति के विचार से विकसित हुई थी। आज के भुगतान-प्राप्त इन्फ्लुएंसर्स की तुलना उन नागरिक पत्रकारों से कभी नहीं की जा सकती, जो किसी बड़े सामाजिक उद्देश्य के लिए काम करते हैं।
किसी राजनीतिक कार्यकर्ता या भुगतान-प्राप्त इन्फ्लुएंसर को पत्रकार की तरह संरक्षण नहीं दिया जा सकता। लोकतांत्रिक मूल्यों और व्यवस्थाओं में विश्वास न रखने वाला कोई वैचारिक वामपंथी चरमपंथी भी मीडिया प्रतिनिधि होने का झूठा दावा नहीं कर सकता। इस अंतर को स्पष्ट रूप से समझना होगा। पत्रकारिता की मर्यादा, उसके मूल्यों और निष्पक्षता को बनाए रखने का कोई आसान विकल्प नहीं है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा नई दिल्ली स्थित गैर-दलीय थिंक टैंक सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड एंड होलिस्टिक स्टडीज के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं निदेशक हैं।)

















