उर्दू का मुहावरा है ‘आवाज़ ए ख़ल्क़ नगाड़ा ए खुदा; अर्थात जनता की आवाज़ ईश्वर का फरमान है। समाज हर संगठन या राजनीतिक दल का वो दर्पण है जो उसे वास्तविकता से अवगत करवाता है। गत दिनों जहाज से पुलिस जब कॉकरोच जनता पार्टी के स्वघोषित नेताओं को हिरासत में लेने गई तो सवारियों ने शेम ऑन यू बोल कर अपनी प्रतिक्रिया दी। समाज की छोटी सी प्रतिक्रिया ने बता दिया कि इन लोगों की धमाचौकड़ी से आम आदमी का कोई लेना देना नहीं है। केवल जनसाधारण ही क्यूं, इससे पहले पूर्व न्यायाधीशों और नौकरशाहों ने भी पत्र लिख कर बता दिया था कि चुनाव आयोग के खिलाफ छेड़ा गया हठ संग्राम न तो तथ्यात्मक रूप से और ना ही संवैधानिक रूप से उचित है, यह मात्र जनतंत्र को झुंडतंत्र से हांकने का प्रयास भर है।
क्या बोले पूर्व नौकरशाह
विपक्ष के आंदोलन की बीच राह हांडी फोड़ते हुए पूर्व नौकरशाहों ने अपने पत्र में इस बात का भी जिक्र किया है कि उनमें से अनेक चुनाव प्रक्रिया के संचालन में शामिल रहे हैं और उन्होंने वह दौर भी देखा है, जब चुनावों में असल में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी होती थी। यह न केवल अनोखी और हास्यास्पद बात है कि अभी तक मतदाता सूचियों में तमाम अशुद्धियों और विशेष रूप से फर्जी मतदाताओं के शामिल होने की शिकायतें करने वाले विपक्षी इन अशुद्धियों को दूर करने की प्रक्रिया के खिलाफ अस्पष्ट आरोपों की आड़ में चुनाव आयोग के खिलाफ माहौल बना रहे थे।
एक ऐसे समय में जब मतदाता सूचियों की विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के खिलाफ विपक्ष संकीर्णता के साथ राजनीतिक कारणों से मोर्चा खोल रहा है और कांग्रेस पार्टी भी दिल्ली में धरना-प्रदर्शन करने उतरी हुई है, तब 124 पूर्व अधिकारियों का जनता के नाम जारी किया गया पत्र समूचे देश का ध्यान अपनी ओर खींचने की मांग करता है। यह ऐसा इसलिए करता है क्योंकि भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय विदेश सेवा के इन पूर्व अधिकारियों के इतने बड़े समूह ने अपने पत्र में कुछ ऐसी बातों का जिक्र किया है, जिन्हें अनदेखा करना मुश्किल काम है। उनका यह कहना बिल्कुल सही है कि शक प्रमाण का विकल्प नहीं हो सकता। विडंबना यह है कि एसआईआर को लेकर जो आशंकाएं खड़े की जा रही हैं, वे राई का पहाड़ बनाने की कोशिश से बढ़कर कुछ भी नहीं है।
छोटी-छोटी कमियां साधारण बात
एसआईआर जैसी व्यापक और गहरी प्रक्रिया में छोटी-मोटी कमियां-खामियां होना आम बात है। लेकिन इन कमियों को वोट चोरी का नाम देना और लोकतंत्र को खत्म करने की कोशिश करार देना जनता को गुमराह करना ही है। इस तरह की कोशिश न केवल संस्थाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाती है, बल्कि लोकतंत्र के प्रति जनता के भरोसे को भी कमजोर करने का काम करती है। चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और मुख्य चुनाव आयुक्त भी संवैधानिक पद पर आसीन हैं। यदि विपक्ष के पास एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर इसके खिलाफ कोई पुख्ता सबूत हैं तो उसे सड़कों पर उतरने की बजाय सुप्रीम कोर्ट के सामने जाना चाहिए। वैसे भी सुप्रीम कोर्ट एसआईआर के विभिन्न पहलुओं की सुनवाई कर रहा है। विपक्ष को यह समझना होगा कि किसी झूठ को बार-बार दोहराने से वह सच में नहीं बदल जाता। पूर्व नौकरशाहों ने अपने पत्र में इस बात का भी जिक्र किया है कि उनमें से अनेक चुनाव प्रक्रिया के संचालन में शामिल रहे हैं और उन्होंने वह दौर भी देखा है, जब चुनावों में असल में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी होती थी।
क्या सर्वोच्च न्यायालय पर भी भरोसा नहीं?
यह न केवल अनोखी और हास्यास्पद बात है कि अभी तक मतदाता सूचियों में तमाम अशुद्धियों और विशेष रूप से फर्जी मतदाताओं के शामिल होने की शिकायतें करने वाले विपक्षी इन अशुद्धियों को दूर करने की प्रक्रिया के खिलाफ अस्पष्ट आरोपों की आड़ में चुनाव आयोग के खिलाफ माहौल बना रहे थे। ऐसा लगता है कि वे एसआईआर की सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट पर भी भरोसा करने के लिए तैयार नहीं हैं। यह एक खतरनाक रुझान है।
यदि लोकतंत्र की दुहाई देने वाले राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट जैसी संवैधानिक संस्था पर भी भरोसा नहीं करेंगे तो वे अपनी विश्वसनीयता ही खो देंगे। विपक्ष को पूर्व नौकरशाहों के पत्र पर भी आत्म-मंथन करना चाहिए और इससे पहले लिखे गए पूर्व जजों के पत्र पर भी। क्योंकि यह देश की साख का भी सवाल है और देश की सत्ता पर लोगों के विश्वास का भी।
जनतंत्र को झुंडतंत्र में बदलना संवैधानिक पाप
विपक्ष को समझना चाहिए कि देश की संवैधानिक संस्थाओं पर यूं ही लांछन लगाए जाते रहे तो इसका असर समाज पर पड़ेगा। जिस दिन आम लोगों का इन संस्थाओं से विश्वास उठ गया वो दिन जनतंत्र के लिए घातक साबित होगा। पुर न्यायाधीशों ने इस संबंध मे लिखे पत्र में ठीक ही चेताया है कि कोई भी राजनीतिक प्रणाली जन विश्वास पर ही सफलता पूर्वक चलती है, जनता में व्यवस्था के प्रति झूठे आधार पर अनस्था पैदा करना लोकतंत्र की हत्या के समान अपराध है। विपक्ष शेम ऑन यू व पूर्व न्यायाधीशों और नौकरशाहों के संदेश का मर्म समझें।

















