इस्लामी कट्टरपंथ के संकेतों को समय रहते पहचानने से इनकार करने की कीमत कितनी भयावह हो सकती है, इसका उदाहरण 30 सितंबर, 2026 को आसमान में सामने आया। फ्लाईदुबई एफजेड-1073 में 8 चालक दल सहित 182 लोग सवार थे। दुबई से तेल अवीव जा रहे विमान में सहचालक हमाम अल हम्मामी ने कॉकपिट में रखी आपातकालीन कुल्हाड़ी से भारतीय कप्तान स्मित मच्छार पर हमला कर विमान का नियंत्रण लेने का प्रयास किया। गंभीर रूप से घायल कप्तान के गिरते ही विमान तेजी से नीचे जाने लगा और यात्रियों में चीख-पुकार मच गई। लेकिन कप्तान मच्छार ने हार नहीं मानी। उन्होंने कॉकपिट का दरवाजा खोला, तो यात्रियों ने हमलावर को काबू किया और दूसरे चालक ने नियंत्रण संभालकर विमान को सऊदी अरब के तबूक में सुरक्षित उतारा। बाद में संयुक्त अरब अमीरात ने इसे आतंकी हमला कहा।

सबसे बड़ा सबक
कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। इसके बाद जो तथ्य सामने आया, वह अधिक चिंताजनक है। हम्मामी को ओमान में कट्टरपंथी विचारों को लेकर उठी चिंताओं के बाद उड़ान ड्यूटी से हटा कर ओमान एयर में प्रशासनिक काम सौंपा गया था। लेकिन बाद में फ्लाईदुबई ने उसे नियुक्त कर लिया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उसकी नई नियुक्ति में सुरक्षा जांच औपचारिक आपराधिक रिकॉर्ड तक सीमित रही। इस्राएल ने प्रारंभिक सूचनाओं के आधार पर आरोपी सहचालक के ‘इस्लामी कट्टरपंथ की ओर झुकाव’ की बात कही है।
कट्टरता हमेशा हथियार लेकर सामने नहीं आती। वह विचारों में छिपी होती है-विश्वविद्यालय से सोशल मीडिया तक, प्रार्थना स्थल से कार्यालय तक और कभी-कभी भरोसेमंद वर्दी के भीतर भी। खतरा तब भयावह हो जाता है, जब वही विचार कॉकपिट तक पहुंच जाए। यही इस घटना का सबसे भयावह सबक है।
जब चेतावनी अनसुनी हो जाए
कल्पना कीजिए, यदि कप्तान स्मित मच्छार ने उस निर्णायक क्षण में प्रतिरोध न किया होता, तो इस्राएल जा रहे विमान का संदिग्ध आतंकी परिस्थितियों में गिरना पश्चिम एशिया को एक और भयावह संकट में धकेल सकता था। एक कप्तान की बहादुरी ने न केवल 182 जिंदगियां बचाईं, बल्कि संभवतः एक बड़े अंतरराष्ट्रीय संकट को भी टाल दिया। लेकिन किसी सभ्यता की सुरक्षा आखिरी क्षण में किसी व्यक्ति की वीरता के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस व्यक्ति पर पहले से कट्टरपंथ को लेकर संदेह था, वह दूसरे देश की विमान सेवा में भर्ती होकर संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय उड़ान के कॉकपिट तक कैसे पहुंच गया?
यह केवल विमानन सुरक्षा की विफलता नहीं, उस मानसिकता का उदाहरण है, जिसमें कट्टरता के संकेतों को तब तक निर्णायक नहीं माना जाता, जब तक वे हिंसा में नहीं बदल जाते।…और जब हिंसा हो जाती है तब समाज पूछता है कि संकेत पहले क्यों नहीं पहचाने गए? 11 सितंबर 2001, मैड्रिड, लंदन, पेरिस, शार्ली एब्दो, बाटाक्लां, नीस, मैनचेस्टर, ब्रसेल्स, सोलिंगन और 7 अक्तूबर 2023 तक, हर बार हमला हुआ, चेतावनी मिली और संकल्प दोहराया गया- अब कट्टरपंथ के स्रोतों पर गंभीर बात होगी। लेकिन बहस बार-बार हमले की विचारधारा से हटकर उसे कठघरे में खड़ा करने वालों की भाषा पर जा अटकी। हमला सामने था, लेकिन विमर्श दूसरी दिशा में मोड़ दिया गया। यही सबसे खतरनाक चूक है।
मोबाइल की स्क्रीन से आतंक की राह तक
इस्लामी कट्टरपंथ पर आधुनिक पश्चिम की सबसे बड़ी कठिनाई संभवत: सूचना की कमी नहीं है। समस्या यह है कि उपलब्ध सूचनाओं का क्या किया जाए। यूरोपोल की 2026 रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में यूरोपीय संघ में 45 आतंकी हमले हुए, जिनमें 22 पूर्ण हमले, 20 नाकाम किए गए प्रयास और 3 विफल हमले शामिल थे। इनमें 24 जिहादी आतंकवाद से जुड़े थे। आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार 486 लोगों में 347 यानी लगभग 71 प्रतिशत जिहादी मामलों से जुड़े थे। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इन 347 आरोपियों में 108 नाबालिग या 18 वर्ष तक के किशोर थे। अर्थात् खतरा केवल आज के आतंकियों का नहीं, अगली पीढ़ी के मन में बोए जा रहे कट्टरपंथ का भी है। सवाल यह है कि दुनिया उसे पहचानकर रोकने के लिए तैयार है या फिर अगले हमले का इंतजार करेगी?
अब कट्टरपंथ गुप्त प्रशिक्षण शिविरों तक सीमित नहीं है। मोबाइल उसके प्रचारक, बंद ऑनलाइन समूह संपर्क-केंद्र हैं और छोटे वीडियो वैचारिक प्रवेश-द्वार। कोई किशोर बिना किसी आतंकी संगठन का औपचारिक सदस्य बने भी इस्लामिक स्टेट जैसे संगठनों के हिंसक आख्यान से जुड़ सकता है।
यूरोपोल के अनुसार, आतंकवाद का केंद्र तेजी से डिजिटल वातावरण की ओर खिसक रहा है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, एन्क्रिप्टेड संचार और एआई-संचालित सामग्री कट्टरपंथ तथा हिंसक रास्ते को तेज कर रहे हैं। फ्रांसीसी सुरक्षा एजेंसियां भी चेतावनी दे रही हैं कि देश के सामने प्रमुख आतंकवादी खतरा ‘जिहादी प्रकृति’ का है। अक्तूबर 2025 कट्टरपंथ निगरानी व्यवस्था में थे। इसलिए खतरा बड़े संगठनों तक सीमित नहीं, इस्लामिक स्टेट के प्रचार से प्रभावित बेहद कम उम्र के अकेले युवा भी हिंसा की ओर बढ़ रहे हैं। हालांकि उनमें से अधिकांश का उस संगठन से प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता।

नीरजा भनोट : 5 सितंबर 1986 को मुंबई से न्यूयार्क जा रही पैन एम की फ्लाइट 73 को कराची में अबू निदाल संगठन के चार आतंकियों ने हाईजैक कर लिया। एयर होस्टेस नीरजा भनोट ने हाइजैक कोड सक्रिय कर विमान को उड़ने से रोका और कई अमेरिकी यात्रियों के पासपोर्ट छिपाकर उन्हें बचाया। लगभग 17 घंटे चले संकट में उन्होंने इमरजेंसी एग्जिट खोलकर यात्रियों को बाहर निकालने में मदद की। तीन बच्चों को बचाने के प्रयास में 23 वर्षीया नीरजा गोलीबारी में बलिदान हो गईं।
कैप्टन देवी शरण : 24 दिसंबर 1999 को काठमांडू से दिल्ली जा रही इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC-814 को पांच आतंकियों ने अपहरण कर लिया। विमान में 176 यात्री और 15 क्रू सदस्य थे। कैप्टन देवी शरण और उनके क्रू ने अत्यंत तनावपूर्ण हालात में विमान संभाला। विमान को कंधार ले जाया गया, जहां यात्री लगभग आठ दिन बंधक रहे। अंततः भारत सरकार को यात्रियों की सुरक्षित रिहाई के लिए आतंकियों से समझौता करना पड़ा।
काउंटर हाइजैक ऑपरेशन : 24 अप्रैल 1993 को दिल्ली से श्रीनगर जा रहे बोइंग 737 को एक आतंकी ने हाईजैक कर अमृतसर के राजा सांसी एयरपोर्ट पर उतारा। एनएसजी के ब्लैक कैट कमांडोज ने विमान में घुसकर आतंकी को पकड़ लिया। इस सफल ऑपरेशन में सभी यात्री सुरक्षित निकाले गए और किसी को गंभीर नुकसान नहीं हुआ। यह भारत के सबसे सफल काउंटर-हाइजैक अभियानों में से एक माना जाता है।
लाहौर विमान अपहरण कांड : 5 जुलाई 1984 को श्रीनगर से दिल्ली जा रही इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC-405 को नौ खालिस्तानी आतंकी हाईजैक कर लाहौर ले गए। क्रू-सदस्यों ने लगभग 20 घंटे तक धैर्य और संयम से स्थिति संभाली। लगातार बातचीत से अपहरणकर्ताओं को विवश किया गया और अंततः उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया। इस घटना में बड़ा खून-खराबा नहीं हुआ।
जिहादी प्रचार को नया ईंधन
फ्रांस की जांच में एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई। 7 अक्तूबर, 2023 के बाद इस्राएल-फिलिस्तीन संघर्ष का जिहादी प्रचार में व्यापक उपयोग हुआ। इस्राएल, यहूदियों और पश्चिम के विरुद्ध हिंसक आख्यानों को नई सामग्री मिली। फ्रांसीसी सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, बीते दो वर्ष में जिहादी खतरा बढ़ा है। इसलिए 7 अक्तूबर को केवल पश्चिम एशिया की सैन्य घटना मान कर छोड़ देना वास्तविकता से आंखें मूंदना है। उसके बाद की लड़ाई गाजा की भौगोलिक सीमा तक सीमित नहीं रही। उसका वैचारिक प्रभाव यूरोप तक पहुंचा।
उसने यूरोप के भीतर पहले से मौजूद कट्टर नेटवर्क, यहूदी विरोध, पश्चिम विरोध और जिहादी प्रचार को नई सामग्री दी। 7 अक्तूबर का यही वह असुविधाजनक पक्ष है, जिससे बहस के कुछ हिस्से कन्नी काटते हैं—क्योंकि इसे स्वीकार करना केवल युद्ध की राजनीति नहीं, कट्टरपंथ के वैचारिक प्रभाव पर भी बात करने को मजबूर करता है।
हमास के हमले में इस्राएली नागरिकों की बर्बर हत्या, अपहरण और बंधकों के साथ यौन हिंसा के आरोपों पर संयुक्त राष्ट्र की जांच में यौन हिंसा के संबंध में उचित आधार और बंधकों के साथ यौन हिंसा की विश्वसनीय सूचनाएं सामने आईं। फिर भी अंतरराष्ट्रीय विमर्श लंबे समय तक प्रमाण, विवाद और राजनीतिक बहानों में उलझा रहा। इसने एक बड़ा प्रश्न खड़ा किया- क्या अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार व्यवस्था अपराध को अपराधी की पहचान और विचारधारा को अलग करके देखेगी?
जून 2026 में पूर्व बंधक इलाना ग्रिट्जेव्स्की का संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में सवाल पूछना कि ‘हमास कहां है?’ इसी दोहरे मानदंड पर सीधा प्रहार था। गाजा के नागरिकों की पीड़ा वास्तविक है, लेकिन उसे हमास की आतंकवादी विचारधारा और 7 अक्तूबर की बर्बरता पर परदा डालने का तर्क नहीं बनाया जा सकता। हमास को केवल क्षेत्रीय संघर्ष का परिणाम बताना उसके वैचारिक चरित्र को मिटाना है। क्योंकि आतंकवाद को उसकी विचारधारा से काटकर देखेंगे, तो आतंकवाद नहीं समझेंगे-सिर्फ उसके बहाने गिनते रह जाएंगे। और जिस दिन मानवाधिकार की भाषा अपराधी की पहचान देखकर बदलने लगे, उसी दिन उसकी सार्वभौमिकता भी कठघरे में खड़ी हो जाती है। इस्राएल-हमास संघर्ष ने इसी वैचारिक संकट को उजागर किया।
हमास केवल सशस्त्र संगठन नहीं, बल्कि इस्लामी विचारधारा से संचालित संगठन है। इसकी राजनीति में मजहबी विचारधारा केंद्रीय भूमिका निभाती है। इसे नजरअंदाज कर संघर्ष को केवल भूमि, उपनिवेशवाद या उत्पीड़न के चश्मे से देखना अधूरा विश्लेषण है। यही अधूरापन पश्चिम के एक वर्ग को हमास की हिंसा पर स्पष्ट रुख लेने से रोकता है।

इस्लामोफोबिया की ढाल
बीते दो दशक में ‘इस्लामोफोबिया’ शब्द इस्लामी कट्टरता की आलोचना को दबाने के लिए सबसे सुविधाजनक कवच बन गया है। मुस्लिम होने के कारण भेदभाव या हिंसा अस्वीकार्य है, लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब इस्लाम, राजनीतिक इस्लाम, शरीयत, जिहादी विचारधारा, ईशनिंदा कानून या इस्लामवादी संगठनों की आलोचना को भी उसी श्रेणी में रख दिया जाता है। तब सुरक्षा व्यक्ति को नहीं, विचार को मिलने लगती है, और विचार आलोचना से बाहर होने लगता है।
ब्रिटेन में इसी संकट ने सरकारी और संसदीय स्तर पर चिंता उत्पन्न की है। ब्रिटिश संसद की 2026 की गृह मामलों की समिति की रिपोर्ट ने साफ संकेत दिया कि चरमपंथ का खतरा अब केवल बंद कमरों या सीमित संगठनों तक नहीं है।इस्लामी कट्टरपंथ सहित पुराने खतरे कायम हैं, जबकि इंटरनेट और सामाजिक माध्यमों के जरिए बच्चों और युवाओं तक कट्टरपंथी विचार तेजी से पहुंच रहे हैं। रिपोर्ट ने ई निंदा-विरोधी उग्रता में बढ़ोतरी को भी गंभीर चिंता के रूप में दर्ज किया। इस पर सरकार ने कहा कि भविष्य में इस्लामी कट्टरपंथ को अलग विचारधारात्मक श्रेणी के रूप में देखा जाएगा, कट्टरपंथी प्रभाव की पहचान की जाएगी और सरकारी संस्थाओं द्वारा उसे अनजाने में वैधता मिलने से रोका जाएगा।
यह परिवर्तन महत्वपूर्ण है, क्योंकि समस्या केवल बम विस्फोट की नहीं है। हिंसा कट्टरता का अंतिम चरण है। उसके पहले विचार आता है, फिर अलगाव। फिर समानांतर नैतिक व्यवस्था बनती है और राज्य के कानून की तुलना में मजहबी आदेश को श्रेष्ठ बताने की प्रक्रिया आती है। इसके बाद आलोचना को ‘अपमान’ घोषित किया जाता है, अपमान को दंड का आधार बनाया जाता है और अंततः कोई व्यक्ति स्वयं को उस ‘अपमान’ की सजा देने का अधिकारी समझ बैठता है। बार-बार यह भी देखा गया है कि मुट्ठी भर कट्टरपंथी बहुसंख्यक समाज की आवाज दबा कर अभिव्यक्ति की सीमाएं तय करने की कोशिश करते हैं।
विरोध अब तीखा क्यों हो रहा है?
यूरोप में इस्लामी कट्टरता के प्रति विरोध की आवाज कठोर हो रही है। इसे केवल दक्षिणपंथी राजनीति कहना उतना ही भ्रामक है, जितना हर प्रवासी को सुरक्षा-खतरा समझना। लगातार हमले, विफल षड्यंत्र, यहूदी संस्थानों पर खतरे, ईशनिंदा विवाद, ऑनलाइन जिहादी प्रचार, एकीकरण की चुनौतियां और कुछ क्षेत्रों में अलगाववाद ने यूरोपीय राजनीति को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। फ्रांस में छात्र प्रदर्शनों पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, ‘इस्लाम एक महान देश पर कब्जा करना चाहता है।’ इस्लामवादी खतरे को पहचानने के लिए किसी अन्य खतरे से इनकार जरूरी नहीं, और दक्षिणपंथी उग्रवाद के अस्तित्व को कट्टर इस्लामवाद पर मौन रहने का बहाना भी नहीं बनाया जा सकता।
यूरोपीय संघ : यूरोपोल की EU TE-SAT 2025 रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में यूरोपीय संघ के 14 सदस्य देशों में 58 आतंकवादी हमले हुए। जिहादी आतंकवाद सबसे घातक खतरा बना रहा। साथ ही, बहुत कम उम्र के जिहादी और दक्षिणपंथी दोनों प्रकार के मामलों में बढ़ती भागीदारी चिंता का विषय बनी।
फ्रांस : फ्रांस राजनीतिक इस्लाम और संस्थाओं में वैचारिक प्रवेश की खुलकर जांच कर रहा है। फ्रांसीसी गृह मंत्रालय ने 2025 में ‘मुस्लिम ब्रदरहुड और राजनीतिक इस्लामवाद’ पर विशेष रिपोर्ट सार्वजनिक की। इससे स्पष्ट है कि फ्रांस अब केवल आतंकवादी हिंसा ही नहीं, बल्कि राजनीतिक इस्लाम, अलगाववाद और समानांतर सामाजिक ढांचे को भी सुरक्षा एवं गणतांत्रिक व्यवस्था के संदर्भ में देख रहा है।
जर्मनी : 2025 की संवैधानिक सुरक्षा रिपोर्ट में चरमपंथ से जुड़े 58,851 अपराध दर्ज हुए। रिपोर्ट के अनुसार दक्षिणपंथी उग्रवाद लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है, पर इस्लामवाद सहित अन्य कट्टरपंथी खतरे भी बढ़े हैं। इसलिए यूरोप में दो प्रतिक्रियाएं समानांतर चल रही हैं-
सुरक्षा की प्रतिक्रिया
- खुफिया समन्वय मजबूत करना
- ऑनलाइन कट्टरपंथी प्रचार पर कार्रवाई
- आतंकवादी नेटवर्क और वित्तपोषण पर प्रहार
- सीमा एवं प्रवासन नीतियों की समीक्षा
- संवेदनशील धार्मिक स्थलों की सुरक्षा बढ़ाना
सामाजिक-राजनीतिक प्रतिक्रिया
- सहिष्णु समाज को असहिष्णु विचारधारा के प्रति कितना सहिष्णु होना चाहिए?
- मजहबी स्वतंत्रता और हिंसक या अलोकतांत्रिक विचारधारा के बीच सीमा कहां है?
- एकीकरण और समान नागरिकता के स्थान पर अलगाववादी प्रवृत्तियों को कितना स्वीकार किया जा सकता है?
कट्टरता पर चुप्पी, कट्टर प्रतिक्रिया
कट्टरता की आलोचना न हो, तो उसकी प्रतिक्रिया भी कट्टर होगी। यही पश्चिमी उदारवाद की सबसे बड़ी विडंबना है। यदि उदार व्यवस्था इस्लामी कट्टरता की तथ्यात्मक, तर्कसंगत और निर्भीक आलोचना के लिए लोकतांत्रिक जगह नहीं छोड़ेगी, तो वह जगह ऐसे राजनीतिक समूह भरेंगे जिनकी आलोचना विचारधारा से आगे बढ़कर पूरे समुदाय के प्रति वैमनस्य बन सकती है।
इस्लामी कट्टरता पर मौन सामाजिक शांति नहीं बचाता, वह प्रतिक्रिया को और उग्र बनाता है। जब नागरिक बार-बार होने वाले हमले देखते हैं, सुरक्षा एजेंसियां खतरे की चेतावनी देती हैं, यहूदी समुदायों को अतिरिक्त सुरक्षा चाहिए, पर ईशनिंदा के नाम पर धमकियां दी जाती हैं। सार्वजनिक विमर्श में इन प्रश्नों पर खुलकर बोलने के बजाय हर आलोचना को ‘इस्लामोफोबिया’ के भय से नरम कर दिया जाता है, तब समस्या केवल अभिव्यक्ति की नहीं रहती-संस्थाओं पर भरोसा दरकने लगता है।
कट्टरता के सवाल पर कन्नी काटने वाली राजनीति समाज में एक खालीपन और आक्रोश पैदा करती है। इसी खाली जगह का फायदा अतिवादी राजनीति उठाती है। इसलिए कट्टर इस्लामवाद की स्पष्ट आलोचना किसी उग्र दक्षिणपंथ को खाद देना नहीं है। इसके उलट यही उसका लोकतांत्रिक विकल्प हो सकती है। यदि मुख्यधारा सच बोलेगी तो समाज को अतियों के पास सत्य खोजने नहीं जाना पड़ेगा।
दुबई की घटना का असली प्रश्न
फ्लाईदुबई की उड़ान में 182 लोग बच गए, लेकिन कहानी केवल कप्तान स्मित मच्छार की वीरता तक सीमित नहीं होनी चाहिए। नायक की जरूरत पड़ना व्यवस्था की सफलता नहीं, उसकी अंतिम परीक्षा है। सफल सुरक्षा व्यवस्था वह है जो संकट को कॉकपिट तक पहुंचने ही न दे। यदि किसी व्यक्ति की कट्टरपंथ संबंधी चेतावनी एक देश की फाइल में पड़ी रहे और वही व्यक्ति दूसरे देश में संवेदनशील विमान उड़ाने लगे, तो यह वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर चूक है।
यही बात आतंकवाद पर भी लागू होती है। कट्टर विचार को तब पहचानना देर है, जब वह कुल्हाड़ी उठा चुका हो। उसे तब पहचानना चाहिए, जब वह यह विश्वास पैदा करे कि किसी राजनीतिक या मजहबी उद्देश्य के सामने निर्दोष मानव जीवन का कोई मूल्य नहीं।
दशकों से मिल रही चेतावनी


इस्लामी कट्टरता ने दुनिया को पहली चेतावनी अभी नहीं दी है। न्यूयॉर्क, मुंबई, मैड्रिड, लंदन, पेरिस, ब्रसेल्स, नीस, मैनचेस्टर, वियना, मास्को, तेल अवीव, काबुल और अफ्रीका के संघर्षग्रस्त इलाकों तक—दशकों से हिंसा के प्रमाण सामने रहे हैं।
घटनाएं अलग थीं, संगठन अलग थे, तरीके अलग थे—पर कट्टर जिहादी हिंसा की चेतावनी बार-बार दोहराई गई। कई छोटे हमले ऐसे भी हुए, जिनके नाम वैश्विक स्मृति में दर्ज तक नहीं हुए। सवाल यह नहीं कि दुनिया को चेतावनी मिली या नहीं। सवाल यह है कि चेतावनी मिलने के बाद भी उससे सबक लेने में इतनी देर क्यों हुई?



कट्टर विचार किसी एक देश, क्षेत्र या समुदाय तक सीमित नहीं है। वह विचार, प्रचार, असंतोष और राजनीतिक परिस्थितियों के मेल से फैलता है। इसीलिए वह किसी भी समाज में जगह बना सकता है और सही परिस्थितियों में वहीं पला युवक उसी समाज के विरुद्ध हथियार उठा सकता है। इसलिए यह खतरा किसी भी देश, समाज और अंततः किसी भी घर तक पहुंच सकता है।
दुबई से तेल अवीव जा रहे विमान से जुड़ा प्रकरण इस चिंता को गंभीर बनाता है। यदि कट्टर विचार किसी विमान के कॉकपिट जैसे अत्यंत नियंत्रित और जिम्मेदार स्थान तक पहुंच सकते हैं, तो यह मानना गलत होगा कि बाकी संस्थाएं स्वतः सुरक्षित हैं। अगला जोखिम कहां उभरेगा, इसका अनुमान कठिन है, पर उसे अनदेखा करने से वह समाप्त नहीं होता।
लोकतांत्रिक समाज की जिम्मेदारी है कि वह खतरे की प्रकृति स्पष्ट रूप से पहचाने, पर विचारधारा और उसे मानने वाले सामान्य व्यक्ति के बीच अंतर बनाए रखे। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हिंसक या कट्टर राजनीतिक विचारधारा की आलोचना ही रोक दी जाए। इस्लामी कट्टरता को इसी कसौटी पर देखने की आवश्यकता है। यह केवल सुरक्षा का नहीं, वैचारिक चुनौती का भी प्रश्न है। उसकी विचारधारा, संगठनात्मक विस्तार, हिंसक शाखाओं और कट्टरता पैदा करने वाली सामाजिक परिस्थितियों की जांच पूर्वाग्रह नहीं है। हर आलोचना को ‘इस्लामोफोबिया’ कहकर खारिज करना हिंसा के शुरुआती संकेतों को पहचानने की क्षमता कमजोर करता है। 30 सितंबर की घटना ने यही सवाल फिर खड़ा किया कि क्या दुनिया कट्टरता के बदलते रूपों को समय रहते पहचान रही है? उस दिन कॉकपिट में स्मित मच्छार जाग रहे थे। सवाल है, क्या दुनिया भी जागेगी?



















