गत 30 सितम्बर को पाञ्चजन्य द्वारा मुंबई में ‘छत्रपति संवाद : मुंबई संकल्प’ का आयोजन हुआ। इसमें महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने लंबी बातचीत की। प्रस्तुत हैं मुख्यांश
भाजपा आज देश के 22 राज्यों में दिखाई देती है। जब कार्यकर्ताओं को अलग-अलग राज्यों की जिम्मेदारी दी जाती है तो अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों से संवाद करना पड़ता है। लेकिन महाराष्ट्र में जब भाषा का प्रश्न उठता है, तो वह पूरे देश में चर्चा का विषय बन जाता है। आपके लिए भाषा का प्रश्न क्या है-पहचान का, प्रशासन का या राजनीति का?
हमारे लिए भाषा हमेशा संवाद का माध्यम रही है। हम कभी यह नहीं मानते कि भाषाएं विवाद का माध्यम होनी चाहिए। जहां तक महाराष्ट्र का सवाल है, 2014 से जब से भारतीय जनता पार्टी ने शासन संभाला है या हमारी महायुति की सरकार रही है, हमने कभी भी भाषा के आधार पर महाराष्ट्र में अन्याय नहीं होने दिया। यह अलग बात है कि महाराष्ट्र में कुछ पार्टियां ऐसी हैं, जो केवल भाषा के आधार पर राजनीति करना चाहती हैं। हमारा हमेशा यह मानना रहा है कि क्षेत्रीय अस्मिता का सम्मान होना चाहिए, हर मातृभाषा का सम्मान होना चाहिए और साथ-साथ सभी भारतीय भाषाओं का भी सम्मान होना चाहिए। महाराष्ट्र में निश्चित रूप से मराठी को प्राथमिकता मिलेगी, क्योंकि मराठी महाराष्ट्र की अपनी भाषा और मातृभाषा है। लेकिन दूसरी भाषा बोलने वाले लोगों के साथ केवल इसलिए अन्याय नहीं होना चाहिए कि वे दूसरी भाषा बोलते हैं।
मैं एक उदाहरण देना चाहता हूं। महाराष्ट्र में टैक्सी और ऑटो चलाने वाले अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले लोगों के लिए कामचलाऊ मराठी सीखने की व्यवस्था की गई। इसे कुछ लोगों ने इस तरह प्रस्तुत किया, मानो मराठी उन पर जबरन थोपी जा रही हो। जबकि वास्तव में केवल दो पन्नों का एक छोटा-सा सिलेबस था, जिसमें उन्हें सामान्य बातचीत के कुछ शब्द और वाक्य सीखने थे-जैसे बैठिए, आइए, कहां जाना है आदि। मुझे खुशी है कि मुंबई के टैक्सी और ऑटो यूनियन के हमारे हिंदी भाषी भाइयों ने खुद मुझसे मिलकर कहा कि हम कामचलाऊ मराठी सीखना चाहते हैं, लेकिन हमें समय चाहिए। हमने कहा कि आपको जितना समय चाहिए, उतना लीजिए। किसी पर कोई सख्ती नहीं होगी और किसी का लाइसेंस रद्द नहीं किया जाएगा। हमारा मानना है कि जिस राज्य में हम रहते हैं, वहां की भाषा की कम से कम सामान्य जानकारी हमें होनी चाहिए। इसलिए आप विश्वास रखिए, महाराष्ट्र में जब तक भाजपा की सरकार है, मराठी का सर्वोच्च सम्मान होगा, लेकिन सभी भारतीय भाषाओं का भी सम्मान होगा। मराठी हमारी मां है तो बाकी भारतीय भाषाएं हमारी मौसी हैं।
महाराष्ट्र सरकार बहुत सारी कल्याणकारी योजनाएं चला रही है। किसानों के लिए भी योजनाएं हैं और बुनियादी ढांचे पर भी बड़ा खर्च हो रहा है। लेकिन इसके साथ राज्य का कर्ज भी बढ़ रहा है। अंततः यह बोझ किस पर पड़ेगा और इसे नियंत्रित करने की आपकी क्या योजना है?
पहली बात तो यह है कि हम एक विकासशील अर्थव्यवस्था है। विकासशील अर्थव्यवस्था में जब आप विकास करते हैं तो कर्ज लेना आवश्यक हो सकता है। लेकिन दो चीजें देखी जाती हैं-कर्ज किस चीज पर खर्च किया जा रहा है और जीडीपी के मुकाबले कर्ज कितना है। आरबीआई ने राज्यों के लिए जीडीपी के 25 प्रतिशत तक कर्ज लेने की सीमा का एक मानक रखा है। अगर कोई राज्य इससे आगे जाता है तो चिंता की स्थिति पैदा होती है। महाराष्ट्र की स्थिति देखें तो हमारी जीडीपी की तुलना में हमारा कर्ज लगभग 18 प्रतिशत है। देश के बड़े राज्यों में महाराष्ट्र और गुजरात ऐसे राज्य हैं, जिनका अनुपात करीब 18-19 प्रतिशत के आसपास है, जबकि कई दूसरे राज्य 23-24 प्रतिशत तक हैं। कई बार लोग केवल कर्ज की कुल राशि देखते हैं, लेकिन उसके अनुपात को नहीं देखते।
महाराष्ट्र की जीडीपी 2013-14 में लगभग 13 लाख करोड़ रुपए थी और आज यह लगभग 54 लाख करोड़ रुपए के स्तर पर पहुंच गई है। यानी अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ी वृद्धि हुई है। 2013 में भी जीडीपी के अनुपात में हमारा कर्ज करीब 18 प्रतिशत था और आज भी करीब 18 प्रतिशत है। इसके साथ महाराष्ट्र उन राज्यों में है, जिन्होंने राजकोषीय घाटे को 3 प्रतिशत के आसपास या उसके भीतर रखने का प्रयास किया है। इसलिए केवल कर्ज बढ़ने को देखकर चिंता करना पर्याप्त नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि कर्ज का इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए किया जा रहा है और अर्थव्यवस्था उसे वहन करने की स्थिति में है या नहीं।

आपने बताया कि जीडीपी जिस तेजी से बढ़ी, उसके अनुपात में कर्ज नियंत्रित रहा। लेकिन क्या 18 प्रतिशत का यह आंकड़ा आने वाले वर्षों में और नीचे जाएगा?
यह बिल्कुल नीचे आ सकता है, लेकिन अगले पांच-दस साल तक हमारा प्राथमिक लक्ष्य इसे नीचे लाना नहीं है। जीडीपी के साथ हमारी क्षमता बढ़ेगी और हम उतना कर्ज ले सकते हैं, लेकिन हमारा प्रयास होगा कि वह कर्ज मुख्य रूप से ‘कैपिटल एक्सपेंडिचर’ के लिए लिया जाए। हम ऐसा निवेश करना चाहते हैं, जिससे रोजगार पैदा हो, अर्थव्यवस्था का विस्तार हो और अंततः वही पैसा ब्याज सहित अर्थव्यवस्था में वापस आए। आज महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था लगभग 54 लाख करोड़ रुपए की ओर बढ़ चुकी है। अगर महाराष्ट्र को एक अलग देश माना जाए तो उसकी अर्थव्यवस्था दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में आती। अगर हम वर्तमान विकास दर को बनाए रखने में सफल रहे तो आने वाले वर्षों में महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था और भी बड़े वैश्विक स्तर पर पहुंचेगी।
डबल इंजन की सरकार में एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दूसरी तरफ आप हैं। विपक्ष से सारे मुद्दे ही खींच लिए जाते हैं-देश को खुशहाल बनाना है और विपक्ष को कंगाल बनाना है। आप विपक्ष पर इतना अत्याचार क्यों करते हैं?
मूल रूप से हमारा विपक्ष कभी विपक्षी भूमिका में जा ही नहीं पाया। उनकी मानसिकता इतनी सामंती रही है कि वे अपने आपको अधिकारिता और सत्ता के केंद्र के रूप में देखते रहे। उन्होंने खुद को राजा माना और यह स्वीकार नहीं कर पाए कि वे विपक्ष में हैं और उन्हें विपक्ष की भूमिका निभानी है। लोकतंत्र में विपक्ष के पास जनता के मुद्दे होने चाहिए। लेकिन उन्होंने कई बार ऐसे मुद्दे उठाए, जिनका आम आदमी की समस्याओं से सीधा संबंध नहीं था। मैं मजाक में कहता हूं कि हमारा डीएनए तो विपक्ष में तैयार हुआ है। इन्हें हमारे प्रशिक्षण में भेज दीजिए, हम इन्हें अच्छा विपक्ष बनना सिखा देंगे।
विकास और निवेश के उत्साहजनक आंकड़े सामने आते हैं। लेकिन सवाल यह है कि अर्थव्यवस्था जितनी बढ़ी है, क्या रोजगार भी उसी अनुपात में बढ़ा है? अगर नहीं, तो इसकी वजह क्या है और इसे बढ़ाने की आपकी योजना क्या है?
निश्चित रूप से रोजगार भी बढ़ा है। औपचारिक क्षेत्र में रोजगार का एक संकेतक ईपीएफओ के नए खातों की संख्या हो सकती है। देश में हर साल सबसे ज्यादा नए ईपीएफओ खाते महाराष्ट्र से खुलते हैं। दूसरा, एमएसएमई रोजगार निर्माण का बड़ा माध्यम है। महाराष्ट्र में एमएसएमई का बड़ा आधार है और राज्य ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण विस्तार किया है। तीसरा, आज की अर्थव्यवस्था में स्टार्टअप भी रोजगार निर्माण का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। महाराष्ट्र देश के प्रमुख स्टार्टअप केंद्रों में है और स्टार्टअप में निवेश के मामले में भी राज्य महत्वपूर्ण स्थान रखता है। महाराष्ट्र की आबादी देश की कुल आबादी का लगभग 9 प्रतिशत है, जबकि देश के स्टार्टअप इकोसिस्टम में महाराष्ट्र की हिस्सेदारी उससे काफी अधिक बताई जाती है। इसके साथ हमारा प्रयास लगातार यही है कि ज्यादा से ज्यादा निवेश महाराष्ट्र में आए, ताकि उसके आधार पर ज्यादा रोजगार पैदा हो।
कई जिलों में बड़े निवेश के प्रस्ताव आए हैं। लेकिन स्थानीय स्तर पर सवाल उठता है कि बड़ी फैक्ट्री तो आ गई, मगर उसमें हमारे स्थानीय युवाओं की भूमिका क्या होगी? इस चुनौती को कैसे देखते हैं?
महाराष्ट्र ने इस समस्या को काफी पहले समझ लिया था। हमने महाराष्ट्र के आईटीआई को उद्योगों के साथ जोड़ने का काम किया है। हमारा उद्देश्य यह है कि जो युवा रोजगार चाहते हैं और जिन उद्योगों को कुशल श्रमिक चाहिए, उनके बीच का अंतर खत्म हो। कई उद्योगों से पूछिए कि उनकी सबसे बड़ी समस्या क्या है, तो वे कहते हैं कि उन्हें स्किल्ड लेबर नहीं मिलता। इसीलिए हमने आईटीआई को उद्योगों के साथ जोड़ा है। कई सरकारी आईटीआई में प्लेसमेंट का स्तर बहुत अच्छा है। हमने छत्रपति संभाजीनगर में ईवी सेक्टर के लिए भी इसी प्रकार का प्रयोग किया है। वहां ईवी का इकोसिस्टम विकसित हो रहा है। हमने उद्योगों से कहा कि वे वहीं ऐसे प्रशिक्षण संस्थान स्थापित करें, जहां भविष्य में काम करने वाले युवाओं को आवश्यक कौशल दिया जा सके। इसका फायदा यह है कि जब तक फैक्ट्री तैयार होती है, तब तक उसके लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन भी तैयार हो जाता है।
आपने रोजगार मेलों की भी शुरुआत की है। इसका क्या उद्देश्य है?
हमने महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर रोजगार मेले शुरू किए हैं। लगभग 2,000 रोजगार मेले आयोजित किए जा रहे हैं। एक ही दिन में करीब 400 स्थानों पर रोजगार मेलों की शुरुआत हुई, जिनमें बड़ी संख्या में युवाओं ने भाग लिया और बड़ी संख्या में उद्योगों ने भी हिस्सा लिया। हमारा लक्ष्य है कि इन मेलों के माध्यम से बड़ी संख्या में युवाओं और युवतियों को रोजगार के अवसर मिलें।
चाकण और हिंजवड़ी जैसे पुराने औद्योगिक क्षेत्रों में सड़क, कचरा, पानी और अन्य बुनियादी सुविधाओं की समस्याएं सामने आती रही हैं। सरकार इनका समाधान कैसे करेगी?
जब औद्योगिक क्षेत्र विकसित होते हैं तो कई बार वे शहर के बाहर ग्राम पंचायतों के क्षेत्र में होते हैं। लेकिन समय के साथ उद्योगों का इतना विस्तार हो जाता है कि ग्राम पंचायत के पास वहां के इंफ्रास्ट्रक्चर को संभालने की क्षमता नहीं रहती। चाकण में भी यही समस्या सामने आई। हमने तय किया है कि इन औद्योगिक क्षेत्रों को इंडस्ट्रियल टाउनशिप के रूप में विकसित किया जाए, ताकि वहां की व्यवस्था के लिए अलग स्थानीय प्रशासनिक ढांचा हो। प्रायोगिक तौर पर चाकण और हिंजवड़ी के लिए लगभग 2,100 करोड़ रुपए के काम मंजूर किए गए हैं। चाकण को आगे औद्योगिक नगर के रूप में विकसित करने की योजना है, जबकि हिंजवड़ी को पिंपरी-चिंचवड़ महानगरपालिका में शामिल करने की दिशा में काम किया जा रहा है।
महाराष्ट्र में क्षेत्रीय अस्मिता के साथ-साथ धर्म और हिंदुत्व का मुद्दा भी राजनीति में दिखाई देता है। कट्टरता के समर्थक होने का आरोप लगाने वालों को आप क्या जवाब देंगे?
पहली बात तो यह है कि हमारा विचार हिंदुत्व है और हमें अपने आपको हिंदू कहने में कोई शर्म नहीं है। लेकिन हिंदुत्व और कट्टरता को एक मानना उचित नहीं है। भारत की संस्कृति ने हमेशा अलग-अलग समुदायों को स्थान दिया है। इतिहास में ऐसे अनेक समुदाय भारत आए, जिन्हें अपने मूल देशों में कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था। भारत ने उन्हें रहने और विकसित होने का अवसर दिया। पारसी समुदाय इसका एक उदाहरण है। आज देश के विकास में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। हमारे लिए हिंदुत्व केवल पूजा-पद्धति या परंपरा तक सीमित नहीं है। यह एक व्यापक सांस्कृतिक दृष्टिकोण है। हम मानते हैं कि भारत की संस्कृति, इसकी परंपराओं और इसके ऐतिहासिक नायकों का सम्मान होना चाहिए। भगवान राम और भगवान कृष्ण हमारे सांस्कृतिक जीवन के महत्वपूर्ण प्रतीक हैं। हिंदुत्व का अर्थ सहिष्णुता भी है, लेकिन सहिष्णुता का मतलब यह नहीं कि कोई सामने से आकर हमला करे और हम जवाब न दें।
घोषणापत्र में किए गए वादों को पूरा करने की समयसीमा और प्रगति का कोई स्पष्ट रिपोर्ट कार्ड होना चाहिए। क्या आपकी पार्टी या सरकार ऐसी कोई पहल करेगी, जिससे जनता यह देख सके कि किस पार्टी ने कितने वादे पूरे किए?
हमारे लोकतंत्र में एक कमी यह है कि कई बार राजनेताओं को पता होता है कि चुनाव के समय किए गए वादे जनता कुछ समय बाद भूल जाती है। इससे राजनीतिक जवाबदेही कमजोर होती है। लेकिन हमें खुशी है कि 2014 में जब हमारी सरकार आई तो हमने अपने संकल्प पत्र के आधार पर काम किया। 2019 के चुनाव से पहले हमने बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बताया कि हमने अपने पिछले संकल्प पत्र में क्या कहा था और उसमें से कितना पूरा किया। हमने बताया कि लगभग 99 प्रतिशत काम पूरे किए जा चुके थे। जो काम नहीं हो सके, उनके पीछे कानूनी या प्रशासनिक अड़चनें थीं। 2024 के चुनाव में भी हमने जनता के सामने अपना ट्रैक रिकॉर्ड रखा।
अब 2029 में भी हम जनता को बताएंगे कि 2024 में हमने क्या वादे किए थे और उनमें से कितने पूरे किए। आज मैं आपको बता सकता हूं कि 2024 में किए गए हमारे करीब 40 प्रतिशत वादे लगभग डेढ़ साल में ही पूरे किए जा चुके हैं। बाकी वादों को भी पूरा करने का हमारा प्रयास रहेगा।
लाडली बहिन योजना से बड़ी संख्या में महिलाएं जुड़ीं। लेकिन बाद में सत्यापन के दौरान कई नाम अपात्र पाए गए। क्या किसी भी योजना में पात्रता की जांच शुरुआत से ही नहीं होनी चाहिए?
निश्चित रूप से किसी भी योजना में पात्रता के मानदंड स्पष्ट होने चाहिए और आदर्श स्थिति यही है कि जो पात्र हो, उसी को योजना का लाभ मिले। लेकिन यह बहुत बड़ी और व्यापक योजना थी। शुरुआत में हमने सेल्फ-सर्टिफिकेशन की व्यवस्था रखी। पात्र व्यक्ति अपने हलफनामे या आवेदन के माध्यम से यह घोषित कर सकता था कि वह निर्धारित मानदंडों को पूरा करता है। इसके साथ-साथ हमने समानांतर रूप से सत्यापन की प्रक्रिया भी शुरू की। सत्यापन में अलग-अलग तरह की अनियमितताएं सामने आईं। कुछ मामलों में पुरुषों ने भी आवेदन कर दिया। कुछ सरकारी कर्मचारियों के परिवारों ने आवेदन किया। कुछ मामलों में निर्धारित पारिवारिक सीमा से अधिक लाभ लिया गया। इसके अलावा वरिष्ठ नागरिकों के लिए उपलब्ध दूसरी योजनाओं से लाभ लेने वाले लोगों के रिकॉर्ड भी जांचे गए। ई-केवाईसी और दूसरे डेटाबेस के साथ मिलान करने पर आयकरदाताओं तथा ऐसे लोगों की जानकारी भी सामने आई, जो निर्धारित पात्रता पूरी नहीं करते थे। कुछ मामलों में वाहन पंजीकरण के रिकॉर्ड से भी जानकारी मिली। इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य यही था कि योजना का लाभ वास्तव में पात्र महिलाओं तक पहुंचे।
मराठवाड़ा और विदर्भ में किसान आत्महत्या, सूखा और अतिवृष्टि लंबे समय से चर्चा के विषय रहे हैं। राहत की घोषणा तो जल्दी होती है, लेकिन पैसा किसानों के खाते तक पहुंचने में समय लगता है। क्या इसके लिए स्पष्ट टाइमलाइन और कार्ययोजना है?
हम टाइमलाइन के आधार पर काम करते हैं। जब फसल खराब होती है या प्राकृतिक आपदा आती है तो तत्काल राहत के लिए कई उपाय शुरू किए जाते हैं। इसके बाद नियमों के अनुसार केंद्र सरकार को एनडीआरएफ के लिए मेमोरेंडम भेजा जाता है और पात्र किसानों के खातों में सीधे सहायता पहुंचाई जाती है। पिछले वर्ष भारी बारिश से फसलों को नुकसान हुआ था और हमने लगभग एक महीने के भीतर बड़ी संख्या में किसानों के खातों में सहायता राशि पहुंचाई। कर्जमाफी के संबंध में भी हमने जो वादा किया है, उसे पूरा करने का काम शुरू किया है। लगभग 56 लाख किसानों के कर्जमाफी कार्यक्रम पर काम किया जा रहा है और बड़ी संख्या में किसानों के खातों में राशि पहुंचाई जा चुकी है। इसके अलावा किसानों की बिजली से संबंधित पुरानी बकाया राशि को लेकर भी बड़ा निर्णय लिया गया है। हमारा मानना है कि वादा और इरादा दोनों में अंतर नहीं होना चाहिए।
गठबंधन की राजनीति में एक ही मुद्दे पर दो नेताओं के अलग-अलग बयान सामने आ सकते हैं। जनता किस बयान को अंतिम और आधिकारिक माने?
गठबंधन में पार्टियां अपनी जगह हैं, लेकिन बंधन भी है। बिना बंधन के हम साथ नहीं हैं। जो पार्टी सरकार का नेतृत्व करती है, उसकी जिम्मेदारी होती है कि वह अपने सहयोगियों को विश्वास में लेकर निर्णय करे। जहां तक आधिकारिक बयान का सवाल है, सरकार की ओर से मुख्यमंत्री जो कहते हैं, वही आधिकारिक बयान माना जाएगा। अगर कोई दूसरा व्यक्ति कुछ कहता है तो वह उसका व्यक्तिगत बयान हो सकता है। इसलिए जब मैं कोई बात सरकार की ओर से कहता हूं तो उसे आधिकारिक समझिए।
छत्रपति शिवाजी महाराज और भारतीय इतिहास के बारे में लंबे समय से यह बहस रही है कि कुछ इतिहासकारों ने उनके योगदान को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। महाराष्ट्र में यदि कोई उनके इतिहास के साथ छेड़छाड़ करता है तो सरकार का रुख क्या होगा?
अंग्रेज चाहते थे कि भारत का शौर्य, तेज और आत्मविश्वास कमजोर हो। इसलिए हमारे ऐतिहासिक नायकों और उनके इतिहास को कमजोर करके प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया। आजादी के बाद उम्मीद थी कि स्वतंत्र भारत में हमारा इतिहास सही तरीके से सामने आएगा। लेकिन मेरे अनुसार लंबे समय तक इतिहास लेखन में कुछ ऐसे दृष्टिकोण प्रभावी रहे, जिनमें हमारे अपने नायकों को पर्याप्त स्थान नहीं मिला। छत्रपति शिवाजी महाराज केवल स्वराज्य के संस्थापक नहीं थे, उन्होंने एक ऐसी व्यवस्था खड़ी की, जिसने आगे चलकर मराठा शक्ति के विस्तार का आधार बनाया। हमारे इतिहास में मराठों की भूमिका को पर्याप्त रूप से समझना आवश्यक है। मुझे खुशी है कि अब इतिहास को अलग दृष्टिकोण से देखने का प्रयास हो रहा है और छत्रपति शिवाजी महाराज के इतिहास को पाठ्यक्रम में अधिक स्थान दिया जा रहा है। जहां तक महाराष्ट्र का सवाल है, जब तक चांद और सूरज हैं, छत्रपति शिवाजी महाराज के इतिहास के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं कर सकता।
आर्य बाहर से आए इस ऐतिहासिक धारणा को आप कैसे देखते हैं?
हमारे इतिहास में लंबे समय तक यह पढ़ाया गया कि आर्य बाहर से आए थे और भारत के उत्तर और दक्षिण के बीच अलगाव की अवधारणाएं बनाई गईं। अब पुरातात्विक और आनुवंशिक शोध के आधार पर इन पुराने सिद्धांतों पर नए सिरे से चर्चा हो रही है। मेरा मानना है कि भारत के इतिहास और सभ्यता को भारतीय दृष्टिकोण से भी समझने की आवश्यकता है। हमें अपने इतिहास को प्रमाणों के आधार पर सामने लाना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आने वाली पीढ़ियां भारत की सभ्यता, संस्कृति और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को व्यापक संदर्भ में समझें।
आपने विकास, निवेश और रोजगार के कई आंकड़े सामने रखे। लेकिन यदि आपको महाराष्ट्र की तीन वास्तविक चुनौतियां बतानी हों तो वे कौन-सी होंगी?
कुछ चुनौतियां केवल महाराष्ट्र की नहीं हैं, बल्कि पूरी मानवता के सामने हैं। मेरे अनुसार सबसे बड़ी चुनौतियों में जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण शामिल हैं। आज से 15 वर्ष पहले क्लाइमेट चेंज की चर्चा बहुत दूर की चीज लगती थी। लेकिन पिछले वर्षों में बदलते मौसम और उसके प्रभावों ने दिखाया है कि यह हर व्यक्ति से जुड़ा हुआ विषय है। महाराष्ट्र में हमने विशेष रूप से ऊर्जा क्षेत्र में नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता बढ़ाने पर काम किया है। 2020-21 में हमारे पावर मिक्स में रिन्यूएबल एनर्जी की हिस्सेदारी करीब 13 प्रतिशत थी, जो अब लगभग 30 प्रतिशत तक पहुंच गई है। हमारा लक्ष्य इसे आगे और बढ़ाना है। दूसरी महत्वपूर्ण समस्या जल प्रबंधन की है। खेती, भूजल और जल स्रोतों का भविष्य जलवायु परिवर्तन से सीधे जुड़ा है। हमें प्रदूषित पानी को जल स्रोतों में जाने से रोकना होगा।
अगले चुनाव में जब आप जनता के बीच जाएंगे तो ऐसी कौन-सी तीन ठोस और मापने योग्य उपलब्धियां होंगी, जिनके आधार पर जनता आपकी सरकार का आकलन कर सके?
सबसे महत्वपूर्ण काम जल संकट को लेकर है। महाराष्ट्र का लगभग 52 प्रतिशत क्षेत्र सूखा-प्रभावित है। हमारा लक्ष्य है कि मेरी पीढ़ी ने अकाल देखा है, लेकिन अगली पीढ़ी अकाल न देखे। इसी उद्देश्य से हमने कई महत्वाकांक्षी नदी-जोड़ और जल-स्थानांतरण परियोजनाएं शुरू की हैं। विदर्भ में वैनगंगा नदी का बड़ी मात्रा में पानी हर वर्ष समुद्र में चला जाता है। हमारी योजना है कि इस पानी का उपयोग विदर्भ के सूखा-प्रभावित क्षेत्रों में किया जाए। इसी तरह पश्चिमी महाराष्ट्र और कोंकण क्षेत्र में बड़ी मात्रा में पानी समुद्र में चला जाता है। उसमें से कुछ पानी गोदावरी बेसिन और सूखा-प्रभावित क्षेत्रों की ओर ले जाने की परियोजनाएं बनाई गई हैं। सतारा, सांगली और कोल्हापुर क्षेत्र में बाढ़ की समस्या को देखते हुए भी फ्लड मिटिगेशन और जल-स्थानांतरण की योजनाएं तैयार की गई हैं। इन नदी-जोड़ परियोजनाओं को पूरा होने में कई वर्ष लगेंगे, लेकिन अगर ये सफल होती हैं तो महाराष्ट्र में सूखे की समस्या को बहुत हद तक कम किया जा सकता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना को 100 वर्ष पूरे हो रहे हैं। सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में इसकी भूमिका को आप कैसे देखते हैं?
मैं ऐसा मानता हूं कि आज देश में जो सांस्कृतिक पुनरुत्थान दिखाई देता है, उसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की महत्वपूर्ण भूमिका है। आज भी हमारे समाज में हिंदू संस्कृति और संस्कारों को लेकर जो चेतना दिखाई देती है, उसमें संघ के लंबे सामाजिक कार्य का योगदान है। परम पूजनीय डॉ. हेडगेवार जी ने इतिहास का अध्ययन करने के बाद यह समझा कि जब-जब इस देश का समाज कमजोर और विभाजित हुआ, तब-तब देश को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व्यक्ति निर्माण का काम करता है। उसका उद्देश्य ऐसे व्यक्तियों का निर्माण करना है, जो अपने-अपने क्षेत्र में काम करें, लेकिन उनके जीवन का अंतिम लक्ष्य राष्ट्र की प्रगति से जुड़ा हो। मेरा मानना है कि संघ ने समाज में राष्ट्रवाद और संगठन की भावना को मजबूत करने का प्रयास किया है। आज देश में जो सांस्कृतिक और सामाजिक जागरण दिखाई देता है, उसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के योगदान को समझना जरूरी है।

















