NCERT में दिल्ली सल्तनत और मुगलों का इतिहास घटा, भारतीय स्वाभिमान बढ़ा: क्यों तिलमिलाया लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम?
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NCERT में दिल्ली सल्तनत और मुगलों का इतिहास घटा, भारतीय स्वाभिमान बढ़ा: क्यों तिलमिलाया लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम?

NCERT ने इतिहास का झूठा नैरेटिव किया ध्वस्त तो चिढ़ा लेफ्ट-लिबरल खेमा, दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य की जगह मराठा,अहोम, विजय नगर का गौरव पढ़ेंगे छात्र

Written byअभय कुमारअभय कुमार
Oct 4, 2026, 07:45 am IST
inविश्लेषण
एनसीईआरटी ने सिलेबस में किया बदलाव। दिल्ली सल्तनत और मुगलों की जगह भारतीय नायकों को दिया स्थान।

एनसीईआरटी ने सिलेबस में किया बदलाव। दिल्ली सल्तनत और मुगलों की जगह भारतीय नायकों को दिया स्थान।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा कक्षा 9 के लिए जारी नई सोशल साइंस पाठ्यपुस्तक में मध्यकालीन भारतीय इतिहास के पाठ्यक्रम में बड़े बदलाव किए गए हैं। नई पुस्तक “अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड – पार्ट 2” में अब यूरोपीय क्रांतियों जैसे फ्रांसीसी और रूसी क्रांति की जगह भारतीय इतिहास, क्षेत्रीय साम्राज्यों और विदेशी आक्रमणों के खिलाफ भारतीय राजाओं के प्रतिरोध पर ध्यान केंद्रित किया गया है। अब मुगलों के गुणगान के बदले भारतीय राजाओं के प्रतिरोध और संघर्ष को पढ़ाये जाने के कारण पूरे देश के लिबरल और लेफ्ट एकेडमिक्स में हड़कंप मच गया है। देश के लिबरल और लेफ्ट इकोसिस्टम की शिकायत है कि संयुक्त संस्कृति और आपसी सहयोग की कहानी को हटाकर ऐसा क्यों किया जा रहा है ?

भारत ने 1000 ईसवी से 1700 ईसवी के बीच विदेशी हमलावरों के खिलाफ गजब का प्रतिकार दिखाया था। कांग्रेस पार्टी और उसके सहयोगियों की सरकारों में गलत इतिहास पढ़ाया गया। भारतीयों को अपने छात्रकाल से ही अपने इतिहास पर गर्व करने के बजाये उसे शर्मिंदगी का करना सिखाया गया था। भारतीयों को शुरुआत से ही बताया गया की दिल्ली ही सम्पूर्ण भारत है। बाबर ने देश में मुगल सल्तनत की स्थापना की, अकबर महान बना, शाहजहां ने ताजमहल और लालकिला का निर्माण करवाया। देशवासियों इसके नाम पर गंगा-जमुनी तहजीब का पाठ पढ़ाया गया।

तलवार के दम पर मतांतरण

यह जानकारी हकीकत से कोसों दूर थी क्योंकि उस दौर में हिंदुओं पर सिर्फ हिंदू होने के कारण जजिया कर थोपा गया था। तलवार के दम पर मतांतरण किया जा रहा था और हजारों मंदिरों को जमींदोज किया गया। कुछ हिंदू राजाओं ने राजनीतिक मजबूरी, जनता के जीवन और अन्य हितों का ख्याल करते हुए समझौते किए। यह कोई भाईचारा या आपसी सौहार्द का विषय नहीं था। स्कूल के बच्चों को यह पाठ पढ़ाया गया कि भारत तो हमेशा से हारा, दबा, कुचला और मुगलों का आभारी देश रहा है। अब जब नई किताब में दिल्ली सल्तनत को उसके अनुसार एक पन्ना दिया गया है और मुगलों के गुणगान की जगह उन असली नायकों को खड़ा किया गया है, जिन्होंने इन आक्रांताओं के पसीने छुड़ा दिए थे तो लिबरल और लेफ्ट एकेडमिक्स की छाती पर सांप लोटना स्वाभाविक है।

अहोम साम्राज्य ने मुगलों को 17 बार खदेड़ा

असम के अहोम साम्राज्य ने मुगलों को 17 बार धूल चटाई थी। लाचित बरफुकन ने सराय घाट की लड़ाई में मुगलों के पूरे बेड़े को तबाह कर दिया था। 600 साल तक असम आजाद रहा लेकिन पूर्व के किताबों में उनके लिए एक पैराग्राफ तक नहीं था। दक्षिण भारत का विजयनगर साम्राज्य जो उस वक्त दुनिया के सबसे समृद्ध और ताकतवर साम्राज्यों में से एक था। उसे किताबों के एक कोने में समेट दिया गया था। अब नई किताब में अहोम साम्राज्य, विजयनगर साम्राज्य, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज के स्वराज्य, जाटों और सिखों के संघर्ष से अवगत करवाया जा रहा है तो लिबरल और लेफ्ट एकेडमिक्स आरोप लगा रहा है कि इतिहास ही बदल दिया गया है। इस इकोसिस्टम की समस्या है कि आखिर संयुक्त संस्कृति की जगह प्रतिरोध को क्यों पढ़ाया जा रहा है। दूसरे शब्दों में इस इकोसिस्टम की समस्या है कि मुगलों को क्यों वैसे दिखाया जा रहा है जैसा थे।

इकोसिस्टम को देवियों की तलवार से भी समस्या

इस इकोसिस्टम को इस तथ्य से भी समस्या है कि किताब में देवियों की तलवारों का जिक्र क्यों किया जा रहा है। भारतीय इतिहास और संस्कृति में देवी-देवताओं द्वारा राजाओं को तलवार या अस्त्र-शस्त्र दिए जाने की कई कथाएं मिलती हैं। बस्तर (छत्तीसगढ़) के काकतीय वंश के राजाओं के बारे में यह लोक-मान्यता है कि उन्हें दंतेश्वरी माई के आशीर्वाद से एक चमत्कारी तलवार मिली थी। बस्तर के राजा खुद को देवी दंतेश्वरी का ‘दीवान’ मानकर शासन करते थे। देवी से तलवार मिलने की कथा राजा की सत्ता को प्रजा की नजरों में पवित्र और न्यायसंगत बनाती थी जिससे वनवासी समाज में राजा के प्रति गहरा सम्मान और एकता बनी रहती थी।

विजयनगर साम्राज्य के इतिहास में प्रसिद्ध संस्कृत महाकाव्य मदुरा विजयम के अनुसार जब कुमार कंपन मधुरई को सुल्तानों के नियंत्रण से मुक्त कराने के लिए युद्ध पर निकले थे तब उन्हें एक देवी ने आकर एक दिव्य तलवार सौंपी थी। उस समय दक्षिण भारत में सनातन संस्कृति की रक्षा का एक बड़ा आंदोलन चल रहा था। देवी द्वारा तलवार दिए जाने की कथा ने सैनिकों और जनता में यह विश्वास जगाया कि उनका यह युद्ध धर्म की रक्षा के लिए है और भगवान उनके साथ हैं।

छत्रपति शिवाजी महाराज को माता तुलजा भवानी द्वारा ‘भवानी तलवार’ साक्षात प्रकट होकर देने की लोक-कथा महाराष्ट्र और पूरे भारत में बहुत लोकप्रिय है। इतिहासकार बताते हैं कि छत्रपति शिवाजी महाराज के पास कई उच्च गुणवत्ता वाली जैसे भवानी, जगदम्बा और तुलजा तलवारें थीं। ये तलवारें उस समय के बेहतरीन कारीगरों द्वारा बनाई गई थीं या स्पेन और पुर्तगाल जैसे देशों से मंगवाई गई थीं। स्वराज्य की स्थापना के समय शिवाजी महाराज एक बहुत बड़ी और शक्तिशाली मुगल सत्ता से लड़ रहे थे। ऐसे में मावला सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए यह विश्वास बहुत जरूरी था कि भवानी माता का हाथ शिवाजी महाराज के सिर पर है। इस विश्वास ने मुट्ठी भर सैनिकों में अपार साहस भर दिया था।

यूरोप के इतिहास से धर्मनिरपेक्षता को नहीं लगती ठेस

यूरोप के इतिहास में जॉन ऑफ आर्क को देवी प्रेरित बताया जाता है या किंग आर्थर की तलवार एक्स कैलबर को सम्मान से पढ़ाते हैं तो इनके धर्मनिरपेक्षता को ठेस नहीं लगती है। लेकिन जब भारत का योद्धा सातवीं सदी से शक्ति, काली, दुर्गा और भवानी की उपासना करके मैदान में उतरता है तो इन्हें उसमें इस इकोसिस्टम को अवैज्ञानिक नजर आने लगता है। यूरोप के इतिहास और लोक कथाओं में जॉन ऑफ आर्क और किंग आर्थर की तलवार एक्सकैलिबर दोनों का ही अपना एक विशेष और बहुत ही सम्मानित स्थान हैं। जॉन ऑफ आर्क ने दावा किया था कि उन्हें सेंट माइकल, सेंट कैथरीन और सेंट मार्गरेट के दर्शन हुए थे और भगवान ने उन्हें फ्रांस को अंग्रेजों के कब्जे से मुक्त कराने और ‘हंड्रेड इयर्स वॉर’ (सौ साल के युद्ध) में राजा चार्ल्स VII की मदद करने का आदेश दिया था। इतिहास में उन्हें एक सच्ची वीरांगना और दैवीय रूप से प्रेरित महिला माना जाता है, जिन्होंने अपनी अटूट आस्था और साहस से इतिहास की धारा बदल दी थी।

लेफ्ट-लिबरल को इस तथ्य से भी चिढ़

लेफ्ट लिबरल इकोसिस्टम को नए सिलेबस में एक और तथ्य से भयंकर चिढ़ है कि किताबों में मंदिरों के तोड़े जाने और काशी विश्वनाथ का जिक्र क्यों किया गया है। यह इकोसिस्टम मंदिरों को तोड़े जाने के इतिहास पर पर्दा डालने का काम हमेशा से करता रहा है क्योंकि इन्हें भय हैं कि फिर से कोई मंदिर का दावा कर सकता है। इस इकोसिस्टम की समस्या है कि औरंगजेब द्वारा काशी विश्वनाथ तोड़े जाने और फिर अहिल्याबाई होलकर द्वारा उसके पुनर्निर्माण की बात बच्चों को क्यों पढ़ाई जा रही हैं।

औरंगजेब के दरबारी इतिहासकार साकी मुस्तैद खान द्वारा फारसी में रचित पुस्तक ‘मासिर-ए-आलमगिरी’ में इस बात का स्पष्ट ऐतिहासिक उल्लेख मिलता है कि अप्रैल 1669 में औरंगजेब ने अपने सभी प्रांतों के गवर्नरों को काफिरों के मंदिरों और स्कूलों को तोड़ने का आदेश दिया था। पुस्तक के अनुसार 2 सितंबर 1669 को औरंगजेब के दरबार में यह आधिकारिक सूचना पहुंची थी कि उसके अधिकारियों ने बनारस (वाराणसी) में विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त कर दिया है। साकी मुस्तैद खान औरंगजेब के अंतिम समय और उसकी मृत्यु के बाद के काल का इतिहासकार था, जिसकी शाही दस्तावेजों और फरमानों तक सीधी पहुंच थी। जो सच खुद आक्रांताओं ने अपने पन्नों में दर्ज किया है उसे भी यह इकोसिस्टम स्कूल के बच्चों से क्यों छुपाना चाहता है ? इस इकोसिस्टम के लिए धर्मर्निर्पेक्षता का मतलब है कि सच पर पर्दा डाल दिया जाए ।

भक्ति आंदोलन ने सनातन संस्कृतिको बचाकर रखा

किताब में यह बताया गया है कि भक्ति आंदोलन ने सनातन संस्कृति को बचाए रखा तब भी इस इकोसिस्टम को दर्द हुआ है। जब बाहर मंदिर तोड़े जा रहे थे तब तुलसीदास जी, सूरदास, कबीर और मीराबाई ने घर-घर को ही मंदिर बना दिया था। बंगाल में जब काजी ने संकीर्तन पर रोक लगाई थी तब चैतन्य महाप्रभु ने हजारों लोगों के साथ सड़क पर उतर कर पहला सविनय अवज्ञा आंदोलन किया था। यह सनातनी सांस्कृतिक प्रतिरोध था।

लेफ्ट-लिबरल को फर्जी दुकान बंद होने का डर

इस देश की प्राचीन सभ्यता कोई कमजोर या भीख मांगने वाली सभ्यता नहीं थी जो हमें अब तक पढ़ाई जा रही थी। जिस इस्लामी आक्रांता की आंधी ने फारस, मिस्र, मेसोपोटामिया और पूरे मध्य एशिया की हजारों साल पुरानी सभ्यताओं को महज 20-30 सालों में पूरी तरह मिटा दिया था उसी आंधी के सामने भारत 700 साल से सीना तान कर लड़ता रहा और आज भी अपनी पहचान अपने वेद और अपनी संस्कृति के साथ जिंदा खड़ा होकर उसका प्रतिकार कर रहा है। नई एनसीईआरटी इसी गौरव, इसी प्रतिरोध और इसी स्वाभिमान को भारतीय नजरिए से सामने रख रहा है।

लेफ्ट लिबरल इकोसिस्टम जो दशकों से मुगलों की दरबारी चाटुकारिता को ही भारत का इतिहास मानकर और बच्चों को पढ़ाकर अपने ज्ञान को प्रदर्शित करने और अपने लिए धन का माध्यम बनाये हुए थे उन्हें अपनी उस फर्जी दुकान के हमेशा के लिए बंद हो जाने का लम्बे समय तक दर्द रहेगा। जब उपनिवेश और दरबारी इतिहास के स्थान पर सभ्यतागत इतिहास को पढ़ाया जा रहा है तो दशकों के इस खास आख्यान के संरक्षक रहे बुद्धिजीवियों को झटका लगना स्वाभाविक है।

 

Topics: Vijayanagara EmpireLachit BorphukanLeft Liberal EcosystemKashi Vishwanath TempleChhatrapati Shivaji MaharajBhakti MovementNCERT New SyllabusClass 9 Social Science BookNCERT History ChangesIndian Resistance HistoryAhoms and Mughals
अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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