2 अक्टूबर भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्रीजी की जयंती है। भारतीय सार्वजनिक जीवन में शास्त्रीजी उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे, जिसके लिए सत्ता सुविधा का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा का दायित्व थी। प्रधानमंत्री जैसे सर्वोच्च पद पर पहुंचने के बाद भी उनके जीवन की सहजता, सादगी और शुचिता में कोई परिवर्तन नहीं आया।
‘जय जवान, जय किसान’ का उद्घोष देकर देश के अन्नदाता और सीमा पर खड़े सैनिक को राष्ट्रजीवन के केंद्र में प्रतिष्ठित करने वाले शास्त्रीजी ने अपने आचरण से भी सार्वजनिक जीवन की मर्यादा स्थापित की। उनका जीवन ऐसे अनेक प्रसंगों से भरा है, जिनमें पद की प्रतिष्ठा से कहीं अधिक उनके संस्कार, कर्तव्यबोध और निष्कलंक चरित्र की झलक दिखाई देती है।
शास्त्रीजी की जयंती पर पढ़िए उनके जीवन के ऐसे ही कुछ प्रेरक प्रसंग, जो बताते हैं कि सत्ता के शिखर पर रहते हुए भी सादगी को कैसे जिया जाता है






















