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एक आकस्मिक फोन कॉल, जब पीएमओ से श्रीगुरुजी को आया बुलावा

सितंबर 1965 की एक दोपहर, श्रीगुरुजी भोजन के पश्चात विश्राम कर रहे थे। तभी एक संदेशवाहक ने सूचना दी कि प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) उनसे सम्पर्क करना चाहता है। मामले की गम्भीरता को देखते हुए गुरुजी तुरन्त फोन पर आए। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Oct 19, 2026, 05:49 pm IST
inसंघ @100
पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री RSS के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य श्रीगुरुजी

पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री RSS के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य श्रीगुरुजी

यह 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव राव ‘गुरुजी’ गोलवलकर के बीच हुए उस ऐतिहासिक संवाद और समन्वय की कहानी है, जिसने राष्ट्र को संकट के समय एक सूत्र में पिरो दिया था।

सितंबर 1965 की एक दोपहर, श्रीगुरुजी भोजन के पश्चात विश्राम कर रहे थे। तभी एक संदेशवाहक ने सूचना दी कि प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) उनसे सम्पर्क करना चाहता है। मामले की गम्भीरता को देखते हुए गुरुजी तुरन्त फोन पर आए। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे। शास्त्री जी ने संक्षिप्त शब्दों में राष्ट्र की परिस्थिति बतायी और कहा, “युद्ध चल रहा है, मुझे आपकी सहायता चाहिए। कल सुबह सर्वदलीय बैठक है, आप उसमें सादर आमंत्रित हैं।”

“मैं राजनीतिज्ञ नहीं, कार्यकर्ता हूँ” : श्रीगुरुजी का स्पष्ट उत्तर

शास्त्री जी के निमंत्रण पर श्रीगुरुजी ने विनम्रता से उत्तर दिया, “शास्त्री जी, मैं किसी राजनीतिक दल का नेता नहीं हूँ, मात्र एक संस्था का कार्यकर्ता हूँ।” शास्त्री जी ने उनकी बात स्वीकार की, लेकिन जोर देकर कहा कि देश इस समय एक ऐसे दौर में है जहाँ उन्हें श्रीगुरुजी के मार्गदर्शन और संघ के सहयोग की आवश्यकता है। श्रीगुरुजी ने तुरन्त सहमति दी, लेकिन नागपुर से सुबह तक दिल्ली पहुँचने की चुनौती थी। शास्त्री जी ने इसका प्रबन्ध पहले ही कर रखा था और उन्हें तुरन्त बॉम्बे (मुंबई) के लिए रवाना होने को कहा, जहाँ से उनके दिल्ली आने की विशेष व्यवस्था की गयी थी।

सर्वदलीय बैठक : ‘आपकी सेना’ नहीं, ‘हमारी सेना’ कहिए

7 सितंबर की उस ऐतिहासिक बैठक में एक दिलचस्प वाकया हुआ। बैठक में उपस्थित एक राजनैतिक दल के नेता बार-बार भारतीय सेना को ‘आपकी सेना’ (प्रधानमंत्री की सेना) कहकर संबोधित कर रहे थे। श्रीगुरुजी को यह बात खटक गयी। उन्होंने उस नेता को तब तक बीच में टोका, जब तक कि उन्होंने ‘हमारी सेना’ कहना शुरू नहीं किया। श्रीगुरुजी का मानना था कि युद्ध केवल सरकार का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का होता है।

राष्ट्र के नाम अपील : स्वयंसेवकों का रणघोष

बैठक के अगले ही दिन, 8 सितंबर को श्रीगुरुजी ने देशवासियों और स्वयंसेवकों के नाम एक संदेश जारी किया। उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिए कि इस संकट की घड़ी में कानून-व्यवस्था बनाए रखने, घायलों की सेवा करने और जनता का मनोबल ऊंचा रखने के लिए सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करें। उन्होंने आह्वान किया कि जीत की इच्छाशक्ति हर नागरिक के भीतर जगनी चाहिए।

युद्ध के मैदान में ‘दूसरी सेना’ : संघ का समर्पण

संघ स्वयंसेवक नागरिक प्रशासन की मदद में जुट गये साथ ही जब दिल्ली की पुलिस सीमावर्ती कार्यों में व्यस्त हुई, तो संघ के स्वयंसेवकों ने पूरी मुस्तैदी से शहर की ट्रैफिक व्यवस्था संभाली।

हवाई पट्टियों की सफाई

कश्मीर में बर्फबारी के बीच हवाई पट्टियों से बर्फ हटाने का कठिन कार्य स्वयंसेवकों ने किया ताकि सैन्य विमान उड़ान भर सकें।

रसद और सेवा

सैनिकों के लिए भोजन के पैकेट तैयार करने से लेकर अस्पतालों में रक्तदान करने तक, स्वयंसेवक हर मोर्चे पर सक्रिय रहे।

ताशकंद और शास्त्री जी को अन्तिम विदाई

युद्ध विराम के बाद जब शास्त्री जी रूस के ताशकंद जा रहे थे, तो गुरुजी ने उन्हें पत्र लिखकर समझौते के महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अपने सुझाव भेजे लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। ताशकंद में शास्त्री जी के निधन की खबर मिलते ही गुरुजी सीधे गुवाहाटी से दिल्ली पहुँचे और अपने प्रिय प्रधानमंत्री को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित की। 1965 का यह कालखंड भारतीय इतिहास में ‘जय जवान, जय किसान’ के साथ ‘राष्ट्रीय एकजुटता’ का भी प्रतीक बना, जहाँ वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठकर नेतृत्व और संगठन ने राष्ट्र की सुरक्षा को सर्वोपरि रखा।।

Topics: 1965 Indo-Pak WarGuruji GolwalkarIndo-Pakistan War 1965Lal Bahadur ShastriRashtriya Swayamsevak SanghSangh Swayamsevak
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